“एहि शु ब्रवाणि तेऽग्न
इत्थेतरा गिरः।
अभिवर्धस्व इन्दुभिः॥ (7)”
की अत्यन्त गहन, सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा आधुनिक जीवन-संदर्भ से जुड़ी व्याख्या प्रस्तुत है। यह मंत्र वाणी-शक्ति, संवाद, और चेतना-विकास के रहस्य को उद्घाटित करता है।
एहि शु ब्रवाणि तेऽग्न
इत्थेतरा गिरः।
अभिवर्धस्व इन्दुभिः॥
हे अग्नि!
आप पधारिए।
मैं आपके लिए विविध स्तुतियाँ और मंत्र उच्चारित कर रहा हूँ।
आप सोमरस से पोषित होकर
अधिकाधिक विकसित हों।
साम वेद रक्षक-शक्ति (Protective Intelligence)
यह मंत्र अग्नि को केवल यज्ञ की अग्नि नहीं,
बल्कि—
वाणी, संवाद और चेतना के माध्यम से बढ़ने वाली शक्ति
के रूप में प्रस्तुत करता है।
यहाँ अग्नि संवाद से पुष्ट होती है।
वाणी केवल बोलना नहीं है।
वैदिक दर्शन में—
वाणी = चेतना का प्रकटीकरण
जो बोला जाता है—
इसलिए कहा गया—
“ब्रवाणि ते”
मैं तुम्हारे लिए बोलता हूँ।
👉 सामवेद आत्मीय और हृदयस्थ सत्ता
यह मंत्र बताता है—
जिस प्रकार ईंधन से अग्नि बढ़ती है,
उसी प्रकार सचेत वाणी से चेतना बढ़ती है।
अर्थात्—
यहाँ संकेत है कि—
अग्नि किसी एक शब्द से नहीं,
बल्कि निरंतर, विविध, जीवंत संवाद से बढ़ती है।
आज की भाषा में— 👉 निरंतर आत्म-संवाद (Self-Dialogue)
👉 सामवेद बाधा-विध्वंसक और समृद्धि-दायिनी
सोम केवल पेय नहीं।
दार्शनिक रूप में—
अग्नि को—
कठोरता नहीं,
आनंदपूर्ण साधना चाहिए।
यह मंत्र अग्नि + सोम का संतुलन सिखाता है।
👉 दोनों का संतुलन = जीवन-सिद्धि
👉 त्वमग्ने यज्ञानां घटित विश्वेषां हितः…” सार-गर्भित समग्र व्याख्या
आज की भाषा में—
यह मंत्र—
यह मंत्र सिखाता है—
ईश्वर संवाद से दूर नहीं,
संवाद से समीप आता है।
भक्ति = संवाद
👉 सामवेद मंत्र 2 जीवन-संचालन का वैदिक सूत्र है।
ब्रह्मज्ञान में—
ब्रह्म वाणी से नहीं बंधता,
पर वाणी से प्रकट होता है।
यह मंत्र उसी प्रकट होने की विधि है।
जो बोलते हो, वही बनते हो।
जिस भाव से बोलते हो, वही शक्ति बनता है।
मंत्र 7—
यह मंत्र सिखाता है—
वाणी को यज्ञ बना दो,
जीवन स्वयं प्रकाशित हो जाएगा।
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