इति विचिन्तयन्नेवारुरुक्षुरासनादुदतिष्ठत्। मनसा च तं तुरंगममुपसृत्य महात्मन्वन्योसि सोसि नमोस्तु ते सर्वथा मर्षणीयोयमआरोहणातिक्रमोस्माकमपरिगतानि दैवतान्यप्यनुचितपरिभवभाञ्जि भवन्तीत्यामन्त्रयांबभूव। विदिताभिप्राय इव स तमिन्द्रायुधश्चदुलशिरःकेसरसटाहल्याकुणिताकेकरतारकेण तिर्यक्चक्षुषा विलोक्य मुहुर्मुहुस्ताडयता क्षितितलमुत्खातधूलिधूसरितक्रोडरोमराजिना दक्षिणखुरेणारोहणायाह्वयन्निव स्फुरितघ्राणविवरघर्घरध्वनिमिश्रं मधुरमपरुषहुंकारपरंपरानुबद्धमतिमनोहरं हेषारवमकरोत्। अथाननेन मधुरहेषितेन दत्तारोहणाभ्यनुज्ञ इवेन्द्रायुधमारुरोह चन्द्रापीडः। समारुह्य तं प्रादेशमात्रमिव त्रैलोक्यमखिलं मन्यमानो निर्गत्य प्रलयजलधरविमुक्तोपलासारपरुषेण जर्जरयतेव रसातलमतिनिष्ठुरेण खुरपुटानां रवेण खुररजोभिरुद्धूतघ्राणघोरघोषेण च हेषितेन बधिरीकृतसकलभुवनविवरमशिशिरकिरणदीधितिपरामर्शस्फुरितविमलफलकेनोर्ध्वकृतेन कुन्तलतावनेनोद्भासिनीलोत्पलकलिकावनगहनं सर इव गगनतलमलंकुर्वाणमुदण्डमयूरातपत्रसहस्रान्धकारिताष्टदङ्मुखतया स्फुरितशतमखचापकलापकल्माषमिव जलधरवृन्दमुद्गमफेनपुञ्जधवलितमुखतयानवरतवल्लनचदुलतया च प्रलयसागरजलकलोलसंघातमिव समृद्धमदृष्टपर्यन्तमश्वसैन्यमपश्यत्। तं सागरजलमिव चन्द्रोदयेन चन्द्रापीडनिर्गमेन सकलमेव संचचालाक्षीयम्। अहमहमिकया च प्रणामलालसाः सरभसापनीतआतपत्र...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| आरुरुक्षु: | आ + रुह् + सन् + उ (तुमुन् अर्थ में) | सवार होने का इच्छुक (चन्द्रापीड) |
| मर्षणीय: | मृष् + अनीयर् | क्षमा करने योग्य (अपराध) |
| विदिताभिप्राय: | विदित: अभिप्राय: येन स: | जिसने (चन्द्रापीड के) मंतव्य को जान लिया हो |
| अशिशिरकिरण: | न शिशिरा: किरणा: यस्य स: | सूर्य (जिसकी किरणें ठंडी नहीं हैं) |
| शतमखचाप: | शतमखस्य (इन्द्रस्य) चाप: (धनु:) | इन्द्रधनुष |
ऐसा सोचकर वह उस पर सवार होने के लिए आसन से उठा। उसने मन ही मन उस घोड़े के पास जाकर प्रार्थना की— "हे महात्मन्! आप जो कोई भी दिव्य पुरुष हों, आपको मेरा नमस्कार है। मुझ अनजान द्वारा आप पर सवारी करने के इस अपराध को आप क्षमा करें, क्योंकि अनजाने में देवता भी तिरस्कार के पात्र बन जाते हैं।" ऐसा लगा मानो इन्द्रायुध ने चन्द्रापीड की बात समझ ली हो। उसने अपनी गर्दन हिलाई, तिरछी आँखों से देखा और अपने दाहिने खुर से जमीन को थपथपाकर चन्द्रापीड को सवारी के लिए आमंत्रित किया। उसने एक अत्यंत मधुर और मनोहर हिनहिनाहट (हेषारव) की।
घोड़े की अनुमति पाकर चन्द्रापीड उस पर सवार हो गया। उस पर बैठते ही उसे ऐसा लगा मानो समस्त त्रिलोक उसके अधिकार में है। जब वह महल से बाहर निकला, तो घोड़ों के खुरों की आवाज से ऐसा लगा मानो प्रलय काल के बादलों से ओले गिर रहे हों और पाताल फट रहा हो। चन्द्रापीड ने अपनी उस विशाल अश्व-सेना को देखा जो अंतहीन थी। हज़ारों छत्रों (छतरियों) के कारण आकाश में अंधेरा छा गया था, जिससे ऐसा भ्रम होता था मानो इन्द्रधनुषों से युक्त बादलों का समूह उमड़ आया हो। जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र में हलचल मच जाती है, वैसे ही चन्द्रापीड के निकलने पर उस विशाल सेना में भारी हलचल मच गई। सभी सैनिक प्रणाम करने के लिए आतुर होकर आगे बढ़ने लगे।
Thinking thus, he rose from his seat, desiring to mount. Mentally approaching the horse, he prayed— "O Great Soul, whoever you may be, I bow to you. Please forgive this transgression of mine in mounting you, for even deities, when unrecognized, become subjects of unintended disrespect." As if understanding his intent, Indrayudha tossed his mane, looked with a sidelong glance, and tapped the ground with his right hoof, as if inviting him to mount. He let out a sweet and charming neighing sound.
Receiving permission through that gentle neigh, Chandrapida mounted Indrayudha. Sitting upon him, he felt as if the entire three worlds were within his palm. As he rode out, the thunderous sound of the hooves felt like hailstones falling from primeval clouds, shattering the very underworld. He looked at his vast cavalry, which seemed endless. The thousands of raised umbrellas darkened the sky, making the army look like a mass of rain-clouds adorned with rainbows. Just as the rising moon causes a stir in the ocean, Chandrapida’s departure caused a massive movement in the entire army, with soldiers rushing forward in a competitive spirit to offer their salutations.
चन्द्रापीडस्तु तान् सर्वान् मानयित्वा यथोचितमनन्तरं तुरङ्गमाधिरूढेनानुगम्यमानो वैशम्पायनेन, राजलक्ष्मीनिवासपुण्डरीकाकृतिना सकलराजन्यकुलकुमुदखण्डचन्द्रमण्डलेनेव तुरङ्गमसेनास्रवन्तीपुलिनायमानेन, क्षीरोदफेनधवलितवासुकिफणामण्डलच्छविना, स्थूलमुक्ताकलापजालकावृतेनोपरिचिह्नीकृतं केसरिणमुद्वहतातिमहता काञ्चनदण्डेन ध्रियमाणेनातपत्रेण निवारितातपः, उभयतः समुद्धूयमानचामरकलापपवननर्तितकर्णपल्लवः, पुरःप्रधावता तरुणवीरपुरुषप्रायेणानेक्सहस्रसंख्येन पदातिपरिजनेन, 'जय जीवे'ति च मधुरवचसा मङ्गलप्रायमनवरतमुच्चैः पठता बन्दिजनेन स्तूयमानो नगराभिमुखं प्रतस्थे।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| पर्यवारयन्त | परि + वृ (लङ् लकार) | चारों ओर से घेर लिया |
| प्रतिनामग्राहम् | नाम नाम इति (वीप्सा) | एक-एक का नाम लेकर |
| अनुरागमुद्वमद्भि: | अनुरागं उद्वमन्ति तै: | प्रेम को प्रकट करते हुए (किरणों के बहाने) |
| निवारितातप: | निवारित: आतप: यस्य स: | धूप से बचाया गया (छत्र द्वारा) |
| बन्दिजनेन | स्तुतिपाठक: जन: | भाट या स्तुति करने वाले लोग |
चन्द्रापीड ने उन सभी का यथोचित सम्मान किया। उसके पीछे घोड़े पर सवार **वैशम्पायन** चल रहे थे। चन्द्रापीड के ऊपर एक विशाल स्वर्ण-दण्ड वाला श्वेत छत्र तना हुआ था, जो मोतियों की जाली से ढका था और जिसके ऊपर सिंह की आकृति बनी थी। यह छत्र उन्हें धूप से बचा रहा था। उनके दोनों ओर चामर डुलाए जा रहे थे, जिनकी वायु से उनके कान के आभूषण (कर्णपल्लव) नाच रहे थे। हजारों वीर पैदल सैनिकों के साथ और 'जय हो, चिरंजीवी हो' का मंगल गान करते हुए बन्दीजनों (भाटों) की स्तुति के बीच चन्द्रापीड ने नगर की ओर प्रस्थान किया।
Chandrapida honored them all appropriately. He was followed by **Vaishampayana**, who rode a horse behind him. Over Chandrapida, a magnificent golden-handled umbrella was held, adorned with pearl nets and a lion emblem at the top, shielding him from the sun. On both sides, whisks (Chauvries) were being fanned, their breeze making his ear-ornaments flutter. Accompanied by thousands of young infantry warriors and the melodious chants of "Victory to thee" by the bards, he moved toward the city.
काश्चिद्रार्द्रालक्तकरसपाटालितचरणपुटाः कमलपरिपीतबालातपा इव नलिन्यः, काश्चित्ससम्भ्रमगतिविगलितमेखलाकलापाकुलितचरणकिसलयाः शृङ्खलामन्दानमन्दमन्दसञ्चारिण्य इव करिण्यः, काश्चिज्जलधरसमयदिवसश्रिय इवेन्द्रायुधरागरुचिराम्बरधारिण्यः।
दुलिसितधवलनखमयूखपल्लवान् नूपुररवाकृष्टगृहकलहंसकानिव चरणपुटानुद्वहन्त्यः, काश्चित् करतलस्थितस्थूलहारयष्टयो रतिमिव मदनविनाशशोकगृहीतस्फटिकाक्षवलयां विडम्बयन्त्यः।
| कठिन पद | व्याकरण / अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| ससम्भ्रमम् | सवेगम् / घबराहट या शीघ्रता के साथ | स्त्रियों की चन्द्रापीड को देखने की व्याकुलता। |
| आर्द्रालक्तक | गीला महावर (Red Lac) | पैरों में अभी महावर लगाया ही जा रहा था। |
| इन्द्रायुध | इन्द्रधनुष (Rainbow) | रंगीन वस्त्रों की उपमा इन्द्रधनुष से दी गई है। |
| मेखलाकलाप | करधनी (Girdle/Waistband) | तेज चलने से ढीली होकर पैरों में फंस गई। |
| स्फटिकाक्षवलयाम् | स्फटिक की माला | हाथ में लिए मोतियों के हार की तुलना स्फटिक माला से। |
कोई स्त्री हाथ में दर्पण (शीशा) लिए हुए ऐसी लग रही थी मानो पूर्णिमा की रात हो। किसी के पैरों में अभी ताजा महावर लगा था, जो ऐसा लग रहा था मानो कमलिनी ने सुबह की लाल धूप को पी लिया हो। कुछ स्त्रियों की करधनी ढीली होकर उनके पैरों में उलझ गई थी, जिससे वे जंजीर से बंधी हथिनी की भाँति धीरे-धीरे चल पा रही थीं।
रंगीन वस्त्र पहने हुए स्त्रियाँ वर्षा ऋतु की शोभा की भाँति लग रही थीं। उनके सफेद नाखूनों की चमक ऐसी लग रही थी मानो उनके नूपुरों की आवाज से खिंचे चले आए राजहंस उनके पैरों के पास हों। हाथ में मोतियों का हार लिए कोई सुन्दरी ऐसी लग रही थी मानो कामदेव के विनाश के शोक में स्फटिक की माला धारण किए स्वयं 'रति' खड़ी हो।
Some women holding mirrors resembled the night of the full moon. Some had wet red lac (Alaktaka) on their feet, looking like lotuses that had absorbed the morning sunlight. Due to their hurried pace, the waistbands of some slipped and entangled their feet, making them walk slowly like elephants bound by chains.
Wearing garments as colorful as a rainbow, they appeared like the beauty of the rainy season. The brilliance of their white nails seemed like domestic swans attracted by the tinkling of their anklets. One holding a thick pearl necklace looked like 'Rati' herself, holding a crystal rosary in grief over the loss of Kamadeva.
कादंबरी कथा: अश्व 'इन्द्रायुध' का आगमन एवं चन्द्रापीड का यौवनारम्भ
बाणभट्ट विरचित - संस्कृत गद्य का शिखर
एष खलु देवस्य पारसीकाधिपतिना त्रिभुवनाश्रर्यमिति कृत्वा जलधिजलादुत्थितमयोनिनिदमश्वरत्नमासादितं मया महाराजाधिरोहणयोग्यमिति संदिश्य प्रहित:।
...अविरतपतनौत्पतनजनितविषमखरमुखरखुरपुटैर्जर्जरितवसुंधरैर्मुरजवाद्यमिवाभ्यस्यन्तमुत्कीर्णमिव जङ्घासु विस्तारितमिवोरसि लक्ष्णीकृतमिव मुखे प्रसारितमिव कंधरायामुल्लिखितमिव पार्श्वयोर्द्विगुणीकृतमिव जघनभागे...।
इन्द्रायुध का परिचय: महाराज तारापीड ने चन्द्रापीड के लिए 'इन्द्रायुध' नामक घोड़ा भेजा है, जो वायु और गरुड़ के समान तीव्र गति वाला है। यह घोड़ा पारस (ईरान) के राजा ने भेंट किया था, जिसे समुद्र के जल से उत्पन्न 'अयोनिज' (बिना जन्म के प्रकट) और तीनों लोकों का आश्चर्य माना गया है।
अश्व की विशेषता: इन्द्रायुध के चलने और कूदने की आवाज ऐसी लगती है मानो वह पृथ्वी पर मृदंग (मुरज) बजाने का अभ्यास कर रहा हो। उसकी जंघाएँ उत्कीर्ण (गढ़ी हुई), छाती चौड़ी, मुख चिकना और गर्दन लम्बी है। वह ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् मन का वेग हो।
चन्द्रापीड का रूप: शिक्षा पूर्ण कर लौटे चन्द्रापीड का शरीर यौवन के कारण और भी निखर गया है। उनकी भुजाएँ लंबी हो गई हैं, वक्षस्थल विशाल हो गया है और वाणी में गंभीरता आ गई है।
| संस्कृत पद | अर्थ | विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|
| अनिलगरुडसमजव: | वायु और गरुड़ के समान वेग वाला | घोड़े की तीव्र गति का सूचक। |
| अयोनिजम् | जो गर्भ से उत्पन्न न हुआ हो | दिव्य उत्पत्ति का संकेत। |
| मुरजवाद्यम् | मृदंग जैसा बाजा | खुरों की आवाज की उपमा। |
| जर्जरितवसुंधरै: | पृथ्वी को कँपा देने वाले | घोड़े की शक्ति का वर्णन। |
| अमिततेजसम् | अपार तेज वाला | इन्द्रायुध के दिव्य स्वरूप हेतु। |
The Divine Horse 'Indrayudha': King Tarapida sends a magnificent horse named Indrayudha to Prince Chandrapida. This horse, a gift from the King of Persia, was said to have risen from the ocean and was matchless in all three worlds. Its speed rivaled the wind and Garuda.
Poetic Description: Banabhatta uses masterly metaphors to describe the horse’s gait, comparing the sound of its hooves to the rhythmic beating of drums on the earth. The prince himself is described as reaching the prime of youth, possessing a broad chest and a grave, resonant voice after completing his rigorous education.
यथा यथा च समीपमुपसर्पति चन्द्रापीडस्तथा तथा तासामतिमात्रं ववृधे विस्मयः। परस्परं च सखीजनो व्याहर्तुमारभत— "सखि! पश्य, अहो रूपमतिशयोऽस्य! अहो लावण्यमनिर्वाच्यम्! अहो प्रभावोऽमानुषः! सफलं चक्षुर्जन्म नः। अयं स राजकुमारश्चन्द्रापीडो यमभिनन्दन्ति बन्दिनः।"
"धन्या सा जननी या यमप्रसूत! धन्यं तच्चक्षुर्याभ्यामयमविरतं दृश्यते। सर्वथा नमोऽस्मै रूपान्तरधारिणे भगवते मन्मथाय।" इति व्याहरन्त्यस्तास्तमुपचीयमानप्रीतिरसनिष्यन्दविस्तारितेन लोचनयुगलेनानिमेषेण पपुः।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| करकमलनिहितमुखकमला: | करकमले निहितं मुखकमलं यया सा (बहुव्रीहि) | हाथ रूपी कमल पर मुख रूपी कमल रखे हुए |
| अनिमेषेण | न विद्यते निमेष: यस्मिन् तेन | बिना पलक झपकाए (एकाग्रता से) |
| उपचीयमानप्रीतिरस | उपचीयमान: (बढ़ता हुआ) प्रीतिरस: (प्रेम का रस) | बढ़ते हुए प्रेम के रस से युक्त |
| अमानुष: | न मानुष: (इति) | अलौकिक / दिव्य |
जैसे-जैसे चन्द्रापीड उनके समीप आता गया, वैसे-वैसे उन स्त्रियों का विस्मय बढ़ता ही गया। वे सखियाँ आपस में कहने लगीं— "सखि! देखो, कैसा अद्भुत रूप है! इसका लावण्य तो अनिर्वचनीय है! इसका प्रभाव अलौकिक (अमानुष) है! आज हमारे नेत्रों का जन्म सफल हो गया। यही वे राजकुमार चन्द्रापीड हैं, जिनकी वंदना बन्दीजन कर रहे हैं।"
वे आगे कहने लगीं— "वह माता धन्य है जिसने इन्हें जन्म दिया और वे आँखें धन्य हैं जो इन्हें निरंतर देखती हैं। निश्चय ही ये कोई अन्य रूप धारण किए हुए भगवान कामदेव ही हैं, इन्हें मेरा नमस्कार है।" ऐसा कहती हुई वे स्त्रियाँ, बढ़ते हुए प्रेम-रस से फैली हुई अपनी आँखों से बिना पलक झपकाए मानो राजकुमार के रूप का पान करने लगीं।
As Chandrapida drew closer, their amazement grew beyond measure. The friends began to talk among themselves— "O friend! Look, how extraordinary is his beauty! His charm is beyond words! His aura is divine (superhuman)! Our eyes have finally fulfilled their purpose today. This is indeed Prince Chandrapida, whom the bards are praising."
They continued— "Blessed is the mother who gave birth to him! Blessed are the eyes that behold him constantly. My salutations to him, who appears to be none other than Lord Kamadeva in another form." Saying so, with eyes wide with ever-increasing love and without blinking, they drank in his beauty.
तस्य चोपरि प्रचलत्प्रकीर्णकचामरपुञ्जधवला चपलायमानेन्द्रायुधालोकलोला चन्द्रापीडागमनमुदिता प्रवृत्ता कुसुमवृष्टिः। सा मलयमारुतान्दोलिता सुरलोकवन्दिवृन्दमन्दारासारमुषिणीव गगनतलमलंचकार।
यत्र च संचरति चन्द्रापीडस्तत्र तत्रानुरागमिव विकिरन्त्यः, कुतूहलमिव दर्शयन्त्यः, हृदयमिवार्पयन्त्यः, तासां लोचनपरम्पराः प्रवहन्त्य इव बभुः। चन्द्रापीडस्तु सस्मितमवनतमुखो राजमार्गेण प्रतस्थे।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| विस्मयस्मेरमुखा: | विस्मयेन स्मेरं (मुस्कुराता हुआ) मुखं यासाम् | आश्चर्य से मुस्कुराते हुए मुख वाली |
| कुसुमवृष्टि: | कुसुमानां वृष्टि: (षष्ठी तत्पुरुष) | फूलों की वर्षा |
| मलयमारुतान्दोलिता | मलयमारुतेन आन्दोलिता | मलय पवन से हिलती हुई |
| सस्मितम् | स्मितेन सहितम् (अव्ययीभाव) | मुस्कुराहट के साथ |
राजकुमार के ऊपर फूलों की वर्षा होने लगी। चामरों की श्वेत आभा और इन्द्रायुध (घोड़े) की चपलता के बीच वह कुसुम-वृष्टि ऐसी लग रही थी मानो मलय पवन के झोंकों से आकाश में मन्दार के फूलों की झड़ी लग गई हो।
जहाँ-जहाँ से चन्द्रापीड गुजरता था, वहाँ-वहाँ उन स्त्रियों की चंचल आँखें ऐसी लग रही थीं मानो वे अपना हृदय ही उसे अर्पित कर रही हों। चन्द्रापीड भी मंद मुस्कुराहट के साथ, विनम्रतापूर्वक सिर झुकाए हुए राजमार्ग से आगे बढ़ता गया।
A shower of flowers began to fall upon him. Amidst the white whisks and the restless movements of Indrayudha, the rain of blossoms, swayed by the Malaya breeze, adorned the sky as if celestial Mandara flowers were descending.
Wherever Chandrapida moved, the continuous glances of the women followed him, appearing as if they were showering their affection and surrendering their very hearts to him. Chandrapida, with a slight smile and a humble bowed head, proceeded through the royal highway.



