वेदों के अनुसार सृष्टि का रहस्य, मंगल ग्रह और मानव उत्पत्ति का वैदिक विज्ञान
प्रस्तावना
वेदों में सृष्टि के उद्भव, ब्रह्माण्ड की रचना और मानव उत्पत्ति के विषय में अत्यंत गूढ़ और गहन रहस्य वर्णित हैं। यह ज्ञान केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक विज्ञान आज जिन तथ्यों की खोज कर रहा है, उनका संकेत हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व वेदों और उपनिषदों में दे दिया था।
वेद बताते हैं कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक महान दिव्य चेतना से उत्पन्न हुआ है। वही परमात्मा इस जगत का आधार, संचालक और नियन्ता है। वेदों में उसे स्कम्भ अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाला कहा गया है।
अथर्ववेद में कहा गया है –
“यंस्माध्चो अपातक्षन यजुर्यस्मादपाक्षन समानि यस्य लोमाऽथर्वागिसो मुखम्।
स्कम्भं तं भूहि कतमः स्विदेव सः॥”
अर्थात उस विराट परमेश्वर की महिमा को कौन जान सकता है, जिससे ऋग्वेद प्रकट हुआ, जिससे यजुर्वेद उत्पन्न हुआ, जिसके लोम के समान सामवेद है और जिसका मुख अथर्ववेद है।
वेदों की उत्पत्ति और चार महान ऋषि
वेदों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में चार महान ऋषियों का प्राकट्य हुआ —
इन चारों के हृदय में परमेश्वर ने वेद ज्ञान का प्रकाश किया।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में लिखा है —
“अग्निवायुरव्यंगिरोमनुष्य देहधारि जीवद्वारेण परमेश्वरेण श्रुतिर्वेद: प्रकाशीकृतः।”
अर्थात परमेश्वर ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा इन चार देहधारी जीवों के माध्यम से वेद ज्ञान का प्रकाश किया।
इन्हीं चार ऋषियों ने आगे ब्रह्मा को वेद ज्ञान प्रदान किया और इस प्रकार वे ब्रह्मर्षि कहलाए।
मित्र और वरुण ऊर्जा का रहस्य
ऋग्वेद में वर्णन मिलता है कि मित्र और वरुण नामक दिव्य ऊर्जाओं के तेज से एक दिव्य यज्ञीय कलश में ऊर्जा संचित हुई। उसी से महान ऋषियों का प्राकट्य हुआ।
वैदिक भाषा में मित्र और वरुण दो प्रकार की ऊर्जा शक्तियों का प्रतीक हैं। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से इन्हें दो प्रकार की विद्युत ऊर्जा या ऊर्जा प्रवाह के रूप में समझा जा सकता है।
- एक उष्ण और सक्रिय ऊर्जा
- दूसरी शीतल और संतुलनकारी ऊर्जा
इन्हीं दोनों ऊर्जाओं के संयोग से जीवन की उत्पत्ति होती है।
आज विज्ञान इन्हें जैविक ऊर्जा और प्रजनन प्रक्रिया के रूप में समझता है।
अमैथुन सृष्टि और क्लोनिंग का वैदिक संकेत
वेदों में सृष्टि के प्रारंभ में जिस प्रकार जीवन की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है, उसे अमैथुन सृष्टि कहा गया है।
इसका अर्थ है —
बिना सामान्य स्त्री-पुरुष संबंध के भी जीवन की उत्पत्ति संभव है।
आधुनिक विज्ञान में आज जिस तकनीक को क्लोनिंग कहा जाता है, उसका संकेत वैदिक साहित्य में मिलता है।
प्राचीन ऋषि विशेष प्रयोगशालाओं में जीवन उत्पन्न करने के प्रयोग करते थे। वे शरीर की कोशिकाओं का अध्ययन करके नई कोशिकाओं का निर्माण करते थे।
मानव शरीर का वैदिक शरीर विज्ञान
वैदिक ग्रंथों में मानव शरीर की रचना के विषय में भी अत्यंत वैज्ञानिक वर्णन मिलता है।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर की रचना सात धातुओं से होती है —
- रस
- रक्त
- मांस
- मेद
- अस्थि
- मज्जा
- वीर्य
इन धातुओं के क्रमिक विकास से मानव शरीर का निर्माण होता है।
वेदों में आत्मा को सूर्य के समान बताया गया है और शरीर को उस सूर्य की किरणों के समान ऊर्जा से संचालित बताया गया है।
प्राचीन ऋषियों की दीर्घायु
यजुर्वेद में मनुष्य के दीर्घ जीवन की कामना की गई है।
वेदों में कहा गया है कि मनुष्य कम से कम चार सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है।
प्राचीन ऋषि शरीर विज्ञान और कोशिका विज्ञान में अत्यंत प्रवीण थे। वे शरीर की वृद्धावस्था को नियंत्रित करने की विधियाँ जानते थे।
कहा जाता है कि वे शरीर की उन कोशिकाओं को बदल देते थे जो बुढ़ापा लाती थीं। इसलिए वे कई सौ वर्षों तक जीवित रहते थे।
पुलस्त्य ऋषि और उनकी वंश परंपरा
प्राचीन ऋषियों की वंश परंपरा भी अत्यंत रोचक है।
पुलस्त्य ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री हविर्भू से हुआ। उनसे दो महान पुत्र उत्पन्न हुए —
विश्रवा की दो पत्नियाँ थीं —
- कैकसी – जिनसे रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण उत्पन्न हुए
- इलाविडा – जिनसे कुबेर उत्पन्न हुए
इस प्रकार देव और राक्षस दोनों ही एक ही ऋषि परंपरा से जुड़े हुए थे।
मनु और पृथ्वी पर मानव सभ्यता
वैदिक परंपरा के अनुसार मनु को मानव जाति का प्रथम पुरुष माना जाता है।
कथाओं के अनुसार मनु और सप्तऋषि पृथ्वी पर हिमालय क्षेत्र में आए और उन्होंने यहां मानव सभ्यता की स्थापना की।
उन्होंने प्रयोगशालाओं में जीवन उत्पन्न करने की विधियाँ विकसित कीं और पृथ्वी पर मानव सभ्यता का विस्तार किया।
प्राचीन काल के विशाल जीव
प्राचीन काल में पृथ्वी पर डायनासोर जैसे विशाल जीव भी रहते थे।
कुछ वैदिक व्याख्याओं के अनुसार यह संभव है कि इन जीवों को पृथ्वी के वातावरण को संतुलित करने के लिए उत्पन्न किया गया हो।
जब मानव सभ्यता विकसित हुई तो इन विशाल जीवों का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो गया।
आधुनिक विज्ञान और वैदिक ज्ञान
आज आधुनिक विज्ञान मंगल ग्रह और अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज कर रहा है।
वैज्ञानिक भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव बस्तियाँ बसाने की योजना बना रहे हैं।
यह देखकर आश्चर्य होता है कि हजारों वर्ष पहले हमारे वेदों में भी ग्रहों, ब्रह्मांड और जीवन की उत्पत्ति के विषय में गहन ज्ञान वर्णित है।
इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन ऋषि केवल आध्यात्मिक साधक ही नहीं बल्कि महान वैज्ञानिक भी थे।
निष्कर्ष
वेदों में सृष्टि, जीवन और ब्रह्मांड के विषय में जो ज्ञान वर्णित है वह अत्यंत गूढ़ और गहन है। यह ज्ञान केवल धार्मिक या आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
प्राचीन ऋषियों ने ब्रह्मांड, जीवन और मानव शरीर के रहस्यों को समझने का प्रयास किया और अपने अनुभवों को वेदों और शास्त्रों के माध्यम से मानवता के सामने प्रस्तुत किया।
आज आवश्यकता है कि हम इन प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें और उनमें निहित ज्ञान को समझने का प्रयास करें।
क्योंकि संभव है कि मानवता के भविष्य के अनेक रहस्य इन्हीं प्राचीन ग्रंथों में छिपे हुए हों।
सत्रे ह जाताविषिता नमोभि: कुंभे रेत: सिषिचतु: समानम्। ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥" यंस्माध्चो अपातक्षन यजुर्यस्मादपाक्षन समानि यस्य लोकामान्यथर्वागिसों मुखम। स्कम्भं तं भूहि कतम: स्विदेव स: ॥
अर्थातः- उस स्कम्भ जगदाधार विराट परमेश्वर की महिमा को कौन जान सकता है। इससे ऋग्वेद का विस्तार हुआ, जिससे यजुर्वेद उत्पन्न हुआ, सामवेद जिसके लोम के समान है। और अथर्ववेद जिसका मुख है यहाँ अथर्ववेद को मुख कह इसकी सर्वोच्चता का प्रतिपादन किया गया है।
इसी कारण यज्ञ के चार प्रधान ऋत्वियो के नेता ब्रह्मा के लिये अथर्ववेदित होने की अनिवार्यता रखी गयी है। अथर्ववेद काण्ड १॰ सूक्त ७ मंत्र १४ स्वत: यह प्रमाणित करता है कि अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ये चार ऋषि सर्व प्रथम सृष्टि मे उत्पन्न हुये। इन्ही के हृदयों मे क्रमश: ऋग, यजु, साम तथा अथर्ववेद का प्रकाश हुआ। यह कैसे हुआ इसके लिये एक मंत्र ऋग्वेद का कहता है, कि इन सब की क्लोंनिग हुई अर्थात इनको विशेष रूप से लैब में तैयार किया गया। वह प्रयोगशाला मंगल ग्रह पर बनाई गई क्योंकि यहां आने से पहले मानव जाती मंगल पर रहती थी। इसके भी प्रमाण वेदों में मिलते है।
इन प्रयोगशालाओं में विशेष प्रकार मित्रा और वरुणा नामक दिव्य उर्जावों का उपयोग करके मानव शरीर को युवा उत्पन्न किया गया। यह अमैथुन श्रृष्टी के नाम से जानते है। इनके द्वार ही बाद में मैथुनी श्रृष्टी का आरंभ किया गया। महर्षि दयानन्द ने भी ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका मे वेदोत्पति विषय पर लिखते हुये इसी की पुष्टि की है।
अग्निवायुरव्यंगिरोमनुष्य देहधारि जीवद्वारेण परमेश्वरेण श्रुतिर्वेद: प्रकाशीकृत इति बोध्यम"
यह निश्चय है कि परमेश्वर ने अग्नि वायु आदित्य तथा अंगिरा इन देहधारी जीवो के द्वारा वेद का अर्थ प्रकाश किया। इन चारो ने ही ब्रह्मा को वेद ज्ञान दिया इसी कारण ये ब्रह्मर्षि कहलाये। अंगिरा का अर्थ यही रूढ़ हुआ कि देवां ओर ऋषियो को वेद पढाने वाला आचार्य। ब्रह्मार्षि अंगिरा तथा इनके वंशज अंगिरस (अंगों का रस विर्य है) ऋषियो में सप्तऋषि के नामों से जिनको जानते है। सूर्य की सात किरणों को भी सप्तऋषि कहते है। इसी प्रकार यह आत्मा रूपी सूर्य है जिससे यह सात प्रकार की किरणे निकलती हे। आत्मा को अन्न भी कहते है इस अन्न से से ही पहले रस बनाते है फिर रस से खुन बनता है खुन से मांस बनात है मासं से मेद बनता है मेद से मज्जा बनता है मज्जा से हड्डी बनती है और हड्डी से विर्य बनता है। जिससे मानव शरीर का निर्माण होता है।
ऋग्वेद का कथन है कि मित्र तथा वरुण नामक वेदताओं का अमोघ तेज एक दिव्य यज्ञिय कलश में पुंजीभूत हुआ और उसी कलश के मध्य भाग से दिव्य तेज:सम्पन्न महर्षि अग्नी,
वायु, अंगिरा, और अदित्य आदि ऋषियों का सर्वप्रथमे उद्भव हुआ। यह सब शरीर विज्ञान है इसके द्वारा ही शरीर का निर्वाण हुआ कही पर भी यह नहीं कहा है। कि अत्मा का निर्वाण या परमात्मा का निर्वाण कैसे और कहां हुआ? क्योकि आत्मा और परमात्मा ही निर्वाण करता है इस शरीर के, अब हम शरीर का साक्षात्कार करें, क्योंकि मृत्यु इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है यह शरीर ही मृत्यु है।
हम सब साक्षात मृत्यु पर सवार है फिर भी हमें आजीवन खयाल नहीं आता है इस मृत्यु का, हर समय हम यही सोचते है की मृत्यु अभी नहीं है जीवन अभी है और इस जीवन का आनन्द ले ले, मृत्यु तो कभी भविष्य में आने वाली एक काल्पनिक घटना है।
प्राचिन समय में हमारे पास ऐसा विज्ञान था जिससे हम इस शरीर को मरने से पहले इसको नया कर देते थे, क्योकि यह शरीर अरबो खरबों कोशीकाओं से निर्मित है जो हर समय अपना रूप आकार बदल रही है। कोशीकाओं के परीवर्तन मात्र से शरीर बदलता है। यह जब मां के गर्भ में रहता है तो बहुत सूक्ष्म रहता है। यह दो तत्वों से मिल कर बनता है जिसे हम सब आज के वैज्ञानिक भाषा में अंडाणु और शुक्राणु के नाम से जानते है।
इन दोनों का निसेचन मां के गर्भ में होता है।( निसेचन भी दो प्रकार के होते है एक बाहर होता है एस मां के गर्भ में होता है। जिसके लिये किसी मां के गर्भ की आवश्यक्ता नहीं होती है। जैसा कि क्लोनिगं के समय सर्व प्रथम श्रृष्टी के प्रारम्भ में हुआ था।) जिससे युग्मनज कहते है यह दोनों का योग होता है जिससे एक भ्रुड़ का रूप बनता है। जो हमारी शरीर का प्रथम चरण है। यह भ्रुण बनने से पहले जिसे हम सब अंडाणु और शुक्राणु कहते है।
यह एक स्त्री और पुरुष शरीर के लिंग से निकलने वाली उनका विर्य या तेज कहते है। इसे हमारे प्राचिन वैदिक भाषा में मित्र और वरुण कहते है। यह दो प्रकार की विद्युत उर्जा है। जो सूर्य की मुख्यतः दो किरणों का नाम है। जिस प्राकर से जो सूर्य से किरण निकलती है वह खतरनाक और ज्वलन शिल होती है।
लेकिन यही किरण जब चन्द्रमा पर पड़ती है और वहां से हमारी पृथ्वी पर आती है। वह ठण्डी, शान्त, निर्मल,
कोमल और शुष्क होती है। जिसे आधुनिक भाषा में गीली और सुखी विद्युत के रूप में जानते है। अर्थात एसी. और डीसी. है। जिसको दो वंशो के नाम पर भी जानते है।
सूर्य और चन्द्र वंश यह स्त्री और पुरुष शरीर के रूपक है यह दो प्रकार की उर्जाये है जो एक दूसरे के पुरक है। जो एक ही सूर्य रुप आत्मा से निकली है। यह आत्मा इनसे अलग है एक तीसरा अदृश्य तत्व है जो देनों में एक सामन गती करती है।। यह दो प्रकार की उर्जा शक्तीयां है जो शरीर निर्माण के लिये परम आवश्यक तत्व मानी जाती है।
हमारे प्राचिन काल के ऋषि आदी जो बहुत श्रेष्ठ वैज्ञानिक थे जिन्होंने शरीर की उन कोशिकाओं का अध्यन करके यह जान लिया था की वह कौन सी कोशिका है जो मानव शरीर में बृद्धावस्था को लाती है। उस कोशिका को निकला कर उनके स्थान पर नई कोशिका को प्रत्यारोपित कर देते थे।
जिससे आदमी जल्दी वृद्ध ही नहीं होता था जिसके कारण वह कई सौ सालो तक जिन्दा रहता था। यजुर्वेद में ऐसे कई मंत्र आते है जो यह बताते है की मनुष्य कम से कम चार सौ साल तक तो अवश्य जिन्दा रहे। यह साधरण लोगो की उम्र है जो विशेष लोग है वह तो हजारों और लाखों साल तक जिने में सक्षम थे। जिसमें अधिकतर वैज्ञानिक किस्म के ऋषि महर्षी हुआ करते थे या वह राजा महाराजा जिनके आश्रय में यह संसार और साधरण जन रहते थे। हमारें पुराने साहित्य में यह बात आती है कि किस प्रकार से ऋषि महर्षी अपने योग बल से पर्वतों और दूसरें जण पदार्थों को आज्ञा देते थे और वह जड़ जैसे पर्वत आदि उनकी आज्ञा को सहर्ष स्विकार कर लेते थे। ऐसे ही एक ऋषि थे, पुलस्त्य ऋषि के पुत्र हुए विश्रवा, कालान्तर में जिनके वंश में कुबेर एवं रावण आदि ने जन्म लिया तथा राक्षस जाति को आगे बढ़ाया। पुलस्त्य ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की नौ कन्याओं में से एक से हुआ जिनका नाम हविर्भू था। यह कर्दप ऋषि भारत में नहीं रहते थें यह आज के आधुनिक देश जिसको आस्ट्रेलिया के नाम से जानते है वहां के रहने वाले थे। पुलस्त ऋषि वहां पर धर्म प्रचार करने गये थे जहां पर उनकी मुलाकात कर्दप ऋषि की कन्या हविर्भी से हुआ जिससे उन्होने शादी की जिनसे दो ऋषि पुत्र हुए- महर्षि अगस्त्य एवं विश्रवा। विश्रवा की दो पत्नियाँ थीं - एक थी राक्षस सुमाली एवं राक्षसी ताड़का की पुत्री कैकसी, जिससे रावण, कुम्भकर्ण तथा विभीषण उत्पन्न हुए, तथा दूसरी थी इलाविडा- जिसके कुबेर उत्पन्न हुए। इलाविडा चक्रवर्ती सम्राट तृणबिन्दु की अलामबुशा नामक अप्सरा से उत्पन्न पुत्री थी। ये वैवस्वत मनु श्राद्धदेव के वंशावली की कड़ी थे।
यह मनु ही सर्वप्रथ इस पृथ्वी पर सप्त ऋषयों के साथ अवतरित हुए, अर्थात मंगल ग्रह से अपने स्पैसक्राफ्ट में चल कर यहां पृथ्वी के हिमालय के शिखर पर उतरे।
और यहां पर अपनी मनव कलोनीयों को बसाया। जिसमें सबसे पहले उन्होंन अपनी प्रयोग शाला बनाई और क्लोन की बिधी से युवा मानव के साथ सभी जीवों को तैयार किया और इसके साथ ही यहा पृथ्वी पर मनुष्य युग का प्रारंभ किया। इसके पहले यहां पृथ्वी पर डायना सुर आदि विसाल जीव। रहते थे जब मानव ने यहां रहना प्रारंभ किया तो उसने सभी बड़े और खतरनाक जीवों को यहां पृथ्वी पर से समाप्त कर दिया।
जैसा कि आज के वैज्ञानिक प्रयाश कर रहें है। मंगल आदि ग्रहों पर जा कर वहां अपनी कालोनि बसाने की योजना पर काम कर रहें है। अगले कुछ एक सालों में मानव मंगल ग्रह पर जा कर रहने लगेगा। क्योंकि यह पृथ्वी ज्यादा समय तक मनव के रहने के योग्य नहीं रहगी इसका अनुमान वैज्ञानिको को हो चुका है।
एक प्रश्न और उठता है कि मानव से पहले यहां पृथ्वी पर दूसरे खतरना जीव कहां से आयें। इसका उत्तर यह है कि इन विशाल जीवों को मनव से पहले यहां पर कृतिम रूप से तैयार करके दुसरे ग्र से प्रत्यारोपित किया गया गया था कि वह इस पृथ्वी को मानव के रहने के योग्य बनाये। यहां वायु मंडल को शुद्ध करने के लिये।
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