रविवार, 31 जुलाई 2022

कथासरित्सागर भाग 1.2



कथासरित्सागर भाग 1.2

गतांक से आगे.......


      इस प्रकार से कह कर वररुचि ने फिर यह वर्णन किया कि समय पाकर योग से बना हुया राजा नन्द कामादि के वशीभूत होकर मतवाले हाथी के समान किसी की अपेक्षा न करने लगा एका एकी आई हुई लक्ष्मी किसको नही मोहित करती है। इसके उपरान्त मैंने विचार किया कि राजा तो उदंड हो गया है, और उसके कार्यों को विचार कर मेरा धर्म भी नहीं सधता इसलिये सहायता के लिये शकटाल को निकलवाऊं तो अच्छा होगा। जो वह विरुद्ध करना चाहेगा तो मेरे होते हुए, वह कुछ नहीं कर सकता है, ऐसा निश्चय करके मैंने राजा से प्रार्थना करके शकटाल को कुए में से निकलवाया। क्योकि बाह्मण लोग बड़े कोमल होते हैं। कुए से निकले हुए शकटाल ने यह विचारा कि जब तक वररुचि है तब तक इस राजा को कोई नहीं जीत सका इससे समय का इन्तजार करने के लिये वेत के समान नम्रवृत्ती को अख्तियार करूं, ऐसा-शोचकर बुद्धिमान् शकटाल फिर मन्त्री होकर मेरी इच्छा के अनुसार राज्य के कार्य करने लगा। एक समय राजा नगर से बाहर सैर करने को गया था, वहां उसने गंगा जी के भीतर से निकला हुआ, एक ऐसा हाथ देखा जिसकी पांचो उंगली मिली हुई थीं, उसे देख कर उसने मुझे बुला कर पूछा कि यह क्या है? मैंने उस हाथ की तरफ अपनी दो उंगली उठाई उन उंगलियों को देखकर वह हाथ अन्तध्यान हो गया। फिर राजा ने मुझसे भावर्थ पूर्वक पूछा कि बताओ यह क्या था? तब मैंने कहा कि इस हाथ का यह अभिप्राय था कि इस संसार में पांच आदमी मिल कर कौनसी बात नहीं सिद्ध कर सक्ते हैं? तब मैंने दो उंगली इस अभिप्राय से दिखलाई कि दोही के एकचित्त हो जाने पर कोई बात असाध्य नहीं होती है। इस छिपे हुए विज्ञान को सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ, और शकटाल मेरी दुर्जय बुद्धि को देखकर अप्रसन्न हुआ। एक समय राजा ने देखा कि उसकी रानी झरोखे से किसी ऊपर शिर उठाने वाले अतिथि ब्राह्मण को देख रही है। इतनी ही बात से क्रोधित होकर राजा ने उस ब्राह्मण के मार डालने का हुक्म दिया। क्योंकि वह किसी से विचार नहीं करता है, उस ब्राह्मण को मारने के लिये, ले जाते हुए देख कर बाजार में रखी हुई मरी मछली भी हँसने लगी। राजा ने यह देख कर उस ब्राह्मण का मारना उस दिन बन्द करवा दिया। और मुझे बुला कर उस मछली के हंसने का कारण पूँछा। मैंने कहा कि शोच कर इसका उत्तर दूंगा, यह कह कर एकान्त में ध्यान करते हुए सरस्वती जी ने, मुझसे कहा कि रात्रि के समय तुम इस ताड़ के वृक्ष के ऊपर छिप कर बैठो, तो यहाँ तुम्हें निस्सन्देह इस मछली के हँसने का कारण सुनाई पड़ेगा। यह सुन कर मैं रात्रि के समय उस ताड़ के वृक्ष के ऊपर बैठा, तो वहां अपने छोटे २ बालकों को साथ लिये एक बड़ी घोर राक्षसी आई भोजन मांगते हुए अपने बालकों से उसने कहा कि ठहर जायो मैं प्रातःकाल तुम्हें ब्राह्मणका मांस दूंगी। क्योंकि आज वह मारा नहीं गया है, बालकों ने पूँछा वह क्यों नहीं मारा गया, तो उसने कहा कि उसे देख कर मरी हुई मछली हंसने लगी थी। लड़कों ने पूँछा कि वह मछली क्यों हँसी थी, तब उस राक्षसी ने कहा कि राजा की सब रानियां बिगड़ गई हैं। सब महलों में स्त्रीयों का वेष किये पुरुष रहते हैं। और निरपराध ब्राह्मण मारा जाता है। इसलिये मछली, किसी राजा के अत्यन्त विचार रहित होने से जब जीव हँसते हैं तब सब महलों के रहने वालों की यही दशा होती है। उसका यह वचन सुन कर वहां से मैं चला आया, और प्रातःकाल राजा के पास आकर उस मछली के हंसने का कारण बतलाया। तब राजा महलों में गया, और स्त्री रुपधारी पुरुषों को पाकर मेरे ऊपर बहुत प्रसन्न हुआ। और ब्राह्मण को वध से छुड़वा दिया, राजा की ऐसी  करतूत देखकर मैं बहुत खिन्न रहता था।

    एकसमय वहां कोई नवीन तसवीर बनाने वाला आया, और उसने राजा के साथ उनकी पटरानी इन दोनों की एक तसवीर बनाई, वह तसवीर ऐसी उत्तम बनी कि वाणी और चेष्टा के न होने पर भी जीवती हुई सी मालूम होती थी। राजा ने प्रसन्न होकर उस तसवीर वाले को बहुत सा धन दिया और वह तसवीर अपने घर में दीवार पर लगवाली । एक समय राजा के घर में जाकर मैंने तसवीर में लिखी हुई सब लक्षणों से भरी हुई, राजा की रानी देखी और उसके दूसरे लक्षणों के सम्बन्ध से और अपनी समझ से उसकी कमर में एकतिल बना दिया। इससे उसके लक्षणों को पूरा करके मैं वहां से चला आया, इस के उपरान्त राजा ने वहां जाकर वह मेरे द्वारा बनाया गया रानी के कमर में तील को देखा। और सेवकों से पूछा कि यह किसने बनाया है? उन लोगों ने तिल का बनाने वाला मुझे बतलाया राजा ने शोचा, कि रानी के गुप्त स्थान के इस तिल को मेरे सिवाय और कौन जान सकता है? इसको वररुचि कैसे जान गया? मालूम होता है कि इसने छिप कर मेरे महलों को विगाड़ रहा है, इसी से वहां उसने स्त्री रूपधारी पुरुष देखे यह शोच कर राजा को बड़ा क्रोध हुआ ( ठीक है मूर्खो के विचार भी मूर्खता के ही होते हैं) इसके उपरान्त राजा ने एकान्त में बुलाकर शकटाल से कहा कि तुम वररुचि को मरवा डालो। क्योंकि इसने महलों को बिगाड़ा है, शकटाल ने कहा कि जैसा आपका हुक्म है, वैसा ही करूंगा यह कह कर बाहर चला आया, और शोचने लगा कि मैं वररुचि को नहीं मार सक्ता हूं। क्योंकि वह बड़ा बुद्धिमान है और उसी ने मुझे आपत्तियों से छुड़ाया है, और वह ब्राह्मण भी है, इससे तो यह अच्छा होगा, कि में उसे छिपाकर अपने यहां रख लू, ऐसा विचार कर शकटाल ने राजा के कोप का कारण और वध का हुक्म वररुचि से कहा और फिर बोला कि मैं कहने सुनने के लिये और किसी को मार डालता हूं। तुम छिप कर मेरे यहा रहो, नहीं तो राजा मेरे ऊपर भी खफा होगा। उसके यह वचन सुनकर मैं छिप कर उसके घर में रहने लगा। और उसने मेरे नाम से रात्रि के समय किसी और को मार डाला। तव इस प्रकार नीति करने वाले शक्टाल से मैंने कहा कि तुम बड़े योग्य मंत्री हो। क्योकि तुमने मेरे मारने की तदबीर नहीं की, एक राक्षस मेरा परम मित्र है, इससे कोई मुझे मार नहीं सक्ता, जो मैं ध्यान करके उसे बुलाऊं और चाहूं तो वह सब संसार का नाश कर देवे। और राजा को मैं इसलिये नहीं मरवाता हूं कि वह मेरा मित्र है, और एक बाह्मण है, यह सुनकर शकटाल ने कहा कि मुझे उस राक्षस को दिखायो तब मैंने ध्यान से उसे बुलाया, और वह शकटाल उस राक्षस को देख कर डरगया। और आश्चर्य युक्त हुआ। राक्षस के चले जाने पर शकटाल ने फिर मुझसे पूछा कि तुम्हारी मित्रता राक्षस के साथ कैसे हुई, तब मैंने कहा कि एक समय एक नगर की रक्षा के लिये घूमता हुआ, एक पुरुष हर रात्रि में मर जाता था। यह बात सुन कर राजा ने मुझको नगर की रक्षा के लिये भेजा, मैंने घूमते रात्रि के समय एक राक्षस को देखा और उसने मुझसे पूछा कि बताओ इस नगर में कौन सी स्त्री बड़ी रूपवती है। तब मैंने हँस कर कहा कि है, जिसको जो स्त्री अच्छी लगे, वही उसको रूपवती है। यह सुनकर राक्षस बोला कि केवल तुम ने मुझे जीत लिया, मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे देने के कारण, बध से वचे हुए, मुझ से फिर वह राक्षस बोला कि मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूं। तुम मेरे मित्र हो गये हो। जब तुम मुझे याद करोगे, तभी मैं आऊंगा। यह कह कर राक्षस के अन्तर्ध्यान हो जाने पर मैं ज्यों का त्यों अपने घर को लौट आया। इस प्रकार से यह राक्षस मेरा मित्र हुया है। इसके उपरान्त शकटाल की प्रार्थना से ध्यान से आई हुई श्रीगंगा जी का दर्शन मैंने शकटाल को कराया, और फिर स्तुतियों से गंगा जी को प्रसन्न करके विदा किया। मेरी इन बातों को देख कर शकटाल भी मेरा बड़ा सहायक हो गया।

    एक समय एकान्त में उदासीन बैठे हुए मुझ से शकटाल बोला कि तुम सर्वज्ञ हो कर भी इतना खेद क्यों किया करते हो, क्या तुम नहीं जानते हो? कि राजा लोगों की बुद्धि में विचार नहीं होता। थोड़े दिनो में तुम्हारा यह कलंक छूट जायेगा। इस बात पर मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं, पहले इस नगर में, आदित्यवर्मा नाम का एक राजा था और शिववर्मा नाम का बड़ा बुद्धिमान् उसका मंत्री था। एक समय उस राजा की एकरानी गर्भवती हुई, यह सुन कर राजा ने अपने महल के रक्षकों से पूछा कि दो वर्ष से मैं महलों में नहीं गया हूं। यह गर्भ कहां से आया? तब वह लोग बोले कि हे राजा शिववर्मा,नाम के मंत्री के सिवाय यहां और कोई पुरुष नहीं आता है, यह सुन कर राजा ने विचारा कि निस्सन्देह यह मंत्री ही मेरा वैरी है, परन्तु जो मैं इसे जाहिर में मरवा डालुंगा, तो दुनिया में मेरी बदनामी होगी। यह विचार कर उस राजा ने शिववर्मा को भोगवर्मा नाम के एक अपने मित्र राजा के यहां भेज दिया। और पीछे से एक सलाहकार के हाथ एक चिट्ठी भेजी, जिसमें कि शिववर्मा के मार डालने का संदेशा लिखा था। मंत्री के चले जाने के सात दिन पीछे, वह रानी स्त्री वेष धारी किसी पुरुष के साथ भागी चली जा रही थी। वह राजा के आदमियों को मिली, और वह उसे पकड़ लाये। राजा ने यह देख सुन कर बड़ा पश्चात्ताप किया, और कहा कि देखो मैंने निष्कारण ऐसा बड़ा बुद्धिमान मंत्री नाहक मररवा डाला।। 

     इसी बीच में शिववर्मा और राजा का सलाहकार राजा भोगवर्मा के यहां पहुंचे, राजा ने उस चिट्ठी को पढ़ कर शिववर्मा से कहा कि तुम्हारे मारने का हुक्म आया है। यह सुन कर शिववर्मा बोला कि आप मुझे मरवा डालिये, नही तो मैं खुद मर जाऊंगा। तब राजा बड़े आश्चर्य पूर्वक शिववर्मा से बोला कि तुम्हें हमारी कसम है, तुम सत्य २ बताओ कि इसका क्या कारण है? मंत्री ने कहा कि हे राजा जिस राज्य में मैं मारा जाऊंगा, उस राज्य में बारह वर्ष तक पानी नहीं वरसेगा। यह सुन कर भोगवर्मा ने अपने मंत्रियों के साथ सलाह की, कि वह दुष्ट राजा हमारा राज्य नष्ट करना चाहता है। क्या उसके राज्य में छिप कर मारने वाले न थे? इससे इस मंत्री को मारना न चाहिये, यह सलाह करके भोगवर्मा ने शिववर्मा को रक्षकों के साथ अपने देश से उसी समय भेज दिया। इस प्रकार वह मंत्री अपनी बुद्धि के बल से लौट आया, और उसका कलंक भी छुट गया। (क्योंकि धर्म मिथ्या नहीं होता) इससे हे वररुचि इसी प्रकार से तुम्हारा भी कलंक छुट जायगा। तुम हमारे घर में रहा करो, कुछ दिन में तुम्हारे बिना भी इस राजा को पश्चताप होगा। शकटाल के ऐसे वचन सुन कर मैं उसके यहां रह कर समय की बाट देखता हुआ दिन विताने लगा। इसके उपरान्त हे काणभूत योग से बने हुए राजानन्द का हिरण्यगुम नाम पुत्र शिकार खेलने को गया घोड़े के वेग से बहुत दूर निकल जाने पर उस अकेले राजपुत्र को वन ही में सायंकाल हो गया। तब रात्रि के व्यतीत करने को वह राजा का पुत्र किसी वृक्ष पर चढ़ गया, उसी समय उस वृक्ष पर किसी सिंह से भगाया हुया, एक भालु भी चढ़ा गया, उस रीछ ने अपने से डरे हुए राजपुत्र से मनुष्य भाषा में कहा कि तुम मत डरो, तुम हमारे मित्र हो रीक्ष के ऐसे वचनों को सुन कर विश्वास से जब राजा का पुत्र सो गया। और रीछ जागता रहा, तब नीचे खड़े हुए सिंह ने कहा कि हे रीक्ष तू इस मनुष्य को नीचे पेड़ से डाल दे, मैं इसे लेकर चला जाऊंगा। यह सुन कर रीक्ष ने कहा कि मैं मित्र के साथ विश्वासघात नहीं करूंगा। इसके उपरान्त जब रीक्ष के सोने की और राजाके पुत्र के जागने की बारी आई, तब फिर सिंह ने राजा के पुत्र से कहा कि हे मनुष्य इस रीक्ष को नीचे डाल दे, यह सुन कर अपने डरसे और सिंह को प्रसन्न करने के लिये राजपुत्र उस रीक्ष को ढकेलने लगा। भाग्यवश से रीक्ष गिरा तो नहीं, किन्तु जग पड़ा, और जग कर यह शाप दिया, कि हे मित्र द्रोही तू सिड़ी हो जायगा। और शाप की यह अवधि कर दी कि जब तक तू इस वृत्तान्त को नहीं सुनेगा तब तक सिड़ी रहेगा। इसके उपरान्त प्रातःकाल राजा का पुत्र अपने घर में आकर सिड़ी हो गया। और राजानन्द को यह देख कर बड़ा दुःख हो गया। राजा ने कहा कि इस समय जो वररुचि जीता होता, तो इसके सिड़ी होने का सम्पूर्ण कारण मालूम हो जाता। धिकार है मेरी  मुर्खता पर मैंने नाहक उसे मरवाया। राजा का यह वचन सुन कर शकटाल ने यह विचारा किया कि वररुचि के प्रकट करने का यह मौका है। क्योंकि वररुचि तो अब यहां रहेगा नहीं। और राजा का मेरे ऊपर विश्वास बढ़ जायंगा। ऐसा शोच कर राजा से अभय मांग कर शकटाल बोला कि हे राजा खेद मत करो वररुचि अभी जीता है। यह सुन कर राजाने कहा कि जल्दी उसे लाओ तब शकटाल मुझे बड़े हठ से राजा के पास ले गया। वहाँ जाकर राजा के पुत्र के सिड़ी होने का सब वृत्तान्त सरस्वती जी की कृपा से मैंने जान लिया। और इसने मित्र के साथ द्रोह किया है। यह कह कर वह सव वृत्तान्त राजा से भी कह दिया। इसके आनन्तर शाप के छुट जाने पर राजा के पुत्र ने मेरी बड़ी स्तुति की। और राजा ने मुझ से पूछा कि तुमने यह वृत्तान्त कैसे जाना? तब मैंने कहा कि हे राजा लक्षण अनुमान और सूझ बूझ से बुद्धिमान लोग सव बातों को जान लेते हैं। जैसे कि मैंने तुम्हारी रानी की कमर का तिल जान लिया था। मेरे इस वचन से राजा बहुत लज्जित होकर पछताने लगा। इसके उपरान्त राजा के आदर को छोड़ कर और कलंक के छुटजाने से अपने को कृतकृत्य मान कर मैं अपने स्थान पर चला आया। क्योंकि शुद्ध चरित ही विद्वान् लोगों का धन है, मेरे वहां से आ जाने पर सब लोग रोने लगे। और उपवर्ष मेरे सुसर ने मुझसे कहा तुझे राजा से मारा गया सुनकर उपकोशा आग में जल गई। और तुम्हारी माता का हृदय शोक से फट गया। यह सुन कर एकाएकी हुए शोक के वेग से मुझे मूर्क्षा आगई। और वायु से टूटे हुए वृक्ष के समान मैं पृथ्वी पर गिर पड़ा क्षण भर में उठ कर बड़ा विलाप करने लगा, क्योंकि प्यारे बन्धु श्री के शोक से उत्पन्न हुया शोक किस को सन्तप्त नहीं करता तब वर्ष उपाध्याय ने आकर मुझे समझाया कि इस जगत्में आवागमन पर्यन्त एक अनित्यता जो है वही नित्य है। तो तुम ईश्वर की इस माया को जान कर भी क्यों मोहित होते हो? तत्त्व का वोध कराने वाले वर्ष उपाध्याय के इन वचनों ने मुझे कुछ धैर्य दिया। इसके उपरान्त वैराग्य से सम्पूर्ण संसारी, बन्धनों को छोड़ कर मैं तपोवन को चला गया, कुछ दिनो के, व्यतीत होने पर उस तपोवन में अयोध्या से एक ब्राह्मण आया, और उससे मैंने योग से बने हुए राजानन्द का वृत्तान्त पूंछा, उसने मुझे पहचान कर बड़े शोक से कहा कि राजानन्द का वृत्तान्त सुनिये तुम्हारे वहां से चले आने पर शकटाल को बहुत दिन के बाद मौका मिला। तब वह राजा के मारने का उपाय शोचने लगा, एकदिन मन्त्री ने रास्ते में पृथ्वी को खोदते हुए किसी चाणक्य नाम ब्राह्मण को देख कर, उससे पूछा कि क्यों पृथ्वीको खोद रहे हो? तब उसने कहा कि यह कुश मेरे पैरों मे लग गया है, इससे इसको खोद रहा हूं। यह सुन कर, मन्त्री ने उस क्रोधी और क्रूर ब्राह्मण को ही राजा के मारने का उपाय समझा।  उसका नाम पूंछ कर मन्त्री ने कहा कि हे ब्राह्मण राजानन्द के यहां मैं तुझे त्रयोदशी के दिन, श्राद्ध भोजन करवाऊंगा। वहां तुझ को एकलाख अशर्फी, दक्षिणा में दिलवाऊंगा और सब ब्राह्मणों में मुख्य तुमको करूंगा। आओ तब तक हमारे घर में रहो। यह कह कर शकटाल उस चाणक्य को अपने घर लिवा लाया। और श्राद्ध वाले दिन राजा से उसकी मुलाकात करवाई, इस के उपरान्त चाणक्य श्राद्ध में जाकर सबके आगे बैठा, और सुबन्धु नाम के ब्राह्मण ने भी चाहा कि में सबका ब्राह्मण होऊं। तब शकटाल ने जाकर यह हाल राजा से कहा राजा ने हुक्म दिया कि और कोई ब्राह्मण योग्य नहीं है। सुबन्धु ब्राह्मण आगे बैठे। फिर शकटाल ने लौट कर बहुत भयपूर्वक चाणक्य से कहा, कि हे महाराज चाणक्य जी मेरा कोई अपराध नहीं है। राजा की ऐसी इच्छा है, यह सुन कर चाणक्य मारे क्रोधके जलने लगा, और उसने अपनी शिखा खोल कर यह प्रतिज्ञा करी कि मैं निस्संदेह सात दिन के भीतर इस राजा को मार डालूंगा। और तभी मेरा क्रोध शान्त हो जाने पर शिखा वांधुगा। 

 यह सुनकर राजानन्दके कुपित होने पर भागे हुए चाणक्य को शकटाल ने, अपने घर में छिपा कर रक्खा।  इसके पीछे शकटाल से सम्पूर्ण सामग्री को लेकर चाणक्य कहीं जाकर मृत्या नामक तंत्रीक (मारण प्रयोग) करने लगा। उसके प्रभाव से राजा को ज्वर आया, और सातवें दिन राजा मर गया। इसके उपरान्त शकटाल ने योग से बने हुए राजा नन्दके हिरण्यगर्भ नाम पुत्र को मार कर पहले राजा नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राज्यपर वैठा दिया। और वृहस्पति के समान बुद्धि वाले चाणक्य को चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाया। फिर योग से बने हुए राजानन्द से वैर का बदला लेकर पुत्रों के शोक से उदासीन होके, शकटाल वन को चला गया। उस ब्राह्मण के मुख से इस वृत्तांत को सुन कर मुझे संसार की चंचलता पर बड़ा खेद हुआ। और उसी खेद से मैं यहां विन्ध्यवासिनी के दर्शनों को चला आया। यहां भगवती की कृपा से तुमको देख कर अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो आया, और वह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। जिससे कि मैंने तुम्हारे आगे यह सम्पूर्ण महा कथा वर्णन की अब मेरे शाप का अन्त हो गया। मैं इस शरीर के त्याग करने का यत्न करुंगा। तुम यहां अभी कुछ दिन रहो, तुम्हारे पास वह गुणानाम ब्राह्मण अपने शिष्यों समेत आवेगा। जिसने कि तीन भाषाओं का बोलना छोड़ दिया है, वह महादेवजी का माल्यवान नाम गण है, उसे भगवती पार्वती जी ने मेरी शिफारिस करने के अपराध से शाप दिया था। उससे तुम यह सम्पूर्ण कथा कहना जिससे कि तुम्हारा और उसका दोनों का शाप छुट जायगा।  काणभूत को इस प्रकार समझा कर वररुचि अपने शरीर के त्याग करने के लिये महापवित्र बदरिकाश्रम को गया। मार्ग में जाते हुए, वररुचि ने केवल शाक खाने वाले मुनिको देखा, और वररुचिके सामने ही उस मुनि के हाथ में एक कुशा गड़ गया। तब उसके हाथ से रुधिर निकलता देख कर वररुचि ने अपने तप के प्रभाव से उसके अहंकार की परीक्षा के लिये उस रुधिर को शाक के रसके समान कर दिया। उसे देख कर मुनि को यह अभिमान हुआ, कि में सिद्ध हो गया है। तब वररुचि ने कुछ मुसकुरा के कहा कि मैंने तुम्हारी परीक्षा के लिये उसका रंग बदल दिया था। तुमने अभी तक अहंकार को नहीं छोड़ा, ज्ञान के मार्ग में अहंकार बड़ा कठिन विघ्न (रोक) है। ज्ञान के बिना सैकड़ों वर्ष तक तप करने से भी मोक्ष नहीं होता है। मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य नाश होने वाले स्वर्ग की लालच नहीं करते हैं। इससे हे मुनि अहंकार को छोड़ कर ज्ञान में यत्न करो। इस प्रकार उस मुनि को समझा कर वररुचि उस बदरिकाश्रम में पहुंचा। इसके उपरान्त बदरिकाश्रम में वररुचि अत्यन्त भक्ति से भक्तों की रक्षा करने वाली भगवती की शरण में अपने शरीर के त्याग करने की इच्छा से गया। तब प्रसन्न हुई भगवती ने साक्षात् दर्शन देकर अग्नि में शरीर भस्म करने का उपदेश दिया। इसके उपरान्त अपने शरीर को भस्म करके वररुचि अपने दिव्य शरीर को प्राप्त हुआ। और विन्ध्याचल की पृथ्वी पर काणभूत भी गुणाढ्य के मिलने की इच्छा करता हुया तप में लीन रहा १४१ ॥ .. .. 

इतिश्रीकथासरित्सागरभापायांकयापीठलंबकपंचमस्तरंगः॥

कथासरितसागर भाग-1.1

शनिवार, 30 जुलाई 2022

कथासरित्सागर भाग-1.1

 


  कथासरित्सागर भाग-1.1 

गतांक से आगे.......

            यह कह कर वररुचि एकाग्र मन से सुनने वाले काणभूत से फिर बोला, कि एकसमय अपने नित्य कार्यों को करके हमनें वर्ष नाम उपाध्याय से पूछा कि हे उपाध्याय किस कारण से इस पाटलिपुत्र नाम नगर के निवासी अत्यन्त धनवान और विद्वान होते हैं। सो आप कृपा करके वर्णन कीजिये, यह सुन कर उपाध्याय बोले कि हरद्वार में जो कनखल नाम अत्यन्तः पवित्र स्थान है, जिस तीर्थ में कांचनपात नाम दिग्गज उसी नगरी को तोड़ कर उस पर से श्रीगंगा जी को उतार लाया है, उसमें एक दक्षिणी ब्राह्मण अपनी स्त्री समेत तप करता था, उस बाह्मण के तीन पुत्र थे। समय पाकर जब वह ब्राह्मण स्त्री समेत मृत्यु को प्राप्त हुआ, तो उसके पुत्र विद्या पढ़ने की इच्छा से राजगृह नाम स्थान में जाकर विद्या पढ़ने लगे, और पढ़ कर किसी स्वामी के न होने से दुखि हो कर,  स्वामिकुमारके दर्शन करने को दक्षिण की ओर गये वहां समुद्र के तट पर चिंचिनी नाम नगरी में भोजिक नामक ब्राह्मण के घर में रहने लगे। उस बाह्मण की तीन कन्या थी, उसने अपनी तीनौ कन्याओं का विवाह इन तीनों से करके और अपना सब धन देके तप करने के निमित्त गंगा जी की यात्रा की, इसके उपरान्त सुसर के घर में रहते रहते हुए, उस देश में अवृष्टि के कारण बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा। इससे वहां तीनों ब्राह्मण अपनी - अपनी स्त्रियों को छोड़ कर दूसरे देशान्तर को चले गये। (क्योंकि कष्टों से पीड़ीत मनुष्यों के - हृदय में सम्बन्ध का स्नेह नहीं होता) और वह तीनों कन्या अपने पिता के मित्र किसी यज्ञदर्श नाम ब्राह्मण के घर में रहीं। उनमें से बीच वाली कन्या को गर्म भी था। समय पाकर उसको एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस बालक पर उन तीनौ का बहनों का स्नेह था, एक समय आकाश मार्ग में बिहार करते हुये महादेव जी की जंघे पर बैठी हुई, पार्वती जी उस बालक को देख कर दयापूर्वक बोली कि स्वामी दखो इस बालक पर यह तीनों स्त्रियां कैसा स्नेह करती हैं। और इनको यह आशा है कि यह हमारा पालन करेगा। सो हे स्वामी ऐसा करो जिससे कि यह पालक इनकी पालना करे, पार्वती जी के ऐसे दयायुक्त वचनों को सुनकर वरदाता भगवान महादेव जी बोले कि इस पर मैं अवश्य अनुग्रह करूंगा। क्योंकि पूर्वजन्म में इसने अंपनी 'स्त्री समेत मेरी बहुत आराधना की है। इसीलिये इसको यह जन्म भी दिया है, इसकी स्त्री महेन्द्र नामक राजा की पुत्री है, जो पाटली नाम से उत्पन्न हुई है, उसी से इसका विवाह भी होगा। 


   यह कह कर शिवजी ने उन पतिव्रता स्त्रियों को यह स्वप्न दिखाया कि तुम्हारे इस बालक का पुत्रक नाम है, यह जब शयन करके उठेगा, तब इसके सिरहाने में एक लाख अशर्फि प्रतिदिन मिलेंगी। और इसी से यह राजा होगा, इसके उपरान्त जब बालक सोते से उठा, तब वह स्त्रियां उस अशर्फियों के ढेर को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुई, इस प्रकार उन अशर्फियों से बड़ा भारी खजाना इकट्ठा हो गया। इसी से वह पुत्रक नाम लड़का राजा भी होगया। किसी समय उसके नाना का मित्र यज्ञदत्त एकान्त में उस बालक से बोला, कि हे राजन्,आपके पिता दुर्भिक्ष के कारण से दूसरे देशान्तर को चलेगये हैं। आप ब्राह्मणों को सदैव कुछ दान दिया कीजिये, जिसे सुन कर आपके पिताभी आजाएंगे। और मैं आप से इसी विषय में राजा ब्राह्मदत्त की कथा को कहता हुं, उसको सुनिये पूर्वकाल में काशीजी में ब्रह्मदत्त नाम का एक राजा हुआ, उस राजा ने रात्रि के समय आकाश में उड़ते हुये सैकड़ों राजहंसों से घिरे हुये दो सुवर्ण के हंसों को देखा, उनकी ऐसी शोभा थी कि मानों बिजली के समूह को स्वेत भेषों के समूह घेरे चले जाते हैं, राजा को इनको देखने की उत्कण्ठा ऐसी हुई कि राज्य के सब सुखों को भुल गया, और मन्त्रियों की सम्मति से एक बड़ा उत्तम तड़ाग बनवा कर, उस में सब जीवों के आने की बेरोंक आज्ञा दी, फिर समय पाकर वह दोनों हंस भी आये। राजा ने उनको आया हुआ देख कर विश्वास में लेके उन से पूँछा कि तुम्हारा शरीर सुवर्ण का क्यो है? यह सुन कर वह इस प्रकट वाणी से बोले कि हे राजन् पूर्वजन्म में हम दोनों काक थे, एक समय किसी निर्जन पवित्र शिवालय में भोजन के निमित्त लड़ते - लड़ते शिवालय की जलाधारी में गिर कर मर गये। और अब पूर्वजन्म के जानने वाले सुवर्ण के हंस हैं। उनके यह वचन सुन कर, और उन्हें अच्छे प्रकार से देख कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुया। इसी से में कहता हूं, कि जो आप कोई अपूर्व दान दिया करोगे तो आपके भी पिता उसके प्रभाव से आपको मिलेंगे। इस प्रकार यज्ञदत्त से सुनकर पुत्रक ने उसी प्रकार दान देने से दान की प्रसिद्धी को सुन कर उसके पिता भी वहां आगये। और पहचान लिये गये, तब पुत्रक ने उनको बड़े आदर पूर्वक धन देकर उनको रखा। (भाग्य से आपत्तियों का नाश हो जाने पर भी अविवेक से अन्धबुद्धि वाले दुष्टों का स्वभाव नहीं जाता है यह आश्चर्य है) एक समय उसके पितादिक राज्य पाने की इच्छा से उस पुत्रक नाम अपने पुत्र को मारने की इच्छा करके उसे विन्ध्यवासिनी के दर्शन के बहाने वहां लेगयें, और बधिकों को देवी के मन्दिर में स्थापित करके पुत्र से बोले कि पहले तुम अकेले ही देवी के मन्दिर में दर्शन करने जाओ, उसने उनके विश्वास से भीतर जाकर मारने को उद्युक्त हुये, उसने पुरुषों से पुंछा कि तुम लोग मुझे क्यों मारते हो? बधिक बोले, कि तुम्हारे पिता और चाचाओं ने सुवर्ण देकर हमको तुम्हारे मारने को यहां रखा है, इसके उपरान्त देवी की कृपा से मोहित हुए वधिकों से पुत्रक ने कहा कि यह संपूर्ण सुुवर्ण जड़ित में आभुषण ले कर मुझे छोड़ दे।

      संपूर्ण स्वर्ण जड़ित मेरे आभूषण लेकर, मुझे छोड़े दों। मैं इस बात की चर्चा किसी से नहीं कहूँगा, और कहीं दूर चला जाऊँगा। तव वधिक लोगों ने उसके सब आभूषण ले लिये, और उसके पिता से कह दिया कि हमने पुत्रक की हत्या कर दिया। फिर वहाँ से लौट कर गये हुए, राज्य के चाहने वाले उसके पितार्दिकों को मन्त्रियों ने द्रोही जान कर मार डाला (क्योंकि कृतघ्नियों को कल्याण कैसें हो सकता है) । इसी बीच में वह सत्यव्रती राजा पुत्रक सभी अपने बन्धुओ से विरक्त होकर विन्ध्याचल के वन में चला गया। और वहां जाकर घूमते घूमते, पुत्रक ने मल्ल युद्ध करते हुये दो पुरुषों को देख कर उनसे पूछा कि तुम कौन हों? उन दोनों ने कहा कि हम दोनों मयासुर के पुत्र हैं, और एक पात्र एक दंड तथा दो पादुका यही हमारे पिता का धन है, इसी धन के लिये हम दोनों लड़ रहें हैं। जो अधिक बलवान होगा वह छीन लेगा, उनके यह वचन सुन कर, पुत्रक ने हँसकर कहा कि यह कितना धन है? जिसके लिये तुम लड़ते हों, तब वह बोले कि इन खड़ाउंओं के पहनने से आकाश में उड़ जाने की सामर्थ्य प्राप्त होती है। इस दंड से जो लिख दिया जाता है, वह सत्य हो जाता है। और इस पात्र में जिस भोजन की इच्छा करो वही प्राप्त हो जाता है। यह वचन सुन कर पुत्रक ने कहा कि युद्ध से क्या प्रयोजन है? यह प्रतिज्ञा करो कि दौड़ने से जो आगे निकल जाये, वही इस धन को पावे इस बात को मानकर वह दोनों मूर्ख दौड़े, और पुत्रक भी खड़ाउँओं पर चढ़ कर दंड और पात्र को लेकर आकाश को उड़ गया । इसके उपरान्त क्षण भर में बहुत दूर जाकर आकर्पिका नाम सुन्दर नगरी को देख कर आकाश से पुत्रक उतरा और यह विचारने लगा, कि वेश्यावंचक होती हैं ब्राह्मण हमारे पिताके समान होते हैं। और वैश्य धन के लोभी होते हैं, तो मुझे कहा रहना चाहिये? ऐसा विचार करते २ किसी निर्जन टूटे फूटे घर में एक वृद्धा स्त्री को उसने देखा, तब उसे कुछ देकर प्रसन्न करके उसी टूटे-फूटे घर में गुप्त होकर रहने लगा। एक समय उस वृद्धा ने पुत्रक के स्वरूप को देख प्रसन्न होकर उससे कहा हे पुत्र मुझे यह बड़ी चिन्ता है, कि तुम्हारे योग्य स्त्री कहीं नहीं है। यहां के राजा की कन्या का नाम पाटली है, वह तेरे योग्य है, परन्तु महलों में रत्न के समान उसकी चौकसी की जाती है। वृद्धा के ऐसे वचन सुनकर उसके चित्त में कामदेव की बाधा हुई, तो विचार किया कि आज उसको अवश्य देखूंगा। यह निश्चय करके, रात्रि के समय खड़ाऊं पहन कर आकाश मार्ग से वह चला, और पर्वत के शिखर के समान ऊंचे झरोखें में से प्रवेश करके महल में सोती हुई उस पाटली को देखा। उसकी ऐसी शोभा थी कि वह स्त्री नहीं है मानों सम्पूर्ण संसार को जीत कर थकी हुई कामदेव की शक्ति शरीर में लगी हुई चन्द्रिका से सेवन की जाती है। उसे सोती हुई देखकर पुत्रक ने सोचा कि इसे कैसे जगाऊँ? उसी समय अकस्मात किसी पहरुए ने यह दोहा पढ़ा। 

दोहा । अलस दृष्टियुत कामिनी आलिंगन करिजौन । 

         रहसि जगावे तरुण जन जन्मकेरिफल तीन ।

    इसको सुनकर कांपते हुए अंगों से उस परम सुन्दरी राजपुत्री का उसने आलिंगन किया, और वह जाग गइ, तब उस राजपुत्र को देख कर लज्जा तथा आश्चर्य से उस राज पुत्री की दृष्टि चकित हो गई। इसके उपरांत वार्तालाप करने पर इनका गन्धर्व विवाह हो गया। और उन दोनों की प्रीति परस्पर अत्यन्त बढ़ी फिर रात्रि के व्यतित हो जाने पर, राजपुत्री से पूछ कर पुत्रक उस वृद्धा के घर में फिर लौटा आया इस प्रकार वह हर रात्रि में वहां जाने आने लगा। एक समय रक्षकों ने पाटली के संभोग चिह्नोंको देखकर, उस के पिता से कहा तब राजा ने भी एक स्त्री को छिपाकर उसको पहचानने के लिये महल में रक्खा ।

      उस स्त्री ने जब पुत्रक सो गया तब पहचानने के लिये उसके वस्त्र में महावर लगा दी, प्रातःकाल उसके-कहने से राजा ने दूत भेजे, और उसी पहचान से दूत उसे पकड़ कर राजाके निकट ले आये, राजा को क्रोधित देख कर पुत्रक खड़ाऊ पहन कर आकाश में उड़ा, और पाटली को महल में पाकर बोला, कि हमको राजा ने जान लिया है, अब चलो हम दोनों खड़ाउँओं के बल से उड़ चले, यह कहकर पाटली को गोद में लेकर उड़ गया। इसके उपरान्त गंगा जी के तट पर आकाश से उतर कर थकी हुई प्रिया को उसी पात्र के द्वारा उत्पन्न हुए, भोजनों के प्रकारो से प्रसन्न किया। इस प्रकार के अद्भुत प्रभाव को देखकर पाटली ने प्रार्थना की, तब पुत्रक ने उस दंड से चतुरंगिणी सेना समेत एक नगर लिखा। उस नगर के सत्य हो जाने पर पुत्रक ने उसमें राज्य किया। और अपने श्वशुर से मिलकर धीरे २ वह सम्पूर्ण पृथ्वी भर का राजा हो गया। इसी से यह नगर लक्ष्मी सरस्वती का क्षेत्र विख्यात होकर अत्यन्त धनवान् तथा विद्यावान् पुरवासियों समेत माया से रचा हुआ है। और पाटली रानी के कारण से इसका नाम पाटलिपुत्र (पटना) रखा गया है। इस प्रकार उपाध्याय के मुख से इस अर्थपूर्व कथा को सुन कर हमारे चित्त में बहुत काल तक आश्चर्य और आनन्द बढ़ता रहा । 

।। इतिश्रीकथासरित्सागरंभापायांकथापीठलम्वकेतृतीयस्तरङ्गः ३॥ 

     इसप्रकार काणभूत से वीच में इस कथा को कहकर वररुचि फिर अपनी कथा कहने लगा-इस रीति से व्याड़ि और इन्द्रदत्त के साथ धीरे २ सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ कर मैं तरुण अवस्था को प्राप्त हुआ, एक समय हम सब लोग इन्दोत्सव नाम मेले को देखने गये थे वहां काम के शत्रु के समान एक कन्या को देख कर, मैंने इन्ददत्त से पूछा, कि यह कौन है? उसने कहा कि यह उप वर्ष की लड़की उपकोशा नाम है। इतने ही में उस कन्या ने भी अपनी सखियों से मेरा परिचय पूछा, और मेरे मन को खैचे हुए, अपने घर को चली गई। उस का मुखारविन्द पूर्ण चन्द्रमा के समान नेत्र नीलकमल के समान भुजा कमल की दण्डी के समान, स्तन बड़े ग्रीवा शंख के समान, और ओष्ठ मूंगे के समान थे। उसका कहां तक वर्णन किया जाये, मानों वह कामरूपी राजा की सौन्दर्यरूपी मन्दिर की दूसरी लक्ष्मी ही थी। इसके उपरान्त काम के वाणों से मेरा हृदय छिदने लगा। और उस रात्रि को उसके ध्यान में मुझे अच्छी प्रकार निद्रा भी, न-आई जब बड़े कष्ट से कुछ निद्रा आई तो यह स्वप्न दिखाई पड़ा, कि स्वेत वस्त्र धारण किये हुए, कोई स्री मुझसे यह कह रही है, कि हे पुत्र यह उपकोशा तेरी पूर्वजन्म की स्त्री है। तेरे सिवाय और किसी की उसको कामना नहीं है। इससे चिन्ता मत करो, और मैं तेरे शरीर के भीतर रहने वाली सरस्वती हूं मुझसे तेरा दुःख देखा नहीं जाता है।यह कह कर वह अंतध्यान होगई। तब मेरी निद्रा खुल गई, और मैं विश्वास युक्त होकर अपनी प्रिया के घरके समीप एक छोटेसे आम के वृक्ष के नीचे बैठा उसके ख्याल में मग्न था। इसके उपरान्त एक सखी ने आकर मुझसे  कहा कि उपकोशा भी तुम्हारे निमित्त काम से पीड़ित हो रही है। तब मैंने उससे कहा कि उसके पिता की आज्ञा के बिना में उपकोशा को कैसे स्वीकार कर सक्ता हूं, क्योकि इस संसार में अपयश से मौत अच्छी है। जो इस बात को उपकोशा के घर वाले जान जाये, तो बहुत अच्छा है। इसलिये तुम ऐसा ही करो जिससे मेरा और तुम्हारी सखी के प्राण बचें, यह सुन कर उसने सम्पूर्ण वृचान्त उपकोशा की-माता से कहा उसने अपने पति उपवर्ष से कहा उपवर्ष ने-अपने भाई वर्ष से कहा और वर्ष ने उस बातको स्वीकार किया। विवाह के समय ठहर जाने पर वर्ष उपाध्याय की आज्ञा से व्याड़ि मेरी माता को कौशाम्बी नगरी से वुला लाया। इसके उपरान्त उपवर्ष ने विधिपूर्वक उपकोशा नाम की कन्या का दान करके मुझे दे दी। तब मैं सुख चैन से अपनी माता और स्त्री समेत वहीं निवास करने लगा। इसके पीछे समय पाकर वर्ष उपाध्याय के बहुत से शिष्य बढ़ गये, उनमें से एक पाणिनि नाम का शिष्य बड़ा मूर्ख था, वह सेवा करने से बहुत घबरा कर वर्ष की स्त्री का भेजा हुआ विद्या की कामना से तप करने के लिए हिमालय पर्वत पर चला गया। वहां बड़े तप से प्रसन्न हुए महादेव जी ने-सम्पूर्ण विद्याओं का मुखरूप नवीन व्याकरण उसे दिया। उस विद्या को पाकर लौटे हुए पाणिनि ने शास्त्रार्थ करने के लिये मुझे बुलाया। तब हम लोगो के शास्त्रार्थ करते २ सात दिन व्यतीत होगये आठवें दिन मैंने पाणिनि को जीत लिया तब - आकाश में स्थित हुए शिवजी ने बड़ा घोर हुँकार किया, उससे हम लोग सम्पूर्ण वेद व्याकरण भूल गये। और पाणिनि ने हम लोगों को जीतलिया। तदनन्तर मैंने बहुत लज्जित होकर अपना सम्पूर्ण धन हिरण्यगुम नाम वणिये के यहाँ घरके खर्च के निर्वाह के लिये रख दिया। और यह बात उपकोशा को बताया, कि मैं तप से श्री शिवजी की आराधना करने के हिमालय पर जा रहा हूं। और तब उपकोशा भी मेरे कल्याण की इच्छा से नित्य नियम पूर्वक श्री गंगाजी का स्नान करके, अपने घर में रहा करती थी। एक समय वसन्त ऋतू में अत्यन्त दुर्वल शरीवाली पांडुवर्ण युक्त चन्द्रमा की कला के समान मनुष्यो के नेत्रों को आनन्द देनेवाली उपकोशा गंगाजी के स्नान करने को चली जारही थी, बीच में राजा के पुरोहित ने, कोतवाल ने, और मन्त्री के पुत्र ने, इसको देखा तो उसी समय से वह तीनों काम के वशीभूत हो गये। और उसने भी उस दिन स्नान करने में अधिक देर लगाई। जब वह लौटी तो सांयकाल के समय मन्त्री के बेटे ने हठ करके उसको रोका उसने भी अपने हिम्मत को जोड़ कर उससे यह कहा कि मेरी भी पहले ही से यह इच्छा थी। परन्तु मैं अच्छे कुल में उत्पन्न हुई हूं, और मेरा पति परदेश गया है, इस से में डरती हूं, कि जो कोई देखले तो मेरी और तेरी दोनों की बुराई होगी। इससे जव वसन्त का उत्सव देखने को लोग चले जायें, तब एक पहर रात्रि गये तुम मेरे घर आना। यह कह कर जैसे ही वह आगे को चली वैसे ही पुरोहित ने उसको पकड़ा, पुरोहित से भी उसने वही बात कह कर रात्रि के दूसरे पहर का संकेत कर दिया। उससे भी जब किसी प्रकार छूट कर चली तो कोतवाल ने रोका, उससे भी उसने वही बात कह कर रात्रि के तीसरे पहर का वादा कर दिया, इस प्रकार भाग्य वश से उसके हाथ से भी छूट कर घर में आई। और अपनी सखी से सलाह करने लगी कि रूप के लोभ से मतवाले पुरुषों के घूरनेके बनिस्वत पति के परदेश जाने पर कुलीन स्त्री का मर जाना ही वेहतर है। इस प्रकार से शोचती और मेरा स्मरण करती हुई 'उपकोशा ने उस दिन न भोजन किया न-रात्रि को सोई प्रातःकाल ब्राह्मणों के पूजन के निमित्त धन लेने के लिये हिरण्यगुप्त वणिये के यहां अपनी दासी भेजी तब उस वणिये ने उसके घर पर आकर उपकोशा से एकान्त मे यह कहा कि तुम मेरे साथ संग करो, तो मैं तुम्हारे पति का धरा हुआ धन तुम को दूं। उसके बचन सुन कर और अपने पति के रक्खे हुए धन का कोई गवाह न जान कर, खेद तथा क्रोध में भरी हुई उपकोशा ने उस पापी वाणिये से भी वहीं बात कह कर रात्रि के चौथे पहर का संकेत कर दिया। यह सुन कर वह वणिया चला गया। इसके उपरान्त उपकोशा ने अपनी दासियों से कस्तूरी आदि अनेक सुगन्धियों से युक्त तेल मिला हुआ काजल बनवाया और चार वस्र के टुकड़ों पर वह काजल लिपवाया और एक बड़ी मजबूत संदूक बाहरी कुंडी लगवा कर बनवाई । इसके उपरान्त रात्रि के पहले पहर में, वही उत्तम पोशाक पहन कर मन्त्री का पुत्र आया छिप कर आये हुए, उसे देखकर, उपकोशा ने कहा कि मैं तुझे बिना नहाये को नहीं छुऊंगी, इस लिए भीतर जाकर पहले स्नान करो, उसकी बात को मानकर वह मूर्ख दासियों के साथ बहुत गुप्त अन्धेरे घर में गया। वहां दासियों ने उसके वस्त्र तथा आभूषण लेकर उन वस्त्रों के टुकड़ों में से एक टुकड़ा लंगोटा बांधने को उसे दे दिया। और उबटन के बहाने से शिरसे पैरों तक वह काजल उसके शरीर में मल दिया, क्योंकि उसे वहाँ कुछ सूझता न था। उसके अंगों को दासियां मल ही रही थी, कि दूसरे पहर में पुरोहित जी आगये, तब दासियों ने मन्त्री के बेटे से कहा कि यह वररुचि का मित्र कोई पुरोहित आया है इसलिये तुम इस सन्दूक में चले जाओ, ऐसा कह कर दासियों ने सन्दूक के भीतर उस नंगे मंत्री के बेटे को बैठाकर बाहर से कुंडी बन्द करदी। फिर उस पुरोहित को भी स्नान के बहाने से भीतर ले जाकर सब वस्त्रादिक ले लिये, और वही वस्त्र का टुकड़ा पहना कर, तेल का काजल उतनी देर तक मलती रही कि तीसरे पहर में कोतवाल भी आगये, उसके आने के भय से दासियों ने उसे भी सन्दूक में बैठाकर बाहर से कुंडी लगा दी फिर स्नान के बहाने से कोतवाल को भी भीतर लेजा कर उसके वस्त्रादिक उतार लिये। और उसी प्रकार से काले वस्त्र का टुकड़ा पहना कर इतनी देर तक उबटन करती रहीं, कि पिछले पहर में वणिया भी आ गया। तब दासियों ने उसके आने का भय दिखा कर कोतवाल को भी सन्दूक में अन्द करके कुंडी बाहर से बन्द कर दी। सन्दूक के भीतर वह तीनों परस्परं स्पर्श होने पर भी मारे डरके नहीं बोले। इसके उपरान्त उपकोशा ने घर में दीपक जलवा कर उस वणिये को बुलाया, और बोली कि वह मेरे स्वामी का धन जो तुम्हारे पास रक्खा है, मुझे दे दो यह सुन कर वणिये ने घर को सूना देखकर कहा कि में तो कह चुका कि जो तेरे स्वामी का धन रक्खा है, वह दे दूंगा। तब उपकोशा सन्दूक को सुनाकर बोली कि हे देवता लोगो हिरण्यगुप्त के यह वचन सुनो, यह कहकर और दीपक बुझा कर उसे भी उन लोगों के ही समान स्नान के बहाने से भीतर भेजा दासियों ने उसके भी वस्त्रादिक लेकर और वही काले वस्त्र का टुकड़ा पहनाकर काजल के उबटन लगाने में इतनी देर लगाई कि प्रातःकाल होगया। तब दासियों ने कहा चले जाओ रात्रि व्यतीत होगई, यह कह कर जबरदस्ती उसे धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया। इसके उपरान्त काजल से लिपे हुए बस्त्र के टुकड़े को पहने हुए, वह वणिया लज्जित होकर अपने घर पहुंचा। घर में काजल की स्याही को धोते हुए सेवकों के सामने भी वह नहीं खड़ा हो सका था। (क्योंकि ठीक है अनीति में बड़ा कष्ट होता है)  प्रातःकाल उपकोशा अपनी दासी  को साथ लेकर अपने घरवालों के बिना पूंछे राजानन्द के महल में पहुँची, और जाकर यह कहा कि हिरण्यगुप्त नाम वणिया मेरे पति के धरे हुए धनको नहीं दे रहा है।

    राजाने इस बात की जांच करने के लिये, उसे बुला कर जो पूंछा तो उसने कहा कि मेरे पास कुछ भी इसके पति का धन नहीं है। तब उपकोशाने कहा कि राजा मेरापति सन्दूक में घर के देवताओं को वन्द करके गया है, वह मेरे गवाह हैं, उनके सामने इसने धन देना मंजूर किया है, उस सन्दूक को मँगा कर आप पूंछ लीजिये। यह वचन सुनकर राजा ने बड़े आश्चर्य पूर्वक बहुत से आदमियों को भेज कर वह सन्दूक मँगा लीया।  इसके पीछे उपकोशा ने कहा कि हे देवता लोगों जो कुछ इस वणिये ने कहा है, उसे सत्य सत्य कह कर अपने २ घरों को जाओ नहीं तो मैं तुम्हें राजा को सौंप दूंगी या सभा में खोल दूंगी, यह सुन कर सन्दूक में बैठे हुए वह सव डर कर बोले, कि ठीक है इसने हम लोगों के सन्मुख धन देने को कबूल किया है, तब तो उस बणिये ने निरुत्तर होकर उसका सब धन देदिया।। इसके उपरान्त राजा ने उपकोशा से पूछ कर बड़े आश्चर्यके साथ वह सन्दूक खुलवाया। तो उसमें से काजल से पुते तीन पुरुष निकले और राजा तथा मंत्रियों ने उनको बढ़ी कठिनता से पहचाना, तब हंस कर सब लोग आश्चर्य से पूछने लगे, कि यह क्या बात है? तव उपकोशा ने सारा वृत्तान्त साफ २ कह सुनाया। यह सुन कर सभा सब लोगों ने कहा कि शीलवती कुलवती स्त्रियों का अद्भुत चरित्र है। और उपकोशा की बड़ी प्रशंसा की इसके अनन्तर राजा ने पराई स्त्री के चाहने वाले उन लोगों का सब धन छीन लिया, और अपने देश से निकाल दिया (क्योकि बुरेस्वभावसे किसीका कल्याण नहीं होता) तू मेरी बहिन है, यह कह कर राजाने उपकोशा को उसके घर भेज दिया।
      वर्ष तथा उपवर्ष भी इस हाल को सुन कर बड़े खुश हुए, और उस नगर के सम्पूर्ण निवासी बड़े अचम्भे में हो गये। इसी वीच में मैं हिमालय नाम पर्वत पर मैंने बड़ा तप करके शीघ्र वरदायी शिवजी महाराज को प्रसन्न किया महादेव जी ने प्रसन्न होकर उस पाणिनीय शास्त्र का मेरे हृदय में भी प्रकाश कर दिया, और उन्हीं की कृपा से मैंने उस शास्त्र में जो कमी थी, उसे भी पूर्ण किया। इसके उपरान्त महादेवजी के मस्तक पर विराजमान चन्द्रमा की अमृतमय किरणों से सींचे हुए मैंने बिना परिश्रम घर में आकर माता तथा गुरुओं की बन्दना की, और उपकोशा का अत्यन्त अपूर्व वृत्तान्त सुना यह सुन कर मुझे आश्चर्य पूर्वक बड़ा आनन्द हुआ। और उपकोशा पर मेरा स्नेह तथा आदर बहुत बढगया।  इसके उपरान्त वर्ष उपाध्याय ने मेरे मुख से नवीन पाणिनीय व्याकरण सुनने की इच्छा की तो स्वामिकुमार ने स्वयं उनके हृदय में उसका प्रकाश कर दिया।
     इसके पीछे व्याड़ि और इन्द्रदत्त ने वर्ष उपाध्याय से गुरुदक्षिणा मांगने को कहा तब उन्होंने एक करोड़ अशर्फी मांगी गुरु के वचन को अंगीकार करके उन दोनों ने हमसे कहा कि आओ नन्दराजा के यहां गुरुदक्षिणा मांगने को चलें, उसके सिवाय और कोई इतना धन नहीं दे सक्ता है। क्योंकि उसके यहाँ ९९ करोड़ अशर्फियों की आमद है, और उसने उपकोशा को अपनी धर्म की बहिन कहा था। इसलिये वह तुम्हारा साला है, और वह तुम्हारे गुणों से भी प्रसन्न होकर तु्म्हें कुछ दे सकता है।  

     ऐसा निश्चय करके हम लोग अयोध्या में पढ़े हुए राजानन्द के डेरे में गये, जैसे ही हम लोग वहाँ पहुंचे, वैसे ही उस राजानन्द का देहत्याग हो गया था। और राज्य में कोलाहल मच गया था। इससे हम लोगों को बड़ा खेद हुआ। 
   
    इसके उपरान्त योग की सिद्धि से युक्त इन्द्रदेव ने कहा कि इस मरे हुए राजा के शरीर में में प्रवेश करूं तो वररुचि मेरे पास मांगने को आवे मैं एक करोड़ अशर्फि दे दूंगा, और जब तक में लौट कर न आऊं, तब तक व्याड़ि मेरे शरीर की रक्षा किया करे। यह कह कर इन्द्रदत्त ने राजानन्दके मृतक शरीर में प्रवेश किया, और राजा जी उठा फिर राजा के जी उठने पर वहां बड़ा उत्सव होने लगा तब किसी शून्य देव मन्दिर में इन्ददत्त के शरीर को व्याड़ि के सुपुर्द करके मैं राजा के यहां चला वहां राजा के पास जाके और स्वस्तिवचन कह कर राजा से एक करोड़ अशर्फी गुरुदक्षिणा के लिये मांगी। उसने शकटाल नाम राजा के मंत्री से कहा कि इसे करोड़ अशर्फी दिला दो, मरे हुए का फिर जीवन देख के और शीघ्र ही याचक का आना देख कर मंत्री तत्त्व को जान गया। क्योंकि बुद्धिमानो से कोई बत छिपी नहीं रहती है। स्वामी दिवाय देता हूं यह कह कर मंत्री विचारने लगा कि नन्द राजा का लड़का बहुत छोटा है, और राज्य में भी बहुत से शत्रु हैं, तो इस समय इस प्रकार से राजा के शरीर की रक्षाकरनी चाहिये। ऐसा निश्चय करके उसने वहां के सब मुर्दों जलवा दिय।  इस वीच में दूतों ने शून्य देवमन्दिर में इन्द्रदत्त का भी शरीर पाया, और ब्याड़ि से छीन कर वह भी जला दिया। इसी वीच में राजा को अशर्फियोंके देने में जल्दी करते देख कर शकटाल ने विचार कर कहा कि उत्सव से सम्पूर्ण लोगों का चित्त अभी सावधान नहीं है, क्षण भर यह ब्राह्मण ठहरे मैं अशर्फी दिवाय देता हूं। इसके उपरान्त ब्याड़ि ने योग से बने राजानन्द के आगे चिल्ला कर कहा कि बड़ा अन्धेर है, कि नहीं मरे हुए योग में स्थित ब्राह्मण का शरीर अनाथ मुर्दा कह कर आप के राज्य में जला दिया, यह सुन कर योग से बने हुए राजानन्दकी शोक से बुरी दशा होगई। देह के जल जाने से उस नन्दको स्थिर जान कर मंत्री ने बाहर आकर मुझे सब अशर्फिया दे दी। 
  
     इसके अनन्तर योग से बने हुए नन्द ने एकान्त में शोक युक्त होकर ब्याड़ि से कहा कि मैं ब्राह्मण से शूद्र हो गया। इस धन से क्या लाभ होगा? यह सुन कर व्याड़ि ने उसे समय के माफिक समझा कर कहा कि शकटाल तुझे जान गया, तो अब शोचो कि यह तुम्हारा मुख्य मंत्री है थोड़े दिनों में तुम्हें मरवा कर नन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को यहां का राजा वनावेगा। इसलिये वररुचि को अपना मुख्यमंत्री बनाओ उसकी बड़ी प्रभाववाली बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर हो जायगा। यह कह कर व्याड़ि तो गुरु दक्षिणा देने को चला गया। और उसने मुझे बुलाकर अपना मंत्री बनाया। तब मैं ने उससे कहा कि तुम्हारा ब्राह्मणत्व तो चला ही गया है, परन्तु शकटाल जब तक जीता है, तब तक राज्य को भी स्थिर न समझो, इसलिये इसका युक्ति पूर्वक नाश करना चाहिये। मेरे इस मन्त्र को सुन कर योग से बने हुए नन्द ने शकटाल को उसके सौ पुत्रों समेत अंधे कुए में गिरवा दिया। और जीते हुए ब्राह्मण को इसने मरवा डाला, इस बदनामी के डर से एक प्याले भर सत्तू और प्याले भर पानी इन सबके लिये प्रतिदिन बँधवा दिया तव शकटाल ने अपने पुत्रों से कहा कि इतने में एक का भी पेट नहीं भरेगा। बहुतौ की कौन कहे? इसलिये एक ही हममें से वह मनुष्य इस को रोज खाया करे जोकि योग से बने हुए इस राजा नन्द से अपना बदला ले सके।  तब उसके पुत्रों ने कहा कि आप ही इस काम को कर सकेंगे, इससे आपही इसे खाइये। क्योंकि धीर पुरुषों को शत्रुओं से बदला लेना प्राणों से भी बढ़ कर है।  तब शकटाल उस सत्तू और जल से अपने प्राणों की रक्षा करने लगा। क्योंकि जीतने की इच्छा करने वाले बड़े क्रुर होते हैं। अंधे कुए में पड़े हुए शकटाल ने अपने पुत्रों को मरता हुआ देख कर, यह शोचा कि कल्याण चाहने वाला मनुष्य स्वामियों के चित्तको बिना जाने और विश्वास हुए बिना उनके साथ कभी अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार न करे। इसके उपरान्त शकटाल के देखते ही देखते उसके सब पुत्र मर गये। और वह उनके हाड़ों के पांजरों से घिरा हुआ अकेला जीता रहा। इतने में योगसे होने वाले राजा नन्दका भी राज्य जम गया, और गुरू को दक्षिणा देकर लौटे हुए व्याड़ि ने आकर उससे कहा कि हे मित्र तुमको राज्य में सुख हो। अब मैं तुमसे पूंछ कर कहीं तप करने जाता हूं, यह सुनकर राजा गद्गद वचन करके बोला कि तुम भी राज्य में, ऐश्वर्य का भोग करो, और मुझे छोड़ कर कहीं न जाओ। तब व्याडि़ ने कहा कि हे राजा इस क्षण भंगुर शरीर में और इसी प्रकार की अन्य प्रकार वस्तुओं में कौन बुद्धिमान अपने को फंसावे? लक्ष्मीरूपी मृगतृष्णा बुद्धिमान मनुष्य को नही मोहित करती है, यह कह कर ब्याड़ि निश्चय करके तप करनेको चला गया।  इसके उपरांत वह राजा सम्पूर्ण सेना को लेकर मुझ समेत पाटलिपुत्र नाम अपने नगर में आनन्द पूर्वक सुख भोगने के लिये चला आया, वहां राजा के मन्त्रियों मैं मुख्य होकर और बहुत सी लक्ष्मी पाकर अपनी माता तथा गुरुओं के साथ उपकोशा से सेवन किया हुआ, मैं बहुत दिन तक रहा फिर तप से प्रसन्न हुई गंगाजी ने, प्रति दिन मुझे बहुत सा सुवर्ण दिया। और शरीर धारण किये हुए श्री सरस्वती जीने मुझे साक्षात दर्शन देकर मेरे कायों में उत्तम उपदेश दिया॥

इतिश्रीकथासरित्सागरभाषायांकथापीठलंक्केचतुर्थस्तरङ्गः ॥

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

कथा‑सरित्‑सागर – कहानियों का महासागर भाग-1

कथा‑सरित्‑सागर, जिसका अर्थ है “कथाओं की नदियों का सागर”, प्राचीन भारत का एक विशाल और महत्वपूर्ण कथा‑साहित्य है। इसकी रचना 11वीं सदी में सोमदेव भट्ट ने की थी। यह ग्रंथ संस्कृत में लिखा गया और इसमें कथाओं का इतना बड़ा भंडार है कि इसे ‘समुद्र’ कहा गया।



🌊 कथा‑सरित्‑सागर – कहानियों का 

Subtitle: प्राचीन भारत की महान कथा‑परंपरा – जीवन और ज्ञान से भरपूर कथाओं का भंडार


📖 परिचय

कथा‑सरित्‑सागर, जिसका अर्थ है “कथाओं की नदियों का सागर”, प्राचीन भारत का एक विशाल और महत्वपूर्ण कथा‑साहित्य है। इसकी रचना 11वीं सदी में सोमदेव भट्ट ने की थी। यह ग्रंथ संस्कृत में लिखा गया और इसमें कथाओं का इतना बड़ा भंडार है कि इसे ‘समुद्र’ कहा गया।

सोमदेव ने यह ग्रंथ राजा अनन्तदेव की पत्नी रानी सूर्यमती के मनोरंजन के लिए संकलित किया। कथाओं के माध्यम से जीवन की कठिनाइयों से ध्यान हटाने और मनोरंजन का आनंद लेने का प्रयास किया गया।


🏛️ संरचना और रूप

कथा‑सरित्‑सागर कुल 18 भाग और 124 अध्याय में विभाजित है। इसमें लगभग 21,000 से 22,000 संस्कृत श्लोक और कुछ गद्य भाग शामिल हैं।

इसकी सबसे खास शैली यह है कि एक कथा के भीतर कई अन्य कथाएँ कही जाती हैं। इसे कहानी‑के‑बीच‑में‑कहानी (frame narrative) शैली कहा जाता है।

कुल मिलाकर इसमें लगभग 350 से अधिक कहानियाँ हैं – लोककथाएँ, राजा‑रानी की प्रेमकथाएँ, दानवीर और देवताओं की कथाएँ, विद्वानों की बुद्धिमत्ता और जीवन‑संदेशों से भरी कथाएँ।


👑 मुख्य कथा

कथा‑सरित्‑सागर की मुख्य कहानी राजा उदयन और उनके पुत्र नारवहानदत्त के रोमांच और उनके साथ जुड़े अनेक पात्रों की घटनाओं पर आधारित है। इस कथा‑सीमा के भीतर अनेक उप‑कथाएँ बुनी गई हैं, जिनमें प्रेम, संघर्ष, बुद्धिमत्ता और जीवन‑ज्ञान का सुंदर समन्वय मिलता है।


🌟 कथा‑परंपरा और प्रभाव

यह ग्रंथ न केवल भारत में महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी कथाएँ अन्य साहित्य और कथाओं पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं।
यह सिद्ध करता है कि भारत की कथा‑परंपरा प्राचीन काल से अत्यंत समृद्ध और विश्व‑स्तरीय थी।

कई प्रसिद्ध कहानियाँ, जैसे पंचतंत्र की कथाएँ, उर्वशी‑पुरुरव, शिबि और अहल्या की कथा, इसी ग्रंथ में अपनी जड़ें रखती हैं।


🧠 क्यों पढ़ें कथा‑सरित्‑सागर?

  • कथा‑शैली का समृद्ध रूप: केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन‑ज्ञान, नीतिशास्त्र और सामाजिक मूल्यों से भरपूर।
  • जीवन‑ज्ञान का खज़ाना: मृत्यु, धर्म, प्रेम, दान, त्याग, बुद्धिमत्ता और सत्य के तत्वों का सुंदर वर्णन।
  • सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर: भारत की प्राचीन कथा‑परंपरा की अमूल्य धरोहर।

📌 रोचक तथ्य

  • मूल स्रोत गुणाढ्य की बृहत्कथा मानी जाती है।
  • संस्कृत कथा‑साहित्य का सबसे बड़ा और समृद्ध संग्रह।
  • कथा‑शैली सरल, रोचक और जीवन‑प्रेरक है, जो पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी पढ़ी और सुनाई जाती रही।

🧭 निष्कर्ष

कथा‑सरित्‑सागर केवल एक कथा‑ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन कथा‑परंपरा का महासागर है।
यह जीवन के विभिन्न अनुभवों और ज्ञान के मोतियों से भरा हुआ है। यदि आप भारतीय मिथक, लोककथाएँ, नैतिक शिक्षाएँ और जीवन‑ज्ञान से रूबरू होना चाहते हैं, तो कथा‑सरित्‑सागर आपके लिए एक अद्भुत यात्रा है।


🌊 Kathāsaritsāgara — Book‑by‑Book Story Titles & Summaries

(कथा‑सरित्सागर — भागवार प्रमुख कथाएँ और संक्षिप्त विवरण)


📘 Book 1 – Kathāpīṭha (कथापीठ)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Vararuci & Upakośā
एक ब्राह्मण और उसकी बुद्धिमान पत्नी की कथा, जिसमें बुद्धि, नीतिशास्त्र और सामाजिक व्यवहार की शिक्षाएँ मिलती हैं।

2️⃣ Malyavān & Curse of Rebirth
मल्याराज की शाप‑कथा — पुनर्जन्म, कर्म और मोक्ष के सिद्धांतों का जीवन‑आधारित वर्णन।

3️⃣ Origin of the Bṛhatkathā
कहानी‑साहित्य की उत्पत्ति का वर्णन, जिसमें बृहत्कथा की रचना के सामाजिक और दार्शनिक कारण बताए गए हैं।


📘 Book 2 – Kathāmukha (कथामुख)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ King Udayana’s Early Exploits
राजा उदयन का राज्यारोहण, युद्ध‑रणनीति और सामरिक बुद्धिमत्ता की कथा।

2️⃣ Śrīdattā & Devadattā
राजा के मित्रों और परिवार के बीच प्रेम, विश्वास और संघर्ष की कहानी।

3️⃣ Lohajaṅgha
एक साहसी योद्धा की उत्साह‑भरी कथा जो विभिन्न राजाओं और परोपकार के लिए लड़ा।


📘 Book 3 – Lavanaka (लवणक)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Udayana & Padmāvatī
उदायन का पद्मावती से विवाह— प्रेम, संघर्ष और रणनीति की कथा।

2️⃣ Urvāśī & Purūravas
एक देवकन्या और राजकुमार के रोमांटिक और आध्यात्मिक जीवन की पौराणिक कथा।

3️⃣ Indra & Ahalyā
स्वर्गीय देवता इन्द्र और पत्नी अहल्या की कथा — मोह, निरीक्षण और मोक्ष का संदेश।


📘 Book 4 – Naravāhanadattajanana (नरवाहनदत्तजनन)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Birth of Naravāhanadatta
नरवाहनदत्त का जन्म, परिवार‑परम्परा और भविष्य‑वाणियाँ।

2️⃣ Jimutavāhana & the Serpent
एक वीर राजकुमार जो नाग की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान कर देता है। यह वीरता और परिपक्वता की प्रेरक कथा है।


📘 Book 5 – Caturdarika (चतुर्दारिका)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Śaktivega’s Tales
एक विद्या‑धारी राजा की साहसिक यात्राएँ, शत्रु संग्राम और नैतिक संघर्ष।

2️⃣ Prophecies of Naravāhanadatta
राजकुमार के भविष्य‑सूचना और राजकीय जीवन के रोमांच।


📘 Book 6 – Madanamañcukā (मदनमञ्जुका)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Madanamañcukā & Marriage
नरवाहनदत्त का मदनमञ्जुका के साथ विवाह — प्रेम, राजनीति और संघर्ष की कथा।

2️⃣ Uṣā‑Aniruddha Love Story
एक पुराणिक प्रेमकथा जिसमें उषा और अनिरुद्ध के बीच की आकर्षक संघर्ष‑पूर्ण कथा प्रस्तुत है।


📘 Book 7 – Ratnaprabhā (रत्नप्रभा)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Rise of Ratnaprabhā
एक राजकुमारी की यात्रा — संघर्ष, विजय और आत्म‑विश्वास की प्रेरक कथा।

2️⃣ Wisdom of Vidyādhara Queens
विद्या‑धारक पुत्रियों के बुद्धिमत्ता से भरे संवाद और समस्याएँ हल करने के दृष्टांत।


📘 Book 8 – Sūryaprabha (सूर्यप्रभा)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Sūryaprabha’s Adventures
एक साहसी राजकुमार की यात्राएँ जो आदर्श‑धर्म और सत्य के लिए प्रतिज्ञाबद्ध था।

2️⃣ Serpent Realms & Vidyādharas
नाग लोक की रहस्यमयी घटनाएँ, देवों की शक्ति‑कथाएँ और दिव्य संघर्ष का वर्णन।


📘 Book 9 – Alaṅkāravatī (आलङ्कारावती)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Madanamañcukā’s Disappearance
मदनमञ्जुका का रहस्यमयी लुप्त होना और उसके बाद की घटनाएँ।

2️⃣ Nala & Damayantī
एक प्रसिद्ध प्रेम कथा जिसमें राजकुमार नल और राजकुमारी दमयंती के बीच संघर्ष, परीक्षा और पुनर्मिलन की घटनाएँ हैं।


📘 Book 10 – Śaktiyaśas (शक्तियशस्)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Pañcatantra Stories
पंचतंत्र जैसे नैतिक और रोचक शिक्षाप्रद कथाएँ, जिनमें संवेदना, सीद्धान्त और व्यवहारिक बुद्धि का सुंदर मिश्रण हैं।

2️⃣ Genie & Test of Patience
एक जादुई आत्मा (Genie) की कथा जिसमें सहनशीलता, विवेक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष दिखाया गया है।


📘 Book 11 – Vela (वेला)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Vela & Merchant Husband
एक व्यापारी पति और पत्नी वेला की कथा — यात्रा, लूट‑पाट और पुनर्मिलन की घटनाएँ।

2️⃣ Storm at Sea
समुद्र की विभीषिका, कठिनाइयाँ और मनुष्य के धैर्य की परीक्षा।


📘 Book 12 – Śaśāṅkavatī (शशांकावती)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Mṛgaṅkadatta & the Five Friends
पांच वीरों की मित्रता और उनके साहसिक यात्रा की कहानियाँ।

2️⃣ Vetālapañcaviṁśati (25 Vetāla Tales)
२५ Vetāla‑कथाएँ — मनोवैज्ञानिक, नैतिक और रोमांचक दास्ताँ।


📘 Book 13 – Madirāvat (मदिरावत)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Two Brahmins & Royal Princess
दो ब्राह्मणों की शरारती परिकल्पना जिसमें हास्य, रोमांच और राजनीतिक छलकपट दिखाया गया है।

2️⃣ Love & Mischief
प्रेम, विद्रोह और मनोरंजन की कई मज़ेदार घटनाएँ।


📘 Book 14 – Pañca (पञ्च)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Manasavega & the Abduction
एक विद्या‑धारी राजा द्वारा पांच विद्या‑धारिणी पत्नी प्राप्त करने की कथा।

2️⃣ Return to Glory
साहसिक संघर्ष के पश्चात सफलता और प्रतिष्ठा की कथा।


📘 Book 15 – Mahābhiṣeka (महाभिषेक)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Coronation of Naravāhanadatta
नरवाहनदत्त का राज्याभिषेक और सम्मान की यात्रा।

2️⃣ Kingdom Glory
उनके राज्य‑काल की विस्तृत राजनीति, युद्ध और धार्मिक क्षण।


📘 Book 16 – Suratamañjarī (सुरतमान्जरी)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Surrender & Renunciation
राजा उदयन का सिंहासन त्याग और जीवन‑परिवर्तन की कथा।

2️⃣ Chandālī’s Marriage
एक असाधारण विवाह जिसमें सामाजिक संरचना और बुद्धिमत्ता का संगम है।


📘 Book 17 – Padmāvatī (पद्मावती)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ Mukta‑phalaketu & Padmāvatī
राजकुमार मुक्तफलकेतु और पद्मावती का रोमांचक प्रेम‑कथा।

2️⃣ Trials of Separation
वियोग और पुनर्मिलन की परीकथाएँ।


📘 Book 18 – Viṣamasīlā (विषमसीला)

मुख्य कथाएँ:

1️⃣ King Vikramāditya’s Victory
उज्जैन के राजा विक्रमादित्य की विजय और पराक्रम की कविता।

2️⃣ Court Intrigues & Clever Tales
अदालतों, नायिका‑नायक की परिकल्पना और कॉमिक परिदृश्य की कथाएँ।


📌 यह सूची क्यों मूल्यवान है?

✔ यह आपको ग्रंथ का संरचनात्मक आभास देती है — न कि केवल 350 नामों की लम्बी सूची।
✔ प्रत्येक भाग के प्रमुख कथा‑विषयों को संक्षेप में समझने में मदद करती है।
✔ यह भी बताती है कि कथा‑सरित्सागर केवल एक कथा नहीं, बल्कि कथाओं का महासागर है — जहाँ छोटे‑बड़े, लौकिक‑आध्यात्मिक, दिलचस्प‑ज्ञानवर्धक कहानियाँ शामिल हैं।

कथासरित्सागर भाषा की भूमिका

 यह वात प्रायः सर्वसाधारण को विदित है कि इस संसार में बहुधा जितने परोपकारी विषय प्रचलित हैं उनका आरम्भ यदि विचारपूर्वक सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो बहुधा इस भारतवर्ष के प्राचीन आचार्यॊ का ही किया हुआ पाया जाता है,यहां तक कि, सदुपदेश से भरी हुई सर्व साधारण में प्रचलित छोटी 2 कथाएं भी उन आचार्यों के बनाये हुए ग्रन्थों से बहिर्भूत नहीं है इसी बात का यह कथा सरित्सागर नाम ग्रन्थ उदाहरणभूत है यह ग्रन्थ पहले पिशाच भाषा में वृहत्कथा नाम से था जिसके निर्माण करने वाले महाकवि गुणाढ्य नाम है यह महाकवि ख्स्ताब्द के प्रथम शतक मे प्रतिष्ठान देश के अधिपति महाराज सात वाहन की सभा में थे इन्होंने जिस प्रकार से पिशाच भाषा में एक लाख श्लोक की वृहकथा नाम यह कथा बनाई सो इसके कथा पीठलम्बक में प्रकट है इसी वृहत्कथा को संक्षिप्त करके श्री महाकवि सोमदेवभट्ट ने संस्कृत के २५००० हजार श्लोकों में यह वृहत्कथा नाम ग्रन्थ कश्मीर देश के महाराज अनन्तराज की परम पण्डिता रानी सूर्यवती के कहने से निर्माण किया वृहत्कथा का सारांशरूप महाकवि क्षेमेन्दू का बनाया हुआ वृहत्कथा मंजरी नाम एक और ग्रन्थ भी है परन्तु इस ग्रन्थ में ऐसा अधिक संक्षेप किया गया है कि ग्रन्थ की मनोहरता जाती रही आज कल महाकवि गुणाढ्य की बनाई हुई पिशाच भाषामय यह वृहत्कथा नहीं मिलती परन्तु प्राचीन गोवर्द्धन सप्तशती कुवलयानन्द तथा कादंबरी आदि ग्रन्थों में इसका नाम पाया जाता है।

      हिन्दी भाषा के परम हितैषी भार्गववंशावतंस मुंशी नवलकिशोर (सी, आई, ई) ने विद्वानों के मुख से इस कथा सरित्सागर नाम ग्रन्थरत्न की प्रशंसा तथा सदुपदेशभरी अत्यन्त मनोहर कथाओं को सुन कर अपनी मातृ भाषा हिन्दी का गौरव बढ़ाने के लिये हम लोगों को यथोचित धन देकर इसका अनुवाद करवाया इस अनुवाद में हम लोगों ने यथाशक्ति यह उद्योग किया है कि श्लोक के किसी शब्द का अर्थ न रहने पावे और यथा संभव भाषा का प्रवन्ध भी न बिगड़ने पाए इसमें जहां २ नीति के श्लोक आगये है वह भी अनुवाद सहित कोष्टक में लिख दिये गये हैं। 

      हमलोग आशा करते हैं कि जैसे इस ग्रन्थ की कथाओं के आशयों को लेकर संस्कृत के कवियों ने नागानन्द कादंबरी हितोपदेश मुद्राराक्षस तथा वेताल पञ्चविंशति आदि का अनेक ग्रन्थ बनाये, इसी प्रकार इस अनुवाद को देखकर हिन्दी भाषा के सुलेखक गणभी इसकी कथाओं के आशयों को लेकर अनेक नवीन ग्रन्थ बना के अपनी मातृभाषा के गौरव को बढ़ावेंगे हम लोगों का यह भी दृढ़ विश्वास है कि यदि इस यंत्रालयाधिपति की आज्ञानुसार इस ग्रन्थकी छोटी २ कथाओं को लेकर दो चार छोटे २ ग्रन्थ बनवा कर पाठशालाओं के दशम नवम अष्टम तथा सप्तम आदि वर्गों के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिये नियत किये जाये तो उनको विना प्रयास के ही सदुपदेश का लाभ होगा। 

   इस वृहद्ग्रन्थरूपी समुद्र में मधुररसवती कथा रूपी अनेक नदियों का संगम है' इसी तात्पर्य से कवि ने इसका नाम कथासरित्सागर रक्खा है, इस सागर में यह विशेष चमत्कार है कि कथारूपी नदियों का रस क्षार नही किन्तु विशेष मधुर हो जाता है इस बात का अनुभव वही सहृदय महात्मा कर सकेंगे जो अपने मानस शरीर से इसमें मज्जन करेंगे॥ 

    इस वृहद्ग्रन्थ के अनुवाद में हम लोगों से भाषा की कल्पना तथा श्लोकार्थ में जो कुछ त्रुटी रह गई हो उसको गुणग्राही महात्मा सज्जन लोग क्षमा करके शुद्ध कर लें ।।

     पण्डित कालीचरण शर्मा तथा क्षमापति शर्मा तारीख ११ सितम्बर सन् १८६६ ईसवी  । मुताबिक भाद्रपद शुक्ला ? गुरुवार संवत् १९५३ । ...


कथा सरित्सागर की भाषा॥

'महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट विरचित ॥

 कथापीठ नाम प्रथम लम्वक ॥ 

भवतुसदायुष्माकंसम्पद्धाम ॥ भक्ताननाब्जमधुपंगणपतिनाम १

श्रियंदिशतुवशम्भोःश्याम कण्ठोमनोभुवा ॥ अङ्कस्थपार्वतीदृष्टि पाशैरिवविवेष्टितः ॥ २ ॥ सन्ध्यानृत्योत्सवेताराः करेण्डूयविघ्नजित् ॥ शीत्कारसीकरैरन्या कल्पयन्निवपातुवः॥३॥ प्रणम्यवाचंनिश्शेष पदार्थोद्योतदीपिकाम् ॥

वृहत्कथायासारस्य संग्रहंरचयाम्यहम् ॥ ४ ॥ 

। दोहा॥ 

विघ्नहरण गजवदनके चरणन में शिरनाय।

वृहत्कथा के सार की भाषा रचौं बनाय १॥ 


     महाकवि शिरोमणि श्री सोमदेव भट्टजी इस कथा सरित्सागर नामक ग्रन्थ के प्रारम्भ में शिष्टाचार के अनुसार यह मंगलाचरण करते हैं श्री शिवजी का नीलकण्ठ आप लोगों का कल्याण करे जिस नीलकण्ठ की गोद में बैठी हुई पार्वती जी की दृष्टि रूपी वन्धनों से मनों को कामदेव ने वांधा है सन्ध्या समय नृत्य के महोत्सव में अपनी सूंड से आकाश के नक्षत्रों को मानो उड़ा करके जो गणेशशीत्कार के जल कणों से मानों अन्य नक्षत्र बनाते हैं वह आप लोगों की रक्षा करें-सम्पूर्ण पदार्थो को प्रकाशित करने वाली श्री सरस्वती को नमस्कार करके में वृहत्कथा के सार का संग्रह बनाता हूं इस ग्रन्थ में कथापीठ,१ कथामुख २ लावाणक ३ नरवाहनदत्त जनन ४ चतुर्दारिका ५ मदनमञ्चकारनप्रभा सूर्यप्रभम् अलङ्काखती शक्तियश १० बेला ११ शंशांफयती १२ मदिरावती १३ पञ्चलम्बक १४ महाभिषेक १५. सुरतमंजरी १५ पद्मावती १७ और विषमशील यह अठारह लम्बक है और इसमें मूल के सिवाय कुछ नही बढ़ाया गया है बड़े बन्ध का संक्षेप मात्र करके भाषा बदल दी गई है और यथा शक्ति शब्दों का सम्बन्ध भी ठीक २ रखा गया है और कविता ऐसी हो गई है कि जिसमें कथा का रस न बीगड़े। मैं ने अपनी पण्डिताई की प्रशंसा के लिये यह परिश्रम नहीं किया है। किन्तु अनेक प्रकार की कथाओं का सरलता पूर्वक से लोगों के जानने के लिये यह श्रम किया है १२॥

 अथ कथा ॥ ....

     संपूर्ण पर्वतो का राजा हिमालय नाम पर्वत जिस पर किन्नर गन्धर्व और विद्याधराविक ज्ञानवान पुरुष सुख पूर्वक निवास करते है जिसका माहात्म्यं संपूर्ण पर्वतों की अपेक्षा से इस कारण अधिक प्रसिद्ध है कि तीनो लोकों की माता साक्षात् पार्वती जी जिसकी कन्या जिसके उत्तर में उसी का शिखर रूप हजारों योजन के विस्तार वाला कैलास नाम पर्वत स्थित है यह कैलास पर्वत अपनी कांति के कारण मंदराचल पर हँसता है, कि यह समुद्र के मंथन से निकले हुए अमृत से भी उज्ज्वल हुआ है, और बिना परीश्रम के ऐसा उज्ज्वल नहीं हुया हूं। जैसा कि मेरे ऊपर सम्पूर्ण चराचर संसार के स्वामी श्री महादेव जी विद्याधर और सिद्ध योगीयों से सेवित किये हुए पार्वती जी समेत निवास करके विहार करते है। जिनकी पीली २ जटाओं के समूहों में प्राप्त चन्द्रमा सन्ध्याकाल की करुणता से पीतवर्ण होकर उदयाचल के शृंगों के संग के सुख को अनुभव करता है। और जिन शिवजी ने अन्धकासुर के हृदय में त्रिशूल गाड़ कर तीनोंलोकों के हृदयका शूल निकाल डाला, और मुकुटों पर जड़ी हुई मणियों में जिनके चरणों के नखों के प्रतिविम्ब पड़ने से देववा तथा दैत्य लोग चन्द्रशेखर से मातम होते हैं। ऐसे महादेवजी को पार्वती जी ने एकान्त में किसी समय प्रसन्न किया। तब स्तुति से प्रसन्न हुए महादेव जी पार्वती को गोद में बैठा कर, बोले कि हे प्रिये तुम क्या चाहती हो, वह हम करें ऐसे वचन सुनकर पार्वती जी बोली कि हे स्वामी यदि आप प्रसन्न हैं तो कोई अत्यन्त रमणीय नवीन कथा कहिये। यह सुन कर श्रीमहादेव जी बोले कि हे देवी भूत भविष्य और वर्तमान ऐसी कौन सी वस्तु है जिसको तुम नहीं जानती हो। लेकिन पार्वतीजी के अत्यन्त हठ करने पर, श्री महादेव जी ने एक छोटी सी कथा कहने लगे कि एक समय नारायण और ब्रह्मा जी मुझे देखने के लिये पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए हिमालय के नीचे आये। वहां उन दोनों ने एक जाज्वल्यमान महाभारी लिङ्ग देखा, उसके अन्त को देखने के लिये ब्रह्मा ऊपर को गये और नारायण नीचे को गये। जब दोनों ने उसका अन्त न पाया। तब मेरी प्रसन्नता के लिये तप करने लगे उस समय मैं प्रकट हो कर दोनों से कहा कि तुम कोई वरदान मांगो। यह सुनते ही ब्रह्मा ने यह वर मांगा कि आप हमारे पुत्र बन जाइए इसी निन्दित वचन के कहने से ब्रह्मा संसार में अपूज्य होगये। और नारायण ने यह वर मांगा, कि हे भगवन् मैं सदैव आपका सेवक बना रहूं। इसी से वह नारायण तुम्हारे स्वरूप में हो कर मेरे अर्धाङ्गी हुए। और इसी से तुम्हीं मेरी शक्तिरूप नारायण हो। और तुम्ही मेरे पूर्वजन्म में भी स्त्री थी। शिवजी के इस बचन को सुन कर पार्वती जी बोली कि मैं पूर्वजन्म में किस प्रकारसे आपकी स्त्री थी। शिवजी बोले हे पार्वती पूर्व समय में दक्ष प्रजापति के तुम और तुम्हारे सिवाय अनेक कन्या थी। दक्षप्रजापति ने तुम्हारा विवाह मेरे साथ किया, और अन्य कन्याओं का धर्मादिक देवंताओं के साथ कर दिया। एक समय दक्ष ने यज्ञ में सब जामातामों को बुलाया, परन्तु केवल मुझे नहीं बुलाया। तब तुमने दक्ष से पूछा कि मेरे पति को क्यों नहीं बुलाया। दक्ष ने यह उत्तर दिया कि तुम्हारा पति मनुष्यों के कपाल आदिक अशुभ वेष को धारण करता है। उसको में यज्ञ में कैसे बुलाऊं, उसके ऐसे कठोर वचनों को सुन कर हे पार्वती तुमने यह सोचा कि यह बड़ा पापी है। और मेरा शरीर भी इसी से उत्पन्न हुआ है, इसलिये तुमने उस अपने शरीर को योग से त्याग दिया। और मैंने क्रोध से दक्ष के यज्ञ का नाश कर दिया। इसके उपरान्त जैसे समुद्र से चन्द्रमा की कला उत्पन्न हुई है। उसी प्रकार हिमालय के घर में तुम्हारा जन्म हुआ। इसके उपरान्त तुम्हें तो याद ही होगा। कि जब मैं तप करने के लिये हिमालय पर गया, तब तुम्हारे पिता ने मेरी सेवा के लिये तुम को लगा दिया था, इसी बीच में तारकासुर के मारने के निमित्त मेरे पुत्र होने के लिये देवता लोगो के भेजे हुए कामदेव ने, अवसर पाकर मेरे ऊपर अपने वाण चलाये। और मैंने उसे भस्म कर दिया, फिर बड़ा कठोर तप करके तुमने मुझे प्रसन्न किया। और मैंने भी तुम्हारे तप को बढाने के लिये, बहुत देर लगाई। इस प्रकार से तुम मेरे पूर्वजन्म की स्त्री हो। बतायो अब मेैं और क्या कहूं। ऐसा कह कर महादेव जी के चुप हो जाने पर पार्वती जी क्रोध करके बोली कि तुम बड़े धूर्त हो। मेरे प्रार्थना करने पर भी कोई उत्तम कथा नहीं कहते, गङ्गा को शिर पर धारण करते हो 'सन्ध्या की वन्दना करते हो, क्या मैं तुम्हें नहीं जानती। यह वचन सुनकर जब शिवजी ने अपूर्व मनोहर कथा कहने की प्रतिज्ञा की तब पार्वती जी का क्रोध शान्त हुआ। 

     पार्वती जी ने कहा यहां कोई न आने पाए, यह कह कर नन्दी को द्वार पर खड़ा कर दिया और शिवजी ने कथा प्रारम्भ करके कहने लगे, कि देवता लोग अत्यन्त सुखी होते है, और मनुष्य अत्यन्त दुखी होते हैं। इसलिये देवता और मनुष्यों की कथा अत्यन्त मनोहर नहीं है, इस हेतु से में विद्याधरों (अर्थात् ज्ञानवान पुरुषों) की कथा प्रारम्भ करता हूं। इस प्रकार जब शिवजी कहने लागे, तो उसी समय शिवजी का अत्यन्त प्यारा पुष्पदन्त नाम का गण आया, और द्वार पर खड़े हुए नन्दी ने उसे रोक दिया। परन्तु मुझे निष्कारण रोका है ऐसा समझ कर योग के वल से अलक्षित अदृश्य होकर भीतर चला गया। और जाकर महादेवजी की कही हुई सात विद्याधरों की अपूर्व कथा सुनी, और वही सत्कथा उसने अपने घर जाकर जमानाम अपनी स्त्री से कही। क्योंकि कोई भी अपनी स्त्री से धन और गुणों का वर्णन को नहीं छुपासकता। 

     उसकथा के आश्चर्य से भरी हुई जयाने भी सम्पूर्ण कथा पार्वती जी के सन्मुख - कहीं क्योंकि (स्त्रियां किसी बात को छुपा नहीं सकती) जया से इस कथा को सुन कर बहुत क्रोध युक्त हो पार्वती जी ने शिवजी से कहा कि तुमने वह अभुतपूर्व कथा नहीं कही थी। इसे तो जयासी जानती है तब महादेव जी ने ध्यान करके देखा और कहा कि पुष्पदन्त ने योगबल से यहां आकर सभी कथा को सुनी है। और जया से उसने वर्णन की है, नहीं तो इसको कौन जान सकता है। यह सुन कर पार्वतीजी ने बड़े क्रोध से पुष्पदन्त को बुला कर कहा हे दुष्ट तू मनुष्य होजा, यह शाप दिया और उसके लिये शिफारस करने वाले माल्यवान को भी यही शाप दिया। 

     तब उन दोनों ने और जया ने पार्वती के पैर पर गिरकर बहुत समझाया जिससे पार्वती जी ने शाप का अन्त इस प्रकार से बतलाया कि जो विन्ध्याचल के वन में कुवेर के शाप से पिशाच हुआ सुप्रतीक नाम यक्ष काणभूत नामवाला स्थित है। उसके देखने से अपनी जातिको स्मरण करके जब उस से इस कथा को कहोगे, तब हे पुष्पदन्त तुम इस शाप से छूट जावोगे।

    और काणभूत की कथा को जब माल्यवान सुनेगा, तब काणभूत के मुक्त हो जाने पर कथा को प्रकट करके यह भी मुक्त हो जायगा। यह कह कर पार्वतीजी तो चुपकी हो गई। और वह दोनों गण भी देखते ही देखते बिजली के समान नष्ट होगये।

     इसके उपरान्त कुछ समय व्यतीत हो जाने पर पार्वती दयायुक्त होकर शिवजी से बोली कि हे स्वामी जिन दोनों गणो को मैंने शाप दिया था। वह पृथ्वी में कहां उत्पन्न हुए हैं। यह सुन कर महादेव जी बोले कि कौशाम्बी नाम नगरी में वररुचिनाम से पुष्पदन्त उत्पन्न हुआ है। और सुप्रतिष्ठित नाम नगर में गुणाव्य नाम से माल्यवान भी उत्पन्न हुआ है। यह उन दोनों का वृत्तांत है इस प्रकार कह कर श्री महादेव जी गणों को शाप देने से पश्चाचाप वाली पार्वती को लेकर कैलास पर्वत पर कल्पवृक्ष की लताओं में क्रीड़ा करके प्रसन्न करते रहें।

       ॥ इतिश्रीकथासरित्सागरभाषायांकथापीठलंबकेप्रथमस्तरङ्गः१॥ 


     इसके उपरान्त मनुष्य के शरीर में वररुचि अथवा कात्यायन नामसे प्रसिद्ध पुष्पदन्त नाम का गण संपूर्ण विद्याओं को पढ़ कर और राजा नन्द के यहां मन्त्री होकर एक समय बहुत उदास हो के श्री भगवती विन्ध्यवासिनी के दर्शन करने को गया वहां तप से प्रसन्न हुई भगवती ने स्वप्न में वररुचि से यह कहा कि तुम विन्ध्याचल के वन में जाकर काणभूत से मिलो। तब व्याघ्रादि अनेक हिंसक जीवों से भरे हुए निर्जन बड़े २ वृक्ष वाले विन्ध्याचल के घनें जंगल में भ्रमण करते २ वररुचिने एक बहुत वड़ा बरगद का वृक्ष देखा। और उसके निकट सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए शालवृक्ष के समान, ऊंचे डीलवाले काणभूत को देखा। 

    काणभूत ने उसे देख कर पैरों पर गिर कर बैठाया तव क्षण भर बैठ कर वररुचि बोले कि हे काणभूत आप के  आचार बहुत उत्तम हैं। यह गति कैसे हुई? यह बड़े प्रेम के वचन सुन कर काणभूत बोला, कि मैं अपने आप तो कुछ भी नहीं जान सकता हूं। परन्तु उज्जयनी के श्मशान में महादेवजी के मुखारविन्दसे जो सुना है वह कहता हूं। एक समय महादेव जी से पार्वती ने पूछा कि हे देवाधिदेव आपकी प्रीति कपाल और श्मशान में क्यों है? इस प्रकार से पूछे हुए प्रश्न पर महादेवजी बोले कि पूर्व कल्प के अन्त में सम्पूर्ण संसार के जलमय हो जाने पर मैंने अपनी जंघा चीरकर एक रुधिर की बूंद टपका दी थी। वह रुधिर की बूंद जल में गिरकर अण्डासी हो गई। उस अण्डे को फाड़ने से एक पुरुष उत्पन्न हुआ। उसी से मैंने संसार को बनाने के लिये प्रकृति उत्पन्न की, उन दोनों ने मिल कर प्रजापति उत्पन्न किये। और प्रजापतियों ने प्रजा उत्पन्न की। इसी से संसार में उस पुरुष को पितामह कहते हैं। 

      इस प्रकार सब संसार को उत्पन्न करके अभिमान युक्त होने वाले उस पुरुष का शिर मैंने काट डाला, उसी के पश्चात्ताप से मैंने यह बड़ा व्रत ग्रहण किया है। इसीलिये मैं कपालों को हाथ में लिये रहता हूं और श्मशान मुझे बहुत प्यारा है। और हे पार्वतीजी यह कपालरूप संसार मेरे हाथ में स्थित है क्योंकि उस अण्डे के दोनों टुकड़े पृथ्वी और आकाश कहलाते हैं। इस प्रकार महादेव जी के कहने पर उन वातों को सुनने के लिये, मैं वहां पर खड़ा था  कि पार्वतीजी फिर महादेव जी से बोली, कि हे प्रिय वह पुष्पदन्त हमारे पास कितने दिनों में आवेगा। यह सुनकर महादेव जी मेरी ओर देख कर बोले कि यह जो पिशाच दिखाई देता है। यह कुवेर का सेवक यक्ष है, इसकी मित्रता स्थूलशिर नाम किसी राक्षस से थी। उस पापी के साथ इसे देख कर कुवेस्ली ने इसे यह शाप दिया कि तू विन्ध्याचल के जंगल में पिशाच हो जाय। 

      तव दीर्घजंघ नामक इसके भाई ने कुवेर के चरणों पर गिर कर यह प्रार्थना की कि महाराज इसका शाप कब छूटेगा। तब कुवेर ने कहा कि शाप से छूटे हुए, पुष्पदन्त से बृहत्कथा कों सुन कर और उस कथा को शाप से मनुष्य हुए माल्यवान से कह कर, उन दोनों गणों के साथ यह भी शाप से छूटेगा। हे पार्वतीजी कुवेर ने इस प्रकार से इसके शाप का अन्त कहा है, तुमको भी यही जानना चाहिये। महादेव जी के ऐसे वचन सुन मैं बहुत प्रसन्न होकर यहां चला आया, इस प्रकार पुष्पदन्त के आने तक मेरा यह शाप रहेगा। इस प्रकार कह कर जब वह चुप हो गया। तब उसी समय वररुचि अपनी जाति को याद करके, मानों सोते से जग पड़ा, और बोला कि मैं वही पुष्पदन्त हूं, मुझसे उस कथा को सुनो, यह कह कर वररुचि ने सात लाख श्लोकोंकी सात महाकथा कहीं ।

    इसके उपरान्त काणभूत बोला हे पुष्पदन्त तुम तो शिवजी का अवतार हो तुम्हारे सिवाय इन कथाओं को कौन जान सक्ता है। तुम्हारी कृपा से अब यह मेरा' शाप गयाहीसा है। अब आप जन्म से लेकर अपना वृत्तान्त वर्णन करके मुझे पवित्र करो जो मुझसे छिपाना न चाहो। काणभूत के ऐसे कोमल वचनों को सुनकर वररुचि ने जन्म से लेकर अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त विस्तार पूर्वक यंहवर्णन किया।

      कौशाम्बी नाम नगरीमें सोमदत्त नाम का ब्राह्मण रहता था जिसका दूसरा नाम मग्निशिख भी था उस ब्राह्मणकी स्त्री का नाम वसुदचा था वह किसी मुनि की कन्या थी। और किसी शाप से ब्राह्मण की स्त्री हुई थी। उन्ही दोनों से मेरा जन्म हुआ है, जब कि मैं बहुत छोटा बालक था तब मेरा पिता मर गया, मेरी माता बड़े दुःख से मेरा पालन करने लगी।  एक समय बहुत दूर से चले हुए दो ब्राह्मण रात्रिभर रहने के लिये मेरे घरपर ठहरे। वह दोनों मेरे घर पर टिके ही थे, कि उसी समय मृदंग की आवाज सुनाई पड़ी, उसको सुन कर मेरी माता मेरे पिता की याद करके गद्गदवचन से बोली, कि हे पुत्र यह तुम्हारे पिता का मित्र नन्द नाम का नट नाच रहा है। मैंने भी माता से कहा कि मैं इसे देखने को जाता हू। और देख कर तुझे भी सम्पूर्ण दिखाऊंगा, मेरे यह वचन सुनकर 'उन ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य हुआ। तब मेरी माता ने उन दोनों से कहा कि इसमें कोई सन्देह नहीं है, यह बालक एक बार की सुनी हुई, सब बातों को हृदय में धर लेता है, तब मेरी परीक्षा के लिये उन्ह प्रीतिशाख्य का पाठ किया मैंने यह सुन कर उसी प्रकार उनको सुना दिया। इसके उपरान्त उन दोनों के साथ नाच देख कर, मैंने अपनी माता को भी उसी प्रकार करके दिखा दिया। इस प्रकार मुझे संकृत श्रुतिधर (एकवार सुनकर याद रखनेवाला) जान कर उन दोनों में से एक व्याड़ि नामक ब्राह्मण ने मेरी माता को प्रणाम करके यह कथा कही। 

    हे माता वेतसनाम पुर देश में देवस्वामी और करम्भक नाम दो ब्राह्मण अत्यन्त परस्पर प्रेम करने वाले भाई थे। उनमें से देवस्वामी का पुत्र यह इन्द्रदत्त नाम है, और करम्भक का पुत्र व्याडि नाम मैं है, उनमें से प्रथम मेरा पिता मरा उसी के शोकसे इन्द्रदत्त का भी पिता मर गया। और उन्हीं दोनों के शोकसे हमारी माता भी मर गई।

       इसी कारण से धन होने पर भी अनाथ होकर विद्या की अभिलाषा से हम दोनों स्वामि कुमार की तपस्या करने लगे। तप करते २ एक दिन स्वप्न में स्वामिकुमार ने यह कहा कि नन्दनाम राजा के पाटलिपुत्र नाम नगर में वर्ष नाम का एक ब्राह्मण है, उससे तुमको सम्पूर्ण विद्या मिलेंगी। तुम वहीं जाओ इसके उपरान्त पाटलिपुत्र नाम नगर में जाकर, हम लोगों ने पूंछा, तो लोगों ने कहा कि हाँ वर्ष नाम का एक मूर्ख ब्राह्मण है। तब सन्देह युक्त हो कर हम दोनों वर्ष के घर में गये, और जाकर मूसों के बिलो से युक्त गिरी हुई दीवार वाले छाया तथा छप्पर से रहित आपत्तियों के स्थान के समान घर में ध्यान लगाये बैठे हुए उस वर्ष ब्राह्मण को देखा। हम लोगों को आया देख कर वर्ष की स्त्री जिसका शरीर अत्यन्त मलिन दुर्बल बाल खुले हुए, और वस्त्र मैले थे, वह स्त्री क्या थी, मानों वर्ष के गुणों को देख कर साक्षात दुर्दशा ही स्वरूप को धारण किये आई थी उसने बड़ा सत्कार किया। तब हमने प्रणाम करके अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहा और यह भी कहा कि हमने सुना है, कि वर्ष बड़े मूर्ख हैं, यह सुन कर वह बोली कि तुम हमारे पुत्र के समान हो तुमसे क्या लज्जा है? सुनो में तुम से यह कथा कहती हूं।

     इस नगर में शंकर स्वामी नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, उनके दो पुत्र थे एक तो मेरापति और दूसरा उपवर्ष, मेरापति तो अत्यन्त मूर्ख तथा दरिद्रि हुआ। और इसका भाई अत्यन्त धनवान तथा विद्वान हुआ। उसने अपनी स्त्री को हमारे-घर का' भी पालन करने की आज्ञा दे दी थी, पर यहां की यह बड़ी बुरी रीति है, कि वर्षा ऋतु में गुड़ और पीठी को मिलाकर स्त्रियां गुप्तरूप से कोई बुरी चीज़ बना कर मूर्ख ब्राह्मण को देती हैं। ऐसा करने से जाड़ों के दिनों में स्नान का क्लेश और गर्मियों में स्वेदका दुःख नहीं होता है। इसलिये मेरी देवरानी ने भी दक्षिणा सहित वह पदार्थ मेरे पति को दिया, उसे लेकर जब यह घर आया, तब मैंने इसे बहुत डांटा। और यह भी अपनी मूर्खता के कारण अत्यन्त दुखी होकर स्वामिकुमार की सेवा करने को चले गये। इनके तप से प्रसन्न हुए स्वामिकुमार ने इनके हृदय में सम्पूर्ण विद्याओ का प्रकाश कर दिया। और कहा कि जब सकृत् श्रुतिधारी ब्राह्मण तुम को मिले, तब तुम इन विद्यायों का प्रकाश करना इस प्रकार स्वामिकुमार की आज्ञा पाकर बहुत प्रसन्नता पूर्वक घर में आकर इन्होंने सम्पूर्ण वृत्तान्त मुझसे कहा, तब से यह बराबर रात्रि दिन जप और ध्यान में लगे रहते हैं। इस्से कोई सकृत-श्रुतिधारी (एकवार सुनकर याद रखनेवाला) ब्राह्मण लाओ तो तुम्हारा कार्य सिद्ध होये। वर्ष की स्त्री से ऐसे वचन सुन कर और उसे १०० अशर्फी देकर सकृत् श्रुतिधर के ढूंदनेको , हम सब पृथ्वी पर घूमे, परन्तु वह कही नहीं मिला। आज थक कर तुम्हारे यहाँ पाया। तो यह तुम्हारा बालक सकृत श्रुतिधारी मिला सो तुम इसे विद्या पढ़ने के लिये हमको सुपुर्द करदो। 

    व्याड़ि के ऐसे वचन सुनकर-हमारी माता बड़े आदर पूर्वक बोली कि तुम्हारा कहना बहुत ठीकहै, क्योंकि जिस समय यह बालक उत्पन्न हुआ था, तब यह आकाशवाणी हुई थी कि यह बालक सकृत् श्रुतिधारी: होगा। और वर्ष, उपाध्याय से विद्या को पढ़कर संसार में व्याकरण शास्त्र की प्रतिष्ठा बढ़ाएगा। और इसका वररुचि नाम इस कारण से होगा, कि संसार में वर अर्थात् उत्तम पदार्थ ही इसको अच्छे लगेंगे। इसी से इस बालक के बढ़ने पर में रात्रि दिन-शोचती थी, कि वर्ष उपाध्याय कैसे मिलेंगे? आज तुम्हारे मुख से यह बात सुनकर मुझे बड़ा संतोष हुआ। तुम इसे लेजाओ, कोई शोच की बात नहीं है। यह तो तुम्हारे भाई के समान है, मेरी माता के ऐसे वचन सुनकर वह दोनों बड़े प्रसन्न हुए, और क्षण के समान वह रात्रि व्यतीत की, इसके उपरान्त उन दोनों ने मेरी माता के प्रसन्न होने के लिये अपना सम्पूर्ण धन देकर, मेरा यज्ञोपवीत किया। फिर मुझे लेजाने के लिये आज्ञा मांगी, तब मेरी माता ने भी बड़े दुःख से किसी प्रकार अपने आंसुओं को रोककर मुझे जाने की आज्ञा दी। वह मुझे साथ में लेकर वहां से बड़ी प्रसन्नता पूर्वक चले, और वर्ष के घर में पहुंचे पर वर्ष ने भी मुझे स्वामीकुमार के वरदान के समान मानकर दूसरे दिन हम लोगों के सन्मुख बैठा कर अपनी दिव्यवणी से ओमकार का  उचारण किया उसी समय सम्पूर्ण वेद अपने २ अंगो समेत उन को स्मरण हो आये। और वह हम लोगों को पढ़ाने लगे, एक बार सुन कर मैंने दोबार सुन कर व्याड़ि ने और तीन वार सुन कर इन्द्रदत्त ने गुरु का पढ़ाया हुआ याद कर लिया। उस अपूर्व दिव्यध्वनि को सुनकर सम्पूर्ण नगर निवासी बाह्मण लोग देखने को आये। और प्रशंसा करके वर्ष उपाध्याय को प्रणाम करने लगे, ऐसे आचार्य को देख कर पाटलिपुत्र नगर निवासी सम्पूर्ण लोग उत्सव करने लगे, परन्तु उसके भाई उपवर्ष ने अभिमान' के कारण नहीं किया और नन्द नाम राजा ने भी स्वामिकुमार के प्रभावको देखकर और वर्ष के ऊपर प्रसन्न होकर उनका घर धन से भरवा दिया॥ 

 इतिश्रीकथासरित्सागरभाषायांकथापीउलम्बफेदितीयस्तरका २॥ । '

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

The Loss of Friends [Mitrabheda] - Stories of Panchatantra



The Loss of Friends [Mitrabheda] - Stories of Panchatantra


The Lion and the Bull


Once upon a time there was a merchant named Vardhaman. As a businessman he travelled quiet a lot. In those days, the bullock cart , horseback and chariot were the most preferred way of travelling from one place to another.


As Vardhaman was traveling through a jungle on the banks of river Jamuna, one of his bullocks – Sanjeevaka collapsed. Vardhaman was a very busy man. He called some of his servants and asked them to take care of the bullock.


'Take care of bullock!' If he gets well, bring him along with you to the next village. Otherwise...' Vardhaman paused looking at the sick face of the bullock and did not complete his sentence. He somehow felt that the bullock would not live for long...


The servants nodded and stayed behind in the forest with the bullock. However as night came, the servants were scared and nervous. The jungle was a scary place and at night it seemed dangerous. The servants were scared stiff. They looked at the bullock angrily. The bullock was lying tired and ill. The servants did not want to spend another night in the jungle. So they left the bullock in the middle of the jungle and left for the next town.


They met Vardhaman in the next village. 'What happened...?' Vardhaman asked looking at his servants.


'Sir...' One of the servants said hesitatingly, '...Sir, the bullock....' He looked at the others. All the servants had decided to lie to Vardhaman. 'The bullock is dead sir...' The servant said as the other servants also nodded their heads.


Vardhaman nodded his head. He could not find out that his servants were lying to him. It was after all an old bullock. 'Ok...Take rest now...We have work to do in the morning....' The servants nodded and happily went to sleep in their quarters.


However the bullock Sanjeevaka was far from dead. The bullock was just tired from all the traveling. When Vardhaman's servants left behind Sanjeevaka, they had done something very good for the bullock. The bullock took sufficient rest and there was plenty of food in the forest. Taking rest and eating lots of food, Sanjeevaka got back his strength. Sanjeevaka was happy and soon became very strong.


The jungle was ruled by Pingalaka, a bold and strong lion. However the lion had not seen too many bullocks in his life. Once when he was drinking the waters of the river of Jamuna, Pingalaka heard the loud, happy snort of Sanjeevaka. Though Pingalaka was a brave lion, he was afraid when he heard this sound, as he had never heard it in his whole life. Pingalaka ran away from the river and went deep inside the forest away from the noise. Pingalaka knew that he was supposed to be the king of the forest and that he should not have been afraid. He was sitting embarrassed inside the den hoping that no one had seen him run away. However two jackals – Karataka and Damanaka had seen Pingalaka run away in fright.


Karataka and Damanaka were the sons of the ministers of Pingalaka. However Pingalaka had dismissed the fathers of Karataka and Damanaka because they were untrustworthy.


Looking at all this, Karataka wanted to just drop the whole thing and move on. He did not want to interfere in things which did not concern him. However Damanaka wanted to become the king's minster. He knew that if he became the minister, he would have lots of power. Damanaka also knew that if he was the king's minister, he would get lots of food.


Finally Karataka agreed and Damanaka went to the king.


'Sir!' Damanaka said bending low before the king, 'I know....I know that something is bothering you....If you tell me, what it is I will help you sir!'


Pingalaka wondered whether he should tell the jackal everything or not...Damanaka was after all the son of a dismissed minister. He need not like the king at all...However finally Pingalaka decided that he had nothing to lose. He would always be careful of Damanaka. And besides Damanaka may have a good idea...


So Pingalaka told the jackal about the snort he had heard. Damanaka nodded his head and spoke, 'Your majesty! I do not think you should be afraid of any noise, without knowing what it is. However...' Damanaka said looking at the king, 'If it is ok with you sir, I will go and investigate the noise...'


Pingalaka fell silent. He was now feeling distinctly uneasy for trusting the jackal. However he decided that if the noise was something dangerous, it would be better to send the jackal first.


'Ok, Damanaka,' The king said nodding to the jackal, 'Go and find out what the noise is...'


Damaka nodded and slowly approached the place where Sanjeevaka was happily dancing and snorting. When he saw the bull, Damanaka almost burst out laughing. Pingalaka the great king had been afraid of the bull. This is great news. Once I go and tell the king that it is only a bull, the king is going to make me into a minster....Damanaka smiled...Things were going beautifully...


Damanaka went to Pingalaka and respectfully bowed to him, 'Sir, that sound was made by a bull sir!'


Pingalaka looked at Damanaka very dis-trustingly and a little embarrassed also, 'A bull?' He asked Damanaka with disdain.


Damanaka bowed again, 'Yes sir! And sir, if it pleases you I will bring the bull to be your servant sir!


Pingalaka was thinking of everything Damanaka was saying. Damanaka knew that he was scared..of a bull..Pingalaka winced. A bull...which could make such a snorting would indeed be a very powerful creature...It would be great to have such a being as my friend....Damanaka would be able to serve me once more...


'Damanaka!' Pingalaka growled, 'If you indeed make this bull my servant, I will make you as my minister....'


Damanaka bowed and walked away not saying anything, feeling happy.


He went to Sanjeevaka. 'Bull, what are you doing here?' He pretended to be angry and asked the bull.


The bull looked at the jackal surprised and worried, 'I am just a poor bullock. I was abandoned by my master. I have regained my health now...'


Damanaka hid a smile and went on angrily, 'Do you know that you are in the kingdom of the great king – Pingalaka. This is his forest. You dare come here and take our grass and not even let us know about it...'


Sanjeevaka spoke in trembling tones, 'I am a city bullock. I do not know anything about the rules of the jungle...'


Damanaka cut him off, 'Ignorance is not an excuse!...The king is furious, he is going to eat you!'


Sanjeevaka shook his head and said trembling, 'Please wise jackal, Please tell the king about me...Tell him not to eat me...'


Damanaka looked at him coldly, 'I will talk to the king but I cannot promise you anything...' He said and turned away.


Damanaka then came to Pingalaka and spoke, 'Sir! You were right! He is no ordinary animal. He said he is the vehicle of Lord Shiva. But I also have told him that you are the vehicle of Goddess Parvati. I have told him that he has to speak to you for permission to graze in our lands...' Pingalaka looked admiringly at the intelligence of Damanaka. 'He has agreed, provided he has the assurance that you will not hurt him in any way sir...'


Pingalaka slowly nodded and agreed. His doubts about Damanaka vanishing. 'Go bring him here!'


Damanaka then went to Sanjeevaka. 'This king has promised to see you. But do not be very proud of being the king's new friend. If you do not respect me and work with me, I can make sure, you lose the favour of the king also....' Damanaka said with a silky threat.


Sanjeevaka nodded and finally agreed to see the king. Pingalaka met the healthy Sanjeevaka. They greeted each other and finally Sanjeevaka told him everything about himself. 'I was left behind. That is all your majesty. Now I am coming and asking for security from you.


Pingalaka smiled, 'You shall have it my friend! Even bigger animals feel insecure!


Pingalaka made Damanaka and Karataka his ministers.


The jackals felt that lion would spend most of the time with Sanjeevaka and let them manage the affairs of the state However this plan backfired. Pingalaka started relying on Sanjeevaka on the matters of the state. To add to this, Pingalaka was giving up hunting, following the teachings of Sanjeevaka.


This made Damanaka and Karataka very angry as they were eating the remains of what Pingalaka had killed. They often had to go hungry...The two jackals decided that they had create a fight between Pingalaka and Sanjeevaka.


Then Damanaka went to Pingalaka and talked to him, 'Sir! Your friendship with Sanjeevaka...'


Pingalaka looked at Damanaka angrily, 'What about it...' He said pushing his paws angrily.


'He is someone who eats grass and you are someone who eats other animals sir. He still continues to eat grass, but you sir have given up your food...for him...Can't you feel it sir?' Damanaka asked pretending to be angry. 'Can't you feel getting weak whereas Sanjeevaka stands there getting stronger and stronger...'


Listening to Damanaka's words made Pingalaka angry. 'He is a good friend and he has imparted a lot of knowledge to me...'


'Good friend...?' Damanaka said with a smirk, 'A good friend, who wants you weaker than him, so that he can kill you and manage the affairs of the state himself...' Damanaka said drily, 'As it is, he is the one who takes care of the affairs of the forest. He just wants to take over completely...'


'A LIE...!' Pingalaka roared and swung at Damanaka. Damanaka avoided the paw but looked at the king for some time. Smartly Damanaka did not say anything and just went away. He left the king to his own thoughts.


Damannaka then went to Sanjeevaka and sorrowfully nodded his head. 'Did I not tell you, to keep us also as your friends....'


Sanjeevaka looked at Damanaka in surprise. 'When did I stop being friends with you...You have always been....'


Damanaka laughed without any humour, 'You have taught the king about not killing other animals. It is not in his nature...He is a carnivore....He is hungry most of the time....' Damanaka looked at Sanjjevaka and whispered to him. 'He plans to kill you Sanjeevaka...so that he can get back his energy and become the powerful ruler again....'


Sanjeeka pushed Damanaka back, 'You lie!...Pingalaka is a good lion. He is intelligent...'


'...and he is a carnivore....' Damanaka said interrupting him. 'I don't want anything to happen to you, so please be ready when you meet Pingalaka the next time. I would advice you to run away. But I do not think you will listen, so please be careful...'


Sanjeevaka shook his head, but already a shadow of doubt was formed in his head.


Pingalaka also kept thinking about the jackal's words and decided to be careful around Sanjeevaka.


As Pingalaka went near Sanjeevaka, the next day, he saw that the bull was snorting and keeping his horns ready as if to attack him. Pingalaka was enraged. Why that backstabbing bullock...He is actually going to kill me....I made him my friend ...gave him the highest respect and listened to him and THIS is how he repays me...I will...'


Poor Sanjeevaka never even had a chance. The lion pounced on him and killed him even before he had a chance. Damanaka and Karataka saw this from the side happy that they had achieved what they had wanted by their cunning and made sure they were the minsters and got plenty of food.


Pingalaka unfortunately lost a good friend by rash acting...


This is the main story of the first part of the Panchatantra. The other stories are woven inside the main story as part of the dialogues between the main characters...