(कुख्याति और प्रसिद्धि का भेद बताने वाली शिक्षाप्रद कथा)
किसी समय एक दुष्ट स्वभाव का श्वान था। वह लोगों पर अचानक झपट पड़ता था। यद्यपि वह उन्हें काटता नहीं था, परन्तु उसकी आदत इतनी डरावनी थी कि लोग उससे सदा भयभीत रहते थे। वह बिना किसी कारण के उपद्रव मचाता और जहाँ भी जाता, वहाँ अशांति फैल जाती।
उस श्वान के स्वामी ने जब देखा कि लोग उससे अत्यन्त परेशान हैं, तो उसने एक उपाय किया। उसने उस श्वान के गले में एक घण्टा बाँध दिया, जिससे जब भी वह पास आए, लोगों को पहले से ही उसकी उपस्थिति का पता चल जाए और वे सतर्क हो सकें।
अब क्या था —
श्वान को यह घण्टा अपने लिए गौरव का चिन्ह लगने लगा।
वह गर्व से गर्दन ऊँची करके चलता,
घण्टे की टन-टन की आवाज़ के साथ अकड़ कर घूमता,
मानो वह कोई महान् और प्रसिद्ध प्राणी हो।
एक दिन एक वृद्ध और अनुभवी श्वान उसके पास आया और बोला—
“मित्र, तुम इस घण्टे पर गर्व क्यों कर रहे हो?
क्या तुम समझते हो कि यह घण्टा तुम्हारे गुणों का पुरस्कार है?
नहीं! यह तो तुम्हारे दुष्ट स्वभाव की पहचान है।
यह सम्मान नहीं, बल्कि अपमान की मुहर है,
जिसे लोग तुम्हारे खतरनाक स्वभाव के कारण देखते हैं।”
यह सुनकर दुष्ट श्वान स्तब्ध रह गया।
यह कथा हमें बताती है कि—
कुख्याति प्रायः प्रसिद्धि समझ ली जाती है।
परन्तु विवेकी व्यक्ति वही है जो
प्रशंसा और चेतावनी,
सम्मान और अपमान
के बीच का भेद समझ सके।
दुष्टः श्वः .
कदाचित् एकः श्वः आसीत् यः जनान् स्नैपं करोति स्म, विना च तान् दष्टवान् आसीत् । कोऽपि उत्तेजनः, यः च प्रत्येकं महान् उपद्रवः आसीत् यः आगतः।तस्य गुरुगृहम्। अतः तस्य स्वामी तस्य कण्ठं परितः घण्टां बद्धवान् । तस्य सान्निध्यस्य जनान् चेतयति। श्वः घण्टायाः अतीव गर्वितः आसीत्, तथा च अपारसन्तुष्ट्या सह तस्य टिङ्क्लिंग् विषये strutted. परन्तु एकः वृद्धः श्वः तस्य समीपम् आगत्य अवदत्, "यथा न्यूनानि वायुः भवन्तः स्वयमेव उत्तमं ददति, तावत् यावत् भवन्तः स्वयमेव उत्तमं ददति,मम मित्रं। त्वं न मन्यसे, किं त्वं, तव घण्टा त्वां त्वम् अयं दत्ता इति। पुण्यस्य पुरस्कारः ? तद्विपरीतम् अपमानस्य बिल्ला अस्ति” इति ।
कुख्यातिः प्रायः प्रसिद्धेः कृते भ्रान्तं भवति।
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