विवेकचूडामणि: जीवभाव की निवृत्ति श्लोक १९१ - १९५

Vivekachudamani: The Crest Jewel of Discrimination


विवेकचूडामणि - शिष्य का प्रश्न और गुरु का उत्तर

विवेकचूडामणि: जीवभाव की निवृत्ति

श्लोक १९१ - १९५

उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा ह्युपाधिधर्माननुभाति तद्गुणः ।
अयोविकारानविकारिवह्निवत् सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥ १९१॥

हिन्दी: जैसे अग्नि स्वयं निर्विकार है, पर लोहे के संपर्क से वह लोहे के टेढ़े-मेढ़े आकार को अपना लेती है, वैसे ही शुद्ध आत्मा भी उपाधि (बुद्धि) के गुणों को अपना मानकर उनके धर्मों का अनुभव करने लगती है, यद्यपि वह स्वभाव से सदैव एकरूप ही रहती है।

English: Due to connection with the adjuncts (Upadhis), the Supreme Self appears to partake in their attributes, just as the changeless fire assumes the distortions of the iron it heats, though by nature it remains always the same.

शिष्य उवाच (The Disciple Said)
भ्रमेणाप्यन्यथा वाऽस्तु जीवभावः परात्मनः । तदुपाधेरनादित्वान्नानादेर्नाश इष्यते ॥ १९२॥
अतो अस्य जीवभावोऽपि नित्या भवति संसृतिः । न निवर्तेत तन्मोक्षः कथं मे श्रीगुरो वद ॥ १९३॥

हिन्दी: (शिष्य ने पूछा): हे गुरुदेव! चाहे भ्रम से हो या किसी और कारण से, यदि आत्मा में जीवभाव आ गया है और वह उपाधि (अज्ञान) 'अनादि' है, तो अनादि वस्तु का नाश तो संभव नहीं है। अतः यह जीवभाव और संसार भी नित्य होना चाहिए। फिर मोक्ष कैसे संभव होगा? कृपया मुझे समझाएं।

English: If the Jiva-hood of the Self is caused by delusion or otherwise, and since its cause (the Upadhi) is beginningless, a beginningless thing cannot have an end. Therefore, Jiva-hood must be eternal and there can be no liberation. Please explain this to me, O Master.

श्रीगुरुरुवाच (The Master Said)
सम्यक्पृष्टं त्वया विद्वन्सावधानेन तच्छृणु ।
प्रामाणिकी न भवति भ्रान्त्या मोहितकल्पना ॥ १९४॥

हिन्दी: (गुरु ने कहा): हे विद्वान शिष्य! तुमने बहुत सही प्रश्न पूछा है, अब ध्यान से सुनो। भ्रम या मोह के कारण की गई कल्पना कभी वास्तविक या प्रामाणिक नहीं हो सकती (इसलिए उसका अंत संभव है)।

English: You have asked rightly, O wise one! Listen attentively. A concept imagined through delusion and confusion can never be accepted as a factual reality.

भ्रान्तिं विना त्वसङ्गस्य निष्क्रियस्य निराकृतेः ।
न घटेतार्थसम्बन्धो नभसो नीलतादिवत् ॥ १९५॥

हिन्दी: वह जो असंग, निष्क्रिय और निराकार है (आत्मा), उसका किसी भी वस्तु के साथ संबंध बिना 'भ्रम' के संभव ही नहीं है—जैसे आकाश का वास्तव में कोई रंग नहीं होता, पर वह नीला दिखाई देता है।

English: Apart from delusion, the unattached, actionless, and formless Self can have no connection with the objective world. It is like the blueness of the sky, which is only a perceived error and not a reality.

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