कादंबरी: राजकुमार चन्द्रापीड की ६४ कलाएँ और प्राचीन वैदिक शिक्षा प्रणाली

कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७१
कादंबरी: पृष्ठ ७१ - सूतिका-गृह की दिव्य सजावट
गैन विरलप्रथितसितकुसुममिश्रदूर्वाप्रवालमालालंकृतेनावलम्बिताविकलब्याघ्रचर्मणा वन्दनमालान्तरालघटितघण्टागुणेन द्वारदेशेन विराजमानमुभयतश्च द्वारपक्षयोर्मर्यादानिपुणेन गोमयदयीभिरुत्तानविनिहितवराटकदन्तुरभिरन्तरान्तराबद्धविविधवर्णरागरुचिरकूर्पासकुसुमलेशलाञ्छिताभिः कुसुम्भकेसरल्वाश्लेषलोहितामिर्लेखाभिरालिखितस्वस्तिकभक्तिजालमुपरचयता हरिद्राद्रवविच्छुरणपरिपिञ्जरान्तरधरधारिणीं भगवतीं षष्ठीदेवीं कुर्वता विकचपक्षपुटविकटशिखण्डिष्पृष्ठमण्डलाधिरूढमालोललोहितपटघटितपताकमुल्लसितशक्तिदण्डप्रचण्डं कार्तिकेयं संघटयता विन्यस्तालक्तकपाटलमध्यभागौ सूर्याचन्द्रमसावाबध्नता कुङ्कुमपङ्कपिञ्जरीकृतामूर्ध्वप्रोतकनकमययवनिकरपन्टकतितमविरललग्नगौरसिद्धार्थकप्रकरतया काञ्चनरसखचितामिव मृन्मयगुटिकाकदम्बमालां विन्यस्यता चन्दनजलधवलितेषु भित्तिशिखरभागेषु पञ्चाङ्गुलिविचित्रचेलचीरकलापचिह्नामापीतपिष्टपङ्काङ्कितां वर्धमानपरंपरामन्यानि च प्रसवगृह मण्डनभङ्गलानि संपादयता पुरन्ध्रिवर्गेण समधिष्ठितमुखाद्वारसंयतविविधगन्धकुसुममाललंकृतजरच्छागमखिलव्रीहिमध्यवस्थापितार्यवृद्धाध्यासितशयनशिरोभागमनवरतदह्यमानाज्यमिश्रभुजंगनिर्मोकमेषविषाणक्षोदमनलपुष्यमाणारिष्टतरुपल्लवोल्लसितरक्षाधूमगन्धमध्ययनमुखरद्विजगणविप्रकीर्यमाणशान्त्युदकलवमभिनवलिखितमातृपटपूजाव्यग्रधात्रीजनमनेकवृद्धाजनारब्धसूतिकामङ्गलगीतिकामनोहरमुपपाद्यमानस्वस्त्ययनं क्रियमाणशिशुरक्षाबलिविधानमाबध्यमानधवलकुसुमदाम्नमविच्छिन्नपठ्यमाननारायणनामसहस्रममलहाटकयष्टिय्रतिष्ठापितैरन्तरतः शुभशतानीव निश्चलशिखैर्याज्ञिकैर्मङ्गलप्रदीपरुद्भासितमुत्खातासिलता...
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
षष्ठीदेवींषष्ठ्याः देवी (तत्पुरुष)संतान की रक्षक देवी 'षष्ठी' की प्रतिमा
हरिद्राद्रवविच्छुरणहरिद्रायाः द्रव्येण विच्छुरणम्हल्दी के घोल से रंगा हुआ (पीला)
भुजंगनिर्मोकभुजंगस्य निर्मोकः (षष्ठी तत्पुरुष)सांप की केंचुल (नकारात्मकता दूर करने हेतु धूप में प्रयुक्त)
सूतिकामङ्गलगीतिकासूतिकायाः मङ्गलगीतिकासोहर या प्रसव के समय गाए जाने वाले मंगल गीत
नारायणनामसहस्रम्नारायणस्य नाम्नां सहस्रम्विष्णु सहस्रनाम का निरंतर पाठ
हिन्दी अनुवाद: सूतिका-गृह का द्वार सफेद फूलों और दूर्वा (दूब) की मालाओं से सजा था, जिस पर बाघ की खाल लटकी हुई थी और वंदनवारों के बीच छोटी घंटियाँ लगी थीं। द्वार के दोनों ओर कुशल स्त्रियों ने गोबर से लीपे गए स्थान पर कौड़ियों (वराटक) को ऊपर की ओर मुख करके जड़ा था और सिंदूर तथा रंगीन कपड़ों के टुकड़ों से 'स्वस्तिक' के मांगलिक चिह्न बनाए थे। हल्दी के घोल से पीली की गई **भगवती षष्ठी देवी** की प्रतिमा स्थापित की गई थी। साथ ही, पंख फैलाए हुए मोर पर सवार, हाथ में शक्ति (भाला) लिए और लाल झंडे वाले **भगवान कार्तिकेय** की प्रतिमा भी बनाई गई थी।

दीवारों पर आलता (लाल रंग) से सूर्य और चंद्रमा के चित्र बनाए गए थे। केसर से रंगी हुई और पीली सरसों (गौर सिद्धार्थक) से ढकी हुई मिट्टी की छोटी गोलियों की मालाएं ऐसी लग रही थीं मानो सोने के रस से मढ़ी हों। चंदन के जल से पुती सफेद दीवारों पर पाँचों उंगलियों के छापे (छापा) और पिसे हुए चावल के मांगलिक चिह्न बनाए गए थे।

भवन के मुख्य द्वार पर एक बूढ़ा बकरा फूलों की मालाओं से सजाकर बांधा गया था। अनाज के ढेर के बीच बिछौने पर वृद्ध महिलाएं बैठी थीं। हवा में सांप की केंचुल, घी और भेड़ के सींग के चूर्ण को जलाने से उत्पन्न रक्षा-धूप की महक फैली हुई थी, जो नीम के पत्तों के साथ जल रही थी। ब्राह्मण शांति-जल छिड़क रहे थे और धात्रियाँ (दाइयाँ) 'मातृ-पट' की पूजा में व्यस्त थीं। वृद्ध स्त्रियाँ मंगल गीत (सोहर) गा रही थीं, रक्षा-बलि दी जा रही थी और **विष्णु सहस्रनाम** का पाठ निरंतर चल रहा था। सोने की छड़ियों पर रखे गए निश्चल शिखा वाले मंगल-दीपक चारों ओर शुभ प्रकाश फैला रहे थे।
Full English Translation: The entrance to the birth-chamber was adorned with garlands of white flowers and Durva grass, covered with a complete tiger skin, and small bells were fixed between the festoons. On both sides of the door, skilled women had created auspicious 'Swastika' designs using cow-dung, upturned cowries, and colorful cloth fragments. An image of **Goddess Shashthi**, colored yellow with turmeric paste, was installed for the protection of the newborn. Beside her was an image of **Lord Kartikeya**, riding a peacock with outspread wings, holding a fierce spear and a fluttering red banner.

The Sun and Moon were painted on the walls with red lac (Alaktaka). Garlands of clay beads, smeared with saffron and covered with yellow mustard seeds, looked as if they were dipped in liquid gold. The white-washed walls featured five-finger auspicious marks (Chhapa) made with sandalwood and rice paste.

An old goat, decorated with fragrant flower garlands, was tied at the main gate. Elderly women sat on beds placed amidst heaps of grain. The air was thick with the scent of protective smoke (Raksha-dhuma) created by burning snake-skin, clarified butter (Ghee), and powdered ram-horn along with neem leaves. Brahmins were chanting and sprinkling holy water, while nurses were busy worshipping the 'Matri-pata' (Mother's board). The atmosphere was filled with auspicious songs sung by elderly ladies, while the **Vishnu Sahasranama** was being recited continuously. Steady-flamed lamps placed on golden rods illuminated the chamber with hundreds of blessings.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७२
कादंबरी: पृष्ठ ७२ - राजकुमार के चक्रवर्ती लक्षणों का वर्णन
सनाथपाणिभि: सर्वतो रक्षापुरुषै: परवृतं सूतिकागृहदपश्यत्। अम्भ: पावकं च स्पृष्ट्वा विवेश।

प्रविश्य च प्रसवपरीक्षामपाण्डुमुर्बेरुत्संगगतं विलासवत्या: स्वप्रभासमुदयोपह्तगर्भगेहप्रदीपप्रभमपरित्यक्तगर्भरागत्वार्दुदयपरिपाटलमण्डलमिव सवितारमपरसंध्यालोहितबिम्बमिव चन्द्रमसमनुपजातकाठिन्यमिव कल्पतरुपल्लवमुत्फुल्लमिव रक्ताविन्दरशिमवनिदर्शनमवतीर्णमिव लोहिताङ्गं विद्रुम किसलयदलैरिव बालातपच्छेदैरिव पद्मरागरशिमभिरिव रचितावयवमनभिव्यक्तमुखपञ्चकमिव महासेनं सुरवनिताकरपरिभ्रष्टमिवामरपतिकुमारमुत्तप्तकल्याणकर्तस्वरभास्वरया स्वदेहप्रभया पूरयन्तमिव वासभवनमुद्भासमानै: सहजभूषणैरिव महापुरुषलक्षणैरुपेतमागामिकालपालनप्रहृष्टयेव श्रिया समालिङ्गितमाह्लादहेतुमात्मजं ददर्श। विगतनिमेषनिश्चलपक्ष्मणा मुहुर्मुहु: प्रमृष्टसंघटितानन्दबाष्पपटलप्लुतातारेण दूरविस्फारितेन स्निग्धेन चक्षुषा पिबन्निवलपन्निव स्पृशन्निव मनोरथसहस्राप्राप्तदर्शनं सस्पृहमीक्षमाणस्तनयाननं मुमुदे। कृतकृत्यं चात्मानं मेने। समृद्धमनोरथ: शुकनासस्तु शनै: शनैरङ्गप्रत्यङ्गान्यस्य निरूपयन्नीतिविस्तारितलोचनो भूमिपालमवादीत्। देव पश्य पश्यास्य कुमारस्य गर्भसंपीडनवशादपरिस्ुटावयवशोभस्यापि माहात्म्यमाविर्भावयन्ति चक्रवर्तिचिह्नानि। तथा हि अस्य संध्यांशुरक्तबालशशिकलाकारे ललाटपट्टे नलिननालभगं्ततुतन्वीयसूर्णा परिस्फुरति। एतद्विकचपुण्डरीकधवलं कर्णातायतं मुहुर्मुहुुरुन्मिषितैर्धवलयतीव वासभवनमरालपक्ष्म लोचनयुगलम्। विजृम्भमाणकमलकोशपरिमलमनोहरमियमस्य सहजमाननामोदमाजिघ्रतीव दूरायता कनकलेखेव ना...
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
रक्षापुरुषै:रक्षाया: पुरुषा: (तत्पुरुष)सुरक्षाकर्मी या रक्षक पुरुष
सूतिकागृहम्सूतिकाया: गृहम् (तत्पुरुष)प्रसव कक्ष (Labor Room)
चक्रवर्तिचिह्नानिचक्रवर्तिन: चिह्नानिचक्रवर्ती सम्राट होने के लक्षण
पुण्डरीकधवलम्पुण्डरीक (श्वेत कमल) इव धवलम्सफेद कमल के समान उज्ज्वल
ललाटपट्टेललाटस्य पट्ट: (तत्पुरुष)माथे के फलक पर
हिन्दी अनुवाद: राजा तारापीड ने चारों ओर से हथियारों से लैस रक्षकों द्वारा घिरे हुए सूतिका-गृह को देखा। शास्त्रों के अनुसार जल और अग्नि का स्पर्श कर (शुद्ध होकर) उन्होंने भीतर प्रवेश किया।

भीतर जाकर उन्होंने रानी विलासवती की गोद में स्थित अपने पुत्र को देखा। वह बालक अपनी देह की कांति से प्रसव-कक्ष के दीपकों की लौ को भी फीका कर रहा था। जन्म के समय की लाली के कारण वह उदय होते हुए लाल सूर्य या संध्या के समय के लाल चंद्रमा के समान प्रतीत हो रहा था। उसका शरीर कल्पवृक्ष के कोमल पत्तों या खिले हुए लाल कमलों के समूह जैसा कोमल और कांतिमान था। वह बालक ऐसा लग रहा था मानो मूंगे की नई कोंपलों, सुबह की धूप के टुकड़ों या पद्मराग मणियों की किरणों से रचा गया हो। वह साक्षात कार्तिकेय (महासेन) के समान तेजस्वी था और अपनी देह की प्रभा से पूरे भवन को सोने के समान चमका रहा था।

पुत्र को देखकर राजा आनंदित हो गए। वे बिना पलक झपकाए, हर्ष के आंसुओं से भरी आंखों से उसे ऐसे देख रहे थे मानो उसे पी रहे हों या स्पर्श कर रहे हों। उन्होंने स्वयं को कृतकृत्य माना। मन्त्री शुकनास ने भी बड़े ध्यान से बालक के अंगों का निरीक्षण किया और राजा से कहा— "देव! देखिए, यद्यपि अभी इसके अंग पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं, फिर भी इसमें चक्रवर्ती सम्राट के लक्षण साफ दिखाई दे रहे हैं।"

शुकनास ने आगे कहा— "इसके मस्तक पर बाल चंद्रमा की कला के समान चमक है और कमल की डंडी के रेशों के समान सूक्ष्म रेखाएँ (ऊर्णा) उभर रही हैं। इसकी श्वेत कमल जैसी उज्ज्वल और कान तक लंबी आंखें अपनी चमक से पूरे भवन को प्रकाशित कर रही हैं। इसकी लंबी और सुंदर नाक सोने की रेखा के समान है, जो खिले हुए कमल की सुगंध को पहचान रही है।"
Full English Translation: King Tarapida observed the birth-chamber surrounded by armed guards from all sides. After purifying himself by touching water and fire, he entered the room.

Upon entering, he saw his son resting in Queen Vilasavati's lap. The child's natural radiance surpassed the glow of the lamps in the chamber. Due to the redness of birth, he looked like the rising sun or the crimson moon of twilight. His body was as tender as the leaves of the Kalpataru (celestial tree) or a cluster of blooming red lotuses. He appeared to be fashioned from coral sprouts, rays of morning sunlight, or the brilliance of rubies. Shining like Lord Kartikeya, his golden aura illuminated the entire mansion.

The King was overwhelmed with joy. With unblinking eyes filled with tears of happiness, he gazed at his son as if drinking him in or touching him with his sight. He felt his life's purpose was fulfilled. Shukanasa, carefully examining the infant's features, said— "O King! Behold, even though his limbs are not yet fully formed, the signs of a universal sovereign (Chakravartin) are clearly manifest."

Shukanasa continued— "On his forehead, there is a glow like the crescent moon, and fine lines as delicate as lotus fibers (Urna) are visible. His eyes, white like blooming lotuses and extending towards his ears, brighten the house with every blink. His long, graceful nose, resembling a streak of gold, seems to be inhaling the fragrance of a blooming lotus."
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७३
कादंबरी: पृष्ठ ७३ - दोहरी खुशियाँ और वैशम्पायन का जन्म
सिका। रक्तोत्पलकलिकाकारमुद्वहतीव चास्याधररुचकम्। रक्तोत्पलकलिका लोहिततलौ भगवतो विष्टरश्रवस इव शङ्खचक्रचिह्नौ प्रशस्तलेखालाञ्छितौ करौ। अभिनवकल्पतरुपल्लवकोमलं लेखामयैर्ध्वजरथतुरगातपत्रकमलैरलंंकृतमनेकनरेन्द्रसहस्रचूडामणिचक्रचुम्बनोचितं चरणयुगलम्। एष च दुन्दुभेरिवतिगम्भीर: स्वरयोगोऽस्य रुदत: श्रूयते।

इत्येवं कथयत्येव तस्मिन्ससम्भ्रमपसृतेन राजलोकेन द्वारि स्थितेन दत्तमागस्त्वरितगतिरागत्य प्रहर्षोद्गमपुलकिततनु: स्फारीभवल्लोचनो मङ्गलनामा प्रहृष्टवदन: पुरुष: पादयो: प्रणम्य राजानं व्यजिज्ञपत्। देव दिष्ट्या वर्धसे। प्रतिहतास्ते शत्रव:। चिरं जीव। जय च पृथिवीम्। त्वत्प्रसादादत्रभवत: शुकनासस्यापि ज्येष्ठायां ब्राह्मण्यां मनोरमाभिविधानायां राम इव रेणुकायां तनयो जातः। श्रुत्वा देव: प्रमाणमिति।

अथ नृपतिरमृतवृष्टिप्रतिममाकर्ण्य तद्वचनं प्रीतिविस्फारिताक्ष: प्रत्यवदत्। अहो कल्याणपरम्परा। सत्योऽयं जनप्रवादो यद्विपदिपदं संपत्संपदमनुबध्नातीति। सर्वथा समानसुखदु:खतां दर्शयता विधिनापि भवतेव वयमनुवर्तिता:। इत्यभिधाय प्रीतिविकसितमुख: सरभसमालिङ्ग्य विहसन्स्वयमेव शुकनासस्योत्तरीयं पूर्णपात्रं जहार। तस्मै च प्रीतमना: प्रियवचनश्रवणानुरूपं पुरुषायपरिमितं पारितोषिकमादिशत्।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
रक्तोत्पलकलिकारक्तोत्पलस्य कलिका (तत्पुरुष)लाल कमल की कली के समान
दिष्ट्या वर्धसेमुहावरा (Idiom)बधाई हो / आप सौभाग्यशाली हैं
कल्याणपरम्पराकल्याणानां परम्पराशुभ घटनाओं का सिलसिला
पूर्णपात्रम्पूर्णं पात्रम्उपहार स्वरूप दिया जाने वाला पात्र/वस्त्र
विष्टरश्रवसविष्णु का पर्यायवाचीभगवान विष्णु के समान शंख-चक्र चिह्न
हिन्दी अनुवाद: (राजकुमार के अंगों का वर्णन जारी है...) बालक के अधर (होंठ) लाल कमल की कली के समान सुंदर हैं। उसकी हथेलियाँ भगवान विष्णु के समान शंख और चक्र के चिह्नों तथा उत्तम रेखाओं से सुशोभित हैं। उसके दोनों चरण कल्पवृक्ष के नवीन पत्तों के समान कोमल हैं और उन पर ध्वज, रथ, घोड़े, छत्र और कमल जैसी राजसी रेखाएं अंकित हैं; ये चरण भविष्य में हजारों राजाओं के मुकुटों द्वारा चूमे जाने (प्रणाम किए जाने) योग्य हैं। रोते समय इस बालक का स्वर नगाड़े (दुन्दुभि) के समान गंभीर सुनाई देता है।

जब शुकनास यह कह ही रहे थे, तभी द्वार पर खड़े राजपुरुषों द्वारा रास्ता दिए जाने पर 'मंगल' नाम का एक पुरुष अत्यंत तीव्र गति से भीतर आया। वह खुशी से रोमांचित था और उसकी आंखें खिली हुई थीं। उसने राजा के चरणों में प्रणाम कर निवेदन किया— "देव! आपको बधाई हो! आपके शत्रुओं का नाश हो, आप चिरंजीवी हों और पृथ्वी पर विजय प्राप्त करें। आपकी कृपा से मन्त्री शुकनास की ज्येष्ठ पत्नी मनोरमा के गर्भ से भी वैसा ही पुत्र उत्पन्न हुआ है, जैसे रेणुका से भगवान परशुराम उत्पन्न हुए थे।"

अमृत की वर्षा के समान उन वचनों को सुनकर राजा की आँखें प्रेम से खिल उठीं। उन्होंने उत्तर दिया— "अहो! यह तो कल्याण की परंपरा (खुशियों की झड़ी) लग गई है। यह कहावत सच है कि 'विपत्ति विपत्ति को खींचती है और संपत्ति (सुख) संपत्ति को।' विधाता ने हमें समान सुख-दुःख वाला बनाकर आपके और हमारे भाग्य को एक जैसा कर दिया है।" ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त राजा ने हँसते हुए स्वयं ही शुकनास का उत्तरीय (दुपट्टा) 'पूर्णपात्र' (उपहार) के रूप में छीन लिया और उस शुभ समाचार लाने वाले पुरुष को अपार पारितोषिक देने की आज्ञा दी।
Full English Translation: (Continuing the description...) The child's lower lip resembles the bud of a red lotus. His palms, as red as lotus petals, bear the auspicious marks of the conch and the wheel, similar to Lord Vishnu. His feet are as tender as the fresh leaves of the celestial tree, adorned with lines shaped like banners, chariots, horses, umbrellas, and lotuses—feet destined to be bowed upon by the crowns of thousands of kings. Even his cry is as deep and resonant as the sound of a kettle-drum (Dundubhi).

While Shukanasa was still speaking, a man named 'Mangala' entered hurriedly, his body thrilling with excitement. Bowing at the King's feet, he announced— "O Lord! Congratulations! May your enemies be defeated, may you live long and conquer the earth. By your grace, a son has been born to Shukanasa's senior wife, Manorama, just as Lord Parashurama was born to Renuka."

Hearing these words, which were like a rain of nectar, the King's eyes widened with joy. He replied— "Aha! What a sequence of auspicious events! The proverb is true that 'misfortune follows misfortune, and prosperity follows prosperity.' Destiny has made our joys and sorrows identical." Saying this, the joyful King laughingly took Shukanasa's upper garment as a symbolic gift (Purnapatra) and ordered a massive reward for the messenger who brought the good news.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७४
कादंबरी: पृष्ठ ७४ - चन्द्रापीड और वैशम्पायन का नामकरण
लप्स्येन विलसद्वारविलासिनीहसितैरुन्निद्रकैरववनानुकारं प्रथयता सरभसवलनस्खलल्लोलहारलतास्फालितकुचस्थलेन सिन्दूरतिलकलुलितालकलेखेन विप्रकीर्णपिष्टातकपांशुपुञ्जपिञ्जरितकेशपाशेन प्रनृत्तकलमूककुब्जकिरातवामनबधिरजडजनपुरःसरेणोत्तरीयांशुकग्रीवाबद्धावक्रुष्टविडम्बितजरत्कञ्चुकिकदम्बकेन वीणावेणुमुरजकांस्यतालयस्यानुगतेन कलमथुरमुद्गायता हर्षनिर्भरतया मत्तेनेवोन्मत्तेनेव प्रगृहीतेनेव व्यपगतवाच्यावाच्यविवेकेन नृत्तक्रीडाप्रसक्तेनान्तः पुरिकाजनेन प्रचलमणिकुण्डलाहतकपोलभित्तिना च विधूणमानकर्णोत्पलेनाधोविगलितविलोलशेखरेण दोलायमानवैकक्षककुसुममालेन निर्दयप्रहृतभेरीमृदङ्ग-मर्दलपटहनिनादानुगतकाहलाशङ्खखजनितरभसेन चरणसंनिपातैर्दारयतेव वसुधां राजपरिजनेन प्रवृत्तनृत्तेन च चारणगणेन विविधमुखवाद्यकृतकोलाहलेन पठता गायता चानुगम्यमानः शुकनासभवनं गत्वा द्विगुणतरमुत्सवमकारयत्।

अतिक्रान्ते च षष्ठीजागरे प्राप्ते दशमेऽहनि पुण्ये मुहूर्ते गाः सुवर्णं च कोटिशो ब्राह्मणसात्कृत्वा मातुरस्य मया परिपूर्णमण्डलश्चन्द्रः स्वप्ने मुखकमलमाविशन्दृष्ट इति स्वप्नानुरूपमेव राजा स्वसूनोश्चन्द्रापीड इति नाम चकार। अपरेद्युः शुकनासोऽपि कृत्वा ब्राह्मणोचिताः सकलाः क्रिया राजानुमतमात्मजस्य विप्रजनोचितं वैशम्पायन इति नाम चक्रे। क्रमेण कृतचूडाकरणादिबालक्रियाकलापस्य शैशवमतिचक्राम चन्द्रापीडस्य।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
चन्द्रापीडःचन्द्रः आपीडः (मुकुटम्) यस्य सःजिसका मुकुट चंद्रमा हो (राजकुमार का नाम)
वैशम्पायनःविप्रजनोचितं नामशुकनास के पुत्र का नाम
ब्राह्मणसात्कृत्वाब्राह्मणेभ्यः दत्तम्ब्राह्मणों को दान कर देना (कोटिशः सुवर्णम्)
षष्ठीजागरेषष्ठ्याः रात्रौ जागरम्छठी की रात का जागरण
शैशवमतिचक्रामशैशवम् + अतिचक्रामबचपन बीत गया
हिन्दी अनुवाद: राजमहल का वातावरण उत्सवमय था। सुंदर वारांगनाओं की हँसी खिले हुए कुमुदों के वन जैसी लग रही थी। अन्तःपुर की स्त्रियाँ खुशी में ऐसी मग्न थीं कि वे क्या कहना चाहिए और क्या नहीं, इसका विवेक भूल चुकी थीं। उनके गले के हार स्तनों पर टकरा रहे थे, सिंदूर के तिलक बालों में बिखर गए थे और उनके केश गुलाल (पिष्टातक) से पीले हो गए थे। गूँगे, बहरे, बौने और कुबड़े लोग नाच रहे थे। बूढ़े कंचुकी (महल के रक्षक) भी अपने दुपट्टों को गले में बाँधकर खुशी में शोर मचा रहे थे। वीणा, बाँसुरी और मृदंग की मधुर थाप पर नाचते-गाते हुए राजा तारापीड मन्त्री शुकनास के घर गए और वहाँ पहले से भी दोगुना बड़ा उत्सव मनाया।

छठी की रात का जागरण बीत जाने पर, दसवें दिन शुभ मुहूर्त में राजा ने करोड़ों गाएँ और स्वर्ण ब्राह्मणों को दान किया। राजा ने याद किया कि उन्होंने स्वप्न में पूर्ण चंद्रमा को विलासवती के मुख में प्रवेश करते देखा था, अतः उस स्वप्न के अनुसार उन्होंने अपने पुत्र का नाम **'चन्द्रापीड'** रखा। अगले दिन शुकनास ने भी ब्राह्मणोचित संस्कार करके राजा की अनुमति से अपने पुत्र का नाम **'वैशम्पायन'** रखा। धीरे-धीरे मुंडन (चूड़ाकरण) आदि बाल-संस्कार संपन्न हुए और चन्द्रापीड का बचपन बीत गया (वह किशोरावस्था की ओर बढ़ा)।
Full English Translation: The royal palace was filled with a festive atmosphere. The laughter of beautiful courtesans resembled a blooming forest of white lotuses. The women of the harem were so absorbed in joy that they lost the sense of what to say and what not to say. Their necklaces struck their bosoms as they whirled, their vermilion marks were smeared, and their hair was colored yellow with aromatic powders. Mutes, dwarfs, and hunchbacks led the dance, while elderly chamberlains shouted with joy, tying their upper garments around their necks. Accompanied by the sweet sounds of lutes, flutes, and drums, King Tarapida went to Shukanasa's house and celebrated an even grander festival there.

After the ritual awakening of the sixth night (Shashthi-jagara), on the auspicious tenth day, the King donated millions of cows and gold to the Brahmins. Recalling his dream where a full moon entered the mouth of Queen Vilasavati, the King named his son **'Chandrapida'**. The next day, Shukanasa performed the appropriate Vedic rites and, with the King's approval, named his son **'Vaishampayana'**. Gradually, after ceremonies like the first haircut (Chudakarana), Chandrapida's early childhood passed away as he moved toward youth.
कादंबरी भाष्य - पृष्ठ ७५
कादंबरी: पृष्ठ ७५ - चन्द्रापीड की बहुमुखी शिक्षा
...वेष्टितमतिदृढकपाटसंपुटमुद्घाटितैकद्वारप्रवेशमेकान्तोपरचिततुरंगशालाविभामगधः कल्पितव्यायामशालममरागाराकारं विद्यामन्दिरमकारयत्। सर्वविद्याचार्याणां च संग्रहे यत्नमति महान्तमन्वतिष्ठत्।

तत्रस्थं च तं केसरिकिशोरकमिव पञ्जरगतं कृत्वा प्रतिषिद्धनिर्गममाचार्यकुलपुत्रप्रायपरिजनपरिवारमपनीतशेषशिशुजनक्रीडाव्यासङ्गमनन्यमनसमखिलविद्योपादानार्थमाचार्येभ्यश्चन्द्रापीडं शोभने दिवसे वैशम्पायनद्वितीयमर्पयांबभूव। प्रतिदिनं चोत्थायोत्थाय सह विलासवत्या विरलपरिजनस्तत्रैव गत्वैनमालोकयामास राजा।

चन्द्रापीडोऽप्यनन्यहृदयतया तथा नियन्त्रितो राजाचिरेणैव कालेन यथास्वमात्मकौशलं प्रकटयद्भिः पात्रवशादुपजातोत्साहैराचार्यैरुपदिश्यमानाः सर्वा विद्या जग्राह। मणिदर्पण इवातिनिर्मले तस्मिन्संचक्राम सकलः कलाकलापः। तथा हि- पदे वाक्ये प्रमाणे धर्मशास्त्रे राजनीतिषु व्यायामविद्यासु चापचक्रचर्मकृपाणशक्तितोमरपरशुगदाप्रभृतिषु सर्वेष्वायुधविशेषेषु रथचर्यासु गजपृष्ठेषु तुरंगमेषु वीणावेणुमुरजकांस्यतालयदुरपुटप्रभृतिषु वाद्येषु भरतादिप्रणीतेषु नृत्तशास्त्रेषु नारदीयप्रभृतिषु गान्धर्ववेदविशेषेषु हस्तिशिक्षायां तुरगवयोज्ञाने पुरुषलक्षणेषु चित्रकर्मणि पत्रच्छेद्ये पुस्तकव्यापारे लेख्यकर्मणि सर्वासु द्यूतकलासु गन्धर्वशास्त्रेषु शकुनिरुतज्ञाने ग्रहगणिते रत्नपरीक्षासु दारुकर्मणि दन्तव्यापारे वास्तुविद्यास्वायुर्वेदे यन्त्रप्रयोगे विषाहरणे सुरुंगोपभेदे तरणे लङ्घने पुतिष्वारोहणे रतिप्रबन्धेष्विन्द्रजाले कथासु नाटकेष्वाख्यायिकासु काव्येषु महाभारतपुराणेतिहासरामायणेषु सर्वलिपिषु सर्वदेशभाषासु सर्वसंज्ञासु सर्वशिल्पेषु छन्दःस्वपि कलाविशेषेषु परं कौशलमवाप।
पद (Word) विग्रह / विवरण विशेष / अर्थ
विद्यामन्दिरम्विद्यायाः मन्दिरम् (तत्पुरुष)शिक्षा का भवन (School/Academy)
केसरिकिशोरकम्केसरिणः (सिंहस्य) किशोरकम्सिंह के शावक के समान (राजकुमार के लिए उपमा)
वैशम्पायनद्वितीयम्वैशम्पायनः द्वितीयः यस्य तम्वैशम्पायन जिसके दूसरे साथी थे
सकलः कलाकलापःसमस्त कलाओं का समूहसभी ६४ कलाओं और विद्याओं का ज्ञान
शकुनिरुतज्ञानेपक्षियों की बोली का ज्ञानएक प्राचीन विद्या (Augury/Bird signs)
हिन्दी अनुवाद: राजा तारापीड ने नगर के बाहर एक अत्यंत सुरक्षित 'विद्या-मन्दिर' (पाठशाला) का निर्माण करवाया, जो मजबूत किवाड़ों से युक्त था और जिसमें केवल एक ही प्रवेश द्वार था। इसमें घोड़ों के लिए अलग शाला और व्यायाम के लिए विशेष स्थान बनाया गया था। राजा ने देश के श्रेष्ठ आचार्यों को वहाँ राजकुमार को शिक्षित करने के लिए आमंत्रित किया।

एक शुभ दिन पर, राजा ने राजकुमार चन्द्रापीड को मन्त्री-पुत्र वैशम्पायन के साथ उन आचार्यों को सौंप दिया। जिस तरह सिंह के शावक को पिंजरे में रखा जाता है, उसी तरह चन्द्रापीड को वहाँ बाहरी व्याकुलता से दूर रखा गया ताकि वे एकाग्र होकर शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनके बचपन के खेल-कूद और मनोरंजन को पूरी तरह रोक दिया गया। राजा और रानी विलासवती प्रतिदिन सुबह वहाँ जाकर अपने पुत्र से मिलते थे।

चन्द्रापीड ने अत्यंत एकाग्रता से आचार्यों द्वारा सिखाई गई सभी विद्याओं को ग्रहण किया। जिस प्रकार एक स्वच्छ दर्पण में सारे बिम्ब स्पष्ट दिखाई देते हैं, उसी प्रकार चन्द्रापीड के निर्मल बुद्धि रूपी दर्पण में समस्त कलाएँ समा गईं। उन्होंने निम्नलिखित विषयों में महारत हासिल की:
* **व्याकरण और शास्त्र:** व्याकरण (पद), मीमांसा (वाक्य), न्याय (प्रमाण), धर्मशास्त्र और राजनीति। * **युद्ध कला:** धनुष-बाण, चक्र, तलवार, ढाल, गदा, शक्ति, भाला, कुल्हाड़ी आदि शस्त्रों का संचालन। रथ, हाथी और घोड़ों की सवारी। * **संगीत और ललित कला:** वीणा, बाँसुरी, मृदंग आदि वाद्य यंत्र; भरत मुनि का नृत्य शास्त्र और नारद का गान्धर्व वेद (संगीत)। चित्रकला, मिट्टी और काष्ठ कला, तथा हस्तलिपि। * **विशेष ज्ञान:** आयुर्वेद, विष-विज्ञान (विषहरण), यंत्रों का प्रयोग, तैराकी, छलांग लगाना, पक्षियों की भाषा समझना, ज्योतिष (ग्रह-गणित), और रत्नों की परीक्षा। * **साहित्य:** महाभारत, रामायण, पुराण, इतिहास, नाटक, काव्य और विश्व की समस्त लिपियों तथा भाषाओं का ज्ञान।
Full English Translation: King Tarapida had a highly secure 'Vidya-mandira' (Academy) built outside the city, fortified with strong gates and a single entrance. It included a separate stable for horses and a gymnasium for physical training. The King made a great effort to gather the most renowned teachers of all sciences there.

On an auspicious day, the King entrusted Chandrapida and his companion Vaishampayana to these teachers. Like a lion cub kept in a cage, the prince was kept away from all childhood distractions and play to ensure total concentration. Every morning, the King and Queen Vilasavati would visit the academy to see the prince.

With an unwavering mind, Chandrapida mastered all the sciences taught by his teachers. Just as a clean mirror reflects everything clearly, his pure intellect absorbed every art and science. He achieved mastery in:
* **Linguistics & Philosophy:** Grammar, Mimamsa, Logic, Ethics, and Political Science. * **Martial Arts:** Archery, sword-fighting, the use of maces, spears, axes, and shields. He excelled in driving chariots and riding elephants and horses. * **Fine Arts:** Musical instruments (Lute, flute, drums), Dance according to Bharata, and Music according to Narada. Also painting, carpentry, and various crafts. * **Scientific & Specialized Knowledge:** Ayurveda, Toxicology, Mechanical engineering (use of machines), Astronomy, Gemology, and understanding the cries of birds. * **Literature:** Mastery over the Mahabharata, Ramayana, Puranas, History, Drama, Poetics, and all known scripts and languages of the world.
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