जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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आदि पर्व अध्याय 51,52,53,54,55



आदि पर्व अध्याय 51,52,53,54,55

इक्यावनवाँ अध्याय

"जनमेजय के सर्पयज्ञ का उपक्रम"

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- शौनक! श्रीमान राजा जनमेजय ने जब ऐसा कहा, तब उनके मन्त्रियों ने भी उस बात का समर्थन किया। तत्पश्चात राजा सर्पयज्ञ करने की प्रतिज्ञा पर आरूढ़ हो गये। ब्रह्मन! सम्पूर्ण वसुधा के स्वामी भरतवंशियों में श्रेष्ठ परीक्षितकुमार राजा जनमेजय ने उस समय पुरोहित तथा ऋत्विजों को बुलाकर कार्य सिद्ध करने वाली

 बात कही ;- ‘ब्राह्मणों! जिस दुरात्मा तक्षक ने मेरे पिता की हत्या की है, उससे मैं उसी प्रकार का बदला लेना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या कहना चाहिये, यह आप लोग बतावें। क्या आप लोगों को ऐसा कोई कर्म विदित है जिसके द्वारा मैं तक्षक नाग को उसके बन्धु-बान्धवों सहित जलती हुई आग में झोंक सकूँ? उसने अपनी विषाग्नि से पूर्वकाल में मेरे पिता को जिस प्रकार दग्ध किया था, उसी प्रकार मैं भी उस पापी सर्प को जलाकर भस्म कर देना चाहता हूँ।'

ऋत्विजों ने कहा ;- राजन! इसके लिये एक महान यज्ञ है, जिसका देवताओं ने आपके लिये पहले से ही निर्माण कर रखा है। उसका नाम है सर्पसत्र। पुराणों में उसका वर्णन आया है। नरेश्वर! उस यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है- ऐसा पौराणिक विद्वान कहते हैं। उस यज्ञ का विधान हम लोगों को मालूम है। साधुशिरोमणे! ऋत्विजों के ऐसा कहने पर राजर्षि जनमेजय को विश्वास हो गया कि अब तक्षक निश्चय ही प्रज्वलित अग्नि के मुख में समाकर भस्म हो जायेगा। 

तब राजा ने उस समय उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणों से कहा ;- ‘मैं उस यज्ञ का अनुष्ठान करूँगा। आप लोग उसके लिये आवश्यक सामग्री संग्रह कीजिये।' द्विजश्रेष्ठ! तब उन ऋत्विजों ने शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञमण्डप बनाने के लिये वहाँ की भूमि नाप ली। वे सभी ऋत्विज वेदों के यथावत विद्वान तथा परमबुद्धिमान थे। उन्होंने विधिपूर्वक मन के अनुरूप एक यज्ञमण्डप बनाया, जो परम समृद्धि से सम्पन्न, उत्तम द्विजों के समुदाय से सुशोभित, प्रचुर धनधान्य से परिपूर्ण तथा ऋत्विजों से सुसेवित था।

   उस यज्ञमण्डप का निर्माण कराकर ऋत्विजों से सर्पयज्ञ की सिद्धि के लिये उस समय राजा जनमेजय को दीक्षा दी। इसी समय जबकि सर्पसत्र अभी प्रारम्भ होने वाला था, वहाँ पहले ही यह घटना घटित हुई। उस यज्ञ में विघ्न डालने वाला बहुत बड़ा कारण प्रकट हो गया। जब वह यज्ञमण्डप बनाया जा रहा था, उस समय वास्तुशास्त्र के पारंगत विद्वान, बुद्धिमान एवं अनुभवी सूत्रधार ,,

शिल्पवेत्ता सूत ने वहाँ आकर कहा ;- ‘जिस स्थान और समय में यह यज्ञमण्डप मापने की क्रिया प्रारम्भ हुई है, उसे देखकर यह मालूम होता है कि एक ब्राह्मण को निमित्त बनाकर यह यज्ञ पूर्ण न हो सकेगा।' यह सुनकर ,,

राजा जनमेजय ने दीक्षा लेने से पहले ही सेवक को यह आदेश दे दिया ;- ‘मुझे सूचित किये बिना किसी अपरिचित व्यक्ति को यज्ञमण्डप में प्रवेश न करने दिया जाये।'

(इस प्रकार  महाभारत आदि पर्व के अंतर्गत आस्तीक पर्व में सर्पसत्रोपक्रमसम्बंधी इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ)

बावनवाँ अध्याय

"सर्पसत्र का आरम्भ और उसमें सर्पों का विनाश"

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- शौनक! तदनन्तर सर्पयज्ञ की विधि से कार्य प्रारम्भ हुआ। सब याजक विधिपूर्वक अपने-अपने कर्म में संलग्न हो गये। सबकी आँखें धूएँ से लाल हो रही थीं। वे सभी ऋत्विज काले वस्त्र पहनकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रज्वलित अग्नि में होम करने लगे। वे समस्त सर्पों के हृदय में कँपकँपी पैदा करते हुए उनके नाम ले लेकर उन सबका वहाँ आग के मुख में होम करने लगे। तत्पश्चात सर्पगण तड़फड़ाते और दीन स्वर में एक-दूसरे को पुकारते हुए प्रज्वलित अग्नि में टपाटप गिरने लगे। वे उछलते, लम्बी साँसें लेते, पूँछ और फनों से एक-दूसरे को लपेटते हुए धधकती आग के भीतर अधिकाधिक संख्या में गिरने लगे।

   सफेद, काले, नीले, बूढ़े और बच्चे सभी प्रकार के सर्प विविध प्रकार से चीत्कार करते हुए जलती आग में विवश होकर गिर रहे थे। कोई एक कोस लम्बे थे, तो कोई चार कोस और किन्हीं-किन्हीं की लम्बाई तो केवल गाय के कान के बराबर थी। अग्निहोत्रियों में श्रेष्ठ शौनक! वे छोटे-बड़े सभी सर्प बड़े वेग से आग की ज्वाला में निरन्तर आहुति बन रहे थे। इस प्रकार लाखों, करोड़ों तथा अरबों सर्प वहाँ विवश होकर नष्ट हो गये। कुछ सर्पों की आकृति घोड़ों के समान थी और कुछ की हाथी की सूँड के सदृश्य। कितने ही विशालकाय महाबली नाग मतवाले गजराजों को मात कर रहे थे। भयंकर विष वाले छोटे-बड़े अनेक रंग के बहुसंख्यक सर्प, जो देखने में भयानक, परिघ के समान मोटे, अकारण ही डँस लेने वाले और अत्यन्त शक्तिशाली थे, अपनी माता के शाप से पीड़ित होकर स्वयं ही आग में पड़ रहे थे।

(इस प्रकार महाभारत आदि पर्व के अंतर्गत आस्तीक पर्व में सर्पसत्रोपक्रमसम्बंधी बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ)


तिरपनवाँ अध्याय

"सर्पयज्ञ के ऋत्विजों कीका भयंकर विनाश, तक्षक का इंद्र की शरण में जाना तथा वासुकि का अपनी बहिन से आस्तीक को यज्ञ में भेजने के लिये कहना"

शौनक जी ने पूछा ;- सूतनन्दन! पाण्डववंशी बुद्धिमान राजा जनमेजय के उस सर्पयज्ञ में कौन-कौन से महर्षि ऋत्विज बने थे? उस अत्यन्त भयंकर सर्पसत्र में, जो सर्पों के लिये महान भयदायक और विषादजनक था, कौन-कौन से मुनि सदस्य हुए थे? तात! ये सब बातें आप विस्तारपूवर्क बताइये। सूतपुत्र! यह भी सूचित कीजिये कि सर्पसत्र की विधि को जानने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ समझे जाने योग्य कौन-कौन से महर्षि वहाँ उपस्थित थे। 

  उग्रश्रवा जी ने कहा ;- शौनक जी! मैं आपको उन मनीषी महात्माओं के नाम बता रहा हूँ, जो उस समय राजा जनमेजय के ऋत्विज और सदस्य थे। उस यज्ञ में वेद-वेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्राह्मण चण्डभार्गव होते थे। उनका जन्म च्यवनमुनि के वंश में हुआ था। वे उस समय के विख्यात कर्मकाण्डी थे। वृद्ध एवं विद्वान ब्राह्मण कौत्स उद्गाता, जैमिनि ब्रह्मा तथा शांर्गरव और पिंगल अध्वर्यु थे। इसी प्रकार पुत्र और शिष्यों सहित भगवान वेदव्यास, उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पिंगल, असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्ड, जटर, द्विजश्रेष्ठ, कालघट, वात्स्य, जप और स्वाध्याय में लगे रहने वाले बूढ़े श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्रल्य तथा समसौरभ- ये और अन्य बहुत से वेदविद्या के पारंगत, ब्राह्मण जनमेजय के उस सर्पयज्ञ में सदस्य बने थे।

   उस समय उस महान यज्ञ सर्पसत्र में ज्यों-ज्यों ऋत्विज लोग आहुतियाँ डालते, त्यों-त्यों प्राणिमात्र को भय देने वाले घोर सर्प वहाँ आ-आकर गिरते थे। नागों की चर्बी और मेद से भरे हुए कितने ही नाले बह चले। निरन्तर जलने वाले सर्पों की तीखी दुर्गन्ध चारों और फैल रही थी। जो आग में पड़ रहे थे, जो आकाश में ठहरे हुए थे और जो जलती हुई आग की ज्वाला में पक रहे थे, उन सभी सर्पों का करुणक्रन्दन निरन्तर जोर-जोर से सुनायी पड़ता था। नागराज तक्षक ने जब सुना कि राजा जनमेजय ने सर्पयज्ञ की दीक्षा ली है, तब उसे सुनते ही वह देवराज इन्द्र के भवन में चला गया। वहाँ उसने सब बातें ठीक-ठीक कह सुनायीं। फिर सर्पों में श्रेष्ठ तक्षक ने अपराध करने के कारण भयभीत हो इन्द्रदेव की शरण ली। तब इन्द्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा- 'नागराज तक्षक! तुम्हें यहाँ उस सर्पयज्ञ से कदापि कोई भय नहीं है। तुम्हारे लिये मैंने पहले से ही पितामह ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया है, अतः तुम्हें कुछ भी भय नहीं है। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये।'

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- इन्द्र के इस प्रकार आश्वासन देने पर सर्पों में श्रेष्ठ तक्षक उस इन्द्र भवन में ही सुखी एवं प्रसन्न होकर रहने लगा। नाग निरन्तर उस यज्ञ की आग में आहुति बनते जा रहे थे। सर्पों का परिवार अब बहुत थोड़ा बच गया था। यह देख वासुकि नाग अत्यन्त दुखी हो मन-ही-मन संतप्त होने लगे। सर्पों में श्रेष्ठ वासुकि पर भयानक मोह-सा छा गया, उनके हृदय में चक्कर आने लगा। 

अतः वे अपनी बहिन से इस प्रकार बोले ;- ‘भद्रे! मेरे अंगों में जलन हो रही है। मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं। मैं शिथिल-सा हो रहा हूँ और मोहवश मेरे मस्तिष्क में चक्कर सा आ रहा है, मेरे नेत्र घूम रहे हैं, हृदय अत्यन्त विदीर्ण-सा होता जा रहा है। जान पड़ता है, आज मैं भी विवश होकर उस यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में गिर पडूँगा। जनमेजय का वह यज्ञ हम लोगों की हिंसा के लिये ही हो रहा है। निश्चय ही अब मुझे भी यमलोक जाना पड़ेगा। बहिन! जिसके लिये मैंने तुम्हारा विवाह जरत्कारु मुनि से किया था, उसका यह अवसर आ गया है। तुम बान्धवों सहित हमारी रक्षा करो। श्रेष्ठ नागकन्ये! 

पूर्वकाल में साक्षात ब्रह्मा जी ने मुझसे कहा था,,- आस्तीक उस यज्ञ को बंद कर देगा। अतः वत्से! आज तुम बन्धु-बान्धवों सहित मेरे जीवन को संकट से छुड़ाने के लिये वे देवताओं में श्रेष्ठ अपने पुत्र कुमार आस्तीक से कहो। वह बालक होने पर भी वृद्ध पुरुषों के लिये भी आदरणीय है।'

(इस प्रकार  महाभारत आदि पर्व के अंतर्गत आस्तीक पर्व में सर्पसत्र के विषय में वासुकि-वचनसम्बंधी तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ)


चौवनवाँ अध्याय

"माता की आज्ञा से मामा को सांत्वना देकर आस्तीक का सर्पयज्ञ में जाना"

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- जब नागकन्या जरत्कारू नागराज वासुकि के कथनानुसार अपने पुत्र को बुलाकर,,

 इस प्रकार बोली ;- ‘बेटा! मेरे भैया ने एक निमित्त को लेकर तुम्‍हारे पिता के साथ मेरा विवाह किया था। उसकी पूर्ति का यही उपयुक्त अवसर प्राप्त हुआ है। अतः तुम यथावत रूप से उस उद्देश्य की पूर्ति करो’। 

आस्तीक ने पूछा ;- मां! मामा जी ने किस निमित्त को लेकर पिता जी के साथ तुम्हारा विवाह किया था? वह मुझे ठीक-ठीक बताओ। उसे सुनकर मैं उसकी सिद्धि के लिये प्रयत्न करूँगा। 

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- तदनन्तर अपने भाई-बन्धुओं का हित चाहने वाली नागराज की बहिन जरत्कारु शान्तचित्त हो आस्तीक से बोली।

 जरत्कारु ने कहा ;- 'वत्स! सम्पूर्ण नागों की माता कद्रू नाम से विख्यात हैं। उन्होंने किसी समय रुष्ट होकर अपने पुत्रों को शाप दे दिया था। जिस कारण से वह शाप दिया, वह बताती हूँ, सुनो।

(अश्वों का राजा जो उच्चैःश्रवा है, उसके रंग को लेकर विनता के साथ कद्रू ने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी ‘जो हारे वह जीतने वाली की दासी बने।' कद्रू उच्चैःश्रवा की पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रों से कहा- ‘तुम लोग छलपूर्वक उस घोड़े की पूँछ काले रंग की कर दो।’ सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पों को शाप देते हुए कहा-) पुत्रों! तुम लोगों ने मेरे कहने से अश्वराज उच्चैःश्रवा की पूँछ का रंग न बदलकर विनता के साथ जो मेरी दासी होने की शर्त थी, उसमें- उस घोड़े के सम्बन्ध में विनता के कथन को मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजय के यज्ञ में तुम लोगों को आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोक को चले जाओगे। कद्रू ने जब इस प्रकार शाप दे दिया। तब साक्षात लोक पितामह भगवान ब्रह्मा ने ‘एवमस्तु’ कहकर उसके वचन का अनुमोदन किया।

तात! मेरे भाई वासुकि ने भी उस समय पितामह की बात सुनी थी। फिर अमृत मन्थन का कार्य हो जाने पर वे देवताओं की शरण में गये। देवता लोग मेरे भाई की सहायता से उत्तम अमृत पाकर अपना मनोरथ सिद्ध कर चुके थे। अतः ये मेरे भाई को आगे करके पितामह ब्रह्मा जी के पास गये। वहाँ समस्त देवताओं ने नागराज वासुकि के साथ रहकर पितामह ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उन्हें प्रसन्न करने का उद्देश्य यह था कि माता का शाप लागू न हो। 

  देवता बोले ;- भगवन! ये नागराज वासुकि अपने जाति-भाईयों के लिये बहुत दुःखी हैं। कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे माता का शाप इन लोगों पर लागू न हो।

ब्रह्मा जी ने कहा ;- जरत्‍कारु मुनि जरत्‍कारु नाम वाली जिस पत्‍नी को ग्रहण करेंगे, उसके गर्भ से उत्‍पन्‍न ब्राह्मण सर्पों को माता के शाप से मुक्‍त करेगा। देवता के समान तेजस्‍वी पुत्र! ब्रह्मा जी की यह बात सुनकर नागश्रेष्‍ठ वासुकि ने मुझे तुम्‍हारे महात्‍मा पिता की सेवा में समर्पित कर‍ दिया। यह अवसर आने से बहुत पहले इसी निमित्‍त से मेरा विवाह किया गया। तदनन्‍दर उन महर्षि द्वारा मेरे गर्भ से तुम्‍हारा जन्‍म हुआ। जनमेजय के सर्पयज्ञ का वह पूर्वनिर्दिष्‍ट काल आज उपस्थित है (उस यज्ञ में निरन्‍तर सर्प जल रहें हैं), अत: उस भय से तुम उन सबका उद्धार करो। मेरे भाई को भी उस भयंकर अग्नि से बचा लो। जिस उद्देश्‍य को लेकर तुम्‍हारे बुद्धिमान पिता की सेवा में मैं दी गयी, वह व्‍यर्थ नहीं जाना चाहिए। अथवा बेटा! सर्पों को इस संकट से बचाने के लिए तुम क्‍या उचित समझते हो।'

उग्रश्रवा जी कहते हैं ;- माता के ऐसा कहने पर,,

 आस्तीक ने उससे कहा ;- 'माँ! तुम्‍हारी जैसी आज्ञा है वैसा ही करुंगा। इसके बाद वे दु:ख पीड़ित वासुकि को जीवनदान देते हुए से बोले महान शक्तिशाली नागराज वासुके! मैं आपको माता के उस शाप से छुड़ा दूंगा। यह आपसे सत्‍य कहता हूँ। नागप्रवर! आप निश्चिन्‍त रहें। आपके लिए कोई भय नहीं है। राजन! जैसे भी आपका कल्‍याण होगा, मैं वैसा प्रयत्‍न करूँगा। मैंने कभी हंसी मजाक में भी झूठी बात नहीं कही है, फि‍र इस संकट के समय तो कह ही कैसे सकता हूँ। सत्‍पुरुषों में श्रेष्‍ठ मामा जी! सर्पयज्ञ के लिए दीक्षितनृपश्रेष्‍ठ जनमेजय के पास जाकर अपनी मंगलमयी वाणी से आज उन्‍हें ऐसा संतुष्ट करुंगा, जिससे राजा का वह यज्ञ बंद हो जाएगा। महाबुद्धिमान नागराज! मुझमें यह सब कुछ करने की योग्‍यता है, आप इस पर विश्‍वास रखें। आपके मन में मेरे प्रति जो आशा भरोसा है, वह कभी मिथ्‍या नहीं हो सकता।'

वासुकि बोले ;- आस्‍तीक! माता के शाप रुप ब्रह्मदण्‍ड से पीड़ित होने के कारण मुझे चक्‍कर आ रहा है, मेरा हृदय विदीर्ण होने लगा है और मुझे दिशाओं का ज्ञान नहीं हो रहा है। 

आस्‍तीक ने कहा ;- नागप्रवर! आपको मन में किसी प्रकार का संताप नही करना चाहिये। सर्पयज्ञ की धधकती हुई आग से जो भय आपको हुआ है, मैं उसका नाश कर दूंगा। कालाग्नि के समान दाहक और अत्‍यंत भयंकर शाप का यहाँ मैं अवश्‍य नाश कर डालूँगा। अत: आप उससे किसी तरह भय न करें। 

उग्रश्रवा जी कहते है ;- तदनन्‍तर नागराज वासुकि के भयंकर चिन्‍ता-ज्‍वर को दूर कर और उसे अपने उपर लेकर द्विज श्रेष्ठ आस्‍तीक बड़ी उतावली के साथ नागराज वासुकी आदि को प्राण संकट से छुड़ाने के लिये राजा जनमेजय के उस सर्प यज्ञ में गये, जो समस्‍त उत्तम गुणों से सम्पन्न था। वहाँ पहुँचकर आस्‍तीक ने परम उत्तम यज्ञमण्‍डप देखा, जो सूर्य और अग्नि के समान तेजस्‍वी अनेक सदस्‍यों से भरा हुआ था। द्विजश्रेष्ठ आस्‍तीक जब यज्ञमण्‍डप में प्रवेश करने लगे, उस समय द्वारपालों ने उन्‍हें रोक दिया। तब काम-क्रोध आदि शत्रुओं को संतप्त करने वाले आस्‍तीक उसमें प्रवेश करने की इच्‍छा रखकर उस यज्ञ की स्‍तुति करने लगे। इस प्रकार उस परम उत्तम यज्ञमण्‍डप के निकट पहुँचकर पुण्‍यवानों में श्रेष्ठ विप्रवर आस्‍तीक ने अक्षय कीर्ति से सुशोभित यजमान राजा जनमेजय, ॠत्विजों, सदस्‍यों तथा अग्निदेव का स्‍तवन आरम्‍भ किया।

(इस प्रकार  महाभारत आदि पर्व के अंतर्गत आस्तीक पर्व में सर्पसत्र में आस्तीक का आगमन-विषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ)


पचपनवाँ अध्याय

"आस्तीक के द्वारा यजमान, यज्ञ, ॠत्विज, सदस्‍यगण और अग्निदेव की स्‍तुति-प्रशंसा"

आस्तीक ने कहा ;- भरतवंशियों में श्रेष्ठ जनमेजय! चन्‍द्रमा का जैसा यज्ञ हुआ था, वरुण ने जैसा यज्ञ किया था और प्रयाग में प्रजापति ब्रह्मा जी का यज्ञ जिस प्रकार समस्‍त सद्गुणों से सम्पन्न हुआ था, उसी प्रकार तुम्‍हारा यह यज्ञ भी उत्तम गुणों से युक्‍त है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। भरतकुल शिरोमणि परीक्षितकुमार! इन्‍द्र के यज्ञों की संख्‍या सौ बतायी गयी है, राजा पुरु के यज्ञों की संख्‍या भी उनके समान ही सौ है। उन सबके यज्ञों के तुल्‍य ही तुम्‍हारा यह यज्ञ शोभा पा रहा है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। जनमेजय! यमराज का यज्ञ, हरिमेधा का यज्ञ तथा राजा रन्तिदेव का यज्ञ जिस प्रकार श्रेष्ठ गुणों से सम्‍पन्न था, वैसे ही तुम्‍हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। भरतवंशियों में अग्रगण्‍य जनमेजय! महाराज गय का यज्ञ, राजा शशबिन्‍दु का यज्ञ तथा राजाधिराज कुबेर का यज्ञ जिस प्रकार उत्तम विधि-विधान से सम्‍पन्न हुआ था, वैसे ही तुम्हारा वह यज्ञ है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। परिक्षितकुमार! राजा नृग, राजा अजमीढ़ और महाराज दशरथनन्‍दन श्री रामचंद्र जी ने जिस प्रकार यज्ञ किया था, वैसे ही तुम्हारा यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो।

  भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अजमीढ़वंशी धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर के यज्ञ की ख्‍याति स्‍वर्ग के श्रेष्ठ देवताओं ने भी सुन रखी थी, वैसा ही तुम्हारा भी यह यज्ञ है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। भरताग्रगण्‍य जनमेजय! सत्‍यवतीनन्‍दन व्‍यास जी का यज्ञ जिसमें उन्‍होंने स्‍वयं सब कार्य सम्‍पन्न किया था, जैसा हो पाया था, वैसा ही तुम्हारा यह यज्ञ भी है। हमारे प्रियजनों का कल्‍याण हो। तुम्‍हारे ये ॠत्विज सूर्य के समान तेजस्‍वी हैं और इन्‍द्र के यज्ञ की भाँति तुम्‍हारे इस यज्ञ का भली-भाँति अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ऐसी जानने योग्‍य वस्‍तु नहीं है, जिसका इन्‍हें ज्ञान न हो। इन्‍हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं हो सकता। द्वैपायन व्‍यास जी के समान पारलौकिक साधनों में कुशल दूसरा कोई ॠत्विज्ञ नहीं है, यह मेरा निश्चित मन हैं। इनके शिष्‍य ही अपने-अपने कर्मों में निपुण होता, उद्गाता आदि सभी प्रकार के ॠत्विज हैं, जो यज्ञ कराने के लिये सम्‍पूर्ण भूमण्डल में विचरते रहते हैं। जो विभावसु, चित्रभानु, महात्‍मा, हिरण्‍यरेता, हविष्‍यमोजी तथा कृष्‍णवर्त्‍मा कहलाते हैं, वे अग्निदेव तुम्‍हारे इस यज्ञ में दक्षिणावर्त शिखाओं से प्रज्‍वलित हो दी हुई आहुति को भोग लगाते हुए तुम्‍हारे इस हविष्‍य की सदा इच्‍छा रखते हैं। इस मृत्‍युलोक में तुम्‍हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा राजा नहीं है, जो तुम्‍हारी भाँति प्रजा का पालन कर सके। तुम्‍हारे धैर्य से मेरा मन सदा प्रसन्न रहता है। तुम साक्षात् वरुण, धर्मराज एवं यम के समान प्रभावशाली हो।

   पुरुषों में श्रेष्ठ जनमेजय! जैसे साक्षात वज्रपाणि इन्‍द्र सम्‍पूर्ण प्रजा की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस लोक में हम प्रजावर्ग के पालक माने गये हो। संसार में तुम्‍हारे सिवा दूसरा कोई भूपाल तुम-जैसा प्रजापालक नहीं है। राजन! तुम खट्वांग, नाभाग और दिलीप के समान प्रतापी हो। तुम्‍हारा प्रभाव राजा ययाति और मान्धाता के समान है। तुम अपने तेज से भगवान सूर्य के प्रचण्‍ड तेज की समानता कर रहे हो। जैसे भीष्‍मपितामह ने उत्तम ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी इस यज्ञ में परम उत्तम व्रत का पालन करते हुए शोभा पा रहे हो। महर्षि बाल्‍मीकि की भाँति तुम्‍हारा अद्भुत पराक्रम तुममें ही छिपा हुआ है। महर्षि वसिष्ठ जी के समान तुमने क्रोध को काबू में कर रखा है। मेरी ऐसी मान्‍यता है कि तुम्हारा प्रभुत्‍व इन्‍द्र के ऐश्वर्य के तुल्‍य है और तुम्‍हारी अंगकान्ति भगवान नारायण के समान सुशोभित होती है। तुम यमराज की भाँति धर्म के निश्चित सिद्वांत को जानने वाले हो। भगवान् श्रीकृष्‍ण की भाँति सर्वगुण सम्‍पन्न हो। वसुगणों के पास जो सम्‍पत्तियां हैं, वैसी ही सत्म्‍पदाओं के तुम निवास स्‍थान हो तथा यज्ञों की तुम साक्षात निधि ही हो। राजन! तुम बल में दम्भोभ्दव के समान और अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में परशुराम के सदृश हो। तुम्‍हारा तेज और्व और त्रित नामक महर्षियों के तुल्‍य है। राजा भागीरथ की भाँति तुम्‍हारी ओर देखना भी कठिन है। 

उग्रश्रवा जी कहते है ;- आस्तीक के इस प्रकार स्‍तुति करने पर यजमान राजा जनमेजय, सदस्‍य, ॠत्विज और अग्निदेव सभी बड़े प्रसन्न हुऐ। इन सबके मनोभावों तथा चेष्टाओं को लक्ष्‍य करके राजा जनमेजय इस प्रकार बोले।

(इस प्रकार  महाभारत आदि पर्व के अंतर्गत आस्तीक पर्व में सर्पसत्र में राजा जनमेजय की स्तुति-विषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ)

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