कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४१
लावण्य का चरम उत्कर्ष एवं महाश्वेता की तन्मयता
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text - Page 141)
कमलानि सृजता प्रजापतिना प्रथममेतदाननाकारकरणकौशलाभ्यास एव कृतः। अन्यथा किमिव हि सदृशवस्तुविरचनायां कारणम्। अलोकं चेदं यथा किल सकलाः कलाः कलावतो बहुलपक्षे क्षीयमाणस्य सुषुम्नानाम्ना रश्मिना रविरापिबतीति। ताः खल्वस्य गभस्तयः समस्ता वपुरिदमाविशन्तीति। कुतोऽन्यथा रूपापहारिणि क्लेशबहुले तपसि वर्तमानस्येदं लावण्यम्। इति विचिन्तयन्तीमेव मामविचारितगुणदोषविशेषो रूपैकपक्षपाती नवयौवनसुलभः कुसुमायुधः कुसुमसमयमद इव मधुकरीं परवशामकरोत्।
उच्छ्वासितैः सह विस्मृतनिमेषेण किंचिदाकुलितपक्ष्मणा जिह्मतरलतरतारसारोदरेण दक्षिणेन चक्षुषा सस्पृहामपिबन्तीव किमपि याचमानेव त्वदायत्तास्मीति वदन्तीवाभिमुखं हृदयमर्पयन्तीव सर्वात्मनानुप्रविशन्तीव तन्मयतामिव गन्तुमीहमाना...
उच्छ्वासितैः सह विस्मृतनिमेषेण किंचिदाकुलितपक्ष्मणा जिह्मतरलतरतारसारोदरेण दक्षिणेन चक्षुषा सस्पृहामपिबन्तीव किमपि याचमानेव त्वदायत्तास्मीति वदन्तीवाभिमुखं हृदयमर्पयन्तीव सर्वात्मनानुप्रविशन्तीव तन्मयतामिव गन्तुमीहमाना...
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- व्यतिरेक एवं उत्प्रेक्षा: महाश्वेता सोचती है कि ब्रह्मा ने कमलों का निर्माण केवल इसलिए किया ताकि वे पुण्डरीक के मुख जैसा सुंदर आकार बनाने का अभ्यास कर सकें।
- तप और लावण्य का विरोध: बाणभट्ट यहाँ 'तप' (जो रूप को नष्ट करने वाला माना जाता है) और पुण्डरीक के 'अद्वितीय लावण्य' के बीच के विस्मयकारी संतुलन को रेखांकित करते हैं।
- मनोवैज्ञानिक चित्रण: कामदेव के प्रभाव को 'कुसुमसमयमद' (वसंत के उन्माद) के समान बताया गया है, जो महाश्वेता को विवश (परवशा) कर देता है।
- सात्विक भाव: महाश्वेता की दृष्टि का वर्णन—'विस्मृतनिमेषेण' (बिना पलक झपकाए)—उनकी पुण्डरीक के प्रति गहरी आसक्ति और तन्मयता को दर्शाता है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
महाश्वेता सोचती हैं—"निश्चित ही प्रजापति (ब्रह्मा) ने कमलों की रचना केवल इस मुनिकुमार के मुख की आकृति बनाने के अभ्यास के लिए की थी। अन्यथा, एक जैसी सुंदर वस्तुओं की रचना का और क्या कारण हो सकता है? यह बात भी असत्य ही लगती है कि चंद्रमा की कलाएँ सूर्य पी जाता है; सच तो यह है कि वे कलाएँ किरण बनकर इस (पुण्डरीक) के शरीर में प्रविष्ट हो गई हैं। वरना, रूप को क्षीण करने वाले इस कठिन तप में लगे हुए व्यक्ति के पास ऐसा अद्भुत लावण्य कहाँ से आता?"
इस प्रकार विचार करते हुए मुझे उस कामदेव ने, जो गुण-दोष का विचार नहीं करता और केवल रूप का पक्षपाती है, वैसे ही अपने वश में कर लिया जैसे वसंत का मद किसी भ्रमरी को विवश कर देता है। मैं अपनी पलकें झपकाना भूलकर, अपनी आँखों से मानो उन्हें पीती हुई, उनसे कुछ माँगती हुई और अपना हृदय उन्हें अर्पित करती हुई, पूरी तरह उनके प्रति तन्मय हो गई।
इस प्रकार विचार करते हुए मुझे उस कामदेव ने, जो गुण-दोष का विचार नहीं करता और केवल रूप का पक्षपाती है, वैसे ही अपने वश में कर लिया जैसे वसंत का मद किसी भ्रमरी को विवश कर देता है। मैं अपनी पलकें झपकाना भूलकर, अपनी आँखों से मानो उन्हें पीती हुई, उनसे कुछ माँगती हुई और अपना हृदय उन्हें अर्पित करती हुई, पूरी तरह उनके प्रति तन्मय हो गई।
४. English Translation
Mahashweta muses—"Surely the Creator practiced making the shape of this young man's face before he created the lotuses. Otherwise, what else could explain the creation of such similar objects? The legend that the Sun drinks the waning moon's phases also seems false; it must be that those lunar phases have entered and inhabited this body as rays of light. How else could such radiance exist in one performing harsh penance that usually destroys beauty?"
While I was thinking this, the God of Love—who favors beauty alone and ignores virtues or faults—made me helpless, just as the intoxication of spring overcomes a honeybee. Forgetting even to blink, drinking him in with my eyes, and silently offering my heart, I felt as if I were merging into him completely.
While I was thinking this, the God of Love—who favors beauty alone and ignores virtues or faults—made me helpless, just as the intoxication of spring overcomes a honeybee. Forgetting even to blink, drinking him in with my eyes, and silently offering my heart, I felt as if I were merging into him completely.
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४२
अंतर्मन का द्वंद्व एवं सात्विक विकारों का उदय
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text - Page 142)
निरीयुः श्वासरुतः। साभिलाषं हृदयमाख्यातुकाममिव स्फुरितमुखमभूतकुचयुगलम्। स्वेदसलिलवलैलेखाक्षालितेवागलल्लज्जा। मकरध्वजनिशितशरनिकरनिपातत्रस्तेवाकम्पत गात्रयष्टिः। तद्रूपातिशयं द्रष्टुमिव कुतूहलादालिङ्गनलालसेभ्योऽङ्गेभ्यो निरगाद्रोमाञ्चजालकम्। अशेषतः स्वेदाम्भसा धौतचरणयुगलादिव हृदयमविशद्रागः।
आसीच्च मम मनसि शान्तात्मनि दूरीकृतसुरतव्यतिकरेऽस्मिञ्जने मां निक्षिपता किमिदमलक्षणेनासदृशमारब्धं मनसिजेन। एवं च नातिगूढं हृदयमङ्गनाजनस्य। यदनुरागविषययोग्यतामपि विचारयितुं नालम्। क्व चदमतिभास्वरं धाम तेजसां तपसां च। क्व च प्राकृतजनाभिनन्दितानि मन्मथपरिस्पन्दितानि...
आसीच्च मम मनसि शान्तात्मनि दूरीकृतसुरतव्यतिकरेऽस्मिञ्जने मां निक्षिपता किमिदमलक्षणेनासदृशमारब्धं मनसिजेन। एवं च नातिगूढं हृदयमङ्गनाजनस्य। यदनुरागविषययोग्यतामपि विचारयितुं नालम्। क्व चदमतिभास्वरं धाम तेजसां तपसां च। क्व च प्राकृतजनाभिनन्दितानि मन्मथपरिस्पन्दितानि...
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- सात्विक भावों का वर्णन: यहाँ बाणभट्ट ने प्रेम के उदय होने पर होने वाले शारीरिक परिवर्तनों—स्वेद (पसीना), कम्प (काँपना) और रोमाञ्च (रोंगटे खड़े होना)—का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है।
- लज्जा का त्याग: 'स्वेदसलिल...अगलल्लज्जा'—पसीने की धाराओं ने मानो लज्जा को धो डाला हो, यह रूपक महाश्वेता की विवशता को दर्शाता है।
- वैषम्य अलंकार: महाश्वेता पुण्डरीक के 'तेजस्वी तप' और कामदेव की 'प्राकृत चंचलता' के बीच के भारी अंतर (क्व च... क्व च...) पर विचार कर आत्म-द्वंद्व में हैं।
- मनोवैज्ञानिक गहराई: एक कुलीन कन्या के मन में प्रेम के अचानक उदय होने पर उत्पन्न होने वाला संकोच और शाप का भय (कदाचिदनभिमतस्मरविकारदर्शनात्कुपितोयं शापाभिज्ञां करोति माम्) यहाँ स्पष्ट झलकता है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
मेरी लंबी सांसें चलने लगीं। मेरा हृदय मानो अभिलाषा से भरकर कुछ कहना चाहता था, जिससे मेरा वक्षस्थल काँप उठा। पसीने की बूंदों ने मेरी लज्जा को मानो पूरी तरह धो डाला। कामदेव के तीखे बाणों के प्रहार से डरकर मेरा शरीर काँपने लगा। उनके सौंदर्य को देखने की उत्सुकता और आलिंगन की लालसा में मेरे रोंगटे खड़े हो गए। ऐसा लगा मानो पसीने से धुले हुए पैरों के साथ अनुराग (प्रेम) सीधे मेरे हृदय में प्रविष्ट हो गया हो।
मेरे मन में विचार आया—"मुझ जैसी शांत और काम-विकारों से दूर रहने वाली कन्या को इस स्थिति में डालकर कामदेव ने यह कैसा अनुचित कार्य प्रारंभ किया है? स्त्रियों का हृदय कितना अस्थिर है कि वह पात्र की योग्यता का भी विचार नहीं कर पाता। कहाँ यह तपस्या का अत्यंत तेजस्वी स्वरूप और कहाँ साधारण जनों जैसी कामेच्छा की चंचलता! कहीं मेरे इन विकारों को देखकर यह मुनि क्रोधित होकर मुझे शाप न दे दें।" ऐसा सोचकर मैंने उन्हें प्रणाम किया।
मेरे मन में विचार आया—"मुझ जैसी शांत और काम-विकारों से दूर रहने वाली कन्या को इस स्थिति में डालकर कामदेव ने यह कैसा अनुचित कार्य प्रारंभ किया है? स्त्रियों का हृदय कितना अस्थिर है कि वह पात्र की योग्यता का भी विचार नहीं कर पाता। कहाँ यह तपस्या का अत्यंत तेजस्वी स्वरूप और कहाँ साधारण जनों जैसी कामेच्छा की चंचलता! कहीं मेरे इन विकारों को देखकर यह मुनि क्रोधित होकर मुझे शाप न दे दें।" ऐसा सोचकर मैंने उन्हें प्रणाम किया।
४. English Translation
Heavy sighs escaped me. My heart, eager to express its longing, caused a tremor in my bosom. It seemed as if the streams of perspiration washed away my inherent modesty. My body trembled as if terrified by the sharp arrows of the God of Love. Horripilation broke out all over my limbs, as if out of a curious desire to embrace his extraordinary beauty. Passion entered my heart as if having first washed its feet with my sweat.
I thought to myself—"What unsuitable task has the God of Love started by throwing me, a person of peaceful nature, into this state? The heart of a woman is indeed shallow, as it cannot even judge the suitability of the object of its affection. Where is this radiant abode of ascetic brilliance, and where is the frivolous movement of desire typical of common folk? I fear that observing these unwelcome signs of passion, he might get angry and curse me." With this in mind, I bowed to him.
I thought to myself—"What unsuitable task has the God of Love started by throwing me, a person of peaceful nature, into this state? The heart of a woman is indeed shallow, as it cannot even judge the suitability of the object of its affection. Where is this radiant abode of ascetic brilliance, and where is the frivolous movement of desire typical of common folk? I fear that observing these unwelcome signs of passion, he might get angry and curse me." With this in mind, I bowed to him.
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४३
पुण्डरीक के सात्विक विकार एवं महाश्वेता की विस्मयकारी अनुभूति
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text - Page 143)
अथ कृतप्रणामायां मयि दुर्लक्ष्यशासनतया भगवतो मनोभुवो मदुजननतया च मधुमासस्यातिरमणीयतया च तस्य प्रदेशस्याविनयबहुलतया चाभिनवयौवनस्य चंचलप्रकृतितया चेन्द्रियाणां... तदा तस्याप्यभिनवागतं मदनं प्रत्युद्गच्छन्निव रोमोद्गमः प्रादुरभवत्। मत्सकाशमभिप्रस्थितस्य मनसो मार्गमिवोपदर्शयन्तः पुरः प्रवृत्तं श्वासैः। वेपथुगृहीता व्रतभङ्गभीतेवाकम्पत करतलगताक्षमाला। द्वितीयेव कर्णावसक्तकुसुममंजरी कपोलतला संगिनी समदृश्यत स्वेदसलिलसीकरजालिका।
तथा तु तस्यातिप्रकटया विक्रया द्विगुणीकृतमदनावेशा तत्क्षणमहमवर्णनीययोग्यां कामप्यवस्थामन्वभवम्। इदं च मनस्यकरवम्। अनेकसुरतसमागमलास्यलीलोपदेशोपाध्यायो मकरकेतुरेव विलासानुपदिशति... कुतश्चेदमतिनैपुण्यं यच्चक्षुषैवानक्षरमेवमन्तर्गतो हृदयाभिलाषः कथ्यते।
तथा तु तस्यातिप्रकटया विक्रया द्विगुणीकृतमदनावेशा तत्क्षणमहमवर्णनीययोग्यां कामप्यवस्थामन्वभवम्। इदं च मनस्यकरवम्। अनेकसुरतसमागमलास्यलीलोपदेशोपाध्यायो मकरकेतुरेव विलासानुपदिशति... कुतश्चेदमतिनैपुण्यं यच्चक्षुषैवानक्षरमेवमन्तर्गतो हृदयाभिलाषः कथ्यते।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- सात्विक विकारों का प्रतिरोपण: जिस प्रकार महाश्वेता के भीतर सात्विक भाव जागे थे, पुण्डरीक के शरीर में भी रोमहर्ष (रोमांच), श्वास की गति बढ़ना और हाथ का काँपना जैसे विकार प्रकट हुए।
- उत्प्रेक्षा अलंकार: पुण्डरीक के हाथ की अक्षमाला (माला) का काँपना ऐसा चित्रित किया गया है मानो वह माला स्वयं व्रत के टूटने के भय से काँप रही हो।
- स्वेद चित्रण: कपोलों (गालों) पर पसीने की बूंदों की तुलना कानों में पहनी गई दूसरी 'कुसुम-मंजरी' से की गई है, जो बाणभट्ट की सूक्ष्म उपमा का उदाहरण है।
- मौन भाषा: 'अक्षरहीन' संवाद का वर्णन—बिना किसी शब्द के केवल आँखों (चक्षुषा) के माध्यम से हृदय की अभिलाषा का व्यक्त होना प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
जब मैंने उन्हें प्रणाम किया, तब कामदेव की अदम्य शक्ति, वसंत ऋतु की रमणीयता, उस स्थान के प्रभाव और नवयौवन की चंचलता के कारण, उनके (पुण्डरीक के) शरीर में भी रोमाँच उभर आया, मानो वे नए-नए आए कामदेव का स्वागत कर रहे हों। उनकी लंबी सांसें ऐसी लग रही थीं मानो वे मेरी ओर प्रस्थान करने वाले उनके मन के लिए रास्ता दिखा रही हों। उनके हाथ में पकड़ी हुई जपमाला ऐसे काँपने लगी मानो वह स्वयं मुनि का व्रत टूटने के डर से काँप रही हो। उनके कपोलों पर पसीने की बूंदें ऐसी लग रही थीं मानो कानों में एक और फूलों का गुच्छा (मंजरी) लगा हो।
उनके इन स्पष्ट विकारों को देखकर मेरा काम-आवेश और बढ़ गया और मैं एक ऐसी अवस्था में पहुँच गई जिसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। मैंने मन में सोचा—"निश्चित ही कामदेव ही वह गुरु है जो विलासों की शिक्षा देता है। यह कैसी निपुणता है कि बिना किसी अक्षर के, केवल आँखों से ही हृदय की सारी इच्छा व्यक्त की जा रही है!"
उनके इन स्पष्ट विकारों को देखकर मेरा काम-आवेश और बढ़ गया और मैं एक ऐसी अवस्था में पहुँच गई जिसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। मैंने मन में सोचा—"निश्चित ही कामदेव ही वह गुरु है जो विलासों की शिक्षा देता है। यह कैसी निपुणता है कि बिना किसी अक्षर के, केवल आँखों से ही हृदय की सारी इच्छा व्यक्त की जा रही है!"
४. English Translation
As I bowed to him, due to the irresistible command of the God of Love, the exquisite beauty of spring, and the inherent restlessness of new youth, a thrill (horripilation) appeared on his (Pundarik's) body as if to welcome the newly arrived Cupid. His deep sighs seemed like scouts showing the path to his mind that was setting out towards me. The rosary in his hand trembled as if terrified that the ascetic's vows were about to break. The droplets of sweat on his cheeks appeared like a second clusters of flowers tucked behind his ears.
Witnessing his visible agitation, my own passion was redoubled, and I experienced an indescribable state of being. I thought—"Surely, the fish-bannered god (Kamadeva) is the master teacher who instructs in the arts of love. What extraordinary skill this is, where the longing of the heart is expressed through the eyes alone, without any words!"
Witnessing his visible agitation, my own passion was redoubled, and I experienced an indescribable state of being. I thought—"Surely, the fish-bannered god (Kamadeva) is the master teacher who instructs in the arts of love. What extraordinary skill this is, where the longing of the heart is expressed through the eyes alone, without any words!"
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४४
पुण्डरीक का परिचय एवं जन्म कथा
१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text - Page 144)
पूर्वकमपृच्छम्। भगवन्किमभिधानः कस्य चायं तपोधनयुवा। किंनामधेयस्य तरोरियमनेनावतंसीकृता कुसुममंजरी। स तु मामीषद्विहस्याब्रवीत्। बाले किमनेन पृष्ठेन प्रयोजनम्। अथ कौतुकमावेदयामि। श्रूयताम्। अस्ति खलु सकलत्रिभुवनप्रख्यातकीर्तिरत्युदारतया सुरासुरसिद्धवन्दितचरणयुगलो महामुनिर्दिव्यलोकनिवासी श्वेतकेतुर्नाम। तस्य भगवतः सुरासुरलोकसुन्दरीहृदयानन्दकरमशेषत्रिभुवनसुन्दरमतिशयितनलकूबरं रूपमासीत्।
स कदाचिद्देवतार्चनकमलान्युद्धर्तुमैरावतमदजलविन्दुबद्धचन्द्रकशतखचितजलां मन्दाकिनीमवततार। अवतरन्तं च तदा कमलवनेषु संततसंनिहिता विकचसहस्रपत्रपुण्डरीकोपविष्टा देवी लक्ष्मीर्ददर्श। तस्यास्तमवलोकयन्त्याः प्रेममदमुकुलितेनानन्दबाष्पभरतरंगतरलतारेण लोचनयुगलेन रूपमास्वादयन्त्या मन्मथविकृतं मन आसीत्। तस्माच्च कुमारः समुदपादि। ततस्तमुत्संगेनादाय सा भगवन्गृहाण तवायमात्मज इत्युक्त्वा तस्मै श्वेतकेतवे ददौ। असौ पुण्डरीकसम्भवतया तदेव पुण्डरीक इति नाम चक्रे।
स कदाचिद्देवतार्चनकमलान्युद्धर्तुमैरावतमदजलविन्दुबद्धचन्द्रकशतखचितजलां मन्दाकिनीमवततार। अवतरन्तं च तदा कमलवनेषु संततसंनिहिता विकचसहस्रपत्रपुण्डरीकोपविष्टा देवी लक्ष्मीर्ददर्श। तस्यास्तमवलोकयन्त्याः प्रेममदमुकुलितेनानन्दबाष्पभरतरंगतरलतारेण लोचनयुगलेन रूपमास्वादयन्त्या मन्मथविकृतं मन आसीत्। तस्माच्च कुमारः समुदपादि। ततस्तमुत्संगेनादाय सा भगवन्गृहाण तवायमात्मज इत्युक्त्वा तस्मै श्वेतकेतवे ददौ। असौ पुण्डरीकसम्भवतया तदेव पुण्डरीक इति नाम चक्रे।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- पात्र परिचय: पुण्डरीक को दिव्य मुनि श्वेतकेतु और देवी लक्ष्मी का पुत्र बताया गया है, जो उनके अलौकिक सौंदर्य का कारण स्पष्ट करता है।
- नामकरण: उनका जन्म कमल (पुण्डरीक) के संसर्ग से हुआ था, इसलिए उनका नाम 'पुण्डरीक' पड़ा।
- रूप की तुलना: श्वेतकेतु के रूप को 'नलकूबर' (कुबेर के पुत्र) से भी श्रेष्ठ बताया गया है, जो प्राचीन साहित्य में सौंदर्य का मानक माने जाते थे।
- मन्दाकिनी का वर्णन: गंगा के जल को ऐरावत हाथी के मद-बिन्दुओं से युक्त चन्द्रमा के समान चित्रित किया गया है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
मैंने (महाश्वेता ने) विनम्रतापूर्वक पूछा—"हे भगवन! यह युवा तपस्वी कौन हैं और इनका नाम क्या है? इन्होंने कान पर किस वृक्ष की पुष्प-मंजरी लगा रखी है? क्योंकि इसकी अपूर्व सुगंध मेरे मन में भारी कौतूहल पैदा कर रही है"।
वह मुनिकुमार थोड़ा मुस्कुराकर बोले—"बालिके! यह पूछने की क्या आवश्यकता है? फिर भी तुम्हारी जिज्ञासा शांत करने के लिए बताता हूँ, सुनो। दिव्यलोक में श्वेतकेतु नाम के एक अत्यंत उदार और प्रसिद्ध महामुनि रहते हैं, जिनकी वंदना देवता और असुर भी करते हैं। उनका रूप इतना सुंदर था कि वे साक्षात् नलकूबर से भी श्रेष्ठ थे। एक बार जब वे देवताओं की पूजा के लिए कमल के फूल लेने मन्दाकिनी (गंगा) में उतरे, तब खिले हुए श्वेत कमलों (पुण्डरीक) पर बैठी देवी लक्ष्मी ने उन्हें देखा। उन्हें देखकर लक्ष्मी का मन काम-विकार से भर गया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। लक्ष्मी ने उस बालक को श्वेतकेतु को सौंप दिया। चूँकि उनका जन्म पुण्डरीक (कमल) में हुआ था, इसलिए उनका नाम 'पुण्डरीक' रखा गया। यह वही पुण्डरीक हैं।"
वह मुनिकुमार थोड़ा मुस्कुराकर बोले—"बालिके! यह पूछने की क्या आवश्यकता है? फिर भी तुम्हारी जिज्ञासा शांत करने के लिए बताता हूँ, सुनो। दिव्यलोक में श्वेतकेतु नाम के एक अत्यंत उदार और प्रसिद्ध महामुनि रहते हैं, जिनकी वंदना देवता और असुर भी करते हैं। उनका रूप इतना सुंदर था कि वे साक्षात् नलकूबर से भी श्रेष्ठ थे। एक बार जब वे देवताओं की पूजा के लिए कमल के फूल लेने मन्दाकिनी (गंगा) में उतरे, तब खिले हुए श्वेत कमलों (पुण्डरीक) पर बैठी देवी लक्ष्मी ने उन्हें देखा। उन्हें देखकर लक्ष्मी का मन काम-विकार से भर गया और उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। लक्ष्मी ने उस बालक को श्वेतकेतु को सौंप दिया। चूँकि उनका जन्म पुण्डरीक (कमल) में हुआ था, इसलिए उनका नाम 'पुण्डरीक' रखा गया। यह वही पुण्डरीक हैं।"
४. English Translation
I (Mahashweta) asked politely—"O Holy One, who is this young ascetic and what is his name? From which tree does this cluster of flowers behind his ear belong? Its unprecedented fragrance creates great curiosity in my mind".
Smiling slightly, he replied—"Child, what is the need for such a question? Yet, to satisfy your curiosity, listen. There lives in the celestial world a great sage named Shvetaketu, whose fame is known across the three worlds and whose feet are worshiped by gods and demons alike. His beauty surpassed even that of Nalakubara. Once, while descending into the Mandakini river to gather lotuses for worship, he was spotted by Goddess Lakshmi, who was seated upon a blooming white lotus (Pundarika). Beholding him, her mind was agitated with love, and from their union, a son was born. She handed the infant to Shvetaketu, and because he was born through the medium of the lotus, he was named 'Pundarika'. This is that very Pundarika."
Smiling slightly, he replied—"Child, what is the need for such a question? Yet, to satisfy your curiosity, listen. There lives in the celestial world a great sage named Shvetaketu, whose fame is known across the three worlds and whose feet are worshiped by gods and demons alike. His beauty surpassed even that of Nalakubara. Once, while descending into the Mandakini river to gather lotuses for worship, he was spotted by Goddess Lakshmi, who was seated upon a blooming white lotus (Pundarika). Beholding him, her mind was agitated with love, and from their union, a son was born. She handed the infant to Shvetaketu, and because he was born through the medium of the lotus, he was named 'Pundarika'. This is that very Pundarika."
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४५
अनुराग की अभिव्यक्ति एवं प्रथम संवाद
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Highlights)
अथ स तामेव कुसुममंजरीं मत्सकाशादुपलभ्य "बाले! किमनेन त्वया विस्मृतेन" इति मदभिमुखं प्रसारयामास। अहंतु तद्रूपालोकनविह्वला मदनशरशलाकाकीलितेव सौन्दर्यगुणस्यूतेव तन्मुखाल्लावण्यमृतपङ्कमग्नेव... तथाविधं तस्य धैर्यस्खलितमालोक्य किंचित्प्रकटितप्रणयकोप इवावादीत्।
"सखे पुण्डरीक! नैतदनुरूपं भवतः। क्षुद्रजनक्षुण्ण एष मार्गः। धैर्यधना हि साधवः। किं यः कश्चित्प्राकृत इव विक्लवीभवन्मात्मानं न रुणत्सि? क्व ते तद्धैर्यम्? क्वासौ इन्द्रियजयः? क्व तद्वशित्वं चेततः?"
"सखे पुण्डरीक! नैतदनुरूपं भवतः। क्षुद्रजनक्षुण्ण एष मार्गः। धैर्यधना हि साधवः। किं यः कश्चित्प्राकृत इव विक्लवीभवन्मात्मानं न रुणत्सि? क्व ते तद्धैर्यम्? क्वासौ इन्द्रियजयः? क्व तद्वशित्वं चेततः?"
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- धैर्य स्खलन का चित्रण: यहाँ पुण्डरीक जैसे महामुनि पुत्र का धैर्य भी महाश्वेता के रूप के सामने डगमगा जाता है। उनके साथी मुनि द्वारा उन्हें टोकना 'साधु मर्यादा' और 'काम वेग' के बीच के संघर्ष को दिखाता है।
- उपमा अलंकार: महाश्वेता की स्थिति का वर्णन—'मदनशरशलाकाकीलितेव' (कामदेव के बाणों से मानो कील दी गई हो)—अत्यंत प्रभावी है।
- विवेकहीनता: साथी मुनि पुण्डरीक को चेताते हैं कि वे प्राकृत (साधारण) जनों की भांति व्यवहार न करें, क्योंकि साधुओं का असली धन 'धैर्य' ही होता है।
- इन्द्रिय जय: इस पृष्ठ पर इन्द्रियों के संयम और ब्रह्मचर्य के महत्त्व पर कई प्रश्न उठाए गए हैं (क्व ते तद्धैर्यम्?), जो बाणभट्ट की दार्शनिक सोच को दर्शाते हैं।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
जब मैंने उनसे प्रश्न किया, तो उन्होंने उसी पुष्प-मंजरी को मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा—"बाले! तुम इसे यहाँ कैसे भूल गई?" मैं तो उनके रूप को देखकर इतनी विह्वल थी मानो कामदेव के बाणों ने मुझे जड़ कर दिया हो, या उनके मुख के लावण्य रूपी अमृत-पंक (कीचड़) में मैं डूब गई हूँ।
उनकी इस धैर्यहीन स्थिति को देखकर उनके साथी मुनिकुमार (कपिंजल) थोड़े क्रोध और स्नेह के साथ बोले—"सखे पुण्डरीक! यह आपको शोभा नहीं देता। यह मार्ग तो साधारण और नीच लोगों का है। साधुओं का धन तो उनका धैर्य होता है। आप एक साधारण मनुष्य की तरह व्याकुल होकर खुद पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहे हैं? कहाँ गया आपका वह धैर्य? कहाँ गया इन्द्रियों पर वह विजय? कहाँ गई वह चित्त की शांति और वह ब्रह्मचर्य?"
उनकी इस धैर्यहीन स्थिति को देखकर उनके साथी मुनिकुमार (कपिंजल) थोड़े क्रोध और स्नेह के साथ बोले—"सखे पुण्डरीक! यह आपको शोभा नहीं देता। यह मार्ग तो साधारण और नीच लोगों का है। साधुओं का धन तो उनका धैर्य होता है। आप एक साधारण मनुष्य की तरह व्याकुल होकर खुद पर नियंत्रण क्यों नहीं रख पा रहे हैं? कहाँ गया आपका वह धैर्य? कहाँ गया इन्द्रियों पर वह विजय? कहाँ गई वह चित्त की शांति और वह ब्रह्मचर्य?"
४. English Translation
Then, extending that same cluster of flowers towards me, he said, "Child, how did you forget this here?" I was so overwhelmed by his beauty that I felt as if I were transfixed by the shafts of Cupid, or submerged in the nectar-mud of his radiant face.
Seeing his loss of composure, his companion (Kapinjala) spoke with a mix of affection and slight anger—"Friend Pundarika! This does not befit you. This path is trodden by ordinary folk. For the virtuous, patience is their only wealth. Why are you behaving like a commoner and not restraining yourself? Where is your legendary fortitude? Where is your mastery over the senses? Where is that peace of mind and that lifelong vow of celibacy?"
Seeing his loss of composure, his companion (Kapinjala) spoke with a mix of affection and slight anger—"Friend Pundarika! This does not befit you. This path is trodden by ordinary folk. For the virtuous, patience is their only wealth. Why are you behaving like a commoner and not restraining yourself? Where is your legendary fortitude? Where is your mastery over the senses? Where is that peace of mind and that lifelong vow of celibacy?"
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४६
अक्षमाला का विनिमय एवं विरह की प्रथम अनुभूति
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Highlights)
इत्येवमभिधीयमानश्च तेन किंचिदुपजातलब्ज इव प्रत्यवादीत्। सखे कपिञ्जल! किं मामन्यथा संभावयसि। नाहमेवमस्या दुर्विनीत-कन्याकाया मर्षयाम्यक्षमालाग्रहणपराधमिमम्। इत्यभिधायालीककोपकान्तेन... मुखेन्दुना मामवदन्। चञ्चले! प्रदेशादस्मादिमामक्षमालां दत्त्वा पदात्पदमपि न गन्तव्यमिति। तच्च श्रुत्वाहमात्मकण्ठादुन्मुच्य मकरध्वजस्य... एकावलीं 'भगवन्गृह्यतामक्षमलेति' तस्य प्रसारिते पाणौ निधाय स्वेदसलिलस्नातापि पुनः स्नातुमावतरम्।
गत्वा च प्रविश्य कन्यान्तःपुरं ततः प्रभृति तद्विरहविधुरा किमागतास्मि किं तत्रैव स्थितास्मि... किं जागर्मि किं सुप्तास्मि किं रोदिमि किं न रोदिमि... सर्वं नावागच्छम्।
गत्वा च प्रविश्य कन्यान्तःपुरं ततः प्रभृति तद्विरहविधुरा किमागतास्मि किं तत्रैव स्थितास्मि... किं जागर्मि किं सुप्तास्मि किं रोदिमि किं न रोदिमि... सर्वं नावागच्छम्।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- मिथ्या कोप (False Anger): पुण्डरीक अपने मित्र कपिंजल के सामने लज्जित होकर महाश्वेता पर बनावटी गुस्सा (अलीक-कोप) दिखाते हैं, जो उनके भीतर छिपे प्रेम को और अधिक उजागर करता है।
- एकावली का समर्पण: महाश्वेता अपनी मोतियों की माला (एकावली) पुण्डरीक को सौंप देती हैं, जो उनके पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
- विरह की मनोवैज्ञानिक अवस्था: बाणभट्ट ने यहाँ विरह की उस स्थिति का वर्णन किया है जहाँ मनुष्य की सुध-बुध खो जाती है। 'किं जागर्मि किं सुप्तास्मि'—यह अनिर्णय की स्थिति प्रेम की तीव्रता को दर्शाती है।
- तन्मयता: महाश्वेता अपने महल लौटकर भी मानसिक रूप से उसी दिशा (अछोद सरोवर) की ओर देखती रहती हैं जहाँ पुण्डरीक हैं, मानो वह दिशा अमृत रस से भर गई हो।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
कपिनजल द्वारा टोके जाने पर पुण्डरीक ने थोड़ा लज्जित होकर उत्तर दिया—"मित्र कपिंजल! तुम मेरे बारे में क्या सोच रहे हो? मैं इस चंचल कन्या द्वारा मेरी अक्षमाला लिए जाने के अपराध को ऐसे ही नहीं छोड़ दूँगा"। ऐसा कहकर, बनावटी क्रोध से सुंदर लग रहे अपने मुख से उन्होंने मुझसे कहा—"ओ चंचल कन्या! जब तक तुम मेरी अक्षमाला वापस नहीं देतीं, यहाँ से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ना"।
उनकी बात सुनकर मैंने अपने गले से मोतियों की माला (एकावली) उतारी और "भगवन! अपनी माला ले लीजिए" कहते हुए उनके फैले हुए हाथ पर रख दी। इसके बाद मैं सखियों के साथ अपने महल लौट आई। वहाँ पहुँचकर मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था—मैं महल आ गई हूँ या अभी वहीं हूँ? मैं जाग रही हूँ या सो रही हूँ? मैं रो रही हूँ या नहीं? मुझे दिन-रात, सुख-दुःख किसी का ज्ञान नहीं रहा। मैं बस झरोखे पर बैठकर उसी दिशा की ओर देखती रहती थी जहाँ वे (पुण्डरीक) थे।
उनकी बात सुनकर मैंने अपने गले से मोतियों की माला (एकावली) उतारी और "भगवन! अपनी माला ले लीजिए" कहते हुए उनके फैले हुए हाथ पर रख दी। इसके बाद मैं सखियों के साथ अपने महल लौट आई। वहाँ पहुँचकर मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था—मैं महल आ गई हूँ या अभी वहीं हूँ? मैं जाग रही हूँ या सो रही हूँ? मैं रो रही हूँ या नहीं? मुझे दिन-रात, सुख-दुःख किसी का ज्ञान नहीं रहा। मैं बस झरोखे पर बैठकर उसी दिशा की ओर देखती रहती थी जहाँ वे (पुण्डरीक) थे।
४. English Translation
Questioned by Kapinjala, Pundarika replied with a hint of bashfulness—"Friend, what do you take me for? I shall not tolerate this offense of taking away my rosary by this unruly maiden". Saying this, with a face beautiful in feigned anger, he said to me—"O restless one! Do not move even a step from this place until you return the rosary".
Hearing this, I took off the pearl necklace (Ekavali) from my neck and, saying "O Holy One, please accept your rosary," placed it in his extended hand. Afterward, I returned to the inner palace with my companions. From that moment on, overcome by the pain of separation, I lost all sense of my surroundings—I knew not if I had returned or was still there, if I was awake or asleep, if I was weeping or not. I simply sat by the window, gazing incessantly towards the direction where he dwelt.
Hearing this, I took off the pearl necklace (Ekavali) from my neck and, saying "O Holy One, please accept your rosary," placed it in his extended hand. Afterward, I returned to the inner palace with my companions. From that moment on, overcome by the pain of separation, I lost all sense of my surroundings—I knew not if I had returned or was still there, if I was awake or asleep, if I was weeping or not. I simply sat by the window, gazing incessantly towards the direction where he dwelt.
कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४७
विरह-वेदना एवं सुध-बुध का विस्मरण
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Highlights)
चञ्चले! प्रदेशादस्मादिमामक्षमालां दत्त्वा पदात्पदमपि न गन्तव्यमिति। तच्च श्रुत्वाहमात्मकण्ठादुन्मुच्य मकरध्वजलास्यारम्भलीलापुष्पाञ्जलिमेकावलीं 'भगवन्गृह्यतामक्षमला' इति तस्य प्रसारिते पाणौ निधाय... तमेव चिन्तयन्ती स्वभवनमयासिषम्।
गत्वा च प्रविश्य कन्यान्तःपुरं ततः प्रभृति तद्विरहविधुरा किमागतास्मि किं तत्रैव स्थितास्मि... किं रोदिमि किं न रोदिमि किं दुःखमिदं किं सुखमिदम्... सर्वं नावागच्छम्। केवलमारुह्य कुमारीपुरप्रासादं विसृज्य च सखीजनं... तामेव दिशं... पूर्णचन्द्रोदयलंकृतामिव दर्शनसुभगामीक्षमाणा...
गत्वा च प्रविश्य कन्यान्तःपुरं ततः प्रभृति तद्विरहविधुरा किमागतास्मि किं तत्रैव स्थितास्मि... किं रोदिमि किं न रोदिमि किं दुःखमिदं किं सुखमिदम्... सर्वं नावागच्छम्। केवलमारुह्य कुमारीपुरप्रासादं विसृज्य च सखीजनं... तामेव दिशं... पूर्णचन्द्रोदयलंकृतामिव दर्शनसुभगामीक्षमाणा...
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
- छल-कपट रहित अनुराग: पुण्डरीक का महाश्वेता को 'चंचल' कहकर रोकना और अक्षमाला माँगना उनके भीतर के आकर्षण का एक बहाना मात्र है, जिसे बाणभट्ट ने 'अलीक-कोप' (झूठा गुस्सा) कहा है।
- एकावली का प्रतीक: महाश्वेता द्वारा अपनी मोतियों की माला (एकावली) पुण्डरीक के हाथ में रखना उनके पूर्ण आत्म-समर्पण और हृदय के विनिमय को दर्शाता है।
- स्मृति-भ्रम (Mental Abstraction): विरह की अवस्था में महाश्वेता की मानसिक स्थिति का वर्णन—जहाँ उन्हें यह भी बोध नहीं रहता कि वे रो रही हैं या जाग रही हैं—शास्त्रीय वियोग श्रृंगार की 'मोह' नामक दशा का सुंदर उदाहरण है।
- दिशोन्मुखी दृष्टि: झरोखे से उसी दिशा की ओर देखते रहना जहाँ नायक स्थित है, नायक की उपस्थिति के बिना भी उस स्थान को 'अमृत-सागर' जैसा अनुभव करना तन्मयता की पराकाष्ठा है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
पुण्डरीक ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए मुझसे कहा—"अरे चंचल! जब तक तू मेरी यह अक्षमाला नहीं लौटा देती, यहाँ से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ना"। उनकी यह बात सुनकर मैंने अपने गले से मोतियों की वह माला (एकावली) उतारी, जो मानो कामदेव के नृत्य के आरंभ की पुष्पांजलि थी, और "भगवन! यह अक्षमाला लीजिए" कहते हुए उनके बढ़े हुए हाथ पर रख दी।
इसके बाद मैं किसी तरह अपने महल लौटी, पर मेरा मन वहीं रह गया। विरह में मेरी सुध-बुध ऐसी खो गई कि मुझे यह भी पता नहीं चलता था कि मैं महल आ गई हूँ या अभी भी वहीं खड़ी हूँ। मैं जाग रही हूँ या सो रही हूँ, मैं रो रही हूँ या नहीं, यह सुख है या दुःख—मुझे कुछ समझ नहीं आता था। मैं बस अपनी सखियों को विदा कर झरोखे पर बैठी उस दिशा की ओर ताकती रहती थी जहाँ पुण्डरीक थे, मानो वह दिशा ही पूर्ण चंद्रमा के उदय से सुशोभित और अमृत-रस से सराबोर हो।
इसके बाद मैं किसी तरह अपने महल लौटी, पर मेरा मन वहीं रह गया। विरह में मेरी सुध-बुध ऐसी खो गई कि मुझे यह भी पता नहीं चलता था कि मैं महल आ गई हूँ या अभी भी वहीं खड़ी हूँ। मैं जाग रही हूँ या सो रही हूँ, मैं रो रही हूँ या नहीं, यह सुख है या दुःख—मुझे कुछ समझ नहीं आता था। मैं बस अपनी सखियों को विदा कर झरोखे पर बैठी उस दिशा की ओर ताकती रहती थी जहाँ पुण्डरीक थे, मानो वह दिशा ही पूर्ण चंद्रमा के उदय से सुशोभित और अमृत-रस से सराबोर हो।
४. English Translation
Pundarika, with a face beautiful in feigned anger, said to me—"O restless one! Do not move even a step from this place until you return this rosary". Hearing this, I took off from my neck the single-string pearl necklace (Ekavali)—which was like an offering of flowers for the beginning of Cupid's dance—and saying, "O Holy One, please accept this rosary," I placed it in his outstretched hand.
I returned to my palace with my companions, yet I remained consumed by his thoughts. Overwhelmed by the agony of separation, I lost all awareness of my actions—I knew not if I had returned or remained behind, if I was awake or asleep, or if I was weeping or silent. Dismissing my attendants, I simply sat by the window, gazing incessantly towards the direction where he dwelt, as if that very direction were adorned by the rising full moon and flooded with the essence of nectar.
I returned to my palace with my companions, yet I remained consumed by his thoughts. Overwhelmed by the agony of separation, I lost all awareness of my actions—I knew not if I had returned or remained behind, if I was awake or asleep, or if I was weeping or silent. Dismissing my attendants, I simply sat by the window, gazing incessantly towards the direction where he dwelt, as if that very direction were adorned by the rising full moon and flooded with the essence of nectar.
कादम्बरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४८
तरलिका का आगमन और पुण्डरीक का संदेश
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Text)
तस्मादिगन्तरादागच्छन्तमनिलमपि वनकुसुमपरिमलमपि शकुनिध्वनिमपि तद्वार्त्तां प्रष्टुमीहमाना तद्वल्लभतया तपःक्लेशायापि स्पृहयन्ती... निस्पन्दमतिष्ठम्।
अथ ताम्बूलकरङ्कवाहिनी मदीया तरलिका नाम मयैव सह गता ज्ञातुमासीत्। सा च पश्चाच्चिरादिवागत्य तथावस्थितां शनैर्मामवादीत्— "भर्तृदारिके! यौ तौ तापसकुमारौ दिव्याकारवास्माभिरच्छोदसरस्तीरे दृष्टौ, तयोरेको येन भर्तृदुहितुरियमवतंसीकृता सुरतरुकुसुममञ्जरी स तस्माद्वितीयादात्मनो रक्षन्दर्शनमतिनिभृतपदः... मामुपसृत्य प्राक्षीत्— बालिके! केयं कन्यका कस्य वापत्यं किमभिधाना क्व गच्छतीति"।
अथ ताम्बूलकरङ्कवाहिनी मदीया तरलिका नाम मयैव सह गता ज्ञातुमासीत्। सा च पश्चाच्चिरादिवागत्य तथावस्थितां शनैर्मामवादीत्— "भर्तृदारिके! यौ तौ तापसकुमारौ दिव्याकारवास्माभिरच्छोदसरस्तीरे दृष्टौ, तयोरेको येन भर्तृदुहितुरियमवतंसीकृता सुरतरुकुसुममञ्जरी स तस्माद्वितीयादात्मनो रक्षन्दर्शनमतिनिभृतपदः... मामुपसृत्य प्राक्षीत्— बालिके! केयं कन्यका कस्य वापत्यं किमभिधाना क्व गच्छतीति"।
२. व्याकरण एवं कोश (Grammar & Vocabulary)
- तद्वार्त्ताम्: तस्य वार्त्ताम् (षष्ठी तत्पुरुष) - उनका समाचार।
- ईहमाना: ईह् (चेष्टा करना) + शानच् प्रत्यय - इच्छा करती हुई।
- ताम्बूलकरङ्कवाहिनी: ताम्बूलस्य करङ्कं (पान का डब्बा) वहति इति - उपपद तत्पुरुष।
- प्राक्षीत्: प्रच्छ् (पूछना) धातु, लुङ् लकार (Aorist), प्रथम पुरुष, एकवचन - पूछा।
- किम्-अभिधाना: किम् अभिधानं (नाम) यस्याः सा (बहुव्रीहि) - जिसका नाम क्या है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
उस दिशा से आती हुई हवा, वन-फूलों की सुगंध और पक्षियों की आवाजों से भी मैं उनका (पुण्डरीक का) समाचार पूछने की इच्छा करती थी। उनके प्रति अनुराग के कारण मुझे उनके द्वारा झेले जा रहे तपस्या के कष्टों से भी ईर्ष्या होने लगी।
तभी मेरी 'तरलिका' नाम की दासी, जो पान का डब्बा लेकर मेरे साथ गई थी, काफी देर बाद वापस आई और मेरी व्याकुल अवस्था को देखकर धीरे से बोली— "राजकुमारी! अछोद सरोवर के तट पर हमने जिन दो दिव्य तापस कुमारों को देखा था, उनमें से वह (पुण्डरीक), जिसने आपको कल्पवृक्ष की मंजरी भेंट की थी, अपने दूसरे साथी (कपिंजल) से छिपते हुए दबे पाँव मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे पूछा— बालिके! यह कन्या कौन है? किसकी पुत्री है? इसका नाम क्या है और यह कहाँ जा रही है?"
तभी मेरी 'तरलिका' नाम की दासी, जो पान का डब्बा लेकर मेरे साथ गई थी, काफी देर बाद वापस आई और मेरी व्याकुल अवस्था को देखकर धीरे से बोली— "राजकुमारी! अछोद सरोवर के तट पर हमने जिन दो दिव्य तापस कुमारों को देखा था, उनमें से वह (पुण्डरीक), जिसने आपको कल्पवृक्ष की मंजरी भेंट की थी, अपने दूसरे साथी (कपिंजल) से छिपते हुए दबे पाँव मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे पूछा— बालिके! यह कन्या कौन है? किसकी पुत्री है? इसका नाम क्या है और यह कहाँ जा रही है?"
४. English Translation
I was eager to ask even the wind, the fragrance of forest flowers, and the chirping of birds coming from that direction about his welfare. Out of love for him, I even began to envy the hardships of penance he endured.
Then my attendant named Taralika, who carries the betel-box and had gone with me, returned after a long time and seeing my state, softly said— "O Princess! Of the two divine young ascetics we saw on the banks of Lake Achhoda, the one who had adorned you with the cluster of heavenly flowers, approached me stealthily, hiding from his companion. He asked me— O girl! Who is this maiden? Whose daughter is she? What is her name and where is she going?"
Then my attendant named Taralika, who carries the betel-box and had gone with me, returned after a long time and seeing my state, softly said— "O Princess! Of the two divine young ascetics we saw on the banks of Lake Achhoda, the one who had adorned you with the cluster of heavenly flowers, approached me stealthily, hiding from his companion. He asked me— O girl! Who is this maiden? Whose daughter is she? What is her name and where is she going?"
कादम्बरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १४९
वल्कल-पत्रिका पर अंकित प्रेम-संदेश
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Text)
...कल्याणिनी तवाविसंवादिन्यचपला बालभावेप्याकृतिरियम्। तत्करोषि मे वचनमेकमभ्यर्थ्यमानेति। ततो मया सविनयमुपरचिताञ्जलिपुटया... भगवन्किमिति समादिशसि... सस्नेहया सखीमिवोपकारिणीमिव प्राणप्रदामिव दृष्ट्या मामभिनन्द्य... तमालपादपपल्लवमादाय निष्पीड्य शिलातले तेन गन्धगजमदसुरभिपरिमलेन रसेनोत्तरीयवल्कलैकदेशाद्विपाट्य पट्टिकां स्वहस्तकमलकनिष्ठिकानखशिखरेण लिखितेयं पत्रिका।
दूरे मुक्तालतया बिससितया विप्रलोभ्यमानो मे।
हंस इव दर्शिताशो मानसजन्मा त्वया नीतः॥
हंस इव दर्शिताशो मानसजन्मा त्वया नीतः॥
२. व्याकरण एवं कोश (Grammar & Vocabulary)
- अविसंवादिनी: विसंवाद (विरोध) न करने वाली, अर्थात् जो दिखती है वैसी ही है।
- तमालपादपपल्लवम्: तमाल वृक्ष के नए पत्ते। इनका उपयोग स्याही बनाने के लिए किया गया।
- कनिष्ठिकानखशिखरेण: कनिष्ठा (छोटी उंगली) के नाखून की नोक से।
- मानसजन्मा: मनसि जायते इति (कामदेव)। यहाँ 'मानस' सरोवर के पक्ष में भी अर्थ है।
- बिससितया: बिस (कमल की नाल) के समान सफेद।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
पुण्डरीक ने तरलिका से कहा— "हे कल्याणिनी! तुम्हारा यह भोला चेहरा तुम्हारी गंभीरता का प्रमाण है। क्या तुम मेरी एक विनती स्वीकार करोगी?"। तरलिका के सहमत होने पर पुण्डरीक ने उसे अपनी सखी और प्राण देने वाली के समान आदर से देखा। फिर उन्होंने एक तमाल के पत्ते को पत्थर पर पीसकर उससे स्याही बनाई और अपने वल्कल (वस्त्र) का एक टुकड़ा फाड़कर उस पर अपनी छोटी उंगली के नाखून से यह संदेश लिखा:
श्लोक का अर्थ: "जैसे हंस श्वेत कमल-नाल (बिस) के लोभ में मानसरोवर की ओर खिंचा चला जाता है, वैसे ही तुम्हारे गले की सफेद मोतियों की माला (मुक्तालता) से आकर्षित होकर मेरा मन (कामदेव) तुम्हारी ओर खिंचा चला आया है।"
श्लोक का अर्थ: "जैसे हंस श्वेत कमल-नाल (बिस) के लोभ में मानसरोवर की ओर खिंचा चला जाता है, वैसे ही तुम्हारे गले की सफेद मोतियों की माला (मुक्तालता) से आकर्षित होकर मेरा मन (कामदेव) तुम्हारी ओर खिंचा चला आया है।"
४. English Translation
Pundarika said to Taralika— "O auspicious one, your countenance reflects your trustworthy nature. Will you do me a favor if I ask?". Upon her humble consent, he looked at her with gratitude as if she were a dear friend or a lifesaver. He then crushed a Tamala leaf on a stone to create ink, tore a piece of his bark-garment (Valkala), and wrote a letter using the tip of his little finger's nail.
Meaning of the Verse: "Just as a Swan (Hansa) is lured to the Manasa lake by the white lotus-stalks, my mind (born of the heart/Manasa-janma) has been led to you, enticed by your pearl-necklace as white as those stalks."
Meaning of the Verse: "Just as a Swan (Hansa) is lured to the Manasa lake by the white lotus-stalks, my mind (born of the heart/Manasa-janma) has been led to you, enticed by your pearl-necklace as white as those stalks."
कादम्बरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १५०
विरह की प्रगाढ़ता और तरलिका से पूछताछ
१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Text)
लोकायतिकविद्येवाधर्मरुचेर्मदिरिवोन्मत्तस्य दुष्टावेशक्रिययेव पिशाचग्रहस्य दोषविकारोपचयः सुतरामक्रियत स्मरातुरस्य मे मनसः।
तरलिके कथय कथं स त्वया दृष्टः? किं किमभिहितासि तेन? कियन्तं कालमवस्थितासि तत्र? कियदनुसरन्मानसमागता इति पुनः पुनः पर्यपृच्छम्। अनयैव च कथया तया सह तस्मिन्नेव प्रासादे तथैव प्रतिषिद्धाशेषपरिजनप्रवेशा दिवसमत्यवाहयम्।
अथ मदीयेनेव हृदयेन कृतरागसंविभागे लोहितायति गगनतलोपान्तावलम्बिनि रविबिम्बे... रविपरिवरहसूर्च्छान्धकारितहृदयास्विव प्रारब्धनिमीलनासु पद्मिनीषु... सा छत्रग्राहिणी समागत्याकथयत्। भर्तृदारिके तयोर्मुनि...।
तरलिके कथय कथं स त्वया दृष्टः? किं किमभिहितासि तेन? कियन्तं कालमवस्थितासि तत्र? कियदनुसरन्मानसमागता इति पुनः पुनः पर्यपृच्छम्। अनयैव च कथया तया सह तस्मिन्नेव प्रासादे तथैव प्रतिषिद्धाशेषपरिजनप्रवेशा दिवसमत्यवाहयम्।
अथ मदीयेनेव हृदयेन कृतरागसंविभागे लोहितायति गगनतलोपान्तावलम्बिनि रविबिम्बे... रविपरिवरहसूर्च्छान्धकारितहृदयास्विव प्रारब्धनिमीलनासु पद्मिनीषु... सा छत्रग्राहिणी समागत्याकथयत्। भर्तृदारिके तयोर्मुनि...।
२. व्याकरण एवं कोश (Grammar & Vocabulary)
- स्मरातुरस्य: स्मरेण (कामदेवेन) आतुरः (पीड़ितः) - तृतीया तत्पुरुष। काम से पीड़ित व्यक्ति।
- पर्यपृच्छम्: परि + प्रच्छ् धातु, लङ् लकार (Past Tense), उत्तम पुरुष, एकवचन। मैंने बार-बार पूछा।
- लोहितायति: लोहित (लाल) + क्यङ् प्रत्यय। लाल होते हुए (आकाश के लिए प्रयुक्त)।
- प्रतिषिद्धाशेषपरिजनप्रवेशा: जहाँ सभी सेवकों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया हो।
- दिवसमत्यवाहयम्: दिन व्यतीत किया।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
जैसे अधर्मी व्यक्ति के लिए नास्तिक विद्या (लोकायतिक), शराबी के लिए मदिरा और पिशाच से ग्रस्त व्यक्ति के लिए दुष्ट आवेश उसकी बीमारी को बढ़ा देते हैं, वैसे ही पुण्डरीक के उस संदेश ने काम-पीड़ित मेरे मन की व्याकुलता को और अधिक बढ़ा दिया।
मैं तरलिका से बार-बार पूछती रही— "तरलिका, बताओ! तुमने उसे कैसे देखा? उसने तुमसे क्या-क्या कहा? तुम वहाँ कितनी देर रुकीं? और तुम कितनी दूर तक उसके साथ आईं?"। सभी सेवकों का प्रवेश वर्जित कर, मैं दिन भर उसी महल में तरलिका के साथ केवल उन्हीं की बातें करती रही।
फिर जब सूर्य का बिम्ब आकाश के किनारे लटकते हुए लाल होने लगा (मानो उसने मेरे ही अनुराग का लाल रंग ले लिया हो) और कमलिनियाँ सूर्य के विरह में अपने नेत्र (पंखुड़ियाँ) मूंदने लगीं, तब मेरी छत्रधारिणी ने आकर सूचना दी— "राजकुमारी! उन मुनिकुमारों में से..."।
मैं तरलिका से बार-बार पूछती रही— "तरलिका, बताओ! तुमने उसे कैसे देखा? उसने तुमसे क्या-क्या कहा? तुम वहाँ कितनी देर रुकीं? और तुम कितनी दूर तक उसके साथ आईं?"। सभी सेवकों का प्रवेश वर्जित कर, मैं दिन भर उसी महल में तरलिका के साथ केवल उन्हीं की बातें करती रही।
फिर जब सूर्य का बिम्ब आकाश के किनारे लटकते हुए लाल होने लगा (मानो उसने मेरे ही अनुराग का लाल रंग ले लिया हो) और कमलिनियाँ सूर्य के विरह में अपने नेत्र (पंखुड़ियाँ) मूंदने लगीं, तब मेरी छत्रधारिणी ने आकर सूचना दी— "राजकुमारी! उन मुनिकुमारों में से..."।
४. English Translation
Just as materialistic philosophy increases the sin of a wicked person, or wine worsens the state of an intoxicated man, the message from Pundarika further intensified the agitation of my love-stricken mind.
I repeatedly asked Taralika— "Tell me, how did he look? What did he say to you? How long did you stay there? How far did you follow him?". Dismissing all my attendants, I spent the entire day in that palace, exclusively discussing him with her.
As the sun began to set, turning crimson as if sharing the hue of my own passion, and the lotus-beds started to close their petals like eyes shutting in the pain of separation from the sun, my umbrella-bearer arrived with news— "O Princess! Of those two young ascetics...".
I repeatedly asked Taralika— "Tell me, how did he look? What did he say to you? How long did you stay there? How far did you follow him?". Dismissing all my attendants, I spent the entire day in that palace, exclusively discussing him with her.
As the sun began to set, turning crimson as if sharing the hue of my own passion, and the lotus-beds started to close their petals like eyes shutting in the pain of separation from the sun, my umbrella-bearer arrived with news— "O Princess! Of those two young ascetics...".
