तवमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पर्क्ष ईशिषे |
तवं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधतः पासि नु तमना ||
यह मंत्र अग्नि को रुद्र–मारुत–वायु–पूषा जैसे अनेक देव-तत्त्वों का एकीकृत केंद्र घोषित करता है। यह ऋग्वेद की सबसे गहरी दृष्टियों में से एक है, जहाँ देव अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही चेतना के विभिन्न कार्य-रूप हैं।
तवम् अग्ने रुद्रो असुरो महो दिवः
तवम् शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे ।
तवम् वातैर अरुणैर यासि शङ्गयः
तवम् पूषा विधतः पासि नु त्मना ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
रुद्रः – परिवर्तन, उग्र करुणा, शुद्धि की शक्ति
असुरः – प्राण-शक्ति, जीवंत ऊर्जा
महो दिवः – महान् दिव्य लोक से प्रकट
शर्धः मारुतम् – मरुतों का समूह (सामूहिक ऊर्जा, गति)
पृक्ष – पोषण करने वाला
ईशिषे – नियंत्रित करते हो
वातैः अरुणैः – प्राण-वायु, तेजस्वी शक्तियों के साथ
यासि – गतिशील होते हो
शङ्गयः – कल्याणकारी, मंगलदायक
पूषा – मार्गदर्शक, पोषणकर्ता
विधतः – कर्म करने वाले मनुष्य का
पासि – पालन करते हो
नु त्मना – अपने स्वभाव से, सहज रूप से
हे अग्नि!
तुम ही रुद्र हो — जो शुद्धि और परिवर्तन लाते हो।
तुम ही मरुतों की सामूहिक शक्ति को पोषित और नियंत्रित करते हो।
तुम प्राण-वायु के साथ गतिशील होकर
सदा कल्याणकारी मार्गों पर चलते हो।
तुम ही पूषा हो —
जो कर्मशील मनुष्य की रक्षा और पोषण
अपने सहज स्वभाव से करते हो।
👉 Agni Sukta Mantra 5 Inner Strength Mantra
यहाँ रुद्र का अर्थ:
👉 जो टूटता है, वही नया बनता है।
👉Agni Sukta Mantra 4 Protection & Balance
मरुत व्यक्तिगत शक्ति नहीं हैं।
वे:
अग्नि उनका ईश (controller) है।
👉 आज की भाषा में:
System Energy + Co-ordination
👉Agni Sukta Mantra 3 Divine Messenger Mantra
वातैर अरुणैर यासि
👉 जहाँ प्राण जाता है, चेतना वहीं प्रकाशित होती है।
पूषा कोई बाहरी देव नहीं — वह अंतर्यामी मार्गदर्शक है।
अग्नि ही:
यह मंत्र आज कहता है:
👉 यही सतत विकास (Sustainable Evolution) है।
यह मंत्र विशेष रूप से उपयोगी है जब:
यह मंत्र भीतर की रुद्र-अग्नि को जाग्रत करता है
जो विनाश नहीं, पुनर्निर्माण करती है।
👉Agni Sukta Mantra 1 | तवमग्ने दयुभिस्त्वम् | Vedic Fire Mantra Hindi
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