जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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रहस्यमई घटनाएं:तांत्रिक-महिला

 

रहस्यमई घटनाएं:तांत्रिक-महिला

रहस्यमई घटनाएं:तांत्रिक-महिला 

संयुक्त राज्य अमेरिका के जोर्जिया नामक प्रान्त के प्राचीन अभिलेखों में एक ऐसी तात्रिक वृद्धा का उल्लेख मिलता है जो इस क्षेत्र में सिर्फ चार महीने ठहरी तथा इतने ही दिनों में वह आफत करके रख गई। 

यह घटना सन् 1853 ई. की है। 13 नवम्बर को एक बुढ़िया अपनी चार बिल्लियों के साथ न जाने कहां से आई और फोर्ट वेनिंग क्षेत्र के ट्रेलर पार्क के समीप एक फूटे खण्डहर में डेरा डाल कर रहने लगी। 

तांत्रिक-महिला 

उस तांत्रिक बुढ़िया को कितनों ने ही देखा। मगर यही समझा कि कोई भिखारिन अथवा कोई पागल वृद्धा कहीं से आकर ठहर गई है। अतः किसी ने भी उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। 

जब उस विक्षिप्त समझी जाने वाली बुढ़िया से पूछा गया तो उसने अपना नाम डास डंकन बतलाया। बुढ़िया अपने को कुमारी बतलाती थी। बुढ़िया के बाल श्वेत और शरीर अस्थियों का ढांचा मात्र था

इस विक्षिप्त-सी प्रतीत होने वाली बुढ़िया ने जिस दिन से इस खण्डहर में डेरा डाला उस दिन से पार्क के पक्षियों ने चहचहाना बंद कर दिया। वे गुमसुम घोंसलों में शाम को पहुंचते और उसी खामोशी के साथ बिना पत्ता भी खड़काए सवेरा होते-होते भाग खड़े होते। 

दिन भर उस क्षेत्र में कोई भी पक्षी दिखलाई नहीं पड़ता। एक सप्ताह भा नहीं बीता कि उस उपवन में धुन्ध छाई रहने लगी। वह धुन्ध भी कुछ अजाब थी। उस धुन्ध में न तो कुहरे जैसी नमी थी और न धुएं जैसी घुटन  लगता था अन्धेरा ही हल्की बदली शक्ल में इस इलाके पर छा गया है। 

उस वक्त हर चीज धुन्धली दिखलाई पड़ती। आंखों में बहुत खराबा आ पर जिस प्रकार से हर वस्तु धन्धली दिखती है. ठीक वैसा ही धुन्धलका उस पर घिरा रहने लगा। 

इस ओर से निकलने वालों ने किसी अज्ञात भय से इधर से आना-जाना. बिल्कुल बन्द कर दिया। जिन्हें जरूरी काम से इधर जाना पड़ता था, उन्होंने एक दिन देखा कि वही बुढ़िया उस धुन्ध के ऊपर अधर में चल रही है और बिल्लियां उसके साथ हैं। अधर में चलना विचित्र बात थी। 

उक्त घटना को सैकड़ों लोगों ने देखा। घटना क्या देखी, सभी सकते की हालत में आ गए। यह सिलसिला कई दिन तक चला। नियत समय पर दर्शकों की भीड़ इकट्ठी हो जाती। 

तांत्रिक-महिला 

इसके बाद वह बुढ़िया भी गायब हो गई और वह धुन्ध भी छंट गई। लोगों का अनुमान था कि वह कोई तांत्रिक क्रिया जानने वाली महिला थी। 

चर्चा का विषय सदैव यह रहता था कि तांत्रिक बुढ़िया का डेरा उसी खण्डहर में है। वह वहीं गप्त और प्रकट होती हुई डेरा डाले रहती है। 

हुआ यह कि लोगों ने उस खण्डहर को ही नष्ट कर डालने की ठानी और समूह बनाकर फावड़ा लेकर वहां पहुंचे। समूह अभी खण्डहर तक पहंचने भी न पाया था कि एक भयंकर चक्रवात उस क्षेत्र में अचानक प्रकट हुआ, जिसने उन सभी को उछालकर पटक दिया। लोगों को काफी खासी चोटें आईं, पेड़ उखड़ गए, झोंपड़े उजड़ गए। 

 यहां पर आश्चर्य इस बात का था कि वह तूफान खण्डहर व खण्डहर उखाड़ने वाले लोगों के इर्द-गिर्द ही घुमड़ता रहा और पन्द्रह मिनट तक उन्हें त्रास देने के उपरान्त स्वतः ही समाप्त हो गया। 

लगातार चार महीने तक यह उथल-पुथल बराबर चलती रही। बाद में अपने आप ही उस बुढ़िया और उसकी हलचलों का न जाने कहां पलायन हो गया। 

लोगों को वह बुढ़िया जीवितों की तरह से दिखलाई देती थी किन्तु वस्तुत वह थी अदभूत प्रेतात्मा। जानकार उसे मरण से पूर्व तांत्रिक क्रियाओं से आजीविका कमाने और सदा षड्यन्त्रों में संलग्न रहने वाली प्रकृति की बतलाते थे। मरने के बाद भी वह डरावने नाटक रचती रही। 

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