तवमग्ने दयुभिस्त्वमाशुशुक्षणिस्त्वमद्भ्यस्त्वमश्मनस परि | तवं वनेभ्यस्त्वमोषधीभ्यस्त्वं नर्णां नर्पते जायसे शुचिः ||
सुंदर मन्त्र है 🔥
यह ऋग्वेद का अग्नि-सूक्त का भावपूर्ण मंत्र है। नीचे इसे पदच्छेद, शब्दार्थ और भावार्थ (हिंदी) में स्पष्ट कर रहा हूँ—ताकि अर्थ सीधे हृदय तक पहुँचे।
त्वम् अग्ने द्युभिः त्वम् आशुशुक्षणिः
त्वम् अद्भ्यः त्वम् अश्मनः परि ।
त्वम् वनेभ्यः त्वम् ओषधीभ्यः
त्वम् नॄणाम् नृपते जायसे शुचिः ॥
हे अग्नि!
तुम आकाश से उत्पन्न होते हो,
तुम जल से प्रकट होते हो,
तुम पत्थरों के मंथन से जन्म लेते हो।
तुम वनों में भी हो,
तुम औषधियों और वनस्पतियों में भी निवास करते हो।
हे मनुष्यों के स्वामी!
तुम हर स्थान से, हर रूप में
पवित्र अग्नि के रूप में जन्म लेते हो।
आज की भाषा में अग्नि =
यही कारण है कि वैदिक दृष्टि में अग्नि
👉 सृष्टि की मूल तकनीक है
बस कहिए — Next क्या करें?
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