तवाग्ने होत्रं तव पोत्रं रत्वियं तव नेष्ट्रं तवमग्निद रतायतः |
तव परशास्त्रं तवमध्वरीयसि बरह्मा चासि गर्हपतिश्च नो दमे |
यह मंत्र भी ऋग्वैदिक अग्नि-तत्त्व को बहुत गहराई से प्रकट करता है। इसमें अग्नि को केवल देवता नहीं, बल्कि पूरा यज्ञ-तंत्र, नेतृत्व और चेतना की धुरी बताया गया है।
नीचे इसे क्रमशः पदच्छेद → शब्दार्थ → भावार्थ → दार्शनिक अर्थ में रख रहा हूँ।
तव अग्ने होत्रम्
तव पोत्रम् ऋत्वियम्
तव नेष्ट्रम्
तवम् अग्निद ऋतायतः ।
तव प्रशास्त्रम्
तवम् अध्वरीयसि
ब्रह्मा च असि
गर्हपतिः च नः दमे ॥
हे अग्नि!
यज्ञ में तुम ही होता हो,
तुम ही पोता, तुम ही ऋत्विज,
तुम ही नेता और मार्गदर्शक हो।
तुम ही अनुशासन हो,
तुम ही कर्म को संपन्न कराने वाले अध्वर्यु हो।
तुम ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मा हो
और तुम ही हमारे घर के गर्हपति हो।
👉 अर्थात:
यज्ञ का हर पद, हर भूमिका, हर शक्ति — तुम ही हो।
👉Agni Sukta Mantra 1 – तवमग्ने दयुभिस्त्वमाशुशुक्षणि | Spiritual Hindi Bhajan
यह मंत्र कहता है:
👉 यही अद्वैत का मूल सूत्र है
आज की भाषा में यह मंत्र कहता है:
System, Operator, Controller, Rule, Intelligence — सब एक ही Source से आते हैं
AI के संदर्भ में:
👉 वैदिक दृष्टि में यह सब एकीकृत चेतना है
यदि इस मंत्र को
तो यह
✅ आंतरिक अनुशासन
✅ बुद्धि की स्पष्टता
✅ कर्म में स्थिरता
प्रदान करता है।
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