जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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वसंत देसाई संगीतकार कम और पहलवान ज़्यादा लगते थे।

"वसंत देसाई संगीतकार कम और पहलवान ज़्यादा लगते थे।" ये कहना था 1930-40-50 के नामी संगीतकार और गायक अनिल बिस्वास का। अनिल बिस्वास वसंत देसाई जी को एक इंटरव्यू में याद कर रहे थे। उस इंटरव्यू में वसंद देसाई जी से जुड़ा एक किस्सा साझा करते हुए अनिल बिस्वास जी ने कहा था कि अक्सर वसंत देसाई उनसे कहते थे,"मैं तो आपका हनुमान हूं।" वसंद देसाई ऐसा इसलिए कहते थे क्योंकि वो देखने में बहुत मजबूद कदकाठी के व्यक्ति थे। और अनिल बिस्वास उनसे अक्सर मज़ाक में कहते भी थे कि वसंत, तुम तो पहलवान लगते हो। तुम्हें देखकर कोई यकीन नहीं करेगा कि तुम संगीतकार हो।

साल 1968 में ऋषिकेश मुखर्जी की एक फिल्म रिलीज़ हुई थी जिसका नाम था आशीर्वाद। उस फिल्म में दादामुनि अशोक कुमार, संजीव कुमार, सुमिता सान्याल व वीना ने काम किया था। उस फिल्म का संगीत वसंद देसाई जी ने ही कंपोज़ किया था। उस फिल्म की एक प्राइवेट स्क्रीनिंग दिल्ली में रखी गई थी। और इत्तेफाक से उन दिनों अनिल बिस्वास अपने दिल्ली वाले घर में रहा करते थे। अनिल बिस्वास उन दिनों बीमार थे। वसंद देसाई जी और ऋषि दा अनिल बिस्वास जी के घर पहुंचे और इनसे आग्रह किया कि आप भी आशीर्वाद की स्क्रीनिंग पर चलें। मगर अनिव दा ने अपनी बीमारी का हवाला देते हुए मना कर दिया। 

तब वसंत देसाई जी ने बड़े आराम से अनिल बिस्वास जी को अपने कंधे पर उठाया और और बाहर गाड़ी में ले जाकर बैठा दिया और बोले,"आपका ये हनुमान किसलिए है?" और इस तरह उस दिन अनिल बिस्वास भी आशीर्वाद फिल्म के प्रीमियर में शरीक हुए। आज वसंत देसाई जी का जन्मदिवस है। 9 जून 1912 को वसंत देसाई जी महाराष्ट्र के सिंधूदुर्ग ज़िले के सोनावड़े गांव में जन्मे थे। इनका परिवार अपने इलाके का सभ्रांत और रुतबेदार परिवार था। किस्सा टीवी वसंत देसाई की को नमन करता है। शत शत नमन। #VasantDesai #AnilBiswas #HrishikeshMukherjee

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