पृष्ठ ७६:** राजकुमार चन्द्रापीड के शारीरिक परिवर्तन और यौवनारंभ का कामदेव के आगमन जैसा अलंकारिक वर्णन।
* **पृष्ठ ७७:** १६ वर्ष की आयु में शिक्षा पूर्ण कर चन्द्रापीड का विद्या-मन्दिर से प्रस्थान और महाराज तारापीड का संदेश।
* **पृष्ठ ७८:** पारसीक राजा द्वारा भेजे गए दिव्य अश्व 'इन्द्रायुध' का परिचय, जिसे समुद्र से निकला रत्न माना गया है।
* **पृष्ठ ७९:** इन्द्रायुध के शारीरिक सौंदर्य, अयाल (Mane) और उसके वायु के समान अकल्पनीय वेग का सूक्ष्म चित्रण।
* **पृष्ठ ८०:** चन्द्रापीड का विस्मय और अश्व के दिव्य होने की शंका; रम्भा अप्सरा और स्थूलशिरा मुनि के शाप का संदर्भ।
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७६
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७७
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७८
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७९
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ८०
कादंबरी, चन्द्रापीड, महाराज तारापीड, इन्द्रायुध अश्व, बाणभट्ट, अयोनिज रत्न, स्थूलशिरा मुनि शाप। |
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कादंबरी: पृष्ठ ७६ - चन्द्रापीड का पराक्रम और यौवन-आरम्भ
सहजा चास्याजस्रमभ्यस्यतो वृकोदरस्येव शैशव एवाविर्बभूव सर्वलोकविस्मयजननी महाप्राणता। यदृच्छया क्रीडता प्यनेन करतलावलम्बितकर्णपल्लवावनताग्राः सिंहकिशोरक्रममाक्रान्ता इव गज़कलभकाश्चलितुमपि न शेकुः। एकैकेन कृपाणप्रहारेण बाल एव तालतरून्मृणालदण्डानिव लुलाव। सकलराजन्यवंशवनदावानलस्य परशुरामस्येवास्य नाराचाः शिखरिाशिलातलभिदो बभूवुः। दशपुरुषसंवाहनयोग्व्येन चायोदण्डेन श्रममकरोत्। ऋते च महाप्राणतायाः सर्वाभिरन्याभिः कलाभिरनुचकार तं वैशम्पायनः। चन्द्रापीडस्य तु सकलकलाकलापपरिचयबहुमानेन शुकनासगौरवेण सहपांशुकीडनतया सहसंवृद्धतया च सर्वविश्रम्भस्थानं द्वितीयमिव हृदयं वैशम्पायनः परं मित्रमासीत्। निमेषमपि तेन विना स्थातुमेकाकी न शशाक। वैशम्पायनोपि तमुष्णकरमिव वासरोनुगच्छन् क्षणमपि विरहय्यांचकार।
एवं तस्य सर्वविद्यापरिचयमाचरतश्चन्द्रापीडस्य त्रिभुवनविलोभनीयोमृत रस इव सागरस्य सकललोकहृदयानन्दनश्चन्द्रोदय इव प्रदोषस्य बहुविधरागविकारभङ्गुरः सुरधनुः कलाप इव जलधरसमयस्य मकरध्वजायुधभूतः कुसुमप्रसव इव कल्पपादपस्याभिनवाभिव्यज्यमानरागरमणीयः सूर्योदय इव कमलवनस्य विविधलास्यविलासयोगः कलाप इव शिखण्डिनो यौवनारम्भः प्रादुर्भवन्नमणीयस्यापि द्विगुणां रमणीयतां पुपोष। लब्धावसरो नवसेवक इव निकटीबभूवास्य मन्मथः। लक्ष्म्या सह वितस्तार वक्षःस्थलम्। बन्धुजनमनोरथैः सहापूर्यतोदण्डद्वयम्। अरिजनेन सह तनिमानमभजत् मध्यभागः। त्यागेन सह प्रथिमानमाततान नितम्बभागः।
एवं तस्य सर्वविद्यापरिचयमाचरतश्चन्द्रापीडस्य त्रिभुवनविलोभनीयोमृत रस इव सागरस्य सकललोकहृदयानन्दनश्चन्द्रोदय इव प्रदोषस्य बहुविधरागविकारभङ्गुरः सुरधनुः कलाप इव जलधरसमयस्य मकरध्वजायुधभूतः कुसुमप्रसव इव कल्पपादपस्याभिनवाभिव्यज्यमानरागरमणीयः सूर्योदय इव कमलवनस्य विविधलास्यविलासयोगः कलाप इव शिखण्डिनो यौवनारम्भः प्रादुर्भवन्नमणीयस्यापि द्विगुणां रमणीयतां पुपोष। लब्धावसरो नवसेवक इव निकटीबभूवास्य मन्मथः। लक्ष्म्या सह वितस्तार वक्षःस्थलम्। बन्धुजनमनोरथैः सहापूर्यतोदण्डद्वयम्। अरिजनेन सह तनिमानमभजत् मध्यभागः। त्यागेन सह प्रथिमानमाततान नितम्बभागः।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| वृकोदरस्येव | वृकस्य इव उदरं यस्य (भीमः) | भीम के समान (महाप्राणता/शक्ति) |
| सिंहकिशोरक्रमम् | सिंहस्य किशोरः (शावकः) | सिंह के शावक के आक्रमण के समान |
| सहपांशुकीडनतया | पांशु (धूलि) क्रीडन + तल + टाप् | बचपन में साथ धूल में खेलने के कारण |
| मकरध्वजायुधभूतः | मकरध्वजस्य (कामदेवस्य) आयुधः | कामदेव के अस्त्र के समान (यौवन) |
| आयोदण्डेन | अयसः दण्डेन | लोहे के भारी व्यायाम-स्तम्भ से |
हिन्दी अनुवाद:
निरन्तर अभ्यास करने वाले चन्द्रापीड में बचपन से ही भीम (वृकोदर) के समान ऐसी स्वाभाविक महाशक्ति (प्राणशक्ति) प्रकट हुई, जो सम्पूर्ण विश्व को आश्चर्यचकित करने वाली थी। खेल-खेल में ही जब वे हाथी के बच्चों के कानों को पकड़कर झुका देते थे, तो वे हाथी ऐसे जड़ हो जाते थे मानो सिंह के शावक ने उन पर आक्रमण कर दिया हो और वे हिलने में भी असमर्थ होते थे। उन्होंने बचपन में ही तलवार के एक ही प्रहार से बड़े-बड़े ताड़ के वृक्षों को कमल की नाल (डंडी) की तरह काट गिराया। क्षत्रियों के कुल के लिए दावानल के समान परशुराम की तरह उनके बाण पहाड़ों की शिलाओं को भी भेद देते थे। वे व्यायाम के लिए उस लोहे के भारी खंभे (आयोदण्ड) का प्रयोग करते थे जिसे उठाने के लिए दस पुरुषों की आवश्यकता होती थी।
केवल शारीरिक महाशक्ति को छोड़कर, अन्य सभी कलाओं में वैशम्पायन ने चन्द्रापीड का पूर्णतः अनुकरण किया (यानी वे भी उतने ही निपुण हुए)। समस्त विद्याओं के परिचय, मन्त्री शुकनास के प्रति आदर और बचपन से साथ धूल में खेलने के कारण वैशम्पायन चन्द्रापीड के "दूसरे हृदय" के समान अभिन्न मित्र बन गए। चन्द्रापीड उनके बिना एक क्षण भी अकेले नहीं रह सकते थे, और वैशम्पायन भी चन्द्रापीड का उसी तरह साथ देते थे जैसे दिन सूर्य का साथ देता है।
इस प्रकार विद्याभ्यास करते हुए चन्द्रापीड के शरीर में 'यौवन' (जवानी) का आरम्भ हुआ। यह यौवन सागर से निकले अमृत के समान, रात्रि के लिए चन्द्रोदय के समान और वर्षा ऋतु के लिए इन्द्रधनुष के समान शोभायमान था। कामदेव का अस्त्र बना यह यौवन उनके शरीर की सुंदरता को दोगुना करने लगा। अवसर पाकर कामदेव उनके निकट एक सेवक की तरह रहने लगा। लक्ष्मी के साथ-साथ उनका वक्षस्थल भी विशाल हो गया। परिजनों की इच्छाओं के साथ-साथ उनकी भुजाएँ भी पुष्ट हो गईं। शत्रुओं की संख्या के साथ-साथ उनका मध्यभाग (कमर) भी क्षीण (पतला) हो गया, और दानशीलता के साथ-साथ उनके नितम्ब भाग का विस्तार हुआ।
केवल शारीरिक महाशक्ति को छोड़कर, अन्य सभी कलाओं में वैशम्पायन ने चन्द्रापीड का पूर्णतः अनुकरण किया (यानी वे भी उतने ही निपुण हुए)। समस्त विद्याओं के परिचय, मन्त्री शुकनास के प्रति आदर और बचपन से साथ धूल में खेलने के कारण वैशम्पायन चन्द्रापीड के "दूसरे हृदय" के समान अभिन्न मित्र बन गए। चन्द्रापीड उनके बिना एक क्षण भी अकेले नहीं रह सकते थे, और वैशम्पायन भी चन्द्रापीड का उसी तरह साथ देते थे जैसे दिन सूर्य का साथ देता है।
इस प्रकार विद्याभ्यास करते हुए चन्द्रापीड के शरीर में 'यौवन' (जवानी) का आरम्भ हुआ। यह यौवन सागर से निकले अमृत के समान, रात्रि के लिए चन्द्रोदय के समान और वर्षा ऋतु के लिए इन्द्रधनुष के समान शोभायमान था। कामदेव का अस्त्र बना यह यौवन उनके शरीर की सुंदरता को दोगुना करने लगा। अवसर पाकर कामदेव उनके निकट एक सेवक की तरह रहने लगा। लक्ष्मी के साथ-साथ उनका वक्षस्थल भी विशाल हो गया। परिजनों की इच्छाओं के साथ-साथ उनकी भुजाएँ भी पुष्ट हो गईं। शत्रुओं की संख्या के साथ-साथ उनका मध्यभाग (कमर) भी क्षीण (पतला) हो गया, और दानशीलता के साथ-साथ उनके नितम्ब भाग का विस्तार हुआ।
Full English Translation:
Due to constant practice since childhood, a natural and extraordinary vital strength (Mahapranata) appeared in Chandrapida, similar to that of Bhima (Vrikodara), which astonished the entire world. Even while playing casually, if he held the ears of young elephants and pulled them down, they became as motionless as if attacked by a lion cub, unable to even stir. Even as a boy, he felled massive palm trees with a single stroke of his sword as if they were tender lotus stalks. Like Lord Parashurama—the forest fire for the dynasty of kings—his arrows were capable of piercing through the solid rocks of mountains. He exercised with a heavy iron pillar (Ayodanda) that usually required ten men to lift.
Except for that immense physical strength, Vaishampayana followed Chandrapida in mastering all other arts and sciences. Due to their shared education, deep respect for Minister Shukanasa, and having played together in the dust since childhood, Vaishampayana became Chandrapida's "second heart" and closest friend. Chandrapida could not remain alone for even a moment without him, and Vaishampayana followed him just as the day follows the sun.
While thus engaged in his studies, the onset of youth (Yauvana) graced Chandrapida. This youth was like nectar rising from the ocean, like the moonrise to the evening, and like a rainbow to the rainy season. Becoming an instrument for the God of Love (Kamadeva), this youth doubled his natural charm. Seizing the opportunity, Cupid began to dwell near him like a new attendant. Along with his prosperity (Lakshmi), his chest broadened. Along with the desires of his kin, his arms grew powerful. While his waist became slender like the diminishing number of his enemies, his hips attained greatness alongside his generosity.
Except for that immense physical strength, Vaishampayana followed Chandrapida in mastering all other arts and sciences. Due to their shared education, deep respect for Minister Shukanasa, and having played together in the dust since childhood, Vaishampayana became Chandrapida's "second heart" and closest friend. Chandrapida could not remain alone for even a moment without him, and Vaishampayana followed him just as the day follows the sun.
While thus engaged in his studies, the onset of youth (Yauvana) graced Chandrapida. This youth was like nectar rising from the ocean, like the moonrise to the evening, and like a rainbow to the rainy season. Becoming an instrument for the God of Love (Kamadeva), this youth doubled his natural charm. Seizing the opportunity, Cupid began to dwell near him like a new attendant. Along with his prosperity (Lakshmi), his chest broadened. Along with the desires of his kin, his arms grew powerful. While his waist became slender like the diminishing number of his enemies, his hips attained greatness alongside his generosity.
कादंबरी: पृष्ठ ७७ - शिक्षा पूर्णता और महाराज का संदेश
संहारुरोह रोमराजिः। अहितकलत्रालकलताभिः सह प्रलम्बतामुपययौ भुजयुगलम्। चरितेन सह धवलतामभजत लोचनयुगलम्। आज्ञया सह गुरुर्बभूव भुजशिखरदेशः। स्वरेण सह गम्भीरतामाजगाम हृदयम्।
एवं च क्रमेण समारूढयौवनारम्भं परिसमाप्तसकलकलाविज्ञानमधीताशेषविद्यं चावगम्यानुमोदितमाचार्यैश्चन्द्रापीडमानेतुं राजा बलाधिकृतं बलाहकनामानमाहूय बहुतुरगबलपदातिपरिवृतमतिप्रशस्तेहनि प्राहिणोत्। स गत्वा विद्यागृहं द्वाःस्थैः समावेदितः प्रविश्य क्षितितलाविलम्बितचूडामणिना शिरसा प्रणम्य स्वभूमिसमुचिते राजसमीप इव सविनयमासने राजपुत्रानुमतो न्यषीदत्।
स्थित्वा च मुहूर्तमात्रं बलाहकश्चन्द्रापीडमुपसृत्य दर्शितविनयो व्यजिज्ञपत्। कुमार महाराजः समाज्ञापयति। पूर्णा नो मनोरथाः। अधीतानि शास्त्राणि। शिक्षिताः सकलाः कलाः। गतोसि सर्वास्त्रायुधविन्यासु परां प्रतिष्ठाम्। अनुमोतोसि निर्गमाय विद्यागृहात्सर्वाचार्यैः। उपगृहीतशिक्षं गन्धगजकुमारकमिव वारिबन्धान्निर्गतमवगतसकलकलाकलापं पौर्णमासीशशिनमिव नवोद्गतं पश्यतु त्वां जनः। ब्रजन्तु सफलतामतिचिरदर्शनोत्कण्ठितानि लोकलोचनानि। दर्शनं प्रति ते समुत्सुकान्यतीव सर्वाण्यन्तःपुराणि। अयमत्रभवतो दशमो वत्सरो विद्यागृहमिधिवसतः। प्रविष्टोसि षष्ठमनुभवन्वर्षम्। एवं संपिण्डितेनामुना षोडशेन प्रवर्षसे। तदद्यप्रभृति निर्गत्य दर्शनोत्सुकाभ्यो दत्त्वा दर्शनमखिलाभ्यो मातृभ्योभिवाद्य च गुरुनपगतनियन्त्रणो यथासुखमनुभव राज्यसुखानि नवयौवनललितानि च। संमानय राजलोकम्। पूजय द्विजातीन्। परिपालय प्रजाः। आनन्दय बन्धुवर्गम्।
एवं च क्रमेण समारूढयौवनारम्भं परिसमाप्तसकलकलाविज्ञानमधीताशेषविद्यं चावगम्यानुमोदितमाचार्यैश्चन्द्रापीडमानेतुं राजा बलाधिकृतं बलाहकनामानमाहूय बहुतुरगबलपदातिपरिवृतमतिप्रशस्तेहनि प्राहिणोत्। स गत्वा विद्यागृहं द्वाःस्थैः समावेदितः प्रविश्य क्षितितलाविलम्बितचूडामणिना शिरसा प्रणम्य स्वभूमिसमुचिते राजसमीप इव सविनयमासने राजपुत्रानुमतो न्यषीदत्।
स्थित्वा च मुहूर्तमात्रं बलाहकश्चन्द्रापीडमुपसृत्य दर्शितविनयो व्यजिज्ञपत्। कुमार महाराजः समाज्ञापयति। पूर्णा नो मनोरथाः। अधीतानि शास्त्राणि। शिक्षिताः सकलाः कलाः। गतोसि सर्वास्त्रायुधविन्यासु परां प्रतिष्ठाम्। अनुमोतोसि निर्गमाय विद्यागृहात्सर्वाचार्यैः। उपगृहीतशिक्षं गन्धगजकुमारकमिव वारिबन्धान्निर्गतमवगतसकलकलाकलापं पौर्णमासीशशिनमिव नवोद्गतं पश्यतु त्वां जनः। ब्रजन्तु सफलतामतिचिरदर्शनोत्कण्ठितानि लोकलोचनानि। दर्शनं प्रति ते समुत्सुकान्यतीव सर्वाण्यन्तःपुराणि। अयमत्रभवतो दशमो वत्सरो विद्यागृहमिधिवसतः। प्रविष्टोसि षष्ठमनुभवन्वर्षम्। एवं संपिण्डितेनामुना षोडशेन प्रवर्षसे। तदद्यप्रभृति निर्गत्य दर्शनोत्सुकाभ्यो दत्त्वा दर्शनमखिलाभ्यो मातृभ्योभिवाद्य च गुरुनपगतनियन्त्रणो यथासुखमनुभव राज्यसुखानि नवयौवनललितानि च। संमानय राजलोकम्। पूजय द्विजातीन्। परिपालय प्रजाः। आनन्दय बन्धुवर्गम्।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| बलाधिकृतम् | बलानां (सेनानां) अधिकृतः | सेनापति (Commander of forces) |
| बलाहकनामानम् | बलाहकः इति नाम यस्य तम् | बलाहक नामक व्यक्ति को |
| अधिताशेषविद्यम् | अधितानि शेषाः विद्याः येन तम् | जिसने समस्त विद्याएँ पढ़ ली हों |
| षोडशेन प्रवर्षसे | षोडश (१६) वर्षे | सोलहवें वर्ष में प्रवेश (आयु १६ वर्ष) |
| गन्धगजकुमारकम् | गन्धगजस्य कुमारकः इव | मत्त हाथी के बच्चे के समान |
हिन्दी अनुवाद:
राजकुमार के शरीर पर रोमावली (रोमों की पंक्ति) उभर आई। उनकी भुजाएँ शत्रुओं की स्त्रियों के बालों की लताओं की तरह लंबी हो गईं। उनके नेत्रों में चरित्र के साथ-साथ उज्ज्वलता (सफेदी) आ गई। उनके कंधे आज्ञा के समान भारी (शक्तिशाली) हो गए और हृदय स्वर के समान गंभीर हो गया।
इस प्रकार जब चन्द्रापीड युवावस्था में पहुँचे और आचार्यों ने पुष्टि कर दी कि उन्होंने समस्त शास्त्रों, कलाओं और शस्त्र-विद्या में सर्वोच्च निपुणता प्राप्त कर ली है, तब महाराज तारापीड ने उन्हें वापस लाने के लिए 'बलाहक' नामक सेनापति को चतुरंगिणी सेना के साथ एक शुभ दिन पर भेजा। सेनापति ने विद्या-मन्दिर पहुँचकर राजकुमार को प्रणाम किया और उनके अनुमति देने पर उचित आसन पर बैठा।
कुछ समय पश्चात बलाहक ने चन्द्रापीड के पास जाकर विनयपूर्वक महाराज का संदेश सुनाया— "हे कुमार! महाराज की आज्ञा है कि हमारे मनोरथ पूर्ण हुए। आपने सभी शास्त्र पढ़ लिए, कलाएँ सीख लीं और अस्त्र-शस्त्र चलाने में परम प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। सभी आचार्यों ने अब आपको विद्या-मन्दिर से बाहर जाने की अनुमति दे दी है। अब लोग आपको वैसे ही देखें जैसे बंधन से मुक्त हुए किसी मत्त हाथी को या पूर्णिमा के नए उगे चंद्रमा को देखते हैं। नगरवासियों की आँखें जो बहुत समय से आपके दर्शन को उत्सुक थीं, अब सफल हों। अंतःपुर की सभी माताएँ आपको देखने के लिए व्याकुल हैं। आपको इस पाठशाला में रहते हुए १० वर्ष हो गए हैं। आप छठे वर्ष में यहाँ आए थे और अब १६वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। अतः आज से बाहर निकलकर माताओं और गुरुजनों का आशीर्वाद लें और बिना किसी बंधन के राज्य के सुखों और नए यौवन का आनंद लें। राजाओं का सम्मान करें, ब्राह्मणों को पूजें, प्रजा का पालन करें और अपने बंधु-बांधवों को आनंदित करें।"
इस प्रकार जब चन्द्रापीड युवावस्था में पहुँचे और आचार्यों ने पुष्टि कर दी कि उन्होंने समस्त शास्त्रों, कलाओं और शस्त्र-विद्या में सर्वोच्च निपुणता प्राप्त कर ली है, तब महाराज तारापीड ने उन्हें वापस लाने के लिए 'बलाहक' नामक सेनापति को चतुरंगिणी सेना के साथ एक शुभ दिन पर भेजा। सेनापति ने विद्या-मन्दिर पहुँचकर राजकुमार को प्रणाम किया और उनके अनुमति देने पर उचित आसन पर बैठा।
कुछ समय पश्चात बलाहक ने चन्द्रापीड के पास जाकर विनयपूर्वक महाराज का संदेश सुनाया— "हे कुमार! महाराज की आज्ञा है कि हमारे मनोरथ पूर्ण हुए। आपने सभी शास्त्र पढ़ लिए, कलाएँ सीख लीं और अस्त्र-शस्त्र चलाने में परम प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। सभी आचार्यों ने अब आपको विद्या-मन्दिर से बाहर जाने की अनुमति दे दी है। अब लोग आपको वैसे ही देखें जैसे बंधन से मुक्त हुए किसी मत्त हाथी को या पूर्णिमा के नए उगे चंद्रमा को देखते हैं। नगरवासियों की आँखें जो बहुत समय से आपके दर्शन को उत्सुक थीं, अब सफल हों। अंतःपुर की सभी माताएँ आपको देखने के लिए व्याकुल हैं। आपको इस पाठशाला में रहते हुए १० वर्ष हो गए हैं। आप छठे वर्ष में यहाँ आए थे और अब १६वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। अतः आज से बाहर निकलकर माताओं और गुरुजनों का आशीर्वाद लें और बिना किसी बंधन के राज्य के सुखों और नए यौवन का आनंद लें। राजाओं का सम्मान करें, ब्राह्मणों को पूजें, प्रजा का पालन करें और अपने बंधु-बांधवों को आनंदित करें।"
Full English Translation:
The line of hair (Romaraji) appeared on the prince's body. His arms became long like the tresses of the wives of his enemies. His eyes attained a brilliance matching his character. His shoulders became heavy (powerful) like his commands, and his heart became as deep as his voice.
When King Tarapida learned that Chandrapida had attained youth and mastered all sciences, arts, and weaponry as confirmed by the teachers, he sent the commander named Balahaka with a vast army on an auspicious day to fetch him. Balahaka reached the academy, bowed deeply before the prince, and with his permission, sat on a respectful seat.
After a while, Balahaka approached Chandrapida and conveyed the King's message: "O Prince! The King says our desires are fulfilled. You have mastered all scriptures and arts, and achieved the highest proficiency in weaponry. All your teachers have now granted you permission to leave the academy. Let the people behold you now, like a majestic elephant released from captivity or like the newly risen full moon. Let the eyes of the citizens, longing for your sight for so long, find fulfillment. All the queens in the inner chambers are eager to see you. It has been 10 years since you came to this academy; you entered in your 6th year and are now in your 16th. Therefore, from today, go forth, seek the blessings of your mothers and elders, and enjoy the royal pleasures and the charms of youth without restraint. Respect the kings, worship the learned Brahmins, protect your subjects, and bring joy to your kinsmen."
When King Tarapida learned that Chandrapida had attained youth and mastered all sciences, arts, and weaponry as confirmed by the teachers, he sent the commander named Balahaka with a vast army on an auspicious day to fetch him. Balahaka reached the academy, bowed deeply before the prince, and with his permission, sat on a respectful seat.
After a while, Balahaka approached Chandrapida and conveyed the King's message: "O Prince! The King says our desires are fulfilled. You have mastered all scriptures and arts, and achieved the highest proficiency in weaponry. All your teachers have now granted you permission to leave the academy. Let the people behold you now, like a majestic elephant released from captivity or like the newly risen full moon. Let the eyes of the citizens, longing for your sight for so long, find fulfillment. All the queens in the inner chambers are eager to see you. It has been 10 years since you came to this academy; you entered in your 6th year and are now in your 16th. Therefore, from today, go forth, seek the blessings of your mothers and elders, and enjoy the royal pleasures and the charms of youth without restraint. Respect the kings, worship the learned Brahmins, protect your subjects, and bring joy to your kinsmen."
कादंबरी: पृष्ठ ७८ - दिव्य अश्व 'इन्द्रायुध' का परिचय
अयं च ते त्रिभुवनैकरत्नमनिलगरुडसमजव इन्द्रायुधनामा तुरंगम: प्रेषितो महाराजेन द्वारि तिष्ठति। एष खलु देवस्य पारसीकाधिपतिना त्रिभुवनाश्चर्यमिति कृत्वा जलधिजलादुत्थितमयोनिजमिदमनश्वररत्नमासादितं मया महाराजाधिरोहणयोग्यमिति संदिश्य प्रहित:। दृष्ट्वा च निवेदितं लक्षणविद्भि:। देव यान्युच्चै:श्रवस: श्रूयन्ते लक्षणानि तैरयमुपेतो नैवंविधो भूतो भावी वा तुरंगम इति। तदयमनुगृह्यतामधिरोहणेन। इदं च मूर्धाभिषिक्तपार्थिवकुलप्रसूतानां विनयोपपन्नानां शूराणामभिरूपाणां कलावतां च कुलक्रमागातानां राजपुत्राणां सहस्रं परिचारार्थमनुप्रेषितं तुरंगमाधिरूढं द्वारि प्रणामलालसं प्रतिपालयति।
इत्यभिधाय विरतवचसि बलाहके चन्द्रापीड: पितुराज्ञां शिरसि कृत्वा नवजलधरध्वानगम्भीरया गिरा प्रवेश्यतामिन्द्रायुध इति निर्जगामिषुरादिदेश। अथ वचनान्तरमेव प्रवेशितमुभयतः खलीनकनककटकावलग्राभ्यां पदे-पदे कृताकुञ्चनप्रयत्नाभ्यां पुरुषाभ्यामवकृष्यमाणमतिप्रमाणमूर्ध्वकरपुरुषप्राप्यपृष्ठभागमापिबन्तमिव संमुखागतमखिलमाकाशमतिनिष्ठुरं मुहुर्मुहु: प्रकम्पितोदररन्ध्रेण हेषारवेण पूरितभुवनोदरविवरेण निर्भर्त्सयन्तमिवलीकवेगदुर्विदग्धं गरुत्मन्तमतिदूरमवनमता प्रतिक्षणमतिदूरमुज्जमता च जवनिरोधस्फीतरोषघुरघुरायमाणघोरघोणेन शिरोभागेण निजजवदर्पवशादुल्लङ्घनार्थमाकलयन्तमिव त्रिभुवनमसितपीतहरितपाटलमिराखण्डलचापकारिणीभिर्लेखाभि: कल्माषितशरीरमास्तीर्णविचित्रवर्णकम्बलमिव कुंजरकलभं कैलासतटाघातधातुधूलिपाटलमिव हरवृषभमसुररुधिरपङ्कलेखालोहितसटमिव...
इत्यभिधाय विरतवचसि बलाहके चन्द्रापीड: पितुराज्ञां शिरसि कृत्वा नवजलधरध्वानगम्भीरया गिरा प्रवेश्यतामिन्द्रायुध इति निर्जगामिषुरादिदेश। अथ वचनान्तरमेव प्रवेशितमुभयतः खलीनकनककटकावलग्राभ्यां पदे-पदे कृताकुञ्चनप्रयत्नाभ्यां पुरुषाभ्यामवकृष्यमाणमतिप्रमाणमूर्ध्वकरपुरुषप्राप्यपृष्ठभागमापिबन्तमिव संमुखागतमखिलमाकाशमतिनिष्ठुरं मुहुर्मुहु: प्रकम्पितोदररन्ध्रेण हेषारवेण पूरितभुवनोदरविवरेण निर्भर्त्सयन्तमिवलीकवेगदुर्विदग्धं गरुत्मन्तमतिदूरमवनमता प्रतिक्षणमतिदूरमुज्जमता च जवनिरोधस्फीतरोषघुरघुरायमाणघोरघोणेन शिरोभागेण निजजवदर्पवशादुल्लङ्घनार्थमाकलयन्तमिव त्रिभुवनमसितपीतहरितपाटलमिराखण्डलचापकारिणीभिर्लेखाभि: कल्माषितशरीरमास्तीर्णविचित्रवर्णकम्बलमिव कुंजरकलभं कैलासतटाघातधातुधूलिपाटलमिव हरवृषभमसुररुधिरपङ्कलेखालोहितसटमिव...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| अनिलगरुडसमजव: | अनिल: (वायु:) गरुडश्च ताभ्यां सम:जव: यस्य स: | वायु और गरुड़ के समान वेग वाला |
| अयोनिजम् | न योन्या: जायते इति | जो गर्भ से उत्पन्न न हुआ हो (दिव्य) |
| इन्द्रायुधनामा | इन्द्रायुध: इति नाम यस्य स: | इन्द्रायुध नामक (अश्व) |
| उच्चै:श्रवस: | इन्द्र के प्रसिद्ध अश्व के समान | दिव्य लक्षणों वाला अश्व |
| मूर्धाभिषिक्त | मूर्ध्नि अभिषिक्ता: (राजा:) | राजवंशों में उत्पन्न (राजपुत्र) |
हिन्दी अनुवाद:
(सेनापति बलाहक बोला—) "हे कुमार! महाराज द्वारा भेजा गया यह 'इन्द्रायुध' नामक घोड़ा द्वार पर खड़ा है, जो तीनों लोकों में एकमात्र रत्न है और वायु तथा गरुड़ के समान वेगवान है। इसे फारस (पारसीक) के राजा ने महाराज के पास यह कहकर भेजा था कि— 'यह समुद्र के जल से निकला हुआ अयोनिज (दिव्य) और अविनाशी रत्न है, जो केवल महाराज की सवारी के योग्य है।' अश्व-लक्षणों के जानकारों ने इसे देखकर कहा है कि जो लक्षण इंद्र के घोड़े 'उच्चैःश्रवा' के सुने जाते हैं, यह उन सभी लक्षणों से युक्त है; ऐसा घोड़ा न पहले कभी हुआ और न भविष्य में होगा। अतः आप इस पर सवार होकर इसे अनुगृहीत करें। साथ ही, उच्च राजवंशों में उत्पन्न, विनयी, शूरवीर और कलाओं में निपुण एक हजार राजपुत्रों की सेना भी आपकी सेवा के लिए घोड़ों पर सवार द्वार पर खड़ी आपके दर्शन की प्रतीक्षा कर रही है।"
बलाहक के चुप होने पर चन्द्रापीड ने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया और नवीन बादलों के समान गंभीर स्वर में आदेश दिया— "इन्द्रायुध को भीतर प्रवेश कराया जाए।" आदेश मिलते ही दो पुरुषों द्वारा खींचकर लाया जाता हुआ वह विशाल घोड़ा प्रविष्ट हुआ। वह घोड़ा इतना ऊँचा था कि उसका पिछला भाग हाथ उठाए हुए पुरुष की पहुँच तक आता था। वह अपनी हिनहिनाहट (हेषारव) से मानो पूरे ब्रह्मांड को भर रहा था और गरुड़ के वेग का भी तिरस्कार कर रहा था। उसका शरीर इंद्रधनुष की तरह काली, पीली, हरी और लाल रेखाओं से चित्रित था, जिससे वह विचित्र रंगों के कंबल से ढके हुए हाथी के बच्चे के समान लग रहा था। वह कैलाश पर्वत की धातु-धूलि से रंगे शिव के बैल (नंदी) अथवा असुरों के रक्त से सनी गर्दन वाले सिंह के समान तेजस्वी दिख रहा था।
बलाहक के चुप होने पर चन्द्रापीड ने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया और नवीन बादलों के समान गंभीर स्वर में आदेश दिया— "इन्द्रायुध को भीतर प्रवेश कराया जाए।" आदेश मिलते ही दो पुरुषों द्वारा खींचकर लाया जाता हुआ वह विशाल घोड़ा प्रविष्ट हुआ। वह घोड़ा इतना ऊँचा था कि उसका पिछला भाग हाथ उठाए हुए पुरुष की पहुँच तक आता था। वह अपनी हिनहिनाहट (हेषारव) से मानो पूरे ब्रह्मांड को भर रहा था और गरुड़ के वेग का भी तिरस्कार कर रहा था। उसका शरीर इंद्रधनुष की तरह काली, पीली, हरी और लाल रेखाओं से चित्रित था, जिससे वह विचित्र रंगों के कंबल से ढके हुए हाथी के बच्चे के समान लग रहा था। वह कैलाश पर्वत की धातु-धूलि से रंगे शिव के बैल (नंदी) अथवा असुरों के रक्त से सनी गर्दन वाले सिंह के समान तेजस्वी दिख रहा था।
Full English Translation:
(Commander Balahaka said—) "O Prince! This horse named 'Indrayudha', sent by the King, stands at the gate. He is the unique jewel of the three worlds, possessing speed equal to the wind and Garuda. He was sent by the King of Persia (Parsika) with the message: 'I have acquired this indestructible, non-womb-born jewel arisen from the ocean's depths, which is worthy only of the Great King.' Experts in equine traits have declared that he possesses all the divine qualities heard of Indra's horse, Uchhaishravas; such a horse has never existed before nor will ever exist in the future. Therefore, please grace him by mounting. Additionally, a thousand princes born of noble lineages, brave and skilled in arts, await on horseback at the gate to serve you."
When Balahaka finished speaking, Chandrapida accepted his father's command with great respect. In a voice as deep as fresh thunderclouds, he ordered, "Let Indrayudha be brought in." Immediately, the horse was led in by two men pulling at his golden bits. He was so massive that his back reached the height of a man with raised arms. With his piercing neighing, he seemed to fill the hollow of the universe, mocking even the speed of Garuda. His body was marked with black, yellow, green, and red streaks like a rainbow, making him look like a young elephant covered in a multi-colored blanket. He appeared as majestic as Shiva's bull (Nandi) stained with the mineral dust of Mount Kailash or a lion with its mane reddened by the blood of demons.
When Balahaka finished speaking, Chandrapida accepted his father's command with great respect. In a voice as deep as fresh thunderclouds, he ordered, "Let Indrayudha be brought in." Immediately, the horse was led in by two men pulling at his golden bits. He was so massive that his back reached the height of a man with raised arms. With his piercing neighing, he seemed to fill the hollow of the universe, mocking even the speed of Garuda. His body was marked with black, yellow, green, and red streaks like a rainbow, making him look like a young elephant covered in a multi-colored blanket. He appeared as majestic as Shiva's bull (Nandi) stained with the mineral dust of Mount Kailash or a lion with its mane reddened by the blood of demons.
कादंबरी: पृष्ठ ७९ - इन्द्रायुध का अलौकिक सौंदर्य
पर्वतीसिंहं रंह:संघातमिव मूर्तिमन्तममवरतपरिस्फुरत्घोथपुटोन्युक्त-सूत्कारेणातिजवापीतमनिलमिव नासिकाविवरेणोद्वमन्तमन्त:स्खलितमुखखलीनाखरशिखरक्षोभजन्मनो लालाजलमुव: फेनपल्लवानुदधिनिवासपरिपितामृतसगण्डूषानिवोद्विरन्तमतायतमतिनिर्मासतया समुत्कीर्णमिव वदनमुद्वहन्तमाननमण्डलनिहितारुणमणिसमुद्भूतैंरंशुक-लापैरुपैतेनावसक्तरक्तचामरेणैव निश्चलशिखरेण कर्णयुगलेन विराजमानमुज्जवलकनकशृङ्खलारचितरश्मिकलापकलितया लाक्षालोहित-म्वलोलसटासंतानया जलधिसंचरणलग्नविद्रुमपल्लवयेव शिरोधरयोपशोभितमतिकुटिलकनकपत्रलताप्रतानभङ्गुरण पदे पदे रणितरत्नमालेन स्थूलमुक्ताफलप्रायेण तारागणनेव संध्यारागमरुणेनाश्वालंकारेणालंकृतमश्वालंकारनिहितमरकतरत्नप्रभाश्यामायमानदेहतया गगनतलनिपतितदिवसकररथतुरंगमशङ्कामिवोपजनयन्तमतितेजस्वितया जवनिरोधरोषवशात्प्रतिरोमकूपमुद्गतानि सागरपरिचयाल्लभ्रानि मुक्ताफलानीव स्वेदलवजालकानि वर्षन्तमिन्द्रनीलमणिपादपीठा-नुकारिभिरञ्जनशिलाघटितैरिवानवरतपतनौत्पतनजनितविषमखरमुखर-वै: पृथुभि: खुरपुटैर्जर्जरितवसुंधरैर्मुरजवाद्यमिवाभ्यस्यन्तमुत्कीर्णमिव जङ्घासु विस्तारितमिवोरसि श्लक्ष्णीकृतमिव मुखे प्रसारितमिव कंधरायामुल्लिखितमिव पार्श्वयोर्द्विगुणीकृतमिव जघनभागे जवप्रतिपक्षमिव गरुत्मतस्त्रैलोक्यसंचरणसहायमिव मारुतस्यांशावतारमिवोच्चै:श्रवसो वेगसब्रह्मचारिणमिव मनस: हरिचरणमिव सकलवसुंधरोल्लङ्घनक्षमं वरुणहंसमिव मानसप्रचारं मधुमासदिवसमिव विकसितअशोकपाटलं व्रतिनमिव भस्मसितपुण्ड्राङ्कितमुखं कमलवनमिव मधुपङ्कपिञ्जकेसरं ग्रीष्मदिवसमिव महायाममुग्रतेजसं च...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| रंह:संघातम् | रंहस: (वेगस्य) संघात: (समूह:) तम् | मानो वेग का पुंज या समूह हो |
| अतिजवापीतम् | अतिजवेन आपीत: (पियत:) तम् | अत्यधिक वेग के कारण पी ली गई (वायु) |
| लालाजलमुव: | लालाया: जलम् (थूक/झाग) मुञ्चति इति | मुख से झाग उगलने वाला |
| वेगसब्रह्मचारिणम् | वेगस्य सब्रह्मचारी (समान:) तम् | मन के वेग के समान गति वाला |
| सकलवसुंधरोल्लङ्घनक्षमम् | सकलां वसुंधरां उल्लङ्घयितुं क्षम: | पूरी पृथ्वी को लाँघने में समर्थ |
हिन्दी अनुवाद:
वह अश्व (इन्द्रायुध) ऐसा लग रहा था मानो वह मूर्त्तिमान 'वेग' का समूह हो। वह अपनी नासिका के छिद्रों से उस वायु को बाहर निकाल रहा था, जिसे उसने अपने तीव्र वेग के कारण पी लिया था। उसके मुख के भीतर लगाम की रगड़ से उत्पन्न झाग ऐसा प्रतीत होता था, मानो समुद्र में निवास के दौरान पिए गए अमृत के कुल्ले वह बाहर थूक रहा हो। उसका मुख मांसहीन और इतना सुडौल था मानो उसे तराशा गया हो। उसके कानों के पास लगे लाल मणियों की चमक से उसके कान लाल चँवर के समान सुशोभित हो रहे थे। उसकी गर्दन की घनी और लाल अयाल ऐसी लग रही थी मानो समुद्र में भ्रमण करते समय मूंगे की लताएँ उसमें उलझ गई हों।
उसने सोने और रत्नों से जड़े जो आभूषण पहने थे, वे प्रत्येक कदम पर मधुर ध्वनि (मुरज वाद्य की भाँति) कर रहे थे। उन आभूषणों में जड़े मरकत मणियों की हरी प्रभा के कारण उसका शरीर श्यामल दिख रहा था, जिससे ऐसा भ्रम होता था मानो सूर्य के रथ का घोड़ा आकाश से नीचे उतर आया हो। अत्यधिक वेग को रोकने के कारण उत्पन्न क्रोध से उसके रोम-कूपों से पसीने की बूंदें निकल रही थीं, जो समुद्र के मोतियों के समान उज्ज्वल थीं। उसके खुर पृथ्वी को इस प्रकार थपथपा रहे थे मानो कोई संगीत का अभ्यास कर रहा हो। वह अपनी विशाल छाती, सुडौल गर्दन और सुगठित अंगों के कारण गरुड़ के वेग को चुनौती देने वाला और साक्षात् वायु का अंशावतार प्रतीत हो रहा था। वह पूरी पृथ्वी को एक ही छलांग में लाँघने में सक्षम था। उसका मुख किसी तपस्वी के तिलक के समान सफेद निशान से सुशोभित था और उसकी कांति ग्रीष्म काल के प्रचंड सूर्य के समान तेजस्वी थी।
उसने सोने और रत्नों से जड़े जो आभूषण पहने थे, वे प्रत्येक कदम पर मधुर ध्वनि (मुरज वाद्य की भाँति) कर रहे थे। उन आभूषणों में जड़े मरकत मणियों की हरी प्रभा के कारण उसका शरीर श्यामल दिख रहा था, जिससे ऐसा भ्रम होता था मानो सूर्य के रथ का घोड़ा आकाश से नीचे उतर आया हो। अत्यधिक वेग को रोकने के कारण उत्पन्न क्रोध से उसके रोम-कूपों से पसीने की बूंदें निकल रही थीं, जो समुद्र के मोतियों के समान उज्ज्वल थीं। उसके खुर पृथ्वी को इस प्रकार थपथपा रहे थे मानो कोई संगीत का अभ्यास कर रहा हो। वह अपनी विशाल छाती, सुडौल गर्दन और सुगठित अंगों के कारण गरुड़ के वेग को चुनौती देने वाला और साक्षात् वायु का अंशावतार प्रतीत हो रहा था। वह पूरी पृथ्वी को एक ही छलांग में लाँघने में सक्षम था। उसका मुख किसी तपस्वी के तिलक के समान सफेद निशान से सुशोभित था और उसकी कांति ग्रीष्म काल के प्रचंड सूर्य के समान तेजस्वी थी।
Full English Translation:
The horse (Indrayudha) appeared as if he were the personification of 'Speed' itself. He was exhaling through his nostrils the very air he had swallowed during his intense galloping. The froth produced from his mouth due to the friction of the bits looked like mouthfuls of nectar he had drunk while residing in the ocean, now being spat out. His face was lean and perfectly sculpted, as if carved by an artist. His ears, illuminated by the red gems placed near them, appeared like still, red fly-whisks. His thick, red mane on the neck looked as if coral vines from the ocean had clung to it during his journey through the sea.
The ornaments of gold and jewels he wore made a rhythmic sound (like a drum) with every step. Due to the green reflection of the emeralds set in his trappings, his body appeared dark, creating the illusion that one of the horses of the Sun's chariot had descended from the sky. Sweat droplets, bright as ocean pearls, emerged from his pores due to the fury of being restrained. His hooves struck the ground with a rhythmic beat as if practicing a musical performance. With his broad chest, slender neck, and powerful build, he seemed a rival to Garuda's speed and an incarnation of the Wind-god. He was capable of leaping across the entire earth in a single bound. His forehead was marked with a white blaze like the sectarian mark of a sage, and his brilliance was as intense as the mid-day sun in summer.
The ornaments of gold and jewels he wore made a rhythmic sound (like a drum) with every step. Due to the green reflection of the emeralds set in his trappings, his body appeared dark, creating the illusion that one of the horses of the Sun's chariot had descended from the sky. Sweat droplets, bright as ocean pearls, emerged from his pores due to the fury of being restrained. His hooves struck the ground with a rhythmic beat as if practicing a musical performance. With his broad chest, slender neck, and powerful build, he seemed a rival to Garuda's speed and an incarnation of the Wind-god. He was capable of leaping across the entire earth in a single bound. His forehead was marked with a white blaze like the sectarian mark of a sage, and his brilliance was as intense as the mid-day sun in summer.
कादंबरी: पृष्ठ ८० - इन्द्रायुध का दिव्य रहस्य और मुनि शाप
भुजंगमिव सदागत्यभिमुखमुदधिपुलिनमिव शङ्खमालिकाभरणं भीतमिव स्तब्धकर्णं विद्याधरराज्यमिव चक्रवर्तिनरवाहनोचितं सूर्योदयमिव सकलभुवनार्घ्यमश्वातिशयमिन्द्रायुधमद्राक्षीत्।
दृष्ट्वा च तमदृष्टपूर्वममानुषलोकोचिताकारमखिलत्रिभुवनराज्योचितमशेषलक्षणोपपन्नमश्वरूपातिशयमतिधीरप्रकृतेरपि चन्द्रापीडस्य पस्पर्श विस्मयो हृदयम्। आसीच्चास्य मनसि। सरभसविवर्तनवलितवासुकिभ्रमितमन्दरेण मथ्नता जलनिधिजलमिदमश्वरत्नमनभ्युद्धरता किं नाम रत्नमुद्धृतं सुरासुरलोकेन। अनारोहता च मेरुशिलातलविशालमस्य पृष्ठमाखण्डलेन किमासादितं त्रैलोक्यराज्यफलम्। उच्चै:श्रवसा विस्मितहृदयो वञ्चित: खलु जलनिधिना शतमख:। मन्ये च भगवतो नारायणस्य चक्षुर्गोचरमियता कालेन नायमुपगत:। येनाद्यापि ता गरुडारोहणव्यसनितां न परित्यजति। अहो खल्वतिशयितत्रिदशराजसमृद्धिरियं तातस्य राजलक्ष्मी:। यदेवंविधान्यपि सकलत्रिभुवनदुर्लभानि रत्नान्युपकरणतामागच्छन्ति। अतितेजस्वितया महाप्राणतया च सदैवतेवेयमस्याकृति:। यत्सत्यमारोहणे शङ्कामिव मे जनयति। न हि सामान्यवाजिनाममानुषलोकोचिता: सकलत्रिभुवनविस्मयजनन्य ईदृश्यो भवन्त्याकृतय:। दैवतान्यपि हि मुनिशापवशादुज्झितनिजशरीराणि शापवचनोपनीतानि शरीरान्तराण्यध्यासत एव। श्रूयते हि। पुरा किल स्थूलशिरा नाम महातपा मुनिरखिलभुवनललामभूतामपसरसं रम्भाभिधानां शशाप। सा सुरलोकमपहायाश्वहृदये निवेश्यात्मानमश्वहृदयेतिविख्याता वडवा मृत्तिकावत्यां शतधन्वानं नाम राजानमुपसेवमाना मर्त्यलोके महान्तं कालमुवास। अन्ये च महात्मानो मुनिजनशापपरिप्रीत...
दृष्ट्वा च तमदृष्टपूर्वममानुषलोकोचिताकारमखिलत्रिभुवनराज्योचितमशेषलक्षणोपपन्नमश्वरूपातिशयमतिधीरप्रकृतेरपि चन्द्रापीडस्य पस्पर्श विस्मयो हृदयम्। आसीच्चास्य मनसि। सरभसविवर्तनवलितवासुकिभ्रमितमन्दरेण मथ्नता जलनिधिजलमिदमश्वरत्नमनभ्युद्धरता किं नाम रत्नमुद्धृतं सुरासुरलोकेन। अनारोहता च मेरुशिलातलविशालमस्य पृष्ठमाखण्डलेन किमासादितं त्रैलोक्यराज्यफलम्। उच्चै:श्रवसा विस्मितहृदयो वञ्चित: खलु जलनिधिना शतमख:। मन्ये च भगवतो नारायणस्य चक्षुर्गोचरमियता कालेन नायमुपगत:। येनाद्यापि ता गरुडारोहणव्यसनितां न परित्यजति। अहो खल्वतिशयितत्रिदशराजसमृद्धिरियं तातस्य राजलक्ष्मी:। यदेवंविधान्यपि सकलत्रिभुवनदुर्लभानि रत्नान्युपकरणतामागच्छन्ति। अतितेजस्वितया महाप्राणतया च सदैवतेवेयमस्याकृति:। यत्सत्यमारोहणे शङ्कामिव मे जनयति। न हि सामान्यवाजिनाममानुषलोकोचिता: सकलत्रिभुवनविस्मयजनन्य ईदृश्यो भवन्त्याकृतय:। दैवतान्यपि हि मुनिशापवशादुज्झितनिजशरीराणि शापवचनोपनीतानि शरीरान्तराण्यध्यासत एव। श्रूयते हि। पुरा किल स्थूलशिरा नाम महातपा मुनिरखिलभुवनललामभूतामपसरसं रम्भाभिधानां शशाप। सा सुरलोकमपहायाश्वहृदये निवेश्यात्मानमश्वहृदयेतिविख्याता वडवा मृत्तिकावत्यां शतधन्वानं नाम राजानमुपसेवमाना मर्त्यलोके महान्तं कालमुवास। अन्ये च महात्मानो मुनिजनशापपरिप्रीत...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| सदागत्यभिमुखम् | सदागति: (वायु:) तस्य अभिमुख: | सदा वायु के वेग के सन्मुख रहने वाला |
| अमानुषलोकोचिताकारम् | न मानुष: अमानुष: (दिव्य:) तस्य उचित: आकार: | दिव्य लोक के योग्य आकृति वाला |
| शतमख: | शतं मखा: (यज्ञा:) यस्य स: | इन्द्र (सौ यज्ञ करने वाला) |
| अश्वहृदयेतिविख्याता | अश्वस्य हृदयं यस्या: सा | 'अश्वहृदया' नाम से प्रसिद्ध |
| चक्रवर्तिनरवाहनोचितम् | चक्रवर्तिन: नरवाहनस्य उचितम् | चक्रवर्ती और नरवाहन के योग्य |
हिन्दी अनुवाद:
चन्द्रापीड ने उस श्रेष्ठ अश्व 'इन्द्रायुध' को देखा, जो सर्प की तरह सदैव वायु के सम्मुख रहने वाला, समुद्र तट की तरह शंखों की माला से सुशोभित, और सूर्योदय की तरह समस्त संसार द्वारा पूजनीय था।
उस अलौकिक आकृति वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त अश्व को देखकर चन्द्रापीड का धैर्यवान हृदय भी विस्मय से भर गया। उसने मन में सोचा— "जब देवताओं और असुरों ने मन्दराचल पर्वत से समुद्र का मंथन किया था, तब यदि उन्होंने इस अश्वरत्न को नहीं निकाला, तो फिर भला उन्होंने कौन सा रत्न निकाला? इन्द्र ने यदि इसकी सुविशाल पीठ पर सवारी नहीं की, तो उन्हें त्रैलोक्य के राज्य का क्या फल मिला? जलधि (समुद्र) ने 'उच्चैःश्रवा' जैसा घोड़ा देकर इन्द्र को निश्चय ही ठग लिया है। मुझे लगता है कि भगवान नारायण की दृष्टि अब तक इस पर नहीं पड़ी, अन्यथा वे गरुड़ की सवारी का मोह त्यागकर इसी को अपना वाहन बना लेते। धन्य है पिताजी की राजलक्ष्मी, जिनके पास त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसे रत्न उपकरण के रूप में विद्यमान हैं।"
चन्द्रापीड आगे विचार करता है कि इस अश्व का तेज और प्राणशक्ति इतनी अधिक है कि इसकी आकृति 'दैवीय' प्रतीत होती है। साधारण घोड़ों की ऐसी आकृति नहीं होती जो पूरे ब्रह्मांड को चकित कर दे। देवता भी मुनि के शाप वश अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीरों में निवास करते हैं। जैसा कि सुना जाता है— प्राचीन काल में **स्थूलशिरा** नामक महातपस्वी मुनि ने **रम्भा** नामक अप्सरा को शाप दिया था। तब उसने स्वर्ग छोड़कर घोड़ी का रूप धारण किया और 'अश्वहृदया' नाम से प्रसिद्ध होकर मृत्यलोक में राजा शतधन्वा की सेवा की। अवश्य ही यह अश्व भी कोई शापग्रस्त महापुरुष या देवता है।
उस अलौकिक आकृति वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त अश्व को देखकर चन्द्रापीड का धैर्यवान हृदय भी विस्मय से भर गया। उसने मन में सोचा— "जब देवताओं और असुरों ने मन्दराचल पर्वत से समुद्र का मंथन किया था, तब यदि उन्होंने इस अश्वरत्न को नहीं निकाला, तो फिर भला उन्होंने कौन सा रत्न निकाला? इन्द्र ने यदि इसकी सुविशाल पीठ पर सवारी नहीं की, तो उन्हें त्रैलोक्य के राज्य का क्या फल मिला? जलधि (समुद्र) ने 'उच्चैःश्रवा' जैसा घोड़ा देकर इन्द्र को निश्चय ही ठग लिया है। मुझे लगता है कि भगवान नारायण की दृष्टि अब तक इस पर नहीं पड़ी, अन्यथा वे गरुड़ की सवारी का मोह त्यागकर इसी को अपना वाहन बना लेते। धन्य है पिताजी की राजलक्ष्मी, जिनके पास त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसे रत्न उपकरण के रूप में विद्यमान हैं।"
चन्द्रापीड आगे विचार करता है कि इस अश्व का तेज और प्राणशक्ति इतनी अधिक है कि इसकी आकृति 'दैवीय' प्रतीत होती है। साधारण घोड़ों की ऐसी आकृति नहीं होती जो पूरे ब्रह्मांड को चकित कर दे। देवता भी मुनि के शाप वश अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीरों में निवास करते हैं। जैसा कि सुना जाता है— प्राचीन काल में **स्थूलशिरा** नामक महातपस्वी मुनि ने **रम्भा** नामक अप्सरा को शाप दिया था। तब उसने स्वर्ग छोड़कर घोड़ी का रूप धारण किया और 'अश्वहृदया' नाम से प्रसिद्ध होकर मृत्यलोक में राजा शतधन्वा की सेवा की। अवश्य ही यह अश्व भी कोई शापग्रस्त महापुरुष या देवता है।
Full English Translation:
Chandrapida beheld that extraordinary horse, Indrayudha, who like a serpent always faced the wind, was adorned with strings of shells like the seashore, and was worthy of worship by the whole world like the rising sun.
Upon seeing that form, which was suitable for a divine world and endowed with all auspicious marks, even the deeply composed heart of Chandrapida was struck with wonder. He thought to himself: "When the gods and demons churned the ocean with Mount Mandara, if they did not extract this horse-jewel, then what jewel did they truly find? If Indra did not mount this broad back, what was the use of his sovereignty over the three worlds? The ocean surely deceived Indra by giving him the horse Uchhaishravas instead. I believe Lord Narayana’s eyes have not yet fallen upon this horse; otherwise, He would have abandoned His fondness for riding Garuda and chosen this as His vehicle. Truly, my father’s royal fortune is superior to that of the gods, as such rare treasures serve him."
He further pondered that the intense brilliance and vitality of this horse suggested a divine nature. Ordinary horses do not possess such forms that astonish the entire universe. Even deities, due to the curses of sages, leave their original bodies and inhabit other forms. It is heard that in ancient times, a great sage named **Sthulashira** cursed the celestial nymph **Rambha**. Consequently, she left heaven, entered the body of a mare, and became famous as 'Ashvahridaya', serving King Shatadhanva in the mortal world for a long time. Surely, this horse too is some cursed great soul or deity.
Upon seeing that form, which was suitable for a divine world and endowed with all auspicious marks, even the deeply composed heart of Chandrapida was struck with wonder. He thought to himself: "When the gods and demons churned the ocean with Mount Mandara, if they did not extract this horse-jewel, then what jewel did they truly find? If Indra did not mount this broad back, what was the use of his sovereignty over the three worlds? The ocean surely deceived Indra by giving him the horse Uchhaishravas instead. I believe Lord Narayana’s eyes have not yet fallen upon this horse; otherwise, He would have abandoned His fondness for riding Garuda and chosen this as His vehicle. Truly, my father’s royal fortune is superior to that of the gods, as such rare treasures serve him."
He further pondered that the intense brilliance and vitality of this horse suggested a divine nature. Ordinary horses do not possess such forms that astonish the entire universe. Even deities, due to the curses of sages, leave their original bodies and inhabit other forms. It is heard that in ancient times, a great sage named **Sthulashira** cursed the celestial nymph **Rambha**. Consequently, she left heaven, entered the body of a mare, and became famous as 'Ashvahridaya', serving King Shatadhanva in the mortal world for a long time. Surely, this horse too is some cursed great soul or deity.


