तवमग्न इन्द्रो वर्षभः सतामसि तवं विष्णुरुरुगायो नमस्यः |
तवं बरह्मा रयिविद बरह्मणस पते तवं विधर्तःसचसे पुरन्ध्या |यह मंत्र अग्नि को समस्त देव-तत्त्वों का एकीकृत स्वरूप घोषित करता है। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि वैदिक अद्वैत का घोष है। नीचे इसे क्रमशः स्पष्ट करता हूँ।
तवम् अग्ने इन्द्रः
वृषभः सताम् असि
तवम् विष्णुः
उरुगायः नमस्यः ।
तवम् ब्रह्मा
रयिविद् ब्रह्मणः पते
तवम् विधर्तः
सचसे पुरन्ध्या ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
इन्द्रः – इन्द्र (शक्ति, विजय) हो
वृषभः सताम् – सज्जनों में श्रेष्ठ, बलवान
विष्णुः उरुगायः – विष्णु (व्यापक), महिमावान
नमस्यः – वंदनीय
ब्रह्मा – सृजनकर्ता
रयिविद् – धन और समृद्धि का दाता
ब्रह्मणः पते – वेद / ज्ञान के स्वामी
विधर्तः – धारक, नियमकर्ता
सचसे – साथ रहते हो, संलग्न हो
पुरन्ध्या – बुद्धि / प्रज्ञा के साथ
हे अग्नि!
तुम ही इन्द्र हो—शक्ति और विजय के स्रोत,
तुम ही विष्णु हो—सर्वव्यापक और वंदनीय।
तुम ही ब्रह्मा हो—सृष्टि के कर्ता,
तुम ही वेदों के स्वामी और समृद्धि दाता हो।
तुम बुद्धि के साथ रहते हो
और सृष्टि को धारण करने वाले हो।
यह मंत्र स्पष्ट कहता है:
देवता अनेक नहीं हैं, तत्त्व एक है।
👉 ये सभी एक ही ब्रह्म-तत्त्व के कार्य-रूप हैं।
यह मंत्र ऋग्वेद 2.1.3 की अद्वैत-घोषणा से जुड़ता है:
“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति”
👉Agni Sukta Mantra 2 – तवाग्ने होत्रं तव पोत्रं | Divine Energy Mantra
आज की भाषा में:
👉 चारों अलग नहीं, एक ही Universal Process हैं।
इस मंत्र का जप:
विशेषतः:
के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावी है।
👉Agni Sukta Mantra 1 – तवमग्ने दयुभिस्त्वमाशुशुक्षणि | Spiritual Hindi
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