चन्द्रापीड दिग्विजय, अच्छोद सरोवर का प्रसंग, बाणभट्ट की काव्य शैली, संस्कृत साहित्य अनुवाद।

४. Indexing Table (For Quick Navigation)** | पृष्ठ संख्या | मुख्य विषय (Key Highlights) | |---|---| | **111** | चन्द्रापीड का सभा-मण्डप से प्रस्थान और मंगल-दुन्दुभि का नाद। | | **112** | पत्रलेखा के साथ हथिनी पर सवार होकर राजसी वैभव का प्रदर्शन। | | **113** | वैशम्पायन का आगमन और सेना का प्रलयकालीन समुद्र जैसा दृश्य। | | **114-115** | सैन्य कोलाहल और आकाश को ढँक लेने वाली विशाल 'महाधूलि' का वर्णन। | | **116** | धूलि के कारण दिन में अंधकार और पृथ्वी का 'अकाल-राहु' जैसा दृश्य। | | **117** | वैशम्पायन द्वारा चन्द्रापीड के प्रताप और राजाओं की अधीनता का स्तवन। | | **118** | सैन्य शिविर (Camp) में प्रवेश और माता-पिता के वियोग में चन्द्रापीड की जागृत रात्रि। | | **119** | तीन वर्षों में विश्व-विजय और सुवर्णपुर में विश्राम। | | **120** | किन्नर-मिथुन का पीछा करते हुए चन्द्रापीड का अकेले निर्जन वन में खो जाना। | क्या आप **पृष्ठ 121** से आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं, जहाँ चन्द्रापीड **अच्छोद सरोवर** के किनारे पहुँचेंगे? चन्द्रापीड दिग्विजय, अच्छोद सरोवर का प्रसंग, बाणभट्ट की काव्य शैली, संस्कृत साहित्य अनुवाद।

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १११

चन्द्रापीड का सिंहासनारोहण एवं दिग्विजय-दुन्दुभि नाद

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
लंस्तत्कालप्रतिपन्नवेत्रदण्डेन पित्रा स्वयं पुर:प्रारब्धसमुत्सारण: सभामाण्डपमुपगम्य काञ्चनमयं शशीव मेरुशृङ्गं चन्द्रापीड: सिंहासनमारुरोह।

आरूढस्य चास्य कृतयथोचितसकलराजलोकसंमानस्य मुहूर्तं स्थित्वा दिग्विजयप्रयाणशंसी प्रलयघनघटाघोषघर्घरध्वनिरुदधिरिव मन्दरपातैर्वसुंधरापीठ इव युगान्तनिर्घातैरुत्पातजलधर इव तडिद्दण्डपातै: पातालकुक्षिरिव महावराहघोणाभिघातै: कनककोणैरभिहन्यमान: प्रस्थानदुन्दुभिरामन्थरं दध्वान। येन ध्वनता समाध्मातानीवोन्मीलितानीव पृथक्कृतानीव विस्तारितानीव गर्भीकृतानीव प्रदक्षिणीकृतानीव बधिरीकृतानीव रवेण भुवनान्तराणि। विश्लेषिता इव दिशामन्योन्यबन्धसंधय:। यस्य च भयवशविवशवलितोत्तानफणासहस्रेणालिङ्ग्यमान इव रसातले शेषेण मुहुर्मुहुरभिमुखदत्तदन्तोर्ध्वघातैराहूयमान इव दिक्षु दिग्कुञ्जरै: संत्रासविचितरेचकमण्डलै: प्रदक्षिणीक्रियमाण इव नभसि दिवसकररथतुरगैपूर्वार्धदृष्टहासशङ्काहर्षहुंकृतेनाभाष्यमाण इव कैलासशिखरिणि त्र्यम्बकवृषेण कृतगम्भीरकण्ठगर्जितेन प्रत्युद्गम्यमान इव विबुधसद्मनायरावतेनाश्रुतपूर्वरवजनितरोषावेशतिर्यग्वनमितविषाणमण्डलेन प्रणम्यमान इव यमसद्मनि कृतान्तमहिषेण संवस्तलोकपालकर्णितो बभ्राम त्रिभुवनमखिलं निनाद:।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • उपमा एवं उत्प्रेक्षा का बाहुल्य: बाणभट्ट ने दुन्दुभि (नगाड़े) के नाद की तुलना प्रलयकालीन बादलों की गर्जना, मन्दराचल के मन्थन से क्षुब्ध समुद्र और महावराह की फुंकार से की है।
  • ब्रह्माण्डीय प्रभाव: दुन्दुभि के शब्द का प्रभाव पाताल में शेषनाग, दिशाओं में दिग्गज, आकाश में सूर्य के घोड़े और कैलास पर नन्दी तक पड़ता दिखाया गया है, जो चन्द्रापीड के चक्रवर्ती प्रभाव का सूचक है।
  • सिंहासनारोहण: चन्द्रापीड का सुवर्ण सिंहासन पर बैठना वैसा ही सुशोभित है जैसे सुमेरु पर्वत के शिखर पर चंद्रमा का उदय होना।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
उस समय स्वयं पिता (राजा तारापीड) ने हाथ में वेत्रदण्ड (राजदण्ड) लेकर आगे चलते हुए भीड़ को हटाना शुरू किया। चन्द्रापीड ने सभा-मण्डप में पहुँचकर स्वर्णमयी सिंहासन पर वैसे ही आरोहण किया जैसे चंद्रमा सुमेरु पर्वत के शिखर पर विराजमान होता है।

वहाँ बैठकर समस्त राजलोक का यथोचित सम्मान करने के पश्चात, दिग्विजय यात्रा की सूचना देने वाली 'प्रस्थान-दुन्दुभि' (नगाड़ा) स्वर्ण के डंडों की चोट से गंभीर स्वर में गूँज उठी। उसका नाद प्रलयकालीन बादलों की गर्जना के समान घर्घर ध्वनि वाला था। उस शब्द ने मानों समस्त भुवनों को फुला दिया, खोल दिया, विस्तार दे दिया और बहरा कर दिया। ऐसा लगा कि दिशाओं के आपस के जोड़ ढीले पड़ गए हैं।

वह नाद रसातले (पाताल) में भयभीत होकर फण फैलाए हुए शेषनाग द्वारा मानों गले लगाया जा रहा था, दिशाओं में दिग्गजों द्वारा दांतों की चोट से चुनौती दिया जा रहा था, और आकाश में सूर्य के घोड़ों द्वारा चकित होकर प्रदक्षिणा किया जा रहा था। कैलास पर्वत पर भगवान शिव के नन्दी (वृष) ने उसे अपने स्वामी की हँसी समझकर हुंकार भरी, और इन्द्र के ऐरावत हाथी ने क्रोध में आकर अपने दांतों को झुकाकर उसका स्वागत किया। यहाँ तक कि यमलोक में यमराज के भैंसे ने भी उसे प्रणाम किया। वह महानाद समस्त लोकपालों को संत्रस्त करता हुआ पूरे त्रिभुवन में फैल गया।
४. English Translation
At that moment, King Tarapida himself, taking up the golden staff of office, led the way to clear the path. Chandrapida approached the assembly hall and ascended the golden throne, appearing as majestic as the moon rising upon the peak of Mount Meru.

Having seated himself and honored the assembled kings appropriately, the 'Prasthana-Dundubhi' (the drum of departure) was struck with golden rods. Its sound, announcing the start of the conquest of the quarters (Digvijaya), echoed like the thunder of clouds at the end of an aeon. That deep, rumbling resonance seemed to fill, expand, and deafen the entire universe, as if loosening the very joints that held the cardinal directions together.

The sound was so profound that in the netherworld, the serpent Shesha seemed to embrace it with his thousand upturned hoods in fear. In the quarters, the celestial elephants challenged it with the upward thrust of their tusks. In the heavens, the horses of the Sun's chariot circled it in wonder. Upon Mount Kailasa, Nandi (the bull of Shiva) let out a roar, mistaking it for the laughter of his Lord, while Indra’s elephant, Airavata, tilted his tusks in a gesture of greeting. Even the buffalo of Yama in the land of the dead bowed to it. This great resonance, terrifying the guardians of the world, vibrated throughout the entire three realms.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११२

चन्द्रापीड का दिग्विजय प्रस्थान एवं राजसी वैभव

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
जात इव सितकुसुममुकुलपातिभि: कल्पपादपैरैरावत इव विमुक्तकरसीकरैराशागजैर्गगनाभोग इव तारागणवर्षिभिर्दिगन्तरैर्जलदकाल इव स्थूलजललवसारस्यन्दिभिर्जलधरैरनुगम्यमानो नरपतिसहस्रैरास्थानमण्डपान्निर्गत।

निर्गत्य च पूर्वारूढया पत्रलेखया समध्यासितान्तरासनामुपपादितप्रस्थानसमुचितमङ्गल्यालङ्कारां ससंभ्रमाधोरणोपनीतां करेणुकामधिरुह्याचलरचकवक्रीकृतक्षीरोदावर्तपाण्डुरेण दशवदनबाहुदण्डावस्थितकैलासकान्तिना मुक्ताफलजालिना शतशलाकेनातपत्रेण निवार्यमाणातपो निर्गन्तुमारेभे। निर्गच्छंश्चाभ्यन्तरास्थित एव प्राकारान्तरितदर्शनानां द्वारावस्थितानां प्रतिपालयतां राज्ञामुन्मयूखानां चूडामणीनामलक्तकद्रवद्युतिमुषा बहलेनालोकबालातपेन राज्याभिषेकानन्तरप्रसृतेन स्वप्रतापवहिनेवेत्यर्थं पिञ्जरीक्रियमाणा दश दिशो, यौवराज्याभिषेकजन्मना निजानुरागेणैव रज्यमानमवनितलमासंभरिपुविनाशपिशुनेन दिग्दाहेनेव पाटलीक्रियमाणमम्बरतलमभिमुखागतभुवनतललक्ष्मीचरणालक्तकरसेनेव लोहितायमानातपं दिवस ददर्श।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • छत्र का वर्णन: चन्द्रापीड के ऊपर जो छत्र (आतपत्र) लगा है, उसकी सफेदी की तुलना 'क्षीर सागर के भंवर' और 'रावण की भुजाओं के बीच स्थित कैलास पर्वत' से की गई है।
  • पिञ्जरीक्रियमाणा दिशो: दिशाओं का पीला (स्वर्ण जैसा) होना चन्द्रापीड के अभिषेक के बाद फैले उसके 'प्रताप रूपी अग्नि' का प्रतीक बताया गया है।
  • पत्रलेखा का साथ: प्रस्थान के समय हथिनी (करेणुका) पर पत्रलेखा पहले से विराजमान है, जो चन्द्रापीड के प्रति उसकी अटूट सेवा और समीपता को दर्शाती है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
हजारों राजाओं के साथ चन्द्रापीड सभा-मण्डप से बाहर निकले। उनके प्रस्थान के समय ऐसा लग रहा था मानो सफेद फूलों की वर्षा करते कल्पवृक्ष, सूँढ से फुहार छोड़ते ऐरावत आदि दिग्गज, या तारों की वर्षा करता आकाश उनके पीछे चल रहा हो।

बाहर आकर वे उस हथिनी (करेणुका) पर सवार हुए जिस पर पत्रलेखा पहले से ही बैठी थी। वह हथिनी मांगलिक अलंकारों से सजी हुई थी। उनके ऊपर मोतियों की जालियों वाला विशाल सफेद छत्र लगाया गया, जो क्षीर सागर के भंवर जैसा श्वेत और रावण की भुजाओं के बीच स्थित कैलास पर्वत जैसी कांति वाला था।

जब वे बाहर निकल रहे थे, तो महल के भीतर खड़े होकर उन्होंने देखा कि द्वारों पर प्रतीक्षा कर रहे हजारों राजाओं के मुकुटों की मणियों की किरणों से दसों दिशाएं पीली (सुनहरी) हो गई हैं, मानो राजकुमार का 'प्रताप-अग्नि' चारों ओर फैल गया हो। धरती उनके प्रति अनुराग (प्रेम) से लाल दिखाई दे रही थी, और आकाश का लाल रंग शत्रुओं के विनाश की सूचना देने वाले दिग्दाह जैसा लग रहा था। ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् लक्ष्मी के चरणों का लाक्षा-रस (महावर) पूरे दिन के उजाले में फैल गया हो।
४. English Translation
Accompanied by thousands of kings, Chandrapida emerged from the assembly hall. His departure felt as though celestial Kalpa-trees were showering white blossoms, or as if the cosmic elephants were spraying water from their trunks in his honor.

He mounted a female elephant (Karenu) where Patralekha was already seated. A magnificent white parasol, adorned with strings of pearls, was held over him. Its whiteness was compared to the swirling waves of the Ocean of Milk and the brilliance of Mount Kailasa held in Ravana's arms.

As he moved out, he noticed that the rays from the crest-jewels of the waiting kings had turned all ten directions golden-yellow, as if the fire of his own majesty (Pratapa) had spread everywhere after his coronation. The earth appeared reddened by the people's affection for him, and the sky's crimson hue seemed like an omen of the destruction of his enemies. It was as if the red lacquer from the feet of the Goddess of Fortune had stained the light of the entire day.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११३

सैन्य प्रस्थान, वैशम्पायन मिलन एवं ब्रह्माण्डीय दृश्य

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
कनकालंकारप्रभाकल्पातितायवेन च दत्तकुङ्कुमस्थासकेनेवाकृष्यमाणे-नेन्द्रायुधेन सनाथीकृतपुरोभाग: शनै: शनै: प्रथममेव ज्ञातक्रतवी-मांशमभिप्रतस्थे।

चलितगजघटाकम्पितधवलातपत्रमनेककल्लोलपरंपरापतितचन्द्रमण्डलप्रतिबिम्बसहस्रं महाप्रलयजलधिजलमिव प्लावितमहीतलमद्भुतोद्धूतक-लकलमखिलं संचचाल बलम्।

उच्चलितस्य चास्य स्वभवनादुपपादितप्रस्थानमङ्गलो धवलदुकूलवासा: सितकुसुमाङ्गरागो महता बलसमूहेन नगेन्द्रवृन्दैश्वानुगम्यमानो धृतधवलातपत्रो द्वितीय इव युवगजस्त्वरितपदसंचारिण्या करिण्या वैशम्पायन: समीपमाजगाम। आगत्य च रजनीकर इव रवेरासन्नवर्ती बभूव।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • प्रलय जलधि उपमा: चन्द्रापीड की विशाल सेना के चलने को 'महाप्रलय के समुद्र' के समान बताया गया है। सेना के ऊपर हिलते हुए सफेद छत्रों की तुलना समुद्र की लहरों में गिरते हुए हजारों चंद्रमाओं के प्रतिबिंब से की गई है।
  • वैशम्पायन का आगमन: वैशम्पायन सफेद वस्त्र (धवलदुकूल) और श्वेत फूलों के अंगराग में सुसज्जित हैं। उनका चन्द्रापीड के पास आना वैसा ही है जैसे चंद्रमा सूर्य के निकट आता है।
  • ब्रह्माण्डीय रूपक: बाणभट्ट वर्णन करते हैं कि उस समय पूरा दिन 'किरीटमय' (मुकुटों से भरा) और पूरी पृथ्वी 'कुञ्जरमयी' (हाथियों से भरी) प्रतीत हो रही थी।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
चन्द्रापीड के स्वर्ण आभूषणों की चमक और घोड़ों के शरीर पर लगे कुंकुम (केसर) के थापों से युक्त सेना धीरे-धीरे पूर्व दिशा की ओर बढ़ने लगी। हाथियों के चलने से हिलते हुए सफेद छत्रों वाली वह सेना ऐसी लग रही थी मानो महाप्रलय का समुद्र उमड़ पड़ा हो, जिसमें लहरों पर हजारों चंद्रमा नाच रहे हों। उस विशाल सेना के शोर (कलकल) से पूरी पृथ्वी भर गई।

उसी समय, अपने भवन से मांगलिक विधानों को पूरा कर, सफेद रेशमी वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पों का लेप लगाए हुए वैशम्पायन एक युवा हाथी की भांति तीव्र गति वाली हथिनी पर सवार होकर चन्द्रापीड के पास आए। उनका आना वैसा ही था जैसे चंद्रमा सूर्य के समीप आता है।

उस क्षण सेना के मुकुटों और आभूषणों की चमक से दसों दिशाएं इंद्रधनुषी आभा से भर गईं। ऐसा लगने लगा मानो पृथ्वी हाथियों से बनी हो, आकाश छत्रों से ढका हो, और पूरा दिन ही मुकुटों की चमक से निर्मित हुआ हो। चारों ओर केवल राजसी वैभव और पराक्रम की ही दृष्टि थी।
४. English Translation
Chandrapida began his march toward the East, his path illuminated by the golden glint of ornaments and the saffron markings on the steeds. The movement of the massive army, with its white parasols swaying atop the elephants, resembled the cosmic ocean at the time of final dissolution, where thousands of moons are reflected upon the turbulent waves.

At that moment, Vaishampayana, having completed his own auspicious departure rituals, arrived. Dressed in white silk and adorned with white floral pastes, he rode a swift female elephant like a young celestial tusker. His approach toward Chandrapida was likened to the Moon drawing near the Sun.

The brilliance radiating from the jeweled crowns and armlets of the soldiers transformed the ten directions into a kaleidoscope of colors. It appeared as if the entire earth was made of elephants, the sky composed of parasols, and the day itself forged from the luster of royal crowns.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११४

सैन्य कोलाहल एवं महाप्रलय जैसा दृश्य

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
जयशब्दमयमिव त्रिभुवनमभवत्। सर्वतश्च कुलपर्वताकारै: प्रचलद्भिर्मत्तवारणैरुत्पातचन्द्रमण्डलनिभैश्च प्रेङ्खद्भुिरातपत्रै: संवर्तकाम्भोदगम्भीरभीमनादेन च ध्वनता दुन्दुभिना... मदजलधारादुर्दिनने कलकलेन च भुवनान्तरव्यापिना महाप्रलयकाल इव संजज्ञे।

वलबहलकोलाहलभीता इव धवलध्वजनिवहनिन्तरवृता ययु: कापि दश दिश:। मलिनावनीरज: संस्पर्शशङ्कितमिव समदगजघटाचूडसहस्रसंरुद्धमतिदूरमम्बरतलमपससार। प्रबलवेत्रिवेत्रलतासमुत्सार्यमाणा इव तुरंगखुररजोदूसरताभीता इवार्ककिरणा मुमुचु: पुरोभागम्। इभकरसीकरनिर्वापणत्रस्त इवातपत्रसंछादितातपो दिवसो ननाश।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • अतिशयोक्ति एवं उत्प्रेक्षा: बाणभट्ट वर्णन करते हैं कि सेना की धूल से डरकर सूर्य की किरणें मानों रास्ता छोड़कर भाग गईं (शङ्कितमिव अम्बरतलमपससार)। यह चन्द्रापीड के सैन्य बल की विशालता को सिद्ध करने वाली उत्कृष्ट काव्य प्रतिभा है।
  • ध्वन्यात्मक वर्णन: दुन्दुभि (नगाड़ों) की आवाज़ को 'संवर्तक' (प्रलयकालीन) बादलों जैसी भीषण बताया गया है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि तीनों लोक केवल 'जय-जय' के शब्दों से ही निर्मित हैं।
  • प्रलय का रूपक: हाथियों के मदजल की वर्षा और धूल के अंधकार ने दिन को महाप्रलय की रात जैसा बना दिया।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
पूरा त्रिभुवन मानों 'जय-जयकार' के शब्दों से भर गया। चारों ओर कुलपर्वतों के समान विशाल मतवाले हाथी चल रहे थे और उनके ऊपर हिलते हुए सफेद छत्र प्रलयकाल के चंद्रमाओं के समान प्रतीत हो रहे थे। प्रलयकालीन बादलों जैसी गंभीर गर्जना करने वाले नगाड़ों के नाद, हाथियों के मद की वर्षा और सेना के भयंकर कोलाहल से ऐसा लगने लगा मानो महाप्रलय का समय आ गया हो।

सेना के उस कोलाहल से डरकर दसों दिशाएं मानों सफेद झंडों के पीछे छिप गईं। पृथ्वी की धूल के स्पर्श से बचने के लिए आकाश मानों हाथियों के सिरों से भी बहुत ऊपर हट गया। घोड़ों के खुरों से उड़ने वाली धूल से डरकर सूर्य की किरणें रास्ता छोड़कर भागने लगीं। हाथियों की सूँढ से निकलने वाली फुहारों और छत्रों की सघन छाया के कारण दिन मानों कहीं लुप्त हो गया। भारी बोझ से दबी हुई पृथ्वी नगाड़े की आवाज़ के साथ स्वयं भी कराहने लगी।
४. English Translation
The entire universe seemed to be composed of nothing but the cries of "Victory!" All around, intoxicated elephants as massive as the primal mountains moved, and the swaying white parasols above them looked like the moons of doomsday. With the terrifying roar of drums like the clouds of the final dissolution and the rain-like mist of the elephants' rut, the atmosphere became indistinguishable from the time of the Great Pralaya.

Terrified by the immense clamor, the ten directions seemed to hide behind the forest of white banners. The very sky retreated far above the thousands of elephant heads, as if fearing the touch of the dust rising from the earth. The sunbeams fled from the path, seemingly afraid of being soiled by the dust kicked up by the horses' hooves. Under the combined spray from elephant trunks and the dense shadows of parasols, the daylight itself seemed to perish and vanish.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११५

सैन्य धूलि का ब्रह्माण्डीय विस्तार एवं विविध रूप

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
शनै:शनैश्च बलसंक्षोभजन्मा क्षितेरनेकवर्णतया कचिज्जीर्णशफरोदरधूम्र: कचित्क मेलक सटासंनिभ: कचित्परिणतरल्लकरोमपल्लवमलिन: कचिदभ्रपुं तन्तुपाण्डुर: कचित्पञ्जरठमृणालदण्डधवल: कचिद्रक्तकपिकेशकपिल: कचिद्वरवृषभरोमन्यफेनपिण्डपाण्डुरक्षि-पन्पथाप्रवाह इव हरिचरणप्रभव: कुपित इव मुञ्चन्क्षमामागर्वापपरिहास इव रुन्धन्नयनानि तृपित इव पिबन्करिकरसीकरजलानि पक्षवानिवोत्पतन् गगनतलमलिनिवह इव चुम्बन्मदलेखां मृगपतिरिव रचयन्करिकुम्भस्थलीषु पदमुपात्तविजय इव गृह्णन्पताका जरागम इव पाण्डुरीकुर्वन्शिरांसि... रेणुरुत्पपात।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • धूलि के विविध रंग: बाणभट्ट ने पृथ्वी की मिट्टी के विभिन्न रंगों के कारण धूल को कहीं 'बूढ़ी मछली के पेट जैसा धूसर', कहीं 'ऊँट की गर्दन के बालों जैसा', और कहीं 'बूढ़े कमल-दण्ड जैसा सफेद' बताया है।
  • मानवीय एवं प्राकृतिक उत्प्रेक्षा: धूल को एक 'प्यास' (तृपित) प्राणी की तरह दिखाया गया है जो हाथियों की सूँढ के जल को पी रही है, और एक 'बूढ़े' (जरागम) की तरह जो राजाओं के सिरों को सफेद कर रही है।
  • आकाश का ग्रास: यह धूलि 'अकाल राहु' के समान सूर्य मण्डल को ग्रसती हुई प्रतीत होती है, जिससे दिन में ही अंधेरा छाने लगता है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
सेना के चलने से उत्पन्न खलबली के कारण पृथ्वी से धूल उड़ने लगी। वह धूल अनेक रंगों की थी—कहीं वह बूढ़ी सफरी मछली के पेट जैसी मटमैली थी, कहीं ऊँट के गर्दन के बालों जैसी भूरी, कहीं रेशमी ऊन जैसी मलिन, तो कहीं पके हुए कमल के डंडे जैसी सफेद थी।

वह धूलि मानों साक्षात् गंगा की धारा की तरह आकाश से गिर रही थी। वह आँखों को रोक (अंधा कर) रही थी मानो पृथ्वी का उपहास कर रही हो। वह प्यासे की तरह हाथियों की सूँढ से निकलने वाले जल को पी रही थी, और पंख वाले पक्षी की तरह आकाश में उड़ रही थी। वह धूलि हाथियों के मद की सुगंध को ऐसे चूम रही थी जैसे भौरों का समूह हो, और राजाओं के सिरों को वैसे ही सफेद कर रही थी जैसे बुढ़ापा (जरा) आने पर बाल सफेद हो जाते हैं।

सूर्य के मण्डल को बिना समय के ही ग्रसने वाले 'अकाल राहु' के समान वह धूलि पूरे गगन मण्डल में फैल गई। वह सेना के वैभव और राजाओं के मुकुटों की मणियों की किरणों से मिलकर और भी सघन हो गई, मानो आकाश में अकाल ही प्रलय के काले बादलों का समूह उमड़ आया हो।
४. English Translation
Gradually, a massive cloud of dust arose from the earth due to the agitation of the marching army. Owing to the varied colors of the soil, it appeared in diverse hues—gray like the belly of an old fish, tawny like the mane of a camel, and white as the stalk of an aged lotus.

The dust ascended like a celestial stream. It obstructed the vision as if mocking the world in its pride. Like a thirsty creature, it seemed to drink the spray from the elephants' trunks, and like a winged bird, it soared into the firmament. It clung to the lines of ichor on the elephants like a swarm of bees and turned the heads of the soldiers white, just as old age (Jaragam) turns hair gray.

Resembling an 'untimely Rahu' swallowing the orb of the sun, the dust spread across the heavens. Combined with the brilliance of the crest-jewels of the kings and the saffron powder of the army, it intensified until the sky looked as though it were covered by the dark, heavy clouds of the final dissolution.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११६

ब्रह्मांडव्यापी धूलि एवं अलौकिक दृश्य का उपसंहार

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
तेन च क्रमेणोपचीयमानबहलमूर्तिना दिग्विजयमङ्गलध्वजेन रिपुकुलकमलप्रलयनीहारेण राज्यलक्ष्मीविलासपटवासचूर्णेनाहितातपत्रपुण्डरीकखण्डतुषारेण सैन्यभरपीडितमहीतलमूर्च्छान्धकारेण... पातालतलादिवोत्तिष्ठता चरणेभ्य इव निर्गच्छता लोचनेभ्य इव निष्पतता दिग्भ्य इवागच्छता नभस्तलादिव पतता पवनादिवोल्लसता रविकिरणेभ्य इव संभवतापहृतचेतनेन निद्रागमेनानवगणितसूर्येणान्धकारेणघर्मकालोपस्थितेन भूमिग्रहेणानुदिततारागणनिवहेन बहुलनिशाप्रदोषेणापतितसलिलेन जलधरसमयेनाभ्रान्तभुजंगेन रसातलेन हरिचरणेनेव संवर्धमानेन त्रिभुवनमलङ्घयत रजसा।

विकचकुवलयवनमिव नभोदकेन गगनतलमवष्टभ्यमानमलक्ष्यत क्षीरोदफेनपाण्डुना क्षितिक्षोदेन। बहुलरजोधूसरितमशिशिरकिरणबिम्बमकचचामरमिव निष्प्रभमभवत्। दुकूलपट्टधवला कदलिकेव कलुषतामाजगाम गङ्गापगा। नरपालबलभरमतिगुरुमसहमाना पुनरिव भारावतारणार्थममरलोकममारुरोह रजोमिषेण मही।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • धूलि का मानवीकरण: बाणभट्ट धूलि को 'राज्यलक्ष्मी के विलास का चूर्ण' और 'शत्रु रूपी कमलों के लिए प्रलय की ओस' कहते हैं। यह धूलि केवल मिट्टी नहीं, बल्कि विजय का प्रतीक है।
  • विरोधाभास एवं रूपक: धूलि को ऐसे 'अंधकार' के रूप में वर्णित किया गया है जिसने सूर्य की उपेक्षा कर दी है (अनवगणितसूर्येण)। इसे एक ऐसे 'बादल के समय' जैसा बताया गया है जिसमें पानी नहीं गिरता (आपतितसलिलेन जलधरसमयेन)।
  • मही का स्वर्गारोहण: एक अत्यंत सुंदर उत्प्रेक्षा में कवि कहते हैं कि सेना के भारी बोझ को न सह पाने के कारण पृथ्वी (मही) मानों धूल के बहाने (रजोमिषेण) सहायता माँगने स्वर्ग लोक जा रही है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
धीरे-धीरे वह धूलि सघन होती गई। वह विजय की मंगल-पताका के समान थी, जो शत्रुओं के कुल रूपी कमलों के लिए प्रलय की पाला (ओस) बन गई थी। वह राज्यलक्ष्मी के विलास के लिए सुगंधित चूर्ण (पटवास) जैसी थी। वह धूलि ऐसी लग रही थी मानो पाताल से निकल रही हो, पैरों से पैदा हो रही हो, आँखों से गिर रही हो, दिशाओं से आ रही हो, और पवन के साथ उल्लासित हो रही हो। उस धूलि ने चेतना हर लेने वाली नींद के समान सूर्य का तिरस्कार कर दिया और बिना बादलों के ही अंधकार फैला दिया।

पृथ्वी की वह सफेद धूलि (क्षितिक्षोद) जो क्षीर सागर के झाग जैसी श्वेत थी, उसने नीले आकाश को ऐसे ढक लिया जैसे खिले हुए नीलकमलों का वन हो। धूल से मटमैला हुआ सूर्य का मण्डल बिना चमक के ऐसा लग रहा था मानो बिना बालों वाला चामर हो। गंगा का जल जो सफेद रेशमी वस्त्र जैसा था, वह भी धूलि के कारण मटमैला (कलुषित) हो गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो राजाओं की सेना के अत्यधिक भारी बोझ को न सह पाने के कारण, पृथ्वी (मही) स्वयं को हल्का करने के लिए धूल के बहाने स्वर्ग लोक की ओर चढ़ रही हो। अंत में, वह पूरी पृथ्वी धूलि के रूप में मानों संहार-सागर, महाकाल के मुख, या नारायण के उदर में प्रविष्ट हो गई।
४. English Translation
Gradually, that dust grew into a dense form, serving as the auspicious banner of world conquest and as the frost of destruction for the lotus-like clans of enemies. It appeared to arise from the netherworld, to emerge from the feet of the soldiers, to spring from the eyes, and to descend from the very sky. This dust, like a consciousness-robbing sleep, ignored the sun and created a darkness akin to a moonless night or a rainy season without actual rain.

The sky, covered by this white earthly dust which was as pale as the foam of the Milky Ocean, looked like a forest of blossomed blue lotuses. The sun’s orb, dimmed and soiled by the dust, lost its luster and resembled a hairless fly-whisk (Chámara). Even the celestial Ganges, once white as silk, became turbid. It seemed as though the Earth, unable to bear the overwhelming weight of the royal armies, was ascending to the heavens under the pretext of rising dust to seek relief. Ultimately, the entire three worlds seemed to enter the mouth of Mahakala or the womb of Narayana, as everything turned into a manifestation of dust.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११७

वैशम्पायन का उद्बोधन एवं सैन्य वैभव का स्तवन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
अथ निजमदोषमसंतप्तानां दन्तिनां दिशि दिशि करविवरविनि:सृतै: क्षरद्भि: क्षीरोदधवलै: सीकरसारै:... उपशमिते रजसि पुनरुपजातालोकासु दिक्षु... वैशम्पायनश्चन्द्रापीडमाबभापे।

"युवराज! किं न जितं देवेन महाराजाधिराजेन तारापीडेन? का दिशो न वशीकृता या वशीकरिष्यसि? कानि दुर्गाणि न प्रसाधितानि यानि प्रसाधयिष्यसि? ... के वा न प्रणता राजान:? ... एते हि चतुरुदधिजलावगाहेदुर्ललितबलमदावलिप्ता दशरथभगीरथभरतदिलीपार्कमान्धातृप्रतिमा: कुलअभिमानशालिन: ... सर्वपार्थिवा रक्षाभूतिमिवअभिषेकपय:पातपूतैश्चूडामणिपल्लवैरुद्धहन्ति मङ्गल्यां भवच्चरणरज:संहतिम्।"
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • धूलि का शमन: हाथियों की सूँढ से निकले जल की फुहारों (सीकरसारै:) और घोड़ों की लार से मार्ग की धूल शांत हो जाती है, जिससे दिशाएं पुन: प्रकाशित हो उठती हैं।
  • ऐतिहासिक तुलना: वैशम्पायन चन्द्रापीड की अधीनता स्वीकार करने वाले राजाओं की तुलना दशरथ, भगीरथ, भरत और दिलीप जैसे महान पौराणिक सम्राटों से करते हैं।
  • चरण-रज का महत्व: पराजित राजा चन्द्रापीड के चरणों की धूल को अपने मस्तक के रत्नों (चूडामणि) पर ऐसे धारण करते हैं मानो वह कोई मंगलकारी 'रक्षा-विभूति' (पवित्र भस्म) हो।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
इसके बाद, हाथियों की सूँढों से निकलने वाले क्षीर-सागर जैसे सफेद जल की फुहारों और घोड़ों के मुख से निकलने वाले झागों से जब धूल शांत हो गई और दिशाएं फिर से दिखाई देने लगीं, तब वैशम्पायन ने आश्चर्यचकित होकर चन्द्रापीड से कहा।

"हे युवराज! महाराजाधिराज तारापीड ने भला क्या नहीं जीता? कौन सी दिशाएं अब जीतने को शेष हैं? कौन से दुर्ग (किले) हैं जिन्हें उन्होंने वश में नहीं किया? ऐसे कौन से रत्न या द्वीप हैं जो उनके अधिकार में नहीं हैं? कौन से ऐसे राजा हैं जिन्होंने आपके पिता के चरणों में सिर नहीं झुकाया?

ये देखिए, दशरथ, भगीरथ और भरत के समान प्रभावशाली और अभिमानी राजा, जो चारों समुद्रों तक अपनी शक्ति रखते हैं, वे आपके चरणों की धूल को अपने मुकुटों की मणियों पर इस प्रकार धारण कर रहे हैं मानो वह अभिषेक के जल से पवित्र की गई कोई मंगलमयी रक्षा-भस्म हो। ये सभी राजा आदिकाल के पर्वतों की भाँति आपकी पृथ्वी को थामे हुए हैं और आपकी सेवा में उपस्थित हैं"।
४. English Translation
After the dust was settled by the spray of water from the elephants' trunks—white as the Milky Ocean—and the foam from the horses, visibility returned to the directions. Observing the vastness of the army with wonder, Vaishampayana addressed Chandrapida.

"O Prince! What has the Great King Tarapida not already conquered? Which directions remain for you to subdue? Which fortresses have not been won, or which islands and jewels have not been acquired? Behold these kings, as mighty and proud as Dasharatha, Bhagiratha, and Bharata. These rulers, whose power reaches the four oceans, carry the dust of your feet upon the sprouts of their jeweled crowns as if it were sacred, auspicious ash (Raksha-bhuti) purified by the waters of coronation. Like the primordial mountains, they support the earth under your command and wait upon you".
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११८

सैन्य शिविर प्रवेश एवं रात्रि विश्राम का वर्णन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
इव सृजति बलानि। अपरिमितबलभराक्रान्ता मन्ये स्मरति महाभारतसमरसंक्षोभस्याद्य क्षिति:। एष शिखरदेशेषु स्खलितमण्डलो ध्वजानानयन्निव कुतूहलाद्भ्रमति कदलीकावनान्तरेषु मयूखमाली। ... इत्येवं वदत एव तस्य युवराज: समुच्छ्रितानेकतोरणां तृणमयप्राकारमन्दिरसहस्त्रसंबाधामुल्लसितधवलपटमण्डपशतशोभिनीमावासभूमिमवाप।

तस्यां चावतीर्य राजवत्सर्वा: क्रियाश्चकार। सर्वैश्च तै: समेत्य नरपतिभिरमात्यैश्च विविधाभि: कथाभिर्विनोद्यमानस्तं दिवसमशेषमभिनवपितृवियोगजन्मना शोकावेगेनायास्यमानहृदयो दु:खेनात्यवाहयत्। अतिवाहितदिवसश्च यामिनीमपि स्वशयनीयस्य नातिदूरे निहितशयननिषण्णेन वैशम्पायनेनान्यतश्च समीपे क्षितितलविन्यस्तकुथप्रसृप्तया पत्रलेखया सहान्तरा पितृसक्तमन्तरा मातृसंबद्धमन्तरा शुकनासमयं कुर्वन्नालापं नात्युपजातनिद्र: प्रायेण जागदेव निन्ये।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • महाभारत से तुलना: वैशम्पायन कहते हैं कि चन्द्रापीड की विशाल सेना के भार से दबी पृथ्वी को आज पुनः 'महाभारत' के युद्ध के समय हुए संक्षोभ (खलबली) की याद आ रही होगी।
  • आवास-भूमि (Camp) का दृश्य: सेना के पड़ाव का वर्णन करते हुए बाणभट्ट कहते हैं कि वहाँ ऊँचे तोरण द्वार थे, हजारों घास के घर (तृणमयप्राकार) थे और सैकड़ों सफेद रेशमी तम्बू (धवलपटमण्डप) शोभायमान थे।
  • पितृ-वियोग की पीड़ा: राजा होने के बावजूद चन्द्रापीड का हृदय कोमल है। दिग्विजय यात्रा के प्रथम दिन वह अपने माता-पिता और शुकनास से बिछड़ने के शोक में डूबे रहे और पूरी रात जागकर बिताई।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
वैशम्पायन कह रहे थे—"मुझे ऐसा लगता है कि इस अपरिमित सेना के भार से दबी हुई पृथ्वी को आज महाभारत के युद्ध की याद आ रही है। सूर्य भी मानों कुतूहलवश ऊँची ध्वजाओं और केलों के वनों के बीच चक्कर काट रहा है"। जब वैशम्पायन ऐसा कह ही रहे थे, तभी युवराज चन्द्रापीड अपनी 'आवास-भूमि' (पड़ाव) पर पहुँच गए। वह स्थान ऊँचे तोरणों, घास के बने हजारों मन्दिरों और सैकड़ों सफेद तम्बुओं से सुसज्जित था।

वहाँ उतरकर उन्होंने राजा के योग्य नित्य क्रियाएं कीं। यद्यपि सभी राजा और मंत्री उन्हें विविध कथाओं से प्रसन्न करने का प्रयास कर रहे थे, तथापि चन्द्रापीड का हृदय पिता से अभी-अभी हुए वियोग के कारण अत्यंत दुखी था। उन्होंने वह दिन बड़े कष्ट से बिताया। रात के समय भी उन्हें नींद नहीं आई। उनके बिछौने के पास ही वैशम्पायन सोए थे और दूसरी ओर जमीन पर आसन बिछाकर पत्रलेखा बैठी थी। चन्द्रापीड कभी पिता के बारे में, कभी माता के बारे में, तो कभी शुकनास के बारे में बातें करते हुए लगभग जागते हुए ही रात बिताने लगे।
४. English Translation
Vaishampayana remarked, "I believe that the Earth, oppressed by the weight of this boundless army, is reminded today of the great upheaval of the Mahabharata war. Even the sun seems to wander curiously through the rows of banners and banana groves". While he was still speaking, Prince Chandrapida reached his campsite. The area was adorned with many arched gateways, thousands of grass-walled dwellings, and hundreds of brilliant white silk tents.

After dismounting, he performed his royal duties. Although kings and ministers tried to divert his mind with various stories, his heart remained heavy with the sorrow of his recent separation from his father. He passed the day in distress. During the night, unable to sleep, he conversed with Vaishampayana, who lay nearby, and Patralekha, who sat on a rug on the floor. Talking now of his father, then of his mother, and sometimes of Shukanasa, he spent most of the night in a state of wakefulness.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ११९

दिग्विजय का विस्तार एवं किन्नर-युगल का दर्शन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
शनै: शनैश्च स्वेच्छया परिभ्रमन्मजयन्नुभयन्नुभयन्नतानाश्वासयन्भीतान्... प्रथमं प्राचीं ततस्त्रिशङ्कुतिलकां ततो वरुणलाञ्छनामन्तरं... वर्षत्रयेण चात्मीकृताशेषद्वीपान्तरं सकलमेव चतुरम्भोधिवातवलयपरिखाप्रमाणं बभ्राम महीमण्डलम्।

तत: क्रमेणाविजितसकलभुवनतल: प्रदक्षिणीकृत्य वसुधां परिभ्रमन् कदाचित्कैलाससमीपचारिणां हेमकूटधाम्नां किरातानां सुवर्णपुरं नाम निवासस्थानं... तत्र च निखिलधरणितलपर्यटनखिन्नस्य निजबल्स्य विश्रामहेतो: कतिपयन्दिवसानतिष्ठत्।

एकदा तु तत्रस्थ एवेन्द्रायुधमारुह्य मृगयानिर्गतो विचरन्काननं शैलशिखरादवतीर्णं यदृच्छया किन्नरमिथुनमद्राक्षीत्। अपूर्वदर्शनतया तु समुपजातकुतूहल: कृतग्रहणाभिलाषस्तत्समीपमादरादुपसर्पिततुरङ्ग: ... एकाकी निर्गत्य निजबलसमूहात्सुदूरमनुससार।
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • दिग्विजय की अवधि: चन्द्रापीड ने मात्र **तीन वर्षों** (वर्षत्रयेण) में चारों समुद्रों के बीच स्थित पूरी पृथ्वी और सभी द्वीपों को अपने अधीन कर लिया।
  • आदर्श शासक के गुण: यात्रा के दौरान चन्द्रापीड केवल विजय नहीं कर रहे थे, बल्कि डरे हुओं को आश्वासन दे रहे थे, शरणागतों की रक्षा कर रहे थे और दुष्टों (विटपकानुत्सादयन्) का दमन कर रहे थे।
  • सुवर्णपुर का उल्लेख: पृथ्वी की प्रदक्षिणा करते हुए वे किरातों के निवास स्थान 'सुवर्णपुर' पहुँचे, जो हेमकूट पर्वत के पास स्थित है। यहाँ उन्होंने अपनी थकी हुई सेना को विश्राम दिया।
  • कथानक का मोड़: शिकार (मृगया) के दौरान 'किन्नर-मिथुन' (अश्वमुख वाले दिव्य जोड़े) का दिखना कहानी में एक बड़ा मोड़ है, क्योंकि इसी का पीछा करते हुए चन्द्रापीड अपनी सेना से अलग हो जाते हैं।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
चन्द्रापीड धीरे-धीरे अपनी इच्छा से पृथ्वी पर घूमते हुए, झुके हुए राजाओं को उठाते हुए और भयभीत लोगों को ढाढस बँधाते हुए आगे बढ़े। उन्होंने पहले पूर्व दिशा, फिर दक्षिण (त्रिशंकु-तिलक) और फिर पश्चिम (वरुण-लांछन) को जीता। तीन वर्षों के भीतर उन्होंने चारों समुद्रों रूपी खाइयों से घिरी पूरी पृथ्वी और अन्य द्वीपों को अपना बना लिया।

सम्पूर्ण भूमण्डल को जीतकर और उसकी प्रदक्षिणा करते हुए, वे कभी कैलाश पर्वत के समीप रहने वाले किरातों के 'सुवर्णपुर' नामक निवास स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने पूरी पृथ्वी के भ्रमण से थकी हुई अपनी सेना को विश्राम देने के लिए कुछ दिन ठहरने का निर्णय लिया।

एक दिन, वहीं रहते हुए वे अपने घोड़े इन्द्रायुध पर सवार होकर शिकार के लिए निकले। वन में विचरते हुए उन्होंने पर्वत के शिखर से उतरे हुए एक 'किन्नर-जोड़े' (मिथुन) को अचानक देखा। इससे पहले ऐसा प्राणी कभी न देखने के कारण उनके मन में भारी कुतूहल जागा और उन्हें पकड़ने की इच्छा से चन्द्रापीड ने अपने घोड़े को उनके पीछे लगा दिया। वे अपनी सेना को पीछे छोड़कर अकेले ही बहुत दूर तक उनका पीछा करने लगे।
४. English Translation
Chandrapida gradually moved across the earth, comforting the frightened and establishing order by suppressing the wicked. Within three years, he conquered all the directions—East, South, and West—and brought the entire earth, surrounded by the four oceans, under his sovereignty.

Having conquered the world, he eventually reached 'Suvarnapura,' the habitation of the Kiratas near Mount Kailash. He stayed there for a few days to provide rest to his army, which was exhausted from traveling the entire globe.

One day, while out hunting on his horse Indrayudha, he happened to see a pair of Kinnaras (celestial beings) descending from a mountain peak. Filled with immense curiosity by this extraordinary sight, and desiring to capture them, he spurred his horse toward them. Leaving his vast army behind, he pursued them alone for a great distance into the deep forest.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १२०

चन्द्रापीड का अनुताप एवं निर्जन वन में भटकाव

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
आरूढे च तस्मिन्... विधृततुरङ्गमश्चन्द्रापीडस्तस्मिन्काले समारूढश्रमस्वेदाद्र्शरीरमिन्द्रायुधमात्मानं चावलोकयन् क्षणमिव विचार्य स्वयमेव विहस्याचिन्तयत्।

"किमिति निरर्थकमयमसा मया शिशुनेवायासित:। किमनेन गृहितेनागृहितेन वा किन्नरयुगलेन प्रयोजनम्। यदि गृहीतमितं तत: किम्। अथ न गृहीतं ततोपि किम्। अहो मे मूर्खताया: प्रकार:। अहो यत्किंचनकारितायामादर:। अहो निरर्थकव्यापारेष्वभिनिवेश:। अहो बालिशचरितेष्वासक्ति:।"

"कस्मादहमाविष्ट इवोत्सृष्टनिजपरिवार एतावतीं भूमिमायात:। कस्माच्च मया निष्प्रयोजनमिदं मनुसृतमश्वमुखद्वयम्। ... न जाने कियताध्वना विच्छिन्नमितो बलमनुयायि मे। महाजवो हीन्द्रायुधो निमेषमात्रेणातिदूरमतिक्रामति। ... न चास्मिन्प्रदेशे प्रयत्नेनापि परिश्रमता मर्त्यधर्मा कश्चिदासाद्यते य: सुवर्णपुरगामिनं पन्थानमुपदेक्ष्यति।"
२. शास्त्रीय एवं साहित्यिक विश्लेषण (Technical Analysis)
  • आत्म-ग्लानी (Self-Reflection): किन्नरों के पर्वत पर चढ़ जाने के बाद चन्द्रापीड रुकते हैं और अपने पसीने से लथपथ घोड़े 'इन्द्रायुध' को देखकर दुखी होते हैं। वे स्वयं को 'शिशु' (बालक) कहकर कोसते हैं कि उन्होंने एक व्यर्थ कार्य के लिए इतना श्रम किया।
  • निरर्थक व्यापार: राजकुमार अपनी मूर्खता पर हँसते हैं कि इन अश्व-मुख वाले प्राणियों (किन्नरों) को पकड़ने से उन्हें क्या लाभ होता?।
  • भौगोलिक संकट: इन्द्रायुध की तीव्र गति (महाजव) के कारण वे अपनी सेना से बहुत दूर निकल आए हैं। अब वे ऐसे निर्जन स्थान पर हैं जहाँ कोई 'मर्त्यधर्मा' (मनुष्य) नहीं है जो उन्हें वापस सुवर्णपुर का रास्ता बता सके।
  • मनोवैज्ञानिक चित्रण: बाणभट्ट यहाँ एक विजेता राजकुमार की असहाय स्थिति का चित्रण करते हैं, जो कुतूहल के वशीभूत होकर कर्तव्य-पथ से भटक गया है।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
जब वह किन्नर-जोड़ा पर्वत के ऊँचे शिखर पर चढ़ गया और चन्द्रापीड की पहुँच से बाहर हो गया, तब उन्होंने अपने घोड़े को रोका। थकान और पसीने से भीगे हुए इन्द्रायुध और स्वयं की दशा को देखकर, चन्द्रापीड क्षण भर के लिए सोच में पड़ गए और फिर स्वयं पर ही हँसते हुए सोचने लगे।

"मैंने एक बालक की तरह इस घोड़े को व्यर्थ ही क्यों थकाया? इन किन्नरों को पकड़ने या न पकड़ने से मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होता? यदि मैं इन्हें पकड़ भी लेता, तो उससे क्या मिलता? और नहीं पकड़ा, तो भी क्या हानि हुई? हाय! मेरी मूर्खता तो देखो, जो मैंने इस निरर्थक काम में इतना उत्साह दिखाया और बच्चों जैसी हरकत में फँस गया"।

"मैं किसी आवेश में आए व्यक्ति की तरह अपने परिवार और सेना को छोड़कर इतनी दूर क्यों चला आया? मैंने इन दो घोड़े जैसी मुख वाली आकृतियों का पीछा क्यों किया? मुझे नहीं पता कि मेरी सेना मुझसे कितनी दूर पीछे छूट गई है। इन्द्रायुध इतना तेज भागता है कि पलक झपकते ही मीलों की दूरी तय कर लेता है। अब इस प्रदेश में कोई मनुष्य भी नहीं दिख रहा, जिससे मैं सुवर्णपुर वापस जाने का रास्ता पूछ सकूँ"।
४. English Translation
As the pair of Kinnaras ascended the inaccessible peak, Chandrapida pulled the reins of his horse. Looking at himself and Indrayudha, both drenched in sweat from the exhaustion of the pursuit, he reflected for a moment and began to laugh at his own folly.

"Why did I, like a mere child, needlessly tire this horse? What purpose would have been served by capturing or not capturing this pair of Kinnaras? Oh, what an extent of foolishness! What a commitment to a trivial task! I am ashamed of my obsession with such meaningless endeavors and my attachment to childish behavior".

"Like one possessed, why did I leave my retinue and come to this remote land? Why did I follow these two horse-faced beings without any reason? I do not know how far my following army has been separated from me. Indrayudha is so swift that he covers vast distances in the blink of an eye. In this desolate region, there is not even a single human being (mortals) from whom I can ask the way back to Suvarnapura".
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान
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