*🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️*
*🌷🍃 आपका दिन शुभ
दिनांक - - ०६ दिसम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - शुक्रवार
🌓 तिथि -- पञ्चमी ( १२:०७ तक तत्पश्चात षष्ठी )
🪐 नक्षत्र - - श्रवण ( १७:१८ तक तत्पश्चात धनिष्ठा )
पक्ष - - शुक्ल
मास - - मार्गशीर्ष
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ७:०० पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:२४ पर
🌓चन्द्रोदय -- ११:१७ पर
🌓 चन्द्रास्त - - २२:१२ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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*🚩‼️ओ३म्‼️🚩*
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( १) चतुर लोग निन्दा करें या स्तुति, धन आए या जाये, आज ही मरना हो या वर्षों के बाद, धर्मात्मा लोग धर्म पथ से कभी नहीं हटते।
( २) न काम से, न भय से, न लोभ से, न जीवन के मोह से धर्म को कभी न छोड़े, धर्म ही सदा रहने वाला है। सुख दुख तो अनित्य या आने जाने वाले हैं। आत्मा अमर है, इसलिए सदा रहने वाले धर्म से ही प्यार करो।
( ३) पशु पक्षियों को मोतियों से क्या काम, अन्धे को दीपक से क्या लाभ और मूर्ख को सत्य की चर्चा से क्या काम।
( ४) वह सभा नहीं जिसमें बूढ़े न हों और वह बूढ़े नहीं जो धर्म की बात न करें। वह धर्म नहीं कि जिसमें सच्चाई न हो और वह सत्य नहीं जिसमें छल–कपट और धोखा हो।
( ४) बुद्धिमान थोड़े के लिए बहुत का नाश न करे। बुद्धिमता इसी में है कि थोड़े से अधिक की रक्षा करे।
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*🕉️🚩आज का वेद मन्त्र 🚩🕉️*
*🌷ओ३म् तन्तुना रायस्पोषेण रायस्पोषं जिन्व संसर्पेण श्रुताय श्रुतं जिन्वैडेनौषधीभिरोषधीर्जिन्वोत्तमेन तनूभिस्तनूर्जिन्व वयोधसाधींतेनाधीतं जिन्वाभिजिता तेजसा तेजो जिन्व॥*
यजुर्वेद १५-७॥
🌷हे मनुष्य, तुम धन और वैभव का विस्तार धन और वैभव से ही करो। अपने ज्ञान का विस्तार वैदिक ज्ञान को सुनकर करो। औषधि विज्ञान का विस्तार वनस्पति और वृक्षों के विस्तार से करो। उत्तम शरीर का विस्तार धर्म युक्त आचरण से करो। जीवन को धारण करने वाली शक्तियों का विस्तार विद्या की प्राप्ति से करो। अपनी दृढ़ता से इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपने शत्रुओं(काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि) पर विजय प्राप्त करो।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, मार्गशीर्ष - मासे, शुक्ल पक्षे,पञ्चम्यां
तिथौ,
श्रवण नक्षत्रे, शुक्रवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे ढनभरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे।
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