कादंबरी (बाणभट्ट): पृष्ठ 87 से 100 - चन्द्रापीड का राजमहल आगमन एवं मृगया वर्णन

राजकुमार चन्द्रापीड का अपने अश्व इन्द्रायुध पर सवार होकर राजमहल में प्रवेश और माता विलासवती द्वारा स्वागत।

कादंबरी (पूर्वभाग): विस्तृत भाष्य

पृष्ठ ८५, ८६ और ८७ का संपूर्ण विवरण

१. मूल संस्कृत पाठ (Full Original Sanskrit)
तौत्तरीया हस्यसे जनेन। रागावृतनयने पश्यसि न सखीजनम्। अनेकभङ्गिविकारपूर्णे दुःखकारणोयासितहृदया जीवसि। मिथ्याविनीते किं व्यपदेशवीक्षितैर्विश्रब्धमालोकय। ... प्रसीदोत्तिष्ठ सखि पश्य रतिविरहितं साक्षादिव भगवन्तमगृहीतमकरध्वजं मकरध्वजम्।

इत्येवम्विधानि चान्यानि च वदन्तीनां तासामापीयमान इव लोचनपुटैराहूयमान इव भूषणरवैर्नुगम्यमान इव हृदयैर्निबध्यमान इवाभरणरश्मिरज्जुभिरुपह्वियमाण इव नवयौवनबलिभिः... चन्द्रापीडो राजकुलसमीपमासाद। क्रमेण च यामावस्थिताभिनवरतकरटस्थलकलितमदमसीपङ्ककरीभिरञ्जनगिरिमालमलिनिभिः कुञ्जरघटाभिरन्धकारितदिक्मुखतया जलधरदिवसायमानमुद्दण्डधवलातपत्रसहस्रसंकटमनेकद्विपान्तरागतदूतशतसमाकुलं राजद्वारमासाद्य तुरङ्गमादवततार।

अवतीर्य च करतलेन करे वैशम्पायनमवलम्ब्य पुरः सविनयं प्रस्थितेन बलाहकेनोपदिश्यमानमार्गस्त्रिभुवनमिव पुञ्जीभूतमागृहीतकनकवेत्रलतैः... अनेकसंजवनचन्द्रशालिकाविटङ्कवेदिकासंकटशिखरैरभ्रंकषैरपहसितकैलाशशैलशोभैरमलसुधावदातैः सप्रालेयशैलमिव महाप्रासादैरनेकातायनविवरविनिर्गतयुवतिभूषणकिरणसहस्रतया...।
२. व्याकरण एवं पद-परिचय (Detailed Grammar)
पद (Word) व्युत्पत्ति एवं व्याकरण विस्तृत अर्थ
आपीयमान इव आ + पा (पाने) + यक् + शानच् + इव मानो नेत्रों के प्यालों से पिया जा रहा हो (उत्प्रेक्षा)
दशनमयूख दशनानां मयूखाः (षष्ठी तत्पुरुष) दाँतों की किरणों की रेखाएँ
अञ्जनगिरिमाला अञ्जनस्य गिरयः, तेषां माला काजल के पर्वतों की कतार के समान काले हाथी
अभ्रंकषैः अभ्रं कषति इति (अभ्र + कष् + खच्) आकाश (बादलों) को छूने वाले ऊँचे शिखर
हृदयद्वितीयेन हृदयं द्वितीयं यस्य (बहुव्रीहि) जो अपने दूसरे हृदय के समान प्रिय हो (वैशम्पायन)
३. विस्तृत हिंदी अनुवाद (Detailed Hindi Translation)
नगर की युवतियाँ चन्द्रापीड के अलौकिक सौंदर्य को देखकर मुग्ध थीं। वे परस्पर परिहास कर रही थीं— "सखि! देखो, दाँतों की उज्ज्वल कांति से दिशाओं को धवल करती हुई ये स्त्रियाँ कैसे आनंदित हैं। धन्य हैं वे माता विलासवती, जिन्होंने पृथ्वी का भार उठाने वाले इस दिग्गज वीर को जन्म दिया।"

चन्द्रापीड उन स्त्रियों के नेत्रों द्वारा मानो तृष्णा के साथ पिया जाता हुआ, उनके कंगन और नूपुरों की ध्वनियों से मानो पुकारा जाता हुआ, और उनके अनुरागपूर्ण हृदयों द्वारा मानो अदृश्य रस्सियों से बाँधा जाता हुआ राजमहल पहुँचा। वहाँ का द्वार हाथियों की विशाल सेना से भरा था, जिनके मद-जल के बहने से दिशाएँ वर्षा ऋतु के समान अंधकारमय लग रही थीं। हज़ारों ऊँचे धवल छत्रों के बीच से रास्ता बनाते हुए, वह अपने अश्व से नीचे उतरा।

घोड़े से उतरकर चन्द्रापीड ने अपने प्राणप्रिय मित्र वैशम्पायन का हाथ थामा और सेवक बलाहक द्वारा दिखाए मार्ग पर बढ़ चला। वह राजमहल इतना ऊँचा था कि उसके शिखर बादलों को छू रहे थे, और वह अपनी शुभ्रता में कैलाश पर्वत और हिमालय को भी पीछे छोड़ रहा था। महल के वातायनों (खिड़कियों) से झाँकती युवतियों के रत्नों की चमक ऐसी लग रही थी मानो संपूर्ण त्रिभुवन का वैभव एक ही स्थान पर पुंजीभूत हो गया हो।
४. English Literary Translation
Chandrapida proceeded through the city as the townswomen gazed upon him with adoration. He appeared as if he were being imbibed by their thirsty eyes, summoned by the rhythmic jingle of their ornaments, and bound by the invisible threads of their longing hearts. The royal gateway was a spectacle of grandeur, shadowed by herds of mighty elephants as dark as collyrium-mountains, creating an atmosphere of a monsoon day.

Dismounting his steed amidst a forest of a thousand white umbrellas, he held the hand of his dear friend Vaishampayana. Guided by his attendant Balahaka, he entered the inner sanctum of the palace. The structure was a marvel of architecture, its sky-kissing peaks surpassing the splendor of Mount Kailash. The shimmering rays of jewelry from the maidens looking out from the balconies made the palace look like the gathered essence of all three worlds.
प्रस्तुत शोध एवं भाष्य: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान
कादंबरी: एक शास्त्रीय अनुशीलन

कादंबरी: पृष्ठ ८६ (राजद्वार प्रवेश)

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit)
समामनुष्य दशनमयूखलेखाधवलीकृतदिक्कचक्रवालं हसितम्। एषोऽस्य शुकपक्षतिहरितरागेणोत्तरीयांशुप्रान्तेन बलाहकस्तुरङ्गखुरचलनजन्मानमालभमग्रकेशेषु रेणुमपहरति। एष चास्य लक्ष्मीकरकमलस्पर्शलोभेनैवाभिनवयौवनलक्ष्मीलीलाकमलपरिमललग्न इव हस्ते हस्तः सहजेन वैशम्पायनेन धृतः। धन्या च देवी विलासवती सकलमहीमण्डलभारधारणक्षमः ककुभा दिग्गज इव गर्भेण ययायं व्यूढः। इत्येताश्चान्याश्च नगरनारीणां प्रशंसन्तीनां शुश्राव कथाः। क्रमेण च राजद्वारमासाद्य तुरङ्गमादवततार। ​"क्रमेण च यामावस्थिताभिनवरतकरटस्थलकलितमदमसीपङ्ककरीभिरञ्जनगिरिमालमलिनिभिः कुञ्जरघटाभिरन्धकारितदिक्मुखतया जलदसमयदिवसश्रियं बिभ्रता सकलमहीमण्डलहृदयेनेव राजद्वारेण प्रविश्य तुरङ्गमादवततार। अवतीर्य च विसर्जितराजलोकः सहजेन ह्रदयद्वितीयेन वैशम्पायनेन अनुगम्यमानः प्रविवेश अन्तःपुरम्।"
२. व्याकरण विश्लेषण (Grammatical Analysis)
पद (Word) व्याकरण (Grammar) अर्थ (Meaning)
धवलीकृतधवल + च्वि + कृ + क्तसफेद किया हुआ
शुकपक्षतितोते का पंख (उपमान)Parrot-green color
अवततारअव + तृ + लिट् (प्र.पु.)घोड़े से उतरा
मदमसीपङ्कमदस्य मसी इव पङ्कःमद रूपी स्याही का कीचड़
कुञ्जरघटाभिःकुञ्जराणां घटाः (तृतीया बहु.)हाथियों के समूहों से
हृदयद्वितीयेनहृदयं द्वितीयं यस्य सःप्राणप्रिय मित्र के साथ
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
नगर की स्त्रियाँ चन्द्रापीड के वैभव को देखकर चकित हैं। सेवक उसके बालों से धूल झाड़ रहे हैं। स्त्रियाँ उसकी माता विलासवती को धन्य मानती हैं जिसने ऐसे तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। अंत में चन्द्रापीड हाथियों की सेना से घिरे हुए राजद्वार पर पहुँचता है और अपने घोड़े से नीचे उतरता है। धीरे-धीरे वह (चन्द्रापीड) उस राजद्वार पर पहुँचा, जो हाथियों के समूहों के कारण काजल के पर्वतों की कतार जैसा काला दिख रहा था। उन हाथियों के गण्डस्थलों से बहने वाले मद रूपी स्याही के कीचड़ से दिशाएँ ऐसी काली हो गई थीं, मानो वर्षा ऋतु के दिन की शोभा हो। उस राजद्वार, जो मानो संपूर्ण पृथ्वी का हृदय था, में प्रवेश कर वह अपने घोड़े से नीचे उतरा। उतरने के बाद, उसने अन्य राजाओं और सेवकों को विदा किया और अपने दूसरे हृदय के समान प्रिय मित्र वैशम्पायन के साथ अन्तःपुर (महल के भीतरी भाग) में प्रवेश किया।"
४. English Translation
The women of the city praised the radiant Chandrapida. His attendant cleaned the dust from his hair, and the prince, holding Vaishampayana's hand, arrived at the royal palace gate, which was bustling with mighty elephants. He then dismounted from his horse. Passing through the royal gate, which was as dark as a rainy day due to the massive herds of elephants, Chandrapida dismounted from his horse. After dismissing the gathered royals, he entered the inner palace accompanied by his dear friend Vaishampayana, who was like his second heart.
© शोध एवं व्याख्या: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ 86

महाश्वेता-पुण्डरीक वर्णन एवं सखी-परिहास

१. मूल संस्कृत पाठ (Sanskrit Text)
तौत्तरीया हस्यसे जनेन। रागावृतनयने पश्यसि न सखीजनम्। अनेकभङ्गिविकारपूर्णे दुःखकारणोयासितहृदया जीवसि। ... (पूर्व पाठ) ... प्रसीदोत्तिष्ठ सखि पश्य रतिविरहितं साक्षादिव भगवन्तमगृहीतमकरध्वजं मकरध्वजम्। अयमस्य सितातपत्रान्तरेणालिकुलनीले शिरसि तिमिरशङ्कानिपतित इव शशिकरकलापो मालतीकुसुमशेखरोभिलक्ष्यते। एतदस्य कर्णाभरणमरकतप्रभाश्यामायितमुपरचितविकचशिरीषकुसुमकर्णपूरमिव कपोलतलमाभाति। अयमस्य हारान्तर्नििविष्टारुणमणिकिरणकलापच्छलेन हृदयं विविक्षुरभिनवयौवनराग इव बहिः परिस्फुरति। एतदनेन चामरकलापान्तरैतरित एव वीक्षितम्। एतत्किमपि वैशम्पायनेन सह।
२. व्याकरण एवं पद-परिचय (Grammar)
शब्द व्याकरण विश्लेषण अर्थ
सितातपत्रसित + आतपत्र (सफेद छत्र)White Umbrella
शशिकरकलापशशिनः कराणां कलापः (तत्पुरुष)चंद्र-किरणों का समूह
अमृहीतमकरध्वजम्न गृहीतः मकरध्वजः येनबिना धनुष का कामदेव
विविक्षुःविश + सन् + उ (विशनेच्छु)प्रवेश करने की इच्छा वाला

कादंबरी (पूर्वभाग): विस्तृत शास्त्रीय भाष्य

पृष्ठ ८५, ८६, ८७ एवं ८८ का संपूर्ण अनुशीलन

१. मूल संस्कृत पाठ (Complete Sanskrit Text)
[नारी-संवाद एवं प्रशंसा]: तौत्तरीया हस्यसे जनेन। रागावृतनयने पश्यसि न सखीजनम्। अनेकभङ्गिविकारपूर्णे दुःखकारणोयासितहृदया जीवसि। ... प्रसीदोत्तिष्ठ सखि पश्य रतिविरहितं साक्षादिव भगवन्तमगृहीतमकरध्वजं मकरध्वजम्। ... धन्या च देवी विलासवती सकलमहीमण्डलभारधारणक्षमः ककुभा दिग्गज इव गर्भेण ययायं व्यूढः।

[चन्द्रापीड का राजकुल गमन]: इत्येवम्विधानि चान्यानि च वदन्तीनां तासामापीयमान इव लोचनपुटैराहूयमान इव भूषणरवैर्नुगम्यमान इव हृदयैर्निबध्यमान इवाभरणरश्मिरज्जुभिरुपह्वियमाण इव नवयौवनबलिभिः... चन्द्रापीडो राजकुलसमीपमासाद्य तुरङ्गमादवततार। क्रमेण च यामावस्थिताभिनवरतकरटस्थलकलितमदमसीपङ्ककरीभिरञ्जनगिरिमालमलिनिभिः कुञ्जरघटाभिरन्धकारितदिक्मुखतया जलधरदिवसायमानमुद्दण्डधवलातपत्रसहस्रसंकटमनेकद्विपान्तरागतदूतशतसमाकुलं राजद्वारमासाद्य।

[राजमहल एवं आस्थान-मण्डप]: अवतीर्य च करतलेन करे वैशम्पायनमवलम्ब्य पुरः सविनयं प्रस्थितेन बलाहकेनोपदिश्यमानमार्गः प्रविवेश। अनेकसंजवनचन्द्रशालिकाविटङ्कवेदिकासंकटशिखरैरभ्रंकषैरपहसितकैलाशशैलशोभैरमलसुधावदातैः सप्रालेयशैलमिव महाप्रासादैरनेकातायनविवरविनिर्गतयुवतिभूषणकिरणसहस्रतया... वैतालिकगीतमनेकसहास्रसंख्येन धवलोष्णीषपट्टाश्लिष्टविकटकिरीटसंकटशिरसा सामन्तलोकेनाधिष्ठितमास्थानम्।
२. व्याकरण, व्युत्पत्ति एवं पद-परिचय
संस्कृत पद व्याकरण विश्लेषण विस्तृत अर्थ
आपीयमान इव आ + पा (पाने) + यक् + शानच् + इव मानो नेत्रों के प्यालों से तृष्णापूर्वक पिया जा रहा हो।
अभ्रंकषैः अभ्रं कषति इति (अभ्र + कष् + खच्) गगनचुम्बी, जो बादलों को रगड़ रहे हों (अत्यंत ऊँचे शिखर)।
अञ्जनगिरिमाला अञ्जनस्य गिरिः, तेषां माला (तत्पुरुष) काजल के पर्वत जैसी काली हाथियों की पंक्तियाँ।
हृदयद्वितीयेन हृदयं द्वितीयं यस्य सः (बहुव्रीहि) जो अपने दूसरे हृदय के समान अभिन्न हो (वैशम्पायन)।
अमलसुधावदातैः अमला सुधा, तया अवदाताः (तृतीया तत्त.) निर्मल सफेद लेप (चूने) से अत्यंत चमकते हुए प्रासाद।
३. विस्तृत हिंदी अनुवाद (Detailed Hindi Translation)
नगर की युवतियाँ चन्द्रापीड के दिव्य लावण्य को देखकर विस्मित थीं। वे आपस में कह रही थीं— "धन्य हैं वे महारानी विलासवती, जिन्होंने पृथ्वी का भार वहन करने में सक्षम इस साक्षात् दिग्गज (हाथी) के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।" चन्द्रापीड उन युवतियों के नेत्रों द्वारा मानो पिया जाता हुआ और उनके आभूषणों की झंकार से मानो निरंतर पुकारा जाता हुआ राजमहल के द्वार पर पहुँचा।

राजमहल का द्वार काजल के पर्वतों जैसी हाथियों की घटाओं से भरा था, जिनके गण्डस्थलों से बहते हुए मद-जल ने दिन में ही वर्षा ऋतु जैसा अंधकार उत्पन्न कर दिया था। हज़ारों सफेद छत्रों की छाया के बीच से रास्ता बनाते हुए चन्द्रापीड अपने अश्व (घोड़े) से उतरा।

घोड़े से उतरकर उसने अपने प्रिय मित्र वैशम्पायन का हाथ थामा और सेवक बलाहक द्वारा दिखाए मार्ग पर महल के भीतर प्रवेश किया। वह राजमहल इतना ऊँचा था कि उसके शिखर बादलों को छू रहे थे और वह अपनी धवलता में कैलाश पर्वत को भी लज्जित कर रहा था। वहाँ खिड़कियों से झाँकती स्त्रियों के आभूषणों की चमक ऐसी लग रही थी मानो संपूर्ण त्रिभुवन का ऐश्वर्य एक ही स्थान पर एकत्रित हो गया हो। वहाँ वैतालिकों (बंदियों) का मधुर गान गूँज रहा था और सामन्तों की भीड़ राजसी गरिमा को बढ़ा रही थी।
४. English Literary Translation
The city-maidens were spellbound by Chandrapida's celestial charm, praising Queen Vilasavati for bearing a son of such majestic stature. He proceeded towards the palace, perceived as being inhaled by their thirsty gazes and summoned by the melodic chime of their anklets. The royal gateway was crowded with dark elephants, resembling mountains of collyrium, whose flowing ichor cast a shadow like a monsoon day over the entrance.

Dismounting from his steed amidst a sea of white umbrellas, Chandrapida took the hand of his inseparable friend Vaishampayana. Guided by the attendant Balahaka, he entered the palace whose sky-kissing peaks rivaled Mount Kailash in their pristine whiteness. The radiance of the jewelry worn by the ladies looking through the balconies made the palace appear as the singular repository of the three worlds' splendor, while the chants of heralds added to the regal atmosphere.
अनुसंधान एवं व्याख्या: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान
बाणभट्ट कृत 'कादंबरी' - एक साहित्यिक यात्रा

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ८९

अन्तःपुर एवं राजकुल के आंतरिक ऐश्वर्य का वर्णन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
विराजितसभापर्यन्तममलमिणिभूमिसंक्रान्तमुखनिवहप्रतिबिम्बतया विकचकमलपुष्पप्रकरमिव संपादयता गतिशरणितनूपुरहारिहाररसनास्वनमुखरेण स्कन्धावसक्तकनक दण्डचामरेण निर्गच्छता प्रविशता चानवरतं वारविलासिनीजनेनाकुलितमेकदेशनिषण्णचामीकरशृङ्खलासंयतश्वगणमितस्ततः प्रचलितपरिचितामितकस्तूरिककुरङ्गपरिमलवासितदिङ्मुखमनेककुब्जकिरातवर्षवरबधिरवामनकमूकसंकुलमुपाहृतकिंनरमिथुनमानीतवनमानुषमाबद्धमेषकुक्कुटचकोरकपिञ्जललाववकवर्तिकायुद्धमुत्कूजितचकोरकादम्बहारीतकोकिलमालप्यमानशुकसारिकमिभपतिमदपरिमलामर्षजृम्भितैश्च निष्कूजद्भिः शिखरिणां जीवितैरिव गिरिगुहानिवासिभिर्गृहीतः पञ्जरकेसरिभिर्त्रास्यमानमुच्चास्यमानैः काञ्चनभवनप्रभाजनितदावानलशङ्कैर्लोलतारकैर्भ्रमद्भर्भवनहरिणकदम्बकैर्लोचनप्रभया शबलीकृतदिगन्तरमुद्दामकेकारवानुमीयमानमरकतकुट्टिमस्थितशिखण्डिमण्डलममिशिशिरचन्दनविटपिच्छायानिषण्णनिद्रायमाणगृहसारसमन्तःपुरेण च बालिकाजनप्रस्तुतकन्दुकपञ्चालिकाक्रीडेनानवरतसंवाह्यमानदोलाशिखरमणितघण्टाटङ्कारपूरिताशामुखेन...।
२. व्याकरण एवं पद-परिचय (Grammatical Analysis)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ
अमलमणिभूमि अमला च सा मणिभूमिः (कर्मधारय) स्वच्छ मणियों से जड़ी भूमि
शुकसारिकम् शुकाश्च सारिकाश्च (इतरेतर द्वन्द्व) तोते और मैना
काञ्चनभवन काञ्चनस्य भवनम् (षष्ठी तत्पुरुष) स्वर्ण का भवन (महल)
शिखण्डिमण्डलम् शिखण्डिनां मण्डलम् मयूरों का समूह
मसीपङ्क मसी इव पङ्कः (उपमान) स्याही के समान काला मद
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
राजसभा का प्रांगण स्वच्छ मणियों से जड़ी भूमि पर पड़ने वाले मुखों के प्रतिबिम्बों के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो खिले हुए कमलों का समूह बिछा हो। वहाँ चामर लिए वार-विलासिनी स्त्रियाँ निरंतर आ-जा रही थीं, जिनके नूपुरों और करधनी की मधुर ध्वनि से वातावरण गूँज रहा था। महल के एक भाग में सोने की जंजीरों से बँधे शिकारी कुत्ते थे, तो दूसरी ओर कस्तूरी मृगों की सुगंध से दिशाएँ महक रही थीं।

वहाँ अनेक कुबड़े, किरात, बधिर और बौने सेवकों की भीड़ थी। वन-मानुषों और किंनर मिथुनों के साथ-साथ मेढ़ों, मुर्गों और चकोर पक्षियों के युद्ध के दृश्य मनोरंजन कर रहे थे। पिंजरों में बंद सिंहों की दहाड़ से महल के हिरण भयभीत होकर इधर-उधर भाग रहे थे, जिन्हें स्वर्ण भवनों की चमक से दावानल का भ्रम हो रहा था। मरकत मणियों (पन्ना) से बनी वेदियों पर मयूर नृत्य कर रहे थे और चन्दन के वृक्षों की शीतल छाया में सारस सो रहे थे। अन्तःपुर में बालिकाएँ गेंदों और गुड़ियों से खेल रही थीं और झूलों में लगी घंटियों की टंकार से दिशाएँ भर गई थीं।
४. English Translation
The assembly hall shone brilliantly, where the crystal-clear jeweled floor reflected faces so vividly it looked like a cluster of full-blown lotuses. Beautiful courtesans constantly moved in and out, their golden chowries resting on their shoulders, while the tinkling of their anklets and waistbands filled the air.

In one area, hunting dogs were secured with golden chains, while the scent of musk-deer perfumed the surroundings. The place was crowded with diverse attendants—hunchbacks, forest-dwellers, and dwarfs. Caged lions roared from their enclosures, frightening the palace deer who mistook the golden glow of the mansions for a forest fire. Peacocks danced on emerald-paved floors, and domestic cranes slept in the cool shade of sandalwood trees. In the inner apartments, young girls played with balls and dolls, as the ringing of bells from swaying swings echoed in all directions.
प्रस्तुत शोध एवं व्याख्या: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९०

राजकुल की उपमाएँ एवं कंचुकियों का वर्णन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
भिर्भवनकलहंसमालाभिर्धवलिताङ्गणेन धृतधौतधवलदुकूलोत्तरीयैः कलधौतदण्डावलम्बिभिः पलितपाण्डुरमौलिमिराधारमयैरिव मर्यादा-मयैरिव मङ्गलमयैरिव गम्भीराकृतिभिः स्वभावधीरैरुष्णीषिभिर्वयःपरिणामेऽपि जरत्सिंहैरिवपरित्यक्तसत्त्वावष्टम्भैः कञ्चुकिभिरधिष्ठितेन समुपेतभ्यन्तरं जलधरसनाथमिव कृष्णागुरुधूमपटलैः सनीहारमिव यामकुञ्जरघटाकरसीकरैः सनिशमिव तमालवीथिकान्धकारैः सबालातपमिव रक्ताशोकैः सतारागणमिव मुक्ताकलापैः सवर्षासमयमिव धारागृहैः सतडिल्लतमिव हेममयीभिर्मयूरयष्टिभिः सग्रहदैवतमिव शालभञ्जिकाभिः शिवभवनमिव द्वारावस्थितदण्डपाणिप्रतीहारगणमुत्कृष्टकविगद्यमिव विविधवर्णश्रेणिप्रतिपाद्यमानाभिनवार्थसंचयमप्सरोगणमिव प्रकटमनोरमारम्भं दिवसकरोदयमिवोल्लसत्पद्माकरकमलामोदमुष्णकिरणमिव निजलक्ष्मीकृतकमलोपकारं नाटकमिव प्रकटपताकाङ्कुशोभितं शोणितपुरमिव बाणयोग्यवासोपेतं पुराणमिव यथाविभागावस्थापितसकलभुवनकोशं संपूर्णचन्द्रोदयमिव मृदुकरसहस्रसंवर्धितरत्नालयं दिग्गजमिव अविच्छिन्नमहादानसंतानं ब्रह्माण्डमिव सकलजीवलोकव्यवहारकारणोत्पन्नहिरण्यगर्भमीशानबाहुवनमिव महाभोगिमण्डलसहस्राधिष्ठितप्रकोष्ठं महाभारतमिवानन्तगीतकर्णनानन्दितनरं यदुवंशमिव कुलक्रमागतशूरभीमपुरुषोत्तमबलपरिपालितं व्याकरणमिव प्रथममध्यमोत्तमपुरुषविभक्तिस्थित्यनेकादेशकारकाख्यातसंप्रदानक्रियाव्ययप्रपञ्चसुस्थितमुदधिमिव भयान्तःप्रविष्टसपक्षभूभृत्सहस्रसंकुलमुपानिरुद्धसमागममिव चित्रलेखादर्शितविचित्रसकलत्रिभुवनाकारं बलियज्ञमिव पुराणपुरुषवामनाधिष्ठिताभ्यन्तरं शुक्लपक्षप्रदोषमिव...।
२. व्याकरण एवं पद-परिचय (Grammatical Analysis)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ
पलितपाण्डुरमौलिभिः पलितैः पाण्डुराः मौलयः येषां तैः (बहुव्रीहि) सफेद बालों के कारण श्वेत सिर वाले (कंचुकी)
कलधौतदण्ड कलधौतस्य (स्वर्णस्य) दण्डाः सोने की छड़ें (लाठी)
कृष्णागुरुधूम कृष्णश्च असौ अगरुश्च (कर्मधारय) काले अगरु (सुगंधित लकड़ी) का धुआँ
महादानसंतानम् महतां दानानां संतानः (श्लेष अलंकार) निरंतर दान की परंपरा (महल) / निरंतर बहता मद (हाथी)
प्रथममध्यमोत्तमपुरुष व्याकरण की पारिभाषिक संज्ञाएँ महल के सेवक / व्याकरण के पुरुष (श्लेष)
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
राजभवन का आंगन राजहंसों की मालाओं से श्वेत हो रहा था और वहाँ वृद्ध कंचुकी नियुक्त थे, जो श्वेत रेशमी वस्त्र धारण किए हुए और सोने की छड़ें लिए हुए थे। वे वृद्ध कंचुकी अपनी गंभीरता और सफेद बालों के कारण मर्यादा और मंगल के साक्षात् स्वरूप जान पड़ते थे, जो वृद्धावस्था में भी बूढ़े सिंहों के समान अपने पराक्रम को छोड़े हुए नहीं थे।

वह राजमहल काले अगरु के सुगंधित धुएँ के कारण बादलों से युक्त जान पड़ता था, हाथियों के मद-सीकरों के कारण कोहरे वाला, तमाल के वृक्षों के कारण रात्रि के अंधकार वाला और लाल अशोक के फूलों के कारण ऊषा काल की लाली वाला प्रतीत होता था।

बाणभट्ट ने राजकुल की अद्भुत तुलनाएँ की हैं:
  • व्याकरण के समान: जहाँ (महल में) प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष (सेवक) अपनी विभक्तियों (पदों) और कार्यों में सुव्यवस्थित थे।
  • महाभारत के समान: जहाँ अनंत गीतों (कथाओं) के श्रवण से मनुष्य आनंदित होते थे।
  • पुराण के समान: जहाँ संपूर्ण विश्व का ऐश्वर्य यथास्थान रखा गया था।
  • दिग्गज के समान: जहाँ निरंतर दान (धन का वितरण / मद का बहना) की परंपरा अविच्छिन्न थी।
  • समुद्र के समान: जहाँ भयभीत होकर अपने पंख वाले पर्वतों (शत्रु राजाओं) ने शरण ले रखी थी।
४. English Translation
The courtyard of the palace was whitened by rows of domestic swans, and it was guarded by elderly chamberlains (Kanchukis). These chamberlains, dressed in white silken garments and leaning on golden staffs, appeared like the personification of dignity and auspiciousness. Even in their old age, they possessed the indomitable spirit of elderly lions.

The palace was compared to various great entities through profound metaphors:
  • Like Grammar: Because it was well-ordered with first, middle, and best men (officials), just as grammar has first, second, and third persons and various declensions.
  • Like the Mahabharata: Because people were delighted by the listening of infinite songs (verses), just as the epic is famous for its myriad stories.
  • Like the Puranas: Because it contained the entire treasury of the world's wealth, properly arranged.
  • Like a Guardian Elephant: Because of the continuous stream of great donations (Dana), just as an elephant has a constant flow of ichor (Dana).
प्रस्तुत व्याख्या: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९१

राजकुल की तुलनात्मक उपमाएँ एवं शास्त्रीय श्लेष

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
ततशशिकिरणकलापधवलाम्बरवितानं नरवाहनदत्तचरितमिवान्तःसंवर्धितप्रियदर्शनराजदारिकागन्धर्वदत्तोत्कण्ठं महातीर्थमिव सद्योऽनेकपुरुषप्राप्ताभिषेकफलं प्राग्वंशमिव नानासवपात्रसंकुलं निशासमयमिवानक्षत्रमालालंकृतं प्रभातसमयमिव पूर्वदिग्भागरागानुमेयमित्रोदयं गान्धिकभवनमिव स्नानधूपविलेपनवर्णकोज्ज्वलं ताम्बूलिकभवनमिव कृतलवलीलवङ्गाकोलपल्लवसंचयं प्रथमवेश्यासमागममिवाविदितहृदयाभिप्रायेण चेष्टाविकारं कामुकजनमिव बहुचाटुसंलापसुभाषितरसास्वाददत्ततालशब्दं धूर्त मण्डलमिव दीयमानमणिशतसहस्रालंकरणकृतलेख्यपत्रसंचयं धर्मारम्भमिवाशेषजनमनःप्रह्लादनं महावनमिव विविधश्वापदद्विजोपघुष्टं रामायणमिव कपिकथासमाकुलं माद्रीकुलमिव नकुलालंकृतं संगीतभवनमिवानैकस्थानावस्थापितमृदङ्गं रघुकुलमिव भरतगुणानन्दितं ज्योतिषमिव ग्रहमोक्षकलाभागनिपुण नारदीयमिवावर्ण्यमानराजधर्म यन्ममिव विविधशब्दरसलब्धास्वादं मृदुकाव्यमिवान्यचिन्तितस्वभावाभिप्रायवेदकं महानदीप्रवाहमिव सर्वदुरितापहरं धनमिव न कस्यचिन्म काहणीयं संध्यासमयमिव दृश्यमानचन्द्रापीडोदयं नारायणवक्षःस्थलमिव श्रीरत्नप्रभाभासितदिगन्तं बलभद्रमिष कादम्बरीरसविशेषवर्णनाकुलमतिं ब्राह्मणमिव पद्मासनोपदेशदर्शितभूमण्डलं स्कन्दमिव शिखिक्रीडारम्भचञ्चलं कुलनाप्रचारमिव सर्वदोषजातशङ्कं वेश्याजनमिवोपचारचतुरं दुर्जनमिवापगतपरलोकभयमन्त्यजनमिवागम्यविषयाभिलापमगम्यविषयासक्तमपि प्रशंशनीयमन्तकभटगणमिव कृताकृतसुकृतविचागनिपुणं सुकृतमिवादिमध्यावसानकल्याणकरं वासगग्रभमिव परिस्फुरद्वरागराग्णी-
२. व्याकरण एवं श्लेष विश्लेषण (Grammar & Metaphors)
उपमा (Metaphor) श्लेष/अर्थ विस्तार व्याकरण/टिप्पणी
रामायणमिव रामायण वानरों (कपि) की कथा से युक्त है; राजकुल बंदरों (कपि) की क्रीड़ा से व्याप्त है। कपिकथासमाकुलं (बहुव्रीहि)
माद्रीकुलमिव माद्री का कुल नकुल से अलंकृत है; राजकुल नेवलों (नकुल) से सुशोभित है। नकुलालंकृतं
रघुकुलमिव रघुकुल भरत के गुणों से आनंदित है; राजकुल भरत (नटों/गायकों) के गुणों से प्रसन्न है। भरतगुणानन्दितं
ज्योतिषमिव ज्योतिष ग्रहों के मोक्ष में निपुण है; राजकुल बंदियों (ग्रह) की मुक्ति में निपुण है। ग्रहमोक्षकलाभागनिपुण
महानदीमिव नदी पापों को हरती है; राजकुल दुखों और अभावों को दूर करता है। सर्वदुरितापहरं
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
वह राजमहल चन्द्रमा की किरणों के समान धवल चंदोवे (वितान) से सुशोभित था। वह 'नरवाहनदत्त' के चरित्र के समान था, जहाँ प्रियदर्शन और गन्धर्वदत्ता (राजकुमारी) के प्रति उत्कंठा बढ़ी हुई थी। वह किसी महान तीर्थ के समान था जहाँ अनेक पुरुषों को तुरंत राजाश्रय रूपी अभिषेक का फल प्राप्त होता था।

राजकुल की भव्यता इन अद्भुत उपमाओं से स्पष्ट होती है:
  • रामायण के समान: जैसे रामायण कपियों (वानरों) की कथा से भरी है, वैसे ही राजमहल पालतू बंदरों से भरा था।
  • माद्री के कुल के समान: जैसे वह नकुल (पाण्डु पुत्र) से अलंकृत था, वैसे ही राजमहल नेवलों (नकुल) से सुशोभित था।
  • रघुकुल के समान: जैसे वह भरत के गुणों से प्रसन्न था, वैसे ही राजमहल भरत (नटों/गायकों) की कला से आनंदित था।
  • ज्योतिष शास्त्र के समान: जैसे ज्योतिष ग्रहों की गणना और मोक्ष (ग्रहण मुक्ति) में निपुण है, वैसे ही राजमहल बंदियों को मुक्त करने की कला में कुशल था।
  • नारायण के वक्षस्थल के समान: जैसे विष्णु का वक्ष 'श्री' (लक्ष्मी) और कौस्तुभ मणि की आभा से चमकता है, वैसे ही राजमहल राजलक्ष्मी और रत्नों की कांति से देदीप्यमान था।
  • संध्या के समान: जहाँ चन्द्रापीड (राजकुमार / चन्द्रमा) का उदय दिखाई दे रहा था।
४. English Translation
The royal palace was adorned with a canopy as white as moonlight. It resembled the life of Naravahanadatta, filled with the longing for royal maidens like Gandharvadatta. It was like a great holy tirtha, where many found the immediate fruit of their 'consecration' (royal patronage).

Bana uses masterful double entendres (Shlesha) to describe the court:
  • Like the Ramayana: Filled with 'Kapi' (monkeys/monkeys' tales).
  • Like the family of Madri: Adorned by 'Nakula' (the son of Pandu/mongooses).
  • Like the Raghu clan: Delighted by the virtues of 'Bharata' (the brother of Rama/actors and singers).
  • Like Astrology: Expert in the movements and release ('Moksha') of 'Graha' (planets/prisoners).
  • Like Vishnu's Chest: Illuminating the quarters with the radiance of 'Shri' (Lakshmi) and jewels.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९२

राजकुल प्रवेश एवं पिता (तारापीड) के दर्शन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
क्रियमाणनिशान्तं दिव्यमुनिगणमिव कलापिनाथश्वेतकेतुशोभितं भारतसमरमिव कृतवर्मशिलीमुखचक्रसंभारभीषणं पातालमिव महाकञ्चुकिसहस्राध्यासितं वर्षपर्वतसमूहमिवान्तःस्थितपरिमाणश्वेतहेमकूटं महाद्वारमपि दुष्प्रवेशमवन्तिविषयगतमपि मागधजनाधिष्ठितं स्फीतमपि भ्रमद्मलोकं गजकुलं विवेश।

ससंभ्रमोपगतैश्च कृतप्रणामैः प्रतीहारमण्डलैरुपदिश्यमानमार्गः सर्वतः प्रचलितन च पूर्वकृतावस्थानेन दूरपर्यस्तमौलि शिथिलितचूडामणिमरीचिचुम्बितवसुधातलने राजलोकेन प्रत्येकशः प्रतीहारनिवेद्यमानेन सादरं प्रणम्यमानः पदे पदे चाभ्यन्तरविनिर्गताभिराचारकुशलाभरन्तःपुरवृद्धाभिः क्रियमाणावतरणमङ्गलो भुवनान्तराणीव विविधप्राणिसहस्रसंकुलानि सप्तकक्षान्तराण्यतिक्रम्याभ्यन्तरमवस्थितमन्वगतशस्त्रग्रहणैर्यामिकालीढकरतलैः करचरणलोचनवर्मसितलोहजालकावृतशरीरैरालापस्तम्भैरिव गजमदपरिमललोभनिरन्तरनलीनमधुकरपटलजटिलैः कुलक्रमागतैरुदात्तान्वयैरनुरक्तैर्महाप्राणतयातिकर्कशतया च दानवैरिव आशयाकारसंभाव्यमानपराक्रमैः सर्वतः शरीररक्षाधिकारनियुक्तैः पुरुषैः परितवृतमुभयतो वारविलासिनीभिश्चानवरतमुद्धूयमानधवलचामरममलपुलिनतलशोभिनि सुरकुञ्जरमिव मन्दाकिनीवारिणि हंसधवलशयनतले निषण्णं पितरमपश्यत्।

आलोकयति च प्रतीहारवचनान्तरमतिदूरावनतेन चलितचूडामणिना शिरसा कृतप्रणाममेहेहीत्यभिधानो दूरादेव प्रसारितभुजयुगलः शयनतलादीषदुच्छ्वसितमूर्तिरानन्दजलापूर्यमाणलोचनः समुद्भूतपुलकतया सीव्यन्निवैकीकुर्वन्निव पिबन्निव तं पिता विनयावनत-
२. व्याकरण एवं श्लेष विश्लेषण (Grammar & Analysis)
पद (Word) व्याकरण/श्लेष अर्थ संदर्भ
भारतसमरमिव महाभारत युद्ध के समान भीषण कृतवर्मा (योद्धा) और शिलीमुख (बाण) के कारण भीषण; महल कवच (वर्म) और बाणों से युक्त होने के कारण भीषण।
पातालमिव पाताल लोक के समान पाताल में बड़े साँपों (महाकञ्चुकी) का निवास है; महल में हजारों वृद्ध कंचुकियों (सेवकों) का निवास है।
मागधजनाधिष्ठितम् मागध (बन्दीजन) से युक्त महल अवन्ति देश में होने पर भी मागध (स्तुतिपाठक) लोगों से भरा था।
सीव्यन्निव षिव् (सीने) + शतृ (उत्प्रेक्षा) मानो (प्रेम के कारण) उसे अपने शरीर से सी रहा हो।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
चन्द्रापीड ने हाथियों से भरे उस राजकुल (महल) में प्रवेश किया, जो महाभारत के युद्ध के समान भीषण था क्योंकि वहाँ कवचधारी योद्धा और बाण (शिलीमुख) विद्यमान थे। वह पाताल लोक के समान था जहाँ हजारों कंचुकी (वृद्ध सेवक / बड़े साँप) निवास करते थे। वह महल अवन्ति देश में स्थित होने पर भी मागध (बन्दीजनों) से घिरा था।

प्रतीहारों द्वारा मार्ग दिखाए जाने पर, चन्द्रापीड का सामन्तों द्वारा सादर अभिवादन किया गया, जिनकी चूडामणियों की किरणें भूमि का स्पर्श कर रही थीं। अन्तःपुर की वृद्ध स्त्रियों ने चन्द्रापीड का मंगलाचरण (उतारण) किया। सात ड्योढ़ियों (कक्षाओं) को पार करने के बाद, उसने अपने पिता को देखा जो हंसों के समान धवल शय्या पर विराजमान थे, मानो गंगा के जल में कोई ऐरावत हाथी विश्राम कर रहा हो।

चन्द्रापीड को दूर से ही प्रणाम करते देख पिता तारापीड ने 'आओ-आओ' कहते हुए अपनी भुजाएँ फैला दीं। उनकी आँखों में आनंद के आँसू भर आए और वे अपने पुत्र को देखते हुए प्रेम के वशीभूत होकर उसे मानो पी रहे थे या अपने हृदय से सी रहे थे।
४. English Translation
Chandrapida entered the royal residence, which resembled the Great Bharata War due to the presence of armored warriors and arrows ('Shilimukha'). Like the underworld (Patala), it was occupied by thousands of 'Kanchukis' (chamberlains / great serpents). Though situated in Avanti, it was filled with 'Magadhas' (heralds / people of Magadha).

Guided by the warders and respectfully saluted by the vassal kings whose crest-jewels touched the ground, Chandrapida passed through seven inner courtyards. Finally, he saw his father reclining on a couch white as a swan, looking like the celestial elephant Airavata in the waters of the Mandakini.

As soon as the King saw his son bowing from a distance, he stretched out both arms crying, "Come, come!". With eyes filling with tears of joy and his body bristling with emotion, he looked at his son as if he were drinking him in or stitching him to his own heart with his gaze.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९३

पितृ-मिलन एवं माता (विलासवती) के अन्तःपुर में प्रवेश

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
मौलिना। आलिङ्गितोन्मुक्तश्च पितुश्चरणपीठसमीपे पिण्डीकृतमुत्तरीयमात्मताम्बूलकरङ्कवाहिन्या सत्वरमासानीकृतमपनयति शनैर्वदनप्रचरणेन समुत्सार्य चन्द्रापीडः क्षितितल एव निषसाद। अनन्तरनिहिते चास्यासने राज्ञा सुतनिर्विशेषमुपगूढो वैशम्पायनो न्यषीदत्। मुहूर्तमिव विस्मृतचामरोत्क्षेपनिस्पन्दनानां वारविलासिनीनां साभिलाषैरनिलचलितकुवलयदलदामदीर्घैराजिह्यतरलतारसारैरिवलुप्यमान इव दृष्टिपातैः स्थित्वा गच्छ वत्स पुत्रवत्सलां मातरमभिवादस्व। दर्शनलालसा यथाक्रमं सर्वा जननीर्दर्शनेनानन्दयेति विसर्जितः पित्रा सविनयमुत्थाय निवारितपरजनो वैशम्पायनद्वितीयोन्तःपुरप्रवेशयोग्वेन राजपरिजनेनोपदिश्यमानवर्त्मान्तःपुरमाययौ।

तत्र धवलकञ्चुकावच्छन्नशरीरैरनेकशतसंख्यैः श्रियमिव क्षीरोदकलोलैः समन्तात्परिवृतां शुद्धान्तवर्षधरैरतिप्रशान्ताकाराभिश्च कषायरक्ताम्बरधारिणीभिः संध्याभिरिव सकललोकवन्द्याभिः प्रलम्बश्रवणपाशाभिर्विदितानेक्कथावृत्तान्ताभिर्भूतपूर्वाः पुण्याः कथाः कथयन्तीभिरितिहासान्वाचयन्तीभिः पुस्तकानि दधतीभिर्धर्मोपदेशान्निवेदयन्तीभिर्जरत्प्रव्रजिताभिर्विनोद्यमानामुपरचितस्त्रीवेषाभरणेन गृहीतविकटप्रसाधनेन वर्षधरजनेन संसेव्यमानामनवरतविधूयमानबालव्यजनकलापमङ्गनाजनेन च वसनाभरणकुसुमपटवासताम्बूलताम्बूलवन्ताङ्गरागभृङ्गारधारिणा मण्डलोपविष्टेनोपास्यमानां पयोधराववलम्बितमुक्तागुणामचलद्वयमध्यप्रवृत्तगङ्गाप्रवाहमिव मेदिनीमासन्नदर्प-णपतितमुखप्रतिबिम्बामर्कबिम्बप्रविष्टशशिमण्डलामिव दिवं समुपसृत्य मातरं ननाम।
२. व्याकरण एवं अलंकार विश्लेषण (Grammar & Figures of Speech)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ/टिप्पणी
सुतनिर्विशेषम् न विद्यते विशेषः यस्मिन् (बहुव्रीहि) पुत्र के समान (बिना किसी अंतर के)
क्षीरोदकलोलैः क्षीरोदस्य (क्षीरसागरस्य) कल्लोलाः इव क्षीरसागर की लहरों के समान चंचल (श्वेत कंचुकी)
जरत्प्रव्रजिताभिः जीर्यन्त्यः च ताः प्रव्रजिताः च (कर्मधारय) वृद्ध संन्यासिनियों द्वारा
शशिमण्डलामिव शशिनः मण्डलम् (उत्प्रेक्षा अलंकार) मानो सूर्य मण्डल में चन्द्र मण्डल प्रविष्ट हो गया हो
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
पिता (तारापीड) द्वारा आलिंगन किए जाने और मुक्त होने पर, चन्द्रापीड ने अपने चरण-पीठ के पास बिछाए गए उत्तरीय वस्त्र को हटा दिया और स्वयं नीचे भूमि पर ही बैठ गया। राजा ने वैशम्पायन को भी अपने पुत्र के समान ही स्नेह से गले लगाया और उसे पास के आसन पर बैठाया। वहाँ उपस्थित वार-विलासिनी स्त्रियाँ चन्द्रापीड की सुंदरता को देखकर चकित रह गईं और अपनी चामर डुलाना भी भूल गईं।

राजा ने आज्ञा दी—"वत्स! जाओ, अपनी पुत्रवत्सला माता का अभिवादन करो और दर्शन की प्यासी अपनी सभी माताओं को आनंदित करो"। पिता से विदा लेकर चन्द्रापीड वैशम्पायन के साथ अन्तःपुर की ओर चला।

अन्तःपुर में उसने अपनी माता (रानी विलासवती) को देखा, जो श्वेत कंचुक (अंगरखा) पहने हुए सैकड़ों सेवकों से घिरी हुई थीं, मानो क्षीरसागर की लहरों के बीच 'श्री' (लक्ष्मी) विराजमान हों। वे वृद्ध संन्यासिनियों द्वारा सुनाई जा रही धार्मिक कथाओं और इतिहास को सुनकर अपना मन बहला रही थीं। रानी के गले में लटकी हुई मोतियों की माला उनके दोनों स्तनों के बीच ऐसी लग रही थी मानो दो पर्वतों के बीच गंगा की धारा बह रही हो। पास रखे दर्पण में उनका प्रतिबिम्ब ऐसा दिख रहा था मानो सूर्य मण्डल में चन्द्रमा समा गया हो। चन्द्रापीड ने समीप जाकर माता के चरणों में प्रणाम किया।
४. English Translation
After being embraced and released by his father, Chandrapida sat on the bare floor near the footstool. The King also affectionately embraced Vaishampayana as if he were his own son and made him sit on a nearby seat. The palace ladies were so mesmerized by Chandrapida's beauty that they momentarily forgot to wave their chowries.

The King then directed him: "My son, go and salute your mother who loves you dearly, and delight all your mothers who are longing to see you". Taking leave, Chandrapida along with Vaishampayana proceeded to the inner apartments.

In the harem, he saw Queen Vilasavati surrounded by hundreds of attendants in white robes, looking like Goddess Shri in the waves of the Milky Ocean. She was being entertained by elderly female ascetics reciting sacred stories and histories. The pearl necklace hanging between her breasts appeared like the stream of the Ganges flowing between two mountains. Approaching her, Chandrapida bowed down at his mother's feet.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९४

विलासवती का वात्सल्य एवं शुकनास-दर्शन हेतु प्रस्थान

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
परिजने स्वयमेव कृतावतरणका प्रस्नुतपयोधरक्षरत्पयोबिन्दुच्छलेन द्रवीभूय स्नेहाकुलेन निर्गच्छतेव हृदयेनान्तःशुभशतान्यभ्यायन्ती मूर्धन्युपाघ्राय तं सुचिरमाश्लिषत्। अनन्तरं च तथैव कृतयथोचितसमुपचारमाश्लिष्टवैशम्पायना स्वयमुपविश्य विनयादवनितले समुपविशन्तमाकृष्य बलादनिच्छन्तमपि चन्द्रापीडमुत्सङ्गामारोपितवती। ससंभ्रमपरिजनीपनीतायामासन्यामुपविष्टे च वैशम्पायने चन्द्रापीडं पुनः पुनरालिङ्ग्य ललाटदेशे वक्षसि भुजशिखरयोश्च मुहुर्मुहुः करतलेन परामृशन्ती विलासवती तमवादीत्। वत्स कठिनहृदयस्ते पिता येनेयमाकृतिरीदृशी त्रिभुवनलालनीया क्लेशमति महान्तमियन्तं कालं लम्भिता। कथमसि सोढवानतिदीर्घामिमां गुरुजनयन्त्रणाम्। अहो बालस्यापि सतः कठोरस्येव ते महद्धैर्यम्। अहो विगलितशिशुजनक्रीडाकौतुकैलाघवमर्भके त्वयि हृदयम्। अहो गुरुजनस्योपरि भक्तिरसाधारणा। सर्वथा यथा पितुः प्रसादात्समस्ताभिरुपेतो विद्याभिरालोकितोस्येवमचिरेणैव कालेनानुरूपाभिर्वधुभिरुपेतमालोकयिष्यामि। इत्येवमभिधाय लज्जास्मितावनतमात्ममुखप्रतिबिम्बगर्भं विकचकमलकृतकर्णपल्लवावतंस इव कपोले पर्यचुम्बदेनम्। एवं च तत्रापि नातिचिरमेव स्थित्वा क्रमेण सर्वान्तःपुराणि दर्शनेनानन्दयामास। निर्गत्य च राजकुलद्वारावस्थितमिन्द्रायुधमारुह्य तथैव तेन राजपुत्रलोकेनानुगम्यमानः शुकनासं द्रष्टुमयासीत्।
२. व्याकरण एवं अलंकार विश्लेषण (Grammar & Figures of Speech)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ/टिप्पणी
प्रस्नुतपयोधर... प्रस्नुतौ च तौ पयोधरौ च (कर्मधारय) स्तनों से झरते दूध की बूंदों के बहाने (मानो पिघला हुआ स्नेह)
उत्सङ्गामारोपितवती आ + रुह् + णिच + क्तवतु (स्त्रीलिंग) गोद में बैठा लिया (वात्सल्य का चरम)
त्रिभुवनलालनीया त्रिषु भुवनेषु लालनीया (सुप्सुपा) तीनों लोकों द्वारा दुलार करने योग्य (आकृति)
लज्जास्मितावनतम् लज्जया स्मितं तेन अवनतम् (तृतीया तत्पुरुष) लज्जापूर्ण मुस्कान के कारण झुका हुआ (मुख)
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
माता विलासवती ने स्वयं पुत्र का मंगलाचरण (उतारण) किया। उनके स्तनों से दूध की बूंदें गिरने लगीं, मानो उनका हृदय स्नेह से पिघलकर बाहर निकल रहा हो। उन्होंने पुत्र का मस्तक सूंघा और उसे देर तक गले से लगाए रखा। जब चन्द्रापीड विनयवश भूमि पर बैठने लगा, तो माता ने उसे हठपूर्वक खींचकर अपनी गोद में बैठा लिया।

पुत्र के ललाट, वक्ष और कंधों को सहलाते हुए वे बोलीं— "वत्स! तुम्हारे पिता बड़े कठोर हृदय हैं, जिन्होंने तुम्हारी इस सुकुमार आकृति को इतने समय तक (विद्याभ्यास के) महान क्लेश में रखा। तुमने गुरुजनों के उस कठिन अनुशासन को कैसे सहा? बालक होते हुए भी तुम्हारा धैर्य किसी वृद्ध के समान है! तुम्हारी गुरु-भक्ति अद्वितीय है। जिस प्रकार पिता की कृपा से तुम समस्त विद्याओं में निपुण होकर लौटे हो, वैसे ही शीघ्र मैं तुम्हें योग्य वधुओं के साथ देखूँगी"।

ऐसा कहकर उन्होंने लज्जा से झुके हुए चन्द्रापीड के कपोलों (गालों) को चूम लिया। इसके पश्चात् चन्द्रापीड ने अन्य सभी माताओं के अन्तःपुर में जाकर उन्हें दर्शनों से आनंदित किया। अंत में, राजमहल के द्वार पर खड़े अपने घोड़े 'इन्द्रायुध' पर सवार होकर वह मन्त्री शुकनास से मिलने के लिए उनके भवन की ओर चल दिया।
४. English Translation
Queen Vilasavati herself performed the welcoming rituals for her son. Milk began to flow from her breasts as if her heart, melted with affection, was pouring out. She kissed his head and embraced him for a long time. When Chandrapida tried to sit on the ground out of humility, she forcibly pulled him and made him sit on her lap.

Caressing his forehead, chest, and shoulders, she said, "My child, your father is truly hard-hearted to have subjected your delicate form, worthy of being cherished by the whole world, to such great hardships for so long. How did you endure such long and strict discipline from your teachers? Your fortitude, even as a child, is as firm as that of a mature man. Your devotion to your elders is extraordinary. Just as you have returned mastered in all sciences by your father's grace, I hope to see you soon united with worthy brides".

Saying this, she kissed his cheek which was bowed down with a bashful smile. Chandrapida then visited all the other royal ladies to delight them. Finally, mounting his horse Indrayudha at the palace gate, he proceeded to visit Minister Shukanasa at his residence.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान

कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९५

शुकनास-भवन प्रवेश एवं गुरु-वंदन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
केयमुनिशासनपथघोरैयै रक्तपटैः पाशुपतैर्द्विजैश्च दिवानिशमासेव्यमानमभ्यन्तरप्रविष्टानां च सामन्तानां जघनोपविष्टपुरुषोत्सङ्गस्थितद्विगुणकुथाभिरतिचिरावस्थाननिर्वेदप्रसुप्ताधोरणाभिः सपर्यणाभिर्निश्चलावस्थानप्रचलायिताभिः शतसहस्रशः करिणीभिराकीर्णं शुकनासगृहद्वारमासाद्य सत्वरप्रधावितैर्द्वारदेशावस्थितैः प्रतीहारपुरुषैर्निवार्यमाणोपि राजकुल इव राजपुत्रो बाह्याङ्गण एव तुरङ्गादवततार। द्वारदेशावस्थापिततुरङ्गश्च वैशम्पायनमवलम्ब्य पुरःप्रधावितैः समुत्सारितपरिजनैस्तथैव प्रतीहारमण्डलैरुपदिश्यमानमार्गस्तथैव चलितमुकुटकोटिभिर्नरेंद्रवृन्दैः सेवासमुपस्थितैरुत्थायोत्थाय प्रणम्यमानस्तथैव प्रचण्डप्रतीहारहुंकारभयमूकीभवत्परिजनानि प्रचलितवेत्रलताचकितसामन्तचक्रचरणशतचलितवसुंधराणि कक्षान्तराणि निरीक्षमाणस्तथैव नवनवसुधावदातप्रासादसहस्रनिरन्तरं द्वितीयमिव राजकुलं शुकनासभवनं विवेश। प्रविश्य चानेकनरेन्द्रसहस्रमध्येपविष्टमपरमिव पितरमुपदर्शितविनयो दूरावनतेन मौलिना शुकनासं ववन्दे।

शुकनासस्तं ससंभ्रमुत्थायानुपूर्व्येणोत्थितराजलोकः सादरमभिमुखदत्ताविरलपदः प्रहर्षविस्फारितलोचनागतानन्दजलकणः सह वैशम्पायनेन प्रेम्णा गाढमालिङ्गत्। आलिङ्गितोन्मुक्तश्च सांद्रेगोपनीतमपहाय रत्नासनमवनावेव राजपुत्रः समुपविशत्तदनु च वैशम्पायनः। समुपविष्टे च राजपुत्रे शुकनासवर्जमन्यदखिलमवनिपालचक्रमुज्झितनिजासनमवनितलमभजत। स्थित्वा च तूष्णीं क्षणमिव शुकनासः समुद्भूतप्रीतिपुलकैरैरावेद्यमानहृदयहर्षप्रकर्षस्तमब्रवीत्। तात चन्द्रापीडाद्य खलु देवस्य तारापीडस्य समाप्तविद्यमुपा-
२. व्याकरण एवं शास्त्रीय टिप्पणी (Grammar & Scholarly Notes)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ/विशेष संदर्भ
द्वितीयमिव राजकुलम् उपमा अलंकार शुकनास का भवन दूसरे राजमहल के समान भव्य प्रतीत हो रहा था।
अपरमिव पितरम् उपमा शुकनास को चन्द्रापीड ने अपने 'दूसरे पिता' के समान मानकर वंदन किया।
रत्नासनमपहाय अप् + हा + ल्यप् रत्नों के आसन को छोड़कर (विनय के कारण भूमि पर बैठना)।
ससंभ्रमुत्थाय सम् + भ्रम् + ल्यप् हड़बड़ाहट या आदर के साथ शीघ्रता से उठकर।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
शुकनास का भवन द्वार पाशुपत संप्रदाय के मुनियों और लाल वस्त्रधारी ब्राह्मणों से घिरा था। वहाँ हजारों हथिनियाँ खड़ी थीं, जिनके महावत बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के कारण ऊँघ रहे थे। चन्द्रापीड ने द्वारपालों के मना करने पर भी (आदरवश) बाहर के आंगन में ही घोड़े से उतरना उचित समझा। वैशम्पायन का हाथ थामकर और प्रतीहारों द्वारा मार्ग दिखाए जाने पर, वह सामन्तों के प्रणाम स्वीकार करता हुआ आगे बढ़ा। वह भवन नवनिर्मित धवल महलों के कारण दूसरे राजमहल के समान लग रहा था।

भीतर पहुँचकर, हजारों राजाओं के मध्य बैठे हुए शुकनास को चन्द्रापीड ने अपने दूसरे पिता के समान मानकर दूर से ही मस्तक झुकाकर वंदन किया। शुकनास भी आदर के साथ शीघ्रता से उठे और आगे बढ़कर चन्द्रापीड और वैशम्पायन को प्रेमपूर्वक गले लगा लिया। आलिंगन के बाद, राजकुमार चन्द्रापीड रत्नों के आसन पर न बैठकर विनय के कारण भूमि पर ही बैठ गया, और वैशम्पायन भी वैसा ही किया। उन्हें भूमि पर बैठा देख, शुकनास के अतिरिक्त वहाँ उपस्थित अन्य सभी सामन्त भी अपने आसनों को छोड़कर भूमि पर बैठ गए। कुछ क्षण शांत रहकर, पुलकित हृदय से शुकनास बोले— "तात चन्द्रापीड! आज महाराज तारापीड का मनोरथ पूर्ण हुआ..."।
४. English Translation
Chandrapida reached the residence of Shukanasa, which was crowded with Pasupata ascetics and brahmins in red robes. Despite the insistence of the warders to proceed further, the Prince dismounted his horse in the outer courtyard out of respect. Holding Vaishampayana's hand and guided by the staff-bearers, he entered the mansion, which appeared like a second royal palace due to its many white-washed buildings.

Entering the hall where Shukanasa sat amidst thousands of vassal kings, Chandrapida bowed deeply from a distance, regarding him as a second father. Shukanasa rose in haste and with eyes moist with joy, embraced both Chandrapida and Vaishampayana warmly. Out of humility, the Prince declined the jeweled seat and sat on the ground; Vaishampayana followed suit. Seeing this, all other kings present also left their seats and sat on the floor. After a moment of silence, Shukanasa, bristling with delight, said: "Dear Chandrapida, today the king's (Tarapida's) desire is fulfilled as you return having mastered all sciences...".
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९६

शुकनास का आशीर्वाद एवं राजकुमार का भवन-प्रवेश

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
रूढयौवनमालोक्य भवन्तं सुचिराद्भवनराज्यफलप्राप्तिरुपजाता। अद्य समृद्धाः सर्वा गुरुजनाशिषः। अद्य फलितमनेकजन्मान्तरोपात्तमवदातं कर्म। अद्य प्रसन्नाः कुलदेवताः। न ह्यपुण्यभाजां भवत्शास्त्रिभुवनविस्मयहेतवः पुत्रतां प्रतिपद्यन्ते। केदं वयः। केयममानुषी शक्तिः। क्व चेदमशेषविद्याग्रहणसामर्थ्यम्। अहो धन्याः प्रजा यासां भरतभगीरथप्रतिमो भवानुत्पन्नः पालयिता। किं खलु कृतमवदातं कर्म वसुंधरया ययासि भर्ता समासादितः। हरिवक्षःस्थलनिवासासङ्गव्यसनिनी हता खलु लक्ष्मीर्या विग्रहवती भवन्तं नोपसर्पति। सर्वथा कल्पकोटीर्महावराह इव दंष्ट्रावलयेन वह बाहुना वसुंधराभारं सह पित्रा। इत्यभिधाय च स्वयमाभरणवसनकुसुमाङ्गरागादिभिरभ्यर्च्य विसर्जयांचकार।

विसर्जितश्चोत्थायान्तःपुरं प्रविश्य दृष्ट्वा वैशम्पायनमातरं मनोरमाभिधानां निर्गत्य समारुह्येन्द्रायुधं पित्रा पूर्वकल्पितं प्रतिच्छन्दकमिव राजकुलस्य द्रागवस्थितसितपूर्णकलशमाबद्धहरितवन्दनमालमुल्लसितसितपताकासहस्रमभ्याह्तमङ्गलतूर्यवपरिपूरितदिगन्तरमुपरचितविकचकमलकुसुमप्रकरमचिरकृताभिकार्यमुज्ज्वलविविक्तपरिजनमुपपादिताशेषगृहप्रवेशमङ्गलं कुमारो भवनं जगाम। गत्वा च श्रीमण्डपावस्थिते शयने मुहूर्त्तमुपविश्य सह तेन राजपुत्रलोकेनाभिषेकादिकमशनावसानमकरोद्दिवसविधिम्। अभ्यन्तरे च स्वशयनीयगृह एवेन्द्रायुधस्यावस्थानमकल्पयत्।

एवंप्रायेण चास्योदन्तेन तदहः परिणतिमुपययौ। गगनतलादवतरन्त्या दिवसश्रियः पद्मरागन्नूपुरमिव स्वप्रभापिहितरन्ध्रं रवमण्डलममुत्मुकपादं पपात।
२. व्याकरण एवं अलंकार भाष्य (Grammar & Figures of Speech)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति विशेष टिप्पणी
भरतभगीरथप्रतिमः भरतभगीरथाभ्यां प्रतिमः (तृतीया तत्पुरुष) भरत और भगीरथ जैसे महान राजाओं के समान।
महावराह इव उपमा अलंकार जैसे वराह अवतार ने पृथ्वी को दाँतों पर उठाया था, वैसे ही चन्द्रापीड भुजाओं पर राज्यभार उठाएगा।
पद्मरागन्नूपुरमिव पद्मरागमयः नूपुरः (उत्प्रेक्षा) अस्त होता सूर्य 'दिन रूपी लक्ष्मी' के पैरों के पद्मराग मणि के नूपुर जैसा लग रहा है।
विसर्जयांचकार वि + सृज् + णिच + लिट् (अनुप्रयोग) विदा किया (आदर के साथ)।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
मन्त्री शुकनास ने चन्द्रापीड से कहा— "वत्स! तुम्हें युवावस्था को प्राप्त देखकर आज सचमुच राज्य का फल प्राप्त हो गया है। आज गुरुजनों के आशीर्वाद सफल हुए और अनेक जन्मों के पुण्य फलीभूत हुए हैं। तुम्हारी यह आयु और तुम्हारी यह अलौकिक शक्ति तथा समस्त विद्याओं को ग्रहण करने का सामर्थ्य देखकर आश्चर्य होता है। वे प्रजाएँ धन्य हैं जिनके रक्षक तुम जैसे भरत और भगीरथ के समान राजा होंगे। तुम महावराह की भाँति अपने पिता के साथ मिलकर कल्पों तक पृथ्वी का भार अपनी भुजाओं पर वहन करो"।

शुकनास ने आभूषणों और वस्त्रों से चन्द्रापीड का सत्कार कर उसे विदा किया। वहाँ से निकलकर चन्द्रापीड अन्तःपुर में गया और वैशम्पायन की माता 'मनोरमा' से मिला। इसके बाद वह 'इन्द्रायुध' पर सवार होकर अपने उस नवीन भवन में पहुँचा, जिसे राजा ने उसके लिए पहले से ही तैयार करवाया था और जो राजमहल की प्रतिकृति जैसा ही भव्य था।

भवन के द्वार पर मंगल कलश रखे थे और वन्दनवार लटक रहे थे। चन्द्रापीड ने अपने भवन में प्रवेश किया, वहाँ अभिषेक और भोजन आदि के दैनिक कार्य संपन्न किए। उसने अपने शयन-गृह के भीतर ही अपने प्रिय घोड़े इन्द्रायुध के रहने का स्थान भी बनवाया। इस प्रकार दिन बीत गया और सूर्यास्त होने लगा। डूबता हुआ सूर्य ऐसा लग रहा था मानो आकाश से उतरती हुई 'दिन की शोभा' (दिन रूपी लक्ष्मी) के चरणों से कोई लाल नूपुर खिसक कर गिर गया हो।
४. English Translation
Minister Shukanasa addressed Chandrapida: "My son, seeing you in your prime youth, the true fruit of the kingdom is realized today. The blessings of your elders and the merits of many past lives have finally borne fruit. Your superhuman power and the capacity to master all branches of knowledge at such an age are astounding. Blessed are the subjects who have a protector like you, equal to Bharat and Bhagirath. Like the Great Boar (Varaha), may you bear the burden of the earth on your shoulders for eons along with your father".

After honoring him with garments and ornaments, Shukanasa dismissed him. Chandrapida then visited Manorama, the mother of Vaishampayana, in the inner apartments. Mounting his horse Indrayudha, he proceeded to his new mansion, which was a replica of the royal palace itself, decorated with auspicious pitchers and green garlands.

He spent the rest of the day performing rituals and dining with other princes. Interestingly, he arranged the stable for Indrayudha right inside his own bedchamber. As the day ended, the setting sun appeared like a ruby anklet falling from the feet of the "Beauty of the Day" as she descended from the sky.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९७

संध्या-वर्णन एवं रजनी-प्रवेश

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
प्रसन्नस्य वासरालोकः प्रतीचीं ककुभमगात्। अभिनवपल्लवलोहिततलेन करेणेवाधोमुखप्रसृतेन दिवसकरबिम्बेन वासरः कमलरागमशेषं ममार्ज। कमलिनीपरिमलपरिचयागतालिमालाकुलितकण्ठं कालपाशैरिव चक्रवाकमिथुनमाकृष्यमाणं विजघटे। करपुटेरादित्यसान्तमापीतमरविन्दमधुरसमिव रक्तातापच्छलेन गगनगमनखेदादिव दिवसकरबिम्बं ववाम।

क्रमेण च प्रतीचीकर्णपूररक्तोत्पले लोकान्तरमुपगते भगवति गभस्तिमालिनि समुल्लसितायामम्बरतटाकविकचकमलिन्यां संध्यायां कृष्णागुरुपङ्कपत्रलतास्विंव तिमिरलेखासु स्फुरन्तीषु दिशां मुखेषु अलिकुलमलिनिन कुवलयवनेनेव तिमिरनिकरेणोत्सार्यमाणे संध्यारागे कमलिनीनिपीतमातपमुन्मूलयितुमन्धकारपल्लवेष्विव विशत्सु रक्तकमलोदराणि मधुकरकुलेषु शनैः शनैश्च निशाविलासिनीमुखावतंसपल्लवे गलिते संध्यारागे दिक्षु दिक्षु विक्षिप्तेषु संध्यादेवतार्चनबलिपिण्डेषु शिखरदेशलभ्रतिमिरस्वानारूढमयूखेष्वपि मयूराधिष्ठितास्वि मयूरयष्टिषु गवाक्षविवरनिलीनेषु प्रासादलक्ष्मीकर्णोत्पलेषु पारावतेषु विगतविलासिनिसंवाहननिश्चलकाञ्चनपीठासु मूकीभूतघण्टारवास्वन्तःपुरदोलासु भवनसहकारशाखावलम्बितपञ्जरेषु विगतालापेषु शुकसारिकानिवहेषु संगीतविरामविश्रान्तरवात्सार्यमाणासु वीणासु युवतिनूपुरशब्दोपशमनिभृतेषु भवनकलहंसेष्वपनीयमानकर्णशङ्खचामरक्षत्रमालामण्डनेषु मधुकरकुलशून्यकपोलभित्तिषु मत्तवारणेषु प्रदीप्पमानेषु राजवल्लभतुरङ्गममन्दुराप्रदीपेषु विशन्तीषु प्रथमयामकुरघटासु कृतराजस्वस्त्ययनेषु निष्क्रामत्सु पुरोहितेषु विसर्जितराजलोकाविरलपरिजनेषु वि-
२. व्याकरण एवं अलंकार विश्लेषण (Grammar & Figures of Speech)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ/टिप्पणी
कालपाशैरिव उत्प्रेक्षा अलंकार भौरों की पंक्तियाँ चक्रवाक पक्षियों के लिए 'यमराज के पाश' जैसी लग रही हैं।
प्रासादलक्ष्मीकर्णोत्पलेषु रूपक अलंकार महलों की खिड़कियों में बैठे कबूतर 'भवन-लक्ष्मी के कानों के नीलकमल' जैसे हैं।
विगतालापेषु विगतः आलापः येभ्यस्ते (बहुव्रीहि) वे (पक्षी) जिन्होंने बोलना बंद कर दिया है (शांति का प्रतीक)।
मधुकरकुलशून्य तृतीया तत्पुरुष भौरों के समूह से रहित (हाथियों के गाल जहाँ से मद बहना रुक गया है)।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
दिन का प्रकाश पश्चिम दिशा की ओर चला गया। अस्त होते सूर्य ने अपनी लाल किरणों रूपी हाथों से कमलों की लालिमा को मानो पोंछ दिया। चक्रवाक पक्षियों का जोड़ा अलग होने लगा, उनके गले में भौरों की मालाएँ ऐसी लग रही थीं मानो उन्हें यमराज के पाश खींच रहे हों। आकाश रूपी तालाब में संध्या की लालिमा खिल उठी और दिशाओं के मुख पर अंधकार की रेखाएँ कृष्णागुरु के लेप जैसी दिखने लगीं।

जैसे-जैसे रात बढ़ने लगी, संध्या की लालिमा मिटने लगी। महलों की छतों पर मोर अपनी विश्राम-यष्टियों (डंडों) पर बैठ गए। झरोखों में बैठे हुए कबूतर ऐसे लग रहे थे मानो महल की लक्ष्मी ने कानों में नीलकमल पहन रखे हों। अन्तःपुर के झूले स्थिर हो गए और उनकी घंटियाँ मौन हो गईं। पिंजरों में बंद तोते और मैना ने बोलना बंद कर दिया। वीणाओं के तार शांत हो गए और संगीत का स्वर थम गया।

हाथियों के गालों से मद बहना बंद हो गया, जिससे वहाँ मंडराने वाले भौरे चले गए। घोड़ों की शालाओं में दीपक जला दिए गए। प्रथम पहर की पहरेदारी शुरू हो गई और पुरोहितगण राजा को आशीर्वाद देकर विदा होने लगे। राजदरबारी अपने घरों को लौट गए और अब केवल गिने-चुने सेवक ही महल में शेष रह गए।
४. English Translation
The daylight faded away into the western quarter. The setting sun, with its reddish rays like soft hands, seemed to wipe away the crimson glow of the lotuses. The pairs of Chakravaka birds began to separate, the swarms of bees around their necks appearing like the nooses of Death pulling them apart. In the lake of the sky, the twilight bloomed, and streaks of darkness appeared on the faces of the directions like patterns of black aloe paste.

Gradually, as night approached, peacocks settled on their perches atop the mansions. Pigeons resting in the niches of windows looked like blue lotuses adorned as ear-ornaments by the presiding Goddess of the Palace. The swings in the inner apartments became still and their bells grew silent. Parrots and mainas in their cages stopped chirping. The melodies of the veenas ceased as the musical performances came to an end.

The elephants' cheeks became devoid of bees as the flow of ichor dried up for the day. Lamps were lit in the royal stables. The guards for the first watch of the night took their positions, while priests departed after performing auspicious rites for the King. The courtiers dispersed, leaving only a few personal attendants behind.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९८

प्रदोष-वर्णन एवं प्रथम मृगया विहार

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
स्तारितेष्विव राजकुलक्षान्तरेषु प्रज्वलितदीपिकासहस्रप्रतिबिम्बचुम्बितेषु कृतविकचचम्पकदलोपहारेष्विव मणिभूमिकुट्टिमेषु निपत्तितदीपालोकासु रविविरहार्तनलिनीविनोदागतबालातपास्विभ भवनदीर्घिकासु निद्रालसेषु पञ्जरकेसरिषु समारोपितकार्मुके गृहीतसायके यामिक इवान्तःप्रविष्टे मकरकेताववतंसपल्लवेष्विव सरागेषु कर्णे क्रियमाणेषु सुरतदूतीवचनेषु सूर्यकान्तमणिभ्य इव संक्रान्तानलेषु ज्वलत्सु मानिनीनां शोकविधुरेषु हृदयेषु प्रवृत्ते प्रदोषसमये चन्द्रापीडः प्रज्वलितदीपिकाचक्रवालपरिवारश्रणाभ्यामेव राजकुलं गत्वा पितुः समीपे मुहूर्त्तं स्थित्वा दृष्ट्वा च विलासवतीमागत्य स्वभवनमनेकरत्नप्रभाशबलमुरगराजफणामण्डलमिव हृषीकेशः शयनतलमधिशिश्ये।

प्रभातायां च निशीथिन्यां समुत्थाय समभ्यनुज्ञातः पित्राभिनवमृगयाकौतुकावकृष्यमाणहृदयो भगवत्यनुदित एव सहस्ररश्मावारुहेन्द्रायुधमग्रतो बालेयप्रमाणानाकर्षद्भिःशाामीकरश्रृङ्खलाभिः कौलेयका- न्नरव्याघ्रचर्मशबलवसनकञ्चुकधारिभिरने कवर्णपट्टचीरिकोद्धूतमौलिभिरुपचितश्मश्रुगहनमुखैरेककर्णावसक्तहेमतालीपुटैराबद्धनिबिडकक्षैरनवरतश्रमोपचितोरुपिण्डकैः कोदण्डपाणिभिः श्वपोषकैरनवरतकृतकोलाहलैः प्रधावद्भिर्द्विगुणीक्रियमाणमनोत्साहो बहुगजतुरगपादातिपरिवृतो वनं ययौ। तत्र च कर्णान्तावकृष्टमुक्तैर्विकचकुवलयपलाशकान्तिभिर्निर्मलैर्मदकलकलभकुम्भभित्तिदुरैः नाराचैः 'पत्काररवभयचकितवनदेवताधश्र्वविक्षितो वनवराहान्केसरिणः शरभांश्रमरानने ककुरङ्कांश्च सहस्रशो जघान। अन्यांश्च जीवत एव महाप्राणतया स्फुरतो जग्राह।
२. व्याकरण एवं शास्त्रीय टिप्पणी (Grammar & Scholarly Notes)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति अर्थ/संदर्भ
मकरकेतौ... यामिक इव उपमा/उत्प्रेक्षा कामदेव मानो रात्रि का पहरेदार बनकर अंतःपुर में प्रविष्ट हुआ।
शयनतलमधिशिश्ये अधि + शी + लिट् शय्या पर शयन किया (अधि उपसर्ग के कारण द्वितीया विभक्ति)।
हृषीकेश इव पूर्णोपमा जैसे विष्णु शेषनाग की फणों की छाया में सोते हैं, वैसे चन्द्रापीड रत्नों के प्रकाश वाले भवन में सोया।
कोदण्डपाणिभिः कोदण्डः पाणौ येषां ते (बहुव्रीहि) जिनके हाथों में धनुष है (शिकारी)।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
महल के आंगन में हजारों दीपकों का प्रकाश मणियों के फर्श पर प्रतिबिंबित हो रहा था, जिससे ऐसा लगता था मानो खिले हुए चम्पक के फूलों की वर्षा की गई हो। बावड़ियों के जल पर पड़ने वाली दीपकों की रोशनी ऐसी लग रही थी मानो सूर्य के विरह में दुखी कमलिनियों को सांत्वना देने के लिए बाल-धूप (सुबह की धूप) वापस आ गई हो। रात्रि का समय होने पर कामदेव मानो पहरेदार बनकर हृदय में प्रविष्ट हो गया। चन्द्रापीड मशालों के घेरे के साथ राजभवन गया, पिता और माता विलासवती से मिलकर वापस अपने भवन आया और रत्नों की कान्ति से चमकते बिस्तर पर वैसे ही सोया जैसे भगवान विष्णु (हृषीकेश) शेषनाग की फणों पर सोते हैं।

प्रातःकाल होने पर, पिता की आज्ञा लेकर चन्द्रापीड शिकार के उत्साह में सूर्योदय से पहले ही 'इन्द्रायुध' पर सवार होकर वन की ओर चल पड़ा। उसके साथ सोने की जंजीरों से कुत्तों को पकड़े हुए, व्याघ्र-चर्म के वस्त्र पहने हुए, दाढ़ी-मूंछ वाले और हाथों में धनुष लिए हुए अनेक शिकारी चल रहे थे। हाथियों और घोड़ों की सेना के साथ उसने वन में प्रवेश किया। वहाँ उसने कानों तक खींचकर छोड़े गए पैने बाणों से हजारों जंगली सूअरों, सिंहों, शरभों और हिरणों का शिकार किया। कुछ अत्यंत बलशाली पशुओं को उसने जीवित ही पकड़ लिया।
४. English Translation
In the royal courtyard, the reflections of thousands of lit torches on the jeweled floors appeared like scattered petals of blooming Champaka flowers. The lamp-light falling on the palace ponds looked as if the morning sunlight had returned to comfort the lotuses grieving for the departed sun. As night deepened, Cupid (Makaradhvaja) entered like a watchman into the hearts of lovers. Chandrapida visited his father and mother Vilasavati and returned to his palace, resting on a bed glowing with many gems, appearing like Lord Vishnu (Hrishikesha) resting on the hood of the Serpent King.

At dawn, with his father's permission and a heart eager for his first hunt, he mounted Indrayudha before sunrise. He was accompanied by hunters holding dogs with golden chains, dressed in tiger skins, with dense beards and bows in their hands. Surrounded by elephants, horses, and infantry, he entered the forest. There, with arrows drawn back to his ears, he killed thousands of wild boars, lions, sharabhas, and deer. Some of the most powerful animals, still struggling with great vitality, were captured alive by him.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ ९९

मृगया-प्रत्यावर्तन एवं स्नान-विधि

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
समाारूढे च मध्यमहः सवितारि वनाज्ज्ञानोत्थितेनेव श्रमसलिलबिन्दुवर्षमनवरतमुज्झता मुहुर्मुहुर्दर्शनविघट्टनैः खणखणायितखरखलीनेन श्रमशिथिलमुखगलितफेनिलरुधिरलवेन पर्याणपट्टकानुसारोत्थितफेनराजिना कर्णावतंसीकृतमुत्फुल्लकुसुमशबलमलिपटळझंकारमुखरं वनगमनचिह्नं पल्लवस्तबकमुद्वहतेन्द्रायुधेनोह्यमानः...

अवतीय च तुरङ्गमात्ससंभ्रमप्रधावितपरिजनोपनीते समुपविश्यासने वारवाणमवतार्यापनीय चाशेषं तुरङ्गमाधिरोहणोचितं वेषमन्तरा- प्रहसितस्ततः प्रचलिततालवृन्तपवनापनीयमानश्रमो मुहूर्तं विश्राम। विश्रम्य च मणिरजतकानककलशश्वसनाथामन्तर्विन्यस्तकाञ्चनपीठां स्नानभूमिमगात्।
२. व्याकरण एवं शास्त्रीय विश्लेषण (Analysis)
पद (Word) व्याकरण/टिप्पणी अर्थ
श्रमसलिलबिन्दु षष्ठी तत्पुरुष थकावट के कारण निकलने वाले पसीने की बूंदें।
वारवाणम् संज्ञा (पुल्लिङ्ग) कवच या अंगरखा जो शिकार के समय पहना जाता था।
इन्द्रायुधेनोह्यमानः तृतीयोपपद समास इन्द्रायुध (घोड़े) द्वारा ले जाया जाता हुआ (चन्द्रापीड)।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
जब सूर्य आकाश के मध्य (दोपहर) में पहुँच गया, तब चन्द्रापीड वन से वापस लौटा। वह 'इन्द्रायुध' नामक घोड़े पर सवार था, जो पसीने की बूंदों की वर्षा कर रहा था। घोड़े के मुख से झाग और रक्त की बूंदें गिर रही थीं और उसकी लगाम बार-बार 'खण-खण' की ध्वनि कर रही थी। घोड़े के कानों में वन-गमन के चिन्ह स्वरूप फूलों के गुच्छे लगे थे, जिन पर भौरे गुंजन कर रहे थे। चन्द्रापीड स्वयं पसीने से भीगा हुआ था और उसका कवच शिकार किए गए पशुओं के रक्त से सना हुआ था।

महल पहुँचकर उसने घोड़े से उतरकर सेवकों द्वारा लाए गए आसन पर विश्राम किया। उसने अपना भारी अंगरखा (वारवाण) और शिकार के वस्त्र उतारे। ताड़ के पंखों की हवा से अपनी थकान दूर करने के बाद वह स्नान-गृह की ओर गया, जहाँ सोने की चौकी रखी थी और मणि-जड़ित कलश सजाए गए थे। वहाँ राजा (तारापीड) द्वारा भेजी गई दासियाँ विविध प्रकार के आभूषण, मालाएँ और अंगराग लेकर उपस्थित थीं।
४. English Translation
When the sun reached the zenith (noon), Chandrapida returned from the forest. He was mounted on the horse 'Indrayudha', which was shedding showers of sweat drops. Foam mixed with traces of blood dripped from the horse's weary mouth, and its bit jingled with a 'khan-khan' sound. The horse bore clusters of fresh blossoms in its ears as a mark of the forest journey, surrounded by the humming of bees. Chandrapida himself was drenched in perspiration, his armor stained with the blood of hunted animals.

After dismounting, he sat on a seat brought by his hurried attendants and removed his tunic (war-dress) and hunting gear. Fanned by palm leaves to relieve his exhaustion, he rested for a while before proceeding to the bathing hall, which was furnished with a golden pedestal and vessels of gems and silver. There, female attendants sent by the King waited with various ornaments, garlands, and fragrant pastes.
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कादंबरी (पूर्वभाग): पृष्ठ १००

आहार-विधि एवं दिव्य कन्या का आगमन

१. मूल संस्कृत पाठ (Original Sanskrit Text)
रतस्तस्योपतस्थुरुपनिन्युश्च। यथाक्रममादाय च ताभ्यः प्रथमं स्वयमुपलिप्य वैशम्पायनमुपरचिताङ्गरागो दत्त्वा च समीपवर्तिभ्यो यथार्हमाभरणवसनाङ्गरागकुसुमानि विविधमणिभाजनसहस्रसारं शाद्वलमम्बरतलमिव स्फुरिततारागणमाहारमण्डपमगच्छत्।

तत्र च द्विगुणीकृतकुथासनोपविष्टः समीपवष्टिन तद्गुणोपवर्णनपरेण वैशम्पायनेन यथार्हभूमिभागोपवेशितेन राजपुत्रलोकेनेदमस्मै दीयतामिदमस्मै दीयतामिति प्रसादविशेषदर्शनसंवर्धितसेवारसेनाहारविधिमकरोत्। उपस्पृश्य च गृहीतताम्बूलस्तस्मिन्मुहूर्तमिव स्थित्वेन्द्रायुधसमीपमगमत्।

अपरेद्युश्च प्रभातसमय एव सर्वान्तःपुराधिकृतमवनि पतेः परमसंमतमनुमार्गागतया प्रथमे वयसि वर्तमानया राजकुलसंवासप्रगल्भयाप्यनुज्झितविनयया किंचिदुपरूढयौवनया शक्रगोपकालोहितरागेणांशुकेन रचितावगुण्ठया सबालातपयेव पूर्वया ककुभा...।
२. व्याकरण एवं शास्त्रीय विश्लेषण (Technical Analysis)
पद (Word) व्याकरण/व्युत्पत्ति भावार्थ
स्फुरिततारागणम् बहुव्रीहि समास जैसे आकाश तारों से भरा हो, वैसे ही भोजन का मण्डप मणियों के पात्रों से चमक रहा था।
द्विगुणीकृतकुथासन द्विगुणी + कृत (च्वि प्रत्यय) दोहरा करके बिछाया गया ऊनी आसन।
शक्रगोपकालोहित उपमा अलंकार 'वीरबहूटी' (एक लाल कीड़ा) के समान गहरे लाल रंग का वस्त्र।
३. हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
स्नान के पश्चात परिचारिकाओं ने चन्द्रापीड की सेवा की। उसने स्वयं अंगराग (सुगंधित लेप) लगाया, वैशम्पायन को दिया और अन्य उपस्थित राजपुत्रों को उनकी योग्यता के अनुसार वस्त्र, आभूषण और पुष्प प्रदान किए। इसके बाद वह भोजन-मण्डप में गया, जो हज़ारों मणि-जड़ित पात्रों के कारण तारों भरे आकाश जैसा लग रहा था। दोहरे बिछाए गए आसन पर बैठकर, वैशम्पायन और अन्य सहयोगियों के साथ उसने बड़े प्रेमपूर्वक भोजन किया और फिर आचमन कर तांबूल (पान) ग्रहण किया। शाम को वह अपने प्रिय घोड़े 'इन्द्रायुध' के पास गया और उसकी स्वयं देख-रेख की।

अगले दिन प्रातःकाल, राजभवन की एक अत्यंत सम्मानित परिचारिका वहां आई। वह युवावस्था में थी, अत्यंत विनीत थी और उसने 'इन्द्रगोप' (वीरबहूटी) के समान गहरे लाल रंग के रेशमी वस्त्र से घूँघट निकाला हुआ था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो प्रातःकालीन धूप से रंजित पूर्व दिशा साक्षात् चली आ रही हो। वह साक्षात् राजलक्ष्मी या चन्द्रमा की चाँदनी के समान सुंदर थी, जिसके पैरों के नूपुरों की मधुर ध्वनि हंसों के कूजन जैसी लग रही थी।
४. English Translation
After his bath, the attendants waited upon him. Chandrapida applied fragrant pastes, shared them with Vaishampayana, and distributed clothes and ornaments to the other princes as per their merit. He then proceeded to the dining hall, which sparkled with thousands of jeweled vessels, resembling a starlit sky. Seated on a double-folded woolen mat, he dined with Vaishampayana and his retinue in a joyous atmosphere. After rinsing his mouth and taking betel leaf, he spent time near his horse, Indrayudha, even personally offering it fodder.

The next morning, a highly esteemed female attendant of the royal household arrived. She was in the bloom of her youth, exceedingly modest, and veiled in a silk garment as red as the 'Indragopa' insect. She appeared like the eastern quarter personified, radiant with the morning sun. Moving with a grace that surpassed the beauty of the moon, her tinkling anklets sounded like the melodious warbling of swans.
प्रस्तुत शोध एवं संपादन: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान शोध संस्थान
बाणभट्ट की कादंबरी, चन्द्रापीड का पुनरागमन, शुकनास-चन्द्रापीड संवाद, विलासवती वात्सल्य, इन्द्रायुध अश्व, संस्कृत साहित्य भाष्य | 2. Content Summary (Keywords Rich) * **पृष्ठ 87-93:** राजकुमार चन्द्रापीड की शिक्षा पूर्ण होना, पिता तारापीड का संदेश और विद्याश्रम से उज्जयिनी की ओर प्रस्थान। मार्ग में इन्द्रायुध अश्व की गति का वर्णन। पृष्ठ 94-96:** माता विलासवती द्वारा वात्सल्यपूर्ण स्वागत। चन्द्रापीड का मन्त्री **शुकनास** के भवन जाना। शुकनास द्वारा उसे 'द्वितीय पिता' के समान स्नेह और आशीर्वाद देना। पृष्ठ 97-100:** उज्जयिनी का वैभवशाली सूर्यास्त (प्रदोष वर्णन)। चन्द्रापीड की प्रथम **मृगया (शिकार)** यात्रा का रोमांचक वर्णन। अंत में, एक दिव्य परिचारिका (पत्रलेखा की भूमिका की पूर्वपीठिका) का आगमन। ## 4. Key Tags for Indexing #SanskritLiterature #Banabhatta #Kadambari #Chandrapida #AncientIndia #VedicHeritage #GyanVigyanBrahmgyan #Shukanasa #SanskritBhashya #HindiTranslation previous story of kadambari click Next story of kadambari click

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