तवमग्ने राजा वरुणो धर्तव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्यः |
तवमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं तवमंशो विदथे देव भाजयुः ||
यह मंत्र अग्नि को ऋत–नियम–धर्म–सामाजिक समरसता के एकीकृत तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह अग्नि को केवल अग्नि नहीं, बल्कि राजा, नैतिक नियम, मित्रता, समाज-व्यवस्था और देव-भागीदारी का केंद्र बताता है।
तवम् अग्ने राजा वरुणः धृतव्रतः
तवम् मित्रः भवसि दस्मः ईड्यः ।
तवम् अर्यमा सत्पतिः यस्य सम्भुजम्
तवम् अंशः विदथे देव-भाजयुः ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
राजा वरुणः – वरुण-तत्त्व (नियम, ऋत, नैतिक अनुशासन) के राजा हो
धृतव्रतः – जो व्रत/नियम को दृढ़ता से धारण करता है
मित्रः – मित्र (सामंजस्य, विश्वास)
दस्मः – अद्भुत, प्रज्ञावान
ईड्यः – स्तुति के योग्य
अर्यमा – सामाजिक मर्यादा, उत्तरदायित्व, विवाह-संस्कार का तत्त्व
सत्पतिः – सज्जनों का स्वामी, धर्मपालक
सम्भुजम् – जिसका पालन-पोषण/संरक्षण होता है
अंशः – भाग, सहभागिता
विदथे – यज्ञ/सभा/सामूहिक कर्म में
देव-भाजयुः – देवों में भाग बाँटने वाला
हे अग्नि!
तुम ही राजा वरुण हो—ऋत और नियम के धारक।
तुम ही मित्र हो—विश्वास और सौहार्द के स्रोत।
तुम ही अर्यमा हो—समाज और मर्यादा के संरक्षक।
यज्ञ और कर्म में तुम ही देवताओं को उनका भाग देने वाले हो।
यह मंत्र बताता है कि—
आज की भाषा में यह मंत्र कहता है:
👉 ये चारों जब एक साथ हों, तभी सभ्यता टिकती है।
अलग-अलग हों तो:
इस मंत्र का जप विशेष रूप से:
के लिए अत्यंत उपयोगी है।
यह मंत्र “धर्म + करुणा + व्यवस्था” का संतुलन जगाता है।
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