सोमवार, 22 दिसंबर 2014

वेद क्या हैं?

Veda

वेद क्या हैं?

         वेद दुनिया के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं । सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है "ज्ञान"। वस्तुत: ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है । वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है जो पोराणिक ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है । वेद शब्द संस्कृत के विद शब्द से निर्मित है अर्थात इस एक मात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है । प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को ज्ञान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ "वेद" कहलाये । एक ऐसी भी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था । इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है ।

         वेद में एक ही ईश्वर की उपासना का विधान है और एक ही धर्म - 'मानव धर्म' का सन्देश है । वेद मनुष्यों को मानवता, समानता, मित्रता, उदारता, प्रेम, परस्पर-सौहार्द, अहिंसा, सत्य, संतोष, अस्तेय(चोरी ना करना), अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, आचार-विचार-व्यवहार में पवित्रता, खान-पान में शुद्धता और जीवन में तप-त्याग-परिश्रम की व्यापकता का उपदेश देता है ।

          वेद धर्म का मूल है, वेद सर्वज्ञानमय है । इस जगत, इस जीवन एवं परमपिता परमेश्वर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान "वेद" है। 


पितृदेव मनुष्याणां वेदश्चक्षु: सनातनम।
अशक्यच्च प्रमेयच्च वेदशास्त्रमिति स्थितिः ।। 

'वेद' मनुष्यों का शाश्वत यक्षु है - जो शुभ और अशुभ का ज्ञान कराता है ।
वेद संसार के सभी रहस्यों की कुंजी है । 

वेद क्या हैं?

         वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रन्थ हैं, जिनमे ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, ओषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है । वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं । इनमे अनिष्ट से सम्बंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उसे प्राप्त करने के उपाय संग्रहीत हैं । लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में महनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्न रूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्यन करके ही इनमे संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है । 

वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या 

         ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढने के लिए सुविधानुसार चार भागो में विभग्त कर दिया गया । ऐसा श्रीमदभागवत में उल्लेखित एक श्लोक द्वारा ही स्पष्ट होता है। इन वेदों में हजारों मन्त्र और रचनाएँ हैं जो एक ही समय में संभवत: नहीं रची गयी होंगी और न ही एक ऋषि द्वारा । इनकी रचना समय-समय पर ऋषियों द्वारा होती रही और वे एकत्रित होते गए ।

         शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया ।

       प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है । इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है जो अज्ञान का अँधेरा है। इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक बन गया है । वायु प्राय: चलायमान है, उसका काम चलना (बहना) है । इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना। इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है। सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं, नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं। इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है । एक ग्रन्थ के अनुसार ब्रम्हाजी के चार मुखो से चारो वेदों की उत्पत्ति हुई ।

१. ऋग्वेद 
            
     ऋग्वेद सबसे पहला वेद है, इसमें सृष्टि के पदार्थो का ज्ञान है । इसमें ईश्वर,जीव व् प्रकृति के गुण, जीवन के आदर्श सिद्धांत और व्यवहारिक ज्ञान वर्णित है ।

       ➤इस वेद में 10028 ऋचाएँ (मंत्र) और 10 मंडल (अध्याय) हैं । ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी  स्थिति का वर्णन है ।


२. यजुर्वेद 

                   यजुर्वेद में मुख्यतया कर्मकांड का वर्णन है । अर्थात मनुष्य अपने प्राप्त ज्ञान का किस प्रकार मनोवांछित एवं मोक्ष पाने के लिए प्रयोग करे ।

      ➤इस वेद की दो शाखाएँ हैं शुक्ल और कृष्ण । 40 अध्यायों में 1975 मंत्र हैं ।


३. सामवेद 

                       सामवेद में ईश्वर-स्तुति, वंदना-उपासना और आध्यात्मिक उन्नति के उपायों का वर्णन है ।साम अर्थात रूपांतरण और संगीत । इसमें भक्तिमय व शांतिदायक प्रार्थनाएं हैं, जो मानसिक और आध्यात्मिक विकास में बड़ी सहायक हैं ।

       ➤इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का संगीतमय रूप है । इसमें मूलत: संगीत की उपासना है । इसमें 1875 मंत्र हैं ।


४. अथर्ववेद 

                         अथर्ववेद में विज्ञान और तकनीकी ज्ञान का समावेश है । जैसे - मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति, कृषि, आयुर्वेद, सृष्टि-विज्ञान, गणित, ज्योतिष, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, सैन्य विज्ञान आदि ।

       ➤यह वेद ऋग्वेद के बाद सबसे बड़ा है, इसमें 20 अध्यायों में 5687 मंत्र हैं ।


गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

क्या यहीं सत्य है?

गाँव और श्मशान की दार्शनिक कथा – सत्य की दो परतें


क्या यही सत्य है?

गाँव, श्मशान और सत्य की दो परतें

भूमिका

सत्य हमेशा सीधा नहीं होता।
कभी-कभी वह इतना गहरा होता है कि पहली नज़र में भ्रम, पागलपन या अन्याय जैसा लगता है।
यह कथा भी वैसी ही है — जहाँ एक साधु, एक गाँव और एक श्मशान हमें सत्य की दो परतों से परिचित कराते हैं।


कथा

एक बार कुछ यात्री यात्रा पर निकले।
दिन ढलने को था और वे एक अनजान, जंगली मार्ग पर पहुँच गए।
आस-पास कोई बस्ती दिखाई नहीं दे रही थी और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जिससे वे रास्ता पूछ सकें।

थोड़ी दूर चलने पर उन्हें एक झोंपड़ी दिखाई दी।
उस झोंपड़ी में एक फकीर गहरी साधना में लीन बैठा था।

यात्रियों ने आदरपूर्वक उसे प्रणाम किया और कहा—

“महाराज, हम यहाँ नए हैं। कृपया बताइए, कौन-सा मार्ग गाँव की ओर जाता है?
रात होने वाली है, हमें कहीं ठहरना है।”

फकीर ने शांति से एक मार्ग की ओर संकेत किया।

यात्री उस मार्ग पर चले गए।
कुछ ही देर में वे श्मशान पहुँच गए।

वहाँ का दृश्य देखकर वे दुःखी और क्रोधित हो उठे।
वे वापस लौटे और फकीर पर भड़क पड़े—

“आपने हमें धोखा दिया! यह तो श्मशान है, गाँव नहीं।”

फकीर ने शांत स्वर में उत्तर दिया—

“मेरे लिए यही गाँव है।
तुम जिसे गाँव कहते हो, वहाँ रोज़ कोई न कोई मरता है।
जहाँ मैंने तुम्हें भेजा, वहाँ आज तक कोई नहीं मरा —
वहाँ सब जीवित हैं।”

यह सुनकर यात्री उसे पागल कहकर दूसरे मार्ग से गाँव चले गए।


प्रश्न: क्या फकीर ने झूठ बोला?

उत्तर इतना सरल नहीं है।

इस कथा में दो स्तरों का सत्य छिपा है।


1️⃣ व्यवहारिक सत्य (Practical Truth)

व्यवहार की दृष्टि से देखें तो:

  • यात्रियों को रात बिताने के लिए गाँव चाहिए था
  • भोजन, पानी और सुरक्षा की आवश्यकता थी
  • श्मशान उनकी आवश्यकता का समाधान नहीं था

👉 इस स्तर पर यात्रियों की बात सही है।
👉 इस स्तर पर फकीर का उत्तर अनुचित लगता है।


2️⃣ पारमार्थिक सत्य (Spiritual Truth)

अब फकीर की दृष्टि से देखें—

उसके लिए:

  • गाँव = जन्म-मरण का निरंतर चक्र
  • श्मशान = जहाँ मृत्यु का बोध समाप्त हो जाता है

फकीर शरीर नहीं देख रहा था,
वह चेतना देख रहा था।

उसकी दृष्टि में:

जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाए,
वही वास्तविक निवास है।

👉 इस स्तर पर फकीर पूर्ण सत्य बोल रहा था।


क्या फकीर पागल था?

नहीं।

वह पागल नहीं था,
वह असमय और अपात्र के सामने सत्य बोल रहा था।

सत्य यदि समय, पात्र और परिस्थिति के बिना कहा जाए
तो वही सत्य पागलपन प्रतीत होता है।


न्याय-दर्शन की दृष्टि

न्याय दर्शन स्पष्ट करता है—

  • व्यवहारिक सत्य और पारमार्थिक सत्य अलग-अलग स्तर हैं
  • दोनों एक-दूसरे का खंडन नहीं करते

यात्री व्यवहारिक सत्य पर थे
फकीर पारमार्थिक सत्य पर

टकराव इसलिए हुआ क्योंकि स्तर अलग थे।


इस कथा से क्या सीख मिलती है?

🔹 1. हर सत्य हर व्यक्ति के लिए नहीं होता

🔹 2. सुविधा की दृष्टि से देखा गया सत्य अधूरा होता है

🔹 3. जो मृत्यु को समझ लेता है, वही जीवन को जानता है

🔹 4. संसार जिसे सुरक्षित गाँव मानता है, वही सबसे बड़ा श्मशान भी हो सकता है


निष्कर्ष

क्या यही सत्य है?

✔️ हाँ — यदि तुम चेतना से देखो
❌ नहीं — यदि तुम केवल सुविधा से देखो

और यही इस कथा की शक्ति है—
यह हमें उत्तर नहीं देती,
यह हमें दृष्टि बदलने के लिए विवश करती है।


✨ अंतिम विचार

जो सत्य को सह नहीं पाता,
वह सत्य को पागल कह देता है। 

Q1. क्या साधु ने यात्रियों से झूठ कहा था?

उत्तर: व्यवहारिक दृष्टि से नहीं, पारमार्थिक दृष्टि से उसने गहरा सत्य बताया।
Q2. इस कथा का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: सत्य एक नहीं होता; वह दृष्टि और स्तर के अनुसार बदलता है।
Q3. गाँव और श्मशान का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर: गाँव जन्म-मरण का चक्र है, श्मशान उससे परे चेतना का प्रतीक है। 
यह कथा भारतीय दर्शन में व्यवहारिक और पारमार्थिक सत्य की अवधारणा को समझाने हेतु प्रस्तुत है।

 



त्रैतवाद (ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान) का एक वैज्ञानिक विवेचन


त्रैतवाद (ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान) 

का एक वैज्ञानिक विवेचन

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

        जैसा कि महा मृत्युञ्जय मंत्र में कहा जा रहा है कि ओ३म् यह परमात्मा का मुख्य नाम है। अब हम इस मंत्र में धीरे-धीरे उतरते हैं इसमें काफी सूक्ष्म और गुढ़ अर्थ छुपा है।  जैसा की महर्षि दयानन्द जी कहते है। जो अ, , , तीन अक्षर हैं, ये मिलकर एक समुदाय बनाते है इस परमेश्वर के बहुत नाम है, जैसा की अकार से विराट, अग्नि और विश्वादि, उकार से हिरण्यर्गभ, वायु और तैजसादि, मकार से ईश्वर, आदित्य और प्रज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक हैं। उसका ऐसा ही वेदादि सत्यशास्त्रों में ऐसा स्पष्ट व्याख्यान किया गया है। प्रकरण के अनुकूल ये सब नाम परमेश्वर के ही है।

      जैसा की स्वयं महर्षि दयानन्द कह रहे है जो संस्कृत और वेदों के  प्रकाण्ड विद्वान है विश्व में अपना एक नम्बर का स्थान रखते है। वह कह रहें है की वेदादि जो सम्पूर्ण विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है वह ब्रह्म लिपी में हैं जिनमें ना कुछ जोड़ा जा सकता ना ही कुछ घटाया ही जा सकता है। वेद अपने आप में अद्वितीय और अपने को अदृश्य में व्यक्त करते है उनकी जड़े अदृश्य चेतन में स्थित हैं, मैं जो कह रहा हूं उनका सत्य शास्त्रों में व्याख्यान किया गया है। अकार, उकार और मकार यह परमात्मा के विशेष गुण और स्वभाव की चर्चा करते हैं या बतलाते है व्याख्या या परिभाषा करते हैं अकार का सिधा सा अर्थ है आकार देने वाला, उकार का मतलब है, उपकार दूसरों का कल्याण करने वाला, मकार का मतलब है सब का कल्याण करने वाला, सब का सही सत्य न्याय करने वाला या दण्ड देने वाला मारने वाला और यही मुख्यतः तीन सत्ता हैं। एक परमेश्वर रूप (त्रैयम्बक) ओ३म् नाम का परमाणु है, जिसे वैदिक त्रैतवाद कहते हैं, ईश्वर, जीव, प्रकृत यही मूल तीन तत्व है। जिसे वैज्ञानिक इलेक्ट्रान, प्रोटान और न्युट्रान कहते हैं, और इसको ही पौराणिक लोग ब्रह्मा विष्णु, महेश कहते हैं, और इसको ही जब दर्शनों को लिखा गया तो वैशेषिक दर्शन कार कणाद सत्, रज, तम कह रहे हैं। और इन्हीं तीन ज्ञान, कर्म और उपासना विषय को ध्यान में रख कर वेदों को परमात्मा द्वारा रचा गया, जिसको मैं ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान कहता हूं, वह मानव तन की सहायता से तैयार किया गया है, परमात्मा मानव शरीर में प्रकट हुआ। वेद जिसे त्रयी विद्या के नाम से जानते है, अर्थात ज्ञान, कर्म, उपासना, ज्ञान का मतलब सिर्फ जानकारी से नहीं है जैसा की इन्फारमेंसन नालेज है।

 आज इसकी बहुत मांग है, और इसी को ज्ञान समझा जा रहा है। जबकि ज्ञान का मतलब सत्य और स्वयं को उपलब्ध करने में जो सहायक हो वही ज्ञान है। जैसा की कहा गया है सा या विद्याविमुक्तय, विद्या या ज्ञान वह है जो आत्मा को शरीर से मुक्त करती है। ज्ञान शब्द जान का टूटा हुआ  अपभ्रंश है, जान का मूल जीव है, और इस शब्द का प्रथम दर्शम ऋग्वेद में होता है, (क्षयाय जीवसे) अर्थात क्षय नाश होने वाले संसार में जिसका नाश नहीं होता वह जीव है, अर्थात वह ज्ञान है अर्थात हम सब लोग जिसमें आत्मा है वह इस मृत्यु लोक में रहने वाले अमर तत्व अमरत्व के अधिकारी हैं।  आज के समय में जिसे ज्ञान समझा जा रहा है वह मुक्त नहीं करता है वह तो स्वयं को बंधन में डालने वाला हैं। यदि सांसारिक  ज्ञान मुक्त करने वाला होता तो आज संसार में दुःखी मानव को तलाशना मुश्किल ही नहीं असंभव होता, लेकिन आज हम सब इसका बिल्कुल ही उलटा या विपरीत देखते हैं। सारा संसार ही यहां दुःख में डुबा है और संसार भयंकर एक से बढ़ कर एक खतरनाक जानवरों से भरा पड़ा है, जो श्रेष्ठ मनुष्यों को ऐसे तड़पा-तड़पा कर मारती है जिससे उनकी रूह भी कांप जाती है। जिसस, सरमद, मन्सुर, सुकरात, बन्दाबैरागी, ओशो, दयानन्द ऐसे सैकड़ों हैं, जिनकी आज इस भूमंडल पर सांसें घुट रही हैं। यह ग्रह एक भयानक और विक्षिप्त ग्रह पागलों की बस्ती बन कर रह गया है, किस पल यह सारे पागल मिल कर एक साथ आत्महत्या कर लें, यह कौन जानता है? क्योंकि सारी तैयारी हर तरफ से सामूहिक आत्मघात के लिए ही हो रही है। आज जिसको हम सब ज्ञान समझते है उसे न्याय दर्शन कार ऋषि गौतम वात, जल्प, वितण्डा निहारिका कह रहे हैं। सच्चा ज्ञान तो वह है जो हम सब में समाया है वैदिक संस्कृत या दुनिया के किसी भी संस्कृत में नहीं है और जो ऋषियों महर्षियों के द्वारा कहा गया है। वेद, उपनिषद और सम्पूर्ण विश्व के दर्शन वह सभी सत्य की परछाई से अधिक नहीं है। जैसा की स्वयं महर्षि दयानन्द कहते है, की मैं ब्रह्मा से लेकर जैमिनी तक सभी ऋषियों को मानता हूं और उनका अनुमोदन करता हूं उन्हीं का अनुसरण करता हूं जो सूत्र के रूप में है और उनके सारे ज्ञान का निचोड़ आन्तरिक यात्रा का विधान है। मृत्यु में प्रवेश करके उसके पार जाने का विज्ञान है। आज की पीढ़ी को उसको समझना ऐसा है जैसे दांतों से लोहे के चना चबाना पड़े, और यह कार्य तो कोई दयानन्द या उनके जैसा कोई बिरला ही समझ सकता है जिसने स्वयं के जीवन में मृत्यु को स्वीकृति दे दिया है या उसको सहर्ष स्वीकार कर लिया है। सारा ज्ञान मरने की कला के अलावा और कुछ नहीं है। आज इस पृथ्वी पर मरना कौन चाहता है? और जो मरने के लिए तैयार है वही सच्चा ज्ञानी है जो हर पल मर रहा है जिसका ना आने वाला कल है ना ही जो कल चला गया है वही उसका है। जो आज और अभी में जीते है और यह देख रहा है हर पल कि उसके शरीर की मृत्यु हो रही है वह हर पल घट रही है ऐसे मानव जो सदियों और युगों में हुआ करते हैं आज भी संभव है जब उसको समझने का पुरुषार्थ किया जाए। जैसा की दर्शन कार कपिल मुनि कहते हैं केवल और केवल एक मार्ग है तीनों प्रकार के भौतिक, दैविक, और आध्यात्मिक दुःखों से छुटने का है, वह मार्ग पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ का मतलब है अपनी आंखों को खोलना स्वयं को उपलब्ध करना इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है।

       इसी बात को स्पष्ट करने के लिए के लिए मुझे एक कहानी याद आती है एक बार एक वृद्ध आदमी था उसकी उम्र करीब 70 साल की थी उसके चार लड़के उसकी पत्नी उसकी चार बहुयें भी थी उनका एक बच्चा भी था कुल मिला कर उसके परिवार में उसको छोड़ कर 20 व्यक्ति थे जो उसकी बहुत अच्छी प्रकार से सेवा करते थे, वह बहुत प्रसन्न और आनन्द पूर्वक अपना जीवन बीता रहा था सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था की अचानक उसकी आंखों में किसी कारण बस कोई रोग हो गया जिससे उसकी आंखें खराब हो गई, और वह पूरी तरह से अंधा हो गया। उसको चाहने वाले उसके बहुत मित्र शुभ चिन्तक लोग थे। उन्होंने उससे कहा की तुम अपनी आंखों को ठीक करा लो नहीं तो तुमको बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है लेकिन उस वृद्ध ने बार-बार यही कहा की क्या आवश्यकता है? अब मेरी आंखों को ठीक कराने का मतलब होगा, कि मैं व्यर्थ में पैसा को खर्च कर रहा हूं। मेरा परिवार बहुत अच्छे लोगों से भरा है, और सभी लोग मेरी कितनी अच्छी तरह से देख-भाल और ध्यान रखते हैं। मेरे परिवार में कुल बीस आंखें हैं मेरी पत्नी चार बेटे चार बहुएं और उनका एक बहुत सुन्दर बच्चा भी है, उनकी आंखों से ही मेरा सारा कार्य चल रहा है। लोगों ने उस वृद्ध को बहुत समझाने का प्रयास किया। लेकिन मोह और ममता के कारण उसकी बुद्धि  भ्रष्ट हो चुकी थी। उस वृद्ध ने अपनी जिद के कारण अपनी आंखों को ठीक नहीं कराया, बाद में लोगों ने उसको समझाना समाप्त कर दिया। कुछ समय तक सब कुछ अच्छी तरह से चल रहा था, क्योंकि वह एक पुराना बहुत बड़ा व्यापारी था। उसके नाम उसके पास काफी धन था। जिसके कारण सारे परिवार वाले उसका जरूरत से कहीं ज्यादा ही ध्यान रखते थे, उसको अपनी आंखों की कोई जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक उसके मकान में एक रात्रि के मध्य में भयंकर आग लग गई, और उसमें जितने लोग थे वह सब किसी तरह से उस जलते हुए मकान स्वयं को निकालने में सफल हो गए, अब आग बहुत भड़क चुकी थी जब सभी मकान से बाहर निकल चुके, तब उनमें से किसी को याद आया की वह वृद्ध आदमी तो अन्दर जलते हुए मकान में ही रह गया है। लेकिन अब क्या हो सकता था क्योंकि अब उस मकान के अन्दर जाने का मतलब था स्वयं को मृत्यु के मुख में झोंकना और इसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। वह वृद्ध आदमी जिंदा ही जल रहा था, और तड़प-तड़प कर चिल्ला रहा था मुझे बचाओ लेकिन वहां उसकी बात को सुनने वाला कोई नहीं था। तब उसको अपने पुराने मित्रों और शुभ चिन्तकों की बात याद आई की मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी जो अपनी आंखों को ठीक नहीं करवाया, जिसके कारण ही आज मुझे जिंदा आग में जलना पड़ रहा है।

 लेकिन अब क्या हो सकता था दरवाजे तो बहुत थे लेकिन वह बार-बार दीवाल से ही टकराता रहा, तब तक जब तक की उसकी मृत्यु या प्राण पखेरू नहीं उड़ गए। क्योंकि जिससे दरवाजा दिखता है वह ज्ञान इन्द्रि आंख तो उसके पास थी ही नहीं। एक बाहरी आंख है और एक आन्तरीक आंखें होती हैं। जिसको प्रज्ञा चक्षु कहते हैं उसकी तो दोनों आंखें नष्ट हो चुकी थी, जिसके कारण वह अकाल मृत्यु को उपलब्ध हुआ।

    ऐसा ही हम सब के साथ भी हो रहा है हम सब भी दूसरों की आंखों से चलना चाहते हैं। यहां तो आग हम सब के अन्दर लगी है और इसका इलाज बाहरी गुरुओं और ज्ञानियों से पूछ रहें हैं। जिसका ही परिणाम जीवन में अशान्ति और वितृष्णा, अतृप्ति है, इससे ज्यादा कुछ नहीं हैं। जब की सब का गुरु तो हम सब के अन्दर बैठा है जैसा की योग दर्शन कार पतञ्जली कहते है। स पूर्वेषाम अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।। अर्थात परमात्मा सभी गुरुओं का गुरु है अभी तक जितने हुए है और आगे भी जो गुरु पैदा होंगे, उन सब का भी वह गुरु है और वह समय सीमा काल के बन्धन में नहीं आने वाला है। मुसीबत में अपनी ही आंखें ही काम करती हैं दूसरों के पास कितना ही ज्ञान क्यों ना हो, वह अपने काम कभी नहीं आता है। अपना काम तो अपने ही ज्ञान से चलता है और अपनी आंखें ही काम आती हैं, उसी आंख को खोलने के लिए ही सांख्य दर्शन कार कपिल कह रहें है। यह तो ज्ञान हो गया।

    दूसरा कर्म है जब किसी वस्तु का ठीक-ठीक ज्ञान होगा, तो उसके अनुरूप कर्म करने से उसका परिणाम आना निश्चित है> विज्ञान का जो सूत्र है वही सिस्टम या व्यवस्था यहां पर ऋषियों महर्षियों द्वार लागू की जा रही है। ऋषि आज के वैज्ञानिकों से बहुत श्रेष्ठ और उत्कृष्ट हैं। क्योंकि वह सिर्फ भौतिक ज्ञान नहीं देते हैं, यद्यपि वह तीन प्रकार के ज्ञान की बातें करते हैं जिसको जानकर मानव चेतना मन, शरीर और हजारों जन्म के संग्रहीत किए गये अज्ञान कुसंस्कार से मुक्त होकर परमानन्द मोक्ष परमात्मा में स्वयं को विलीन करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।

     सिर्फ समय के साथ नये- नये शब्द को जन्म दिया गया है। ऋषि का मतलब होता है ऋ से ऋत बनता है जिसका अर्थ शास्वत है स का अर्थ है वह अर्थात ऋषि वह है जो शाश्वत चैतन्यता में स्वयं को स्थिर कर चुका है ऋषि वै मंत्र द्रष्टाः। ऋषि वह है जो मंत्र अर्थात जो मन का द्रष्टा मन का साक्षात्कार करने वाला मन का स्वामी है। वह मूल तत्त्व आज भी उसी प्रकार से है जिस प्रकार से तब थे जब वेदों को लिखा गया था। वास्तविक मूल तत्त्व तो वही हैं। वह आज भी निश्चल उसी प्रकार से है।

     अब इस मंत्र को समझते हैं। (त्र्यम्बकं) का अर्थ है जो मुख्य तीन प्रकार के तत्त्व वह आपस में मिल कर (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) जो यज्ञामहे, यज्ञ का कार्य कर रहें हैं, उसी के कारण इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सृजन और प्रलय हो रहा है, यह सब उन्हीं के द्वारा हो रहा है। हर पल यह सब सम्पूर्ण जीव, जन्तु, प्राणी के कल्याण के लिए अभी भी हो रहा है, और जीवन रूपी यज्ञ उन्हीं के द्वारा हो रहा है। वह जीवन रूपी आनन्द को बरसाने वाले हैं जिनके होने से ही यह जीवन रूपी पुष्प सुगन्धित हो रहा है या सुगन्ध आ रही है। वह सब यज्ञ के कारण ही हो रहा है, यज्ञ एक बहुत ही विस्तृत अर्थ वाला रहस्यपूर्ण शब्द है।

     इस यज्ञ को थोड़ा सा समझते है जैसा की ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा जा रहा है कि "यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म" अर्थात यज्ञ मानव और इस समस्त ब्रह्माण्ड का सर्व श्रेष्ट कर्म है। यज्ञ की महिमा प्रस्तुत करते हुए ऋगवेद '1,16,4,35, में यजुर्वेद '26.62' अर्थवेद '9.104' "अयं यज्ञो भुवनस्य नाभी" अर्थात यज्ञ सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड की नाभि केन्द्र है। शब्दों के साथ यज्ञ समग्र संसार और समस्त विश्व ब्रह्माण्ड का आधार माना गया है। छान्दोग्योपनिषद् "4,6,2" और ब्राह्मणग्रन्थों में "यज्ञो वै सः पूरुषो वै यज्ञः" 'शतपथ ब्राह्मण 1,3,2,1' शब्दों से इस सृष्टि के रचैयता ब्रह्म को यज्ञ अभिहीत किया गया। इसी प्रकार ऋगवेद में यज्ञ का अर्थ परम पुरुष करते हुए उस यज्ञ से ही सम्पूर्ण ज्ञान, विज्ञान, ब्रह्मज्ञान और सृष्टि का प्रवर्तन मानते हुए कहा है, यज्ञेन यज्ञमयजन्तदेवाः, तानि धर्माणि प्रथमानि आसन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त।। "ऋगवेद 10.6.16" दिव्यगुण युक्त महापुरुषों ने अपने जीवन से यज्ञ रूप परमात्मा का यज्ञ अर्थात पूजन किया। इससे सभी देव पुरुषों ने महिमा मण्डीत होकर, सभी प्रकार के कष्टों से रहित ब्रह्मी स्थिति मोक्ष को उपलब्ध किया। उस यज्ञपुरुष के ही सृष्टि के आदि में बिस्तार के कारण भुत यह प्रथम धर्म थे। जिससे उस यज्ञरूप प्रभु ने सर्वहुत यज्ञ प्रारम्भ करके इस सृष्टियज्ञ का श्री गणेश किया, और उस सृष्टि को विविध विस्तार प्रदान किये गए। इन सब विविध विस्तार पूर्वक  अवस्थाओं में वह यज्ञ विविध कहलाया, "इमंनो अग्न उपयज्ञमेही पंचयाम त्रिवृतं सप्ततन्तुम।" 'ऋगवेद 10,124.1' इस त्रिविध रूप यज्ञ के धातुगत देव पुजा, संगतिकरण और दान, तीनों अर्थ, प्रथम तीन आश्रम, प्रथम तीन वर्ण, प्रातः मध्यन्दिन और सायं तीन सवन, अग्निहोत्र में प्रयुक्त-तीन समिधा, घृत और हबीस्, तीन प्रमुख समिधायें आवहनीय, दक्षिण और गार्हपत्य-तीन अग्निया तीन आचमन और तीन पूर्णाहुतियां सम्लित हैं। इसी यज्ञरूप कर्मात्मा पुरुष ने आश्रमात्मा कर लोकात्मा और पिण्डात्मा के अनुकरण पर मानव समाज का निर्माण किया, और वहीं पुष्ट वर्धनम वही पालन और विकास के लिए उत्तरदाई जिम्मेदार हैं। उर्वारुकमिव यदि तुम उसको जानकर जिसका खरबुजे की तरह का स्वभाव है। उसी प्रकार से बंधा जिस प्रकार से खरबुजा अपनी बेल से बंधा रहता है। उसी प्रकार से जीवन भी खरबुजे रूपी शरीर से बंधा रहता है, और बेल के समान नस नाड़ियां है जिसमें खून का संचार होता है। बेल का दूसरा अर्थ मृत्यु, मोक्ष का अर्थ ईश्वर भी करते है। तुम उसको जानकर उसमें स्वयं को स्थित कर के स्वयं को अमृत कर सकते हो यानी अमर शाश्वत होने की बात हो रही है।

      इस पूरे मंत्र का अर्थ और विस्तार से समझते हैं। जो स्पष्ट है मूल तीन तत्त्व  हैं। पहला तत्त्व लौकिक है जो प्राकृतिक प्रकृत से बना यह हम सब है शरीर का हैं। दूसरा जो कारण है बन्धन का वह जीव है और उसकी तीन प्रकार की तृष्णा। लोकैसणा, पुत्रैसणा, और जिजैवसणा अर्थात जीने की तृष्णा है और तीसरा सबसे सूक्ष्म सब्टल ईश्वर है। प्रकृति या प्रोटान ही कारण है भौतिक परिवर्तन का अर्थात खरबुजे रूपी शरीर का उसके अन्दर जो सूक्ष्म तत्त्व है, मन यानी न्युट्रान जिसको बेल भी कहते है जो जोड़ने वाला माध्यम है। अन्त में तीसरा तत्त्व मूल बीज है इलेक्ट्रान जो खरबुजे के बीज में ऊर्जा के रूप में व्याप्त है। जिसे वैज्ञानिक विगवैंग कहते है यह विस्फोट ऊर्जा में ही होता है। जैसा की वैज्ञानिक पहले मानते थे की यह सम्पूर्ण जगत और उसमें सब कुछ पदार्थ गत है और उसी से बना है। कालर्माक्स की तरह वह भी यही कहता था की सब कुछ पदार्थ गत है और सभी धर्म अफीम के नशे से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन अब बातें बदल रही है वैज्ञानिक अब कह रहें है की सब कुछ ऊर्जामय है और हम सब भी एक ऊर्जा के ही पुन्ज है। खरबुजे के ऊपर जो आवरण है वह प्रोटान से बना है और न्युट्रान आन्तरीक है यह तीनों मिल कर ही खरबुजे के मूल कारण है। इलेक्ट्रान जो बीज को तोड़ कर उसे अंकुरित करने का मुख्य श्रोत है। यही बीगवैग थ्योरी का जन्मदाता है।

       यह जो क्रिया यहां पर ऋषि खरबुजे के अलंकारिक रूप में समझा रहे है जो बीज में घट रहा है वही क्रिया इस विशाल विश्व ब्रह्माण्ड में भी घट रहा है। ऐसा वैज्ञानिकों का भी मानना है। इससे यह स्पष्ट होता है जिस प्रकार की घटना खरबुजा के साथ घट रही है बिल्कुल वही घटना मनुष्य के साथ भी घट रही है। क्योंकि मनुष्य भी ब्रह्माण्ड कि ही एक कड़ी है या यूं कहे मनुष्य लघु ब्रह्माण्ड छोटा सा पिण्ड है। जो विस्तृत रूप में ब्रह्माण्ड में है वही सूक्ष्म रूप से इस मानव शरीर में भी व्याप्त है। यही नहीं प्रत्येक प्राणी का शरीर चाहे वह कितना ही सूक्ष्म है। इसलिए मंत्र का द्रष्टा कह रहा है यदि तुम खरबुजे को समझ गये तो तुम्हें स्वयं को भी समझने में बहुत आसानी होंगी, और सरलता से स्वयं को समझ कर सम्पूर्ण संसार रूपी ब्रह्माण्डीय शरीर से मुक्त होकर मोक्ष के भागी बन सकते है। 

   यह मंत्र ही नहीं वेद के सारें मंत्र अलंकार में बातें करते है। इसमें उदाहरण दे कर समझाया गया है कि सबसे सूक्ष्म ईश्वर है उससे थोड़ा कम जीव है, और जो सबसे स्थूल प्रकृत है। ईश्वर रूपी इलेक्ट्रान पूरे प्रकृत रूपी ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। जैसा कि मंत्र कह रहा है, ईशा वास्य मिदं सर्वम्।। अर्थात ईश्वर प्रत्येक कण में व्याप्त मिला हुआ है। वैज्ञानिक भी यही कहते है कि इलेक्ट्रान प्रत्येक कण में सम्लित मिला हुआ है और इलेक्ट्रान के चारों तरफ प्रोट्रान और न्युट्रान भ्रमण करता है दोनों की दिशा एक दूसरे से बिपरीत है। प्रोट्रान और न्युट्रान इलेक्ट्रान के रक्षा कवच का कार्य करते है। इसको इस तरह से समझते है कि परमात्मा का रक्षा कवच जीवात्मा है और जीवात्मा का रक्षा कवच प्रकृत है। जब जीवात्मा ही नहीं होंगा तो परमात्मा का होना या ना होना कोई मायने नहीं रखता है। क्योंकि किसी को समझाने के लिए उसके दूसरे पहलू का होना परम आवश्यक है। द्रष्टा के लिए दृश्य का होना आवश्यक है प्रकाश इसलिए है क्योंकि अन्धकार की सत्ता है एक व्यक्ति जो जन्म से अंधा है उसको ना ही अन्धकार का ज्ञान है ना ही प्रकाश का ही ज्ञान है उसके लिए ऐसी स्थिति है जिसका वर्णन ऋगवेद 10.129.1-7 का नासदिय सूक्त करता है।

        नासदिय सूक्त जो कह रहा है उसको समझते है प्रलय अवस्था में ना ही सत्य था ना ही असत्य ही था, उस समय ना ही लोक था ना ही परलोक ही था ना अन्तरिक्ष ही था, उस समय सब को ढकने वाला क्या था, कहां किसके आश्रय में था, अगाध और गम्भीर जल क्या था? यह सब अनिश्चित ही था। उस समय ना ही मृत्यु थी नाही अमृत ही था सूर्य चन्द्र के अभाव में रात दीन का भी ज्ञान नहीं था। उस समय वायु से रहित दशा में एक अकेला वही अपनी शक्ति से सांस बिना सांसों के ले रहा था, उससे परे या भिन्न कोई वस्तु नहीं थी। सृष्टि से पूर्व प्रलय दशा में अंधकार से आच्छादित था अज्ञात दशा में और यह सब कुछ जल ही जल था, जो कुछ था वह चारों ओर होने वाले सदविलक्षण भाव में डुबा हुआ था और वह सब मन के तप के प्रभाव से प्रलया अवस्था में चारों ओर अंधकार ही अंधकार था। अतः कुछ भी ज्ञान नहीं होता था और जो कुछ था वह सब आश्चर्यमय अजीबो-गरीब अद्भुत रहस्यपूर्ण था। उसमें सबसे पहले परमात्मा के मन में सृष्टि करने की इच्छा ने जन्म लिया। उसके बाद उस मन से ऋत बीज का कारण उत्पन्न हुआ फिर बुद्धिमानों ने अपनी बुद्धि द्वारा ऋषियों ने अपने हृदय में विचार कर बन्धन का कारण भूत विद्यमान वस्तु को अविद्यमान पाया, अर्थात सब दृश्यमय जगत का कारण असत् अदृश्य मय ब्रह्म को पाया। इस प्रकार बीज को धारण करने वाले पुरुष भोक्ता और महीलाए भोग्या उत्पन्न फिर इन भोग्य की किरणें तीरछे, उपर, नीचे सब तरफ फैली इनमें भोग्य शक्ति निकृष्ट थी, और भोक्ता का एक जोड़ा हुआ और इन्हीं भोग्य और भोक्ता से सारी सृष्टि हुई। इसमें भोग्य शक्ति निकृष्ट होने के कारण वह भोक्ता के अधीन हो गई। 

   कौन जानता है? कौन कहेगा की यह सृष्टि कहा से किस कारण से उत्पन्न हुई। इसलिए यह सृष्टि जिससे हुई उसे कौन जानता है? यह सृष्टि जिससे पैदा हुई वह इसको धारण भी करता है या नहीं इसको आखिर जानता कौन है? इसलिए हे विद्वानों वही जानता है जो परम आकाश में होता हुआ उस सृष्टि का अध्यक्ष। अथवा वह भी नहीं जानता है। उत्पत्ति से पूर्व यह संसार निगला हुआ अंधकार से आच्छादित था।

       यहां जिसकी बात हो रही है वह सब के अन्तरतम में विद्यमान है। सत्य को जानने वाले कहते है कि उन्होंने अपने हृदय में ध्यान के माध्यम से यह जाना की यह जो बाहरी दृश्यमय जगत है, इसका स्वामी अदृश्य रूप से हम सब में व्याप्त है और वहीं पर उसका साक्षात्कार किया गया है।

      एक बार की बात है जापान में एक बोकुजी नाम का साधु था जो जापान में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध ख्याति प्राप्त था। जापान में बहुत ज्यादा भुकम्प आता है। ऐसी ही एक घटना उसके जीवन में आती है। जो बहुत प्रसिद्ध है एक बार एक बड़े होटल के मालिक ने बोकुजी की प्रशंसा प्रसिद्धि से प्रभावित होकर अपने एक विशाल लकड़ी से बने होटल में निमंत्रित किया उसका होटल भी सबसे पुराना और पूरे जापान में बहुत प्रसिद्ध था। वह लकड़ी का सबसे उंचा और शानदार होटल था उसी में एक दिन शाम को अपने कुछ मित्रों और बोकुजी के साथ एकत्रित हुए। भोजन की टेबल पर उन सब ने यही विचार किया की भोजन भी होगा साथ में बोकुजी के साथ  सत्संग भी हो जाएगा। 

    सब के लिए सुस्वादु भोजन को परोसा गया, और होटल के मालिक ने बोकुजी से पूछा तो आप बताइए की आप किस प्रकार का ज्ञान देते है

   बोकुजी कहना प्रारम्भ करें, उससे पहले ही बहुत भयंकर भूकंप आ गया, और वहां पर सारें लोग जो खाने के लिए बोकुजी के साथ उपस्थित थे वह सब वहां से पलक झपकते ही भाग खड़े हुए, और उस होटल का मालिक भी वहां से अपने पैर को सर पर रख कर भागा।

    लेकिन जब वह सिढ़ीयों पर पहुंचा, तो उसे याद आया वह साधु जो उसका मेहमान था वह तो नहीं आया, वह वहीं पर क्यों बैठा रह गया, उसने विचार किया की उसको बुला लेते है। जब उस होटल का मालिक बोकुजी के पास पहुंचा, तो वह देखता है कि बोकुजी तो आंख बन्द करके निश्चिन्त होकर बैठा है। उस समय होटल के मालिक ने कुछ नहीं बोला उसने अपने मन में सोचा की जब यह साधु यहां से भाग कर नहीं जा रहा है तो मैं भी कहीं नहीं जाऊंगा। वह भी वही पर अपनी आंखें बन्द करके बोकुजी के पास ही बैठ गया। कुछ समय के बाद भूकंप शान्त हो गया, क्योंकि भूकंप हमेशा थोड़े ही रहता है। तब बोकुजी ने अपनी आंखों को खोला और उस होटल के मालिक से कहा की हां अब बताओ क्या बात हो रही थी?

      वहीं से पुनः फिर से प्रारम्भ करते हैं। उस होटल के मालिक ने कहा बस रहने दे, अब फिर कभी बाद में इसके बारे में बात करेंगे। क्योंकि वह आदमी भूकंप के कारण से अन्दर तक हील गया था। लेकिन उसने देखा बोकुजी बिल्कुल उसी प्रकार से था जिस तरह से वह आया था जैसे कुछ हुआ ही नहीं है यह सब एक सामान्य साधारण सी घटना थी। जबकि भूकंप ने काफी तबाही मचाई थी। होटल के मालिक ने बोकुजी से कहा मैं केवल एक प्रश्न के बारे में जानना चाहता हूं कि आप यहां पर ही क्यों बैठें रहे? जबकि और सारे व्यक्ति जो हमारे साथ बैठे थे, वह यहां से भाग गए। मैं भी भाग गया था, लेकिन जब मुझे आपका ख्याल आया, तो मैं वापस आ गया, और जब मैंने आपको देखा तो मैं भी आपके साथ बैठ गया। 

   बोकुजी ने कहा यह मत कहो की मैं नहीं भागा, मैं भी भागा था तुम्हारी तरह अन्तर सिर्फ इतना था, कि तुम सब बाहर की तरफ भागे और मैं अपने अन्दर की तरफ भागा, क्योंकि मैं जानता था, की बाहर कही भी भाग जाओ, हर जगह भूकंप ही भूकंप है। यदि भूकंप से बचना है तो वहां जाना चाहिए जहां भूकंप नहीं है। वह स्थान तो हम सब के अन्दर है, और मैं अपने अन्दर चला गया जहां कभी किसी प्रकार का भूकंप आया ही नहीं करता है। जहां पर परम शान्तिः और परमानंद है।

      इस कहानी को कहने का तात्पर्य यह है, कि बाहरी जगत की जितनी भी समस्या है या परेशानी है उन सब का समाधान स्वयं के अन्दर जाने के बाद ही सब को मिलता है और आज भी सभी को मिलने की संभावना है। बाहर जाने का मतलब सिर्फ इतना है कि हम प्रश्न को कुछ समय के लिए ढकेल देते है जो प्रश्न स्वयं के जीवन से संबन्धित उनको बाहर के प्रश्नों से हम कभी तृप्त नहीं कर सकते है। 

   वह तो समाधि को जब उपलब्ध करता है तभी परम शान्ति को उपलब्ध होता है। तो कहने का मतलब है कि मन को जो भी थोड़ा सा भी समझा गया है क्योंकि वह हमेशा दुविधा कि स्थिति में रहता है और यह सिर्फ बाहरी जगत को ही समझता है। यह एक दूसरे पर निर्भर करते हैं, वैज्ञानिक मानव को समझने का दावा करते हैं, और प्रकृति को भी समझने को भी वह समझ रहे हैं। वह केवल इलेक्ट्रान रूपी ईश्वर को समझने में असमर्थ हैं। क्योंकि इलेक्ट्रान को तोड़ने में समर्थ है लैप्टान और कितने सूक्ष्म रूप में वह है उसको पूर्ण समझना अभी सम्भव नहीं हो पाया है, और वही सब के मूल में व्याप्त है। जो रहस्यपूर्ण चमत्कारिक है। जैसे शरीर और मन को तो काफी हद तक समझने का दम भरते है। मृत्यु और जीवन एक दूसरे के पूरक है, और एक दूसरे पर निर्भर करते है। बस आत्मा ही एक रहस्य है जिसको वह ना ही समझ पाये है ना ही उस पर किसी प्रकार का प्रयोग ही कर पाये हैं। मगर ऋषियों ने सारा प्रयोग आत्मा पर कर के ही सभी प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, और ब्रह्मज्ञान  को जाना है। वह सब एक साथ ही रह कर एक दूसरे को पुष्ट कर रहें हैं। जो सबसे सूक्ष्म कण इलेक्ट्रान उसमें सबसे पहले एक बिस्फोट की घटना घटती है जिसे विगवैंग के नाम से जानते हैं और वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है। कुछ समय पहले वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया, जिसे वह अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग कहते हैं। फ्रांस और स्विजरलैण्ड के मध्य जमीन के अन्दर किया गया। जिससे उनके सिद्धान्त को बल मिलता है कि इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति बिगवैंग जैसी घटना के कारण ही हुई है।

    और इस बात को ऋग वेद का मंत्र भी सिद्ध करता है। हजारों वर्षों पहले ऋषियों ने यही बात कही है। सृष्टि में सबसे पहले एक आग्नेयपिण्ड पैदा हुआ, सवाल यह उठता है की आग्नेयपिण्ड कहां से पैदा हुआ? इसके उत्तर में वैज्ञानिक ऋषि कहते है की आग्नेयपिण्ड शून्य से उत्पन्न हुआ जो बिल्कुल भार रूप आकार परिणाम से भी शून्य था। शून्यता भी चार प्रकार की होती है। एक तो आकाश की शून्यता है जिसे वैज्ञानिक कहते है यदि पृथ्वी का सम्पूर्ण आकाश रिक्तता को किसी माध्यम से खींच लिया जाये, तो यह पृथ्वी एक सेब के आकार की हो जाएगी। यह तो आकाश की शून्यता है। एक पदार्थ की शून्यता होती है, एक ऊर्जा की शून्यता होती है, और एक चेतना की शून्यता होती है। वैज्ञानिक अभी तीन प्रकार की शून्यता से ही परिचित है। एक प्रकार की जो सबसे सूक्ष्म शून्यता है जिसकी बात पतञ्जली करते है, उसको नहीं जानते है। यह सब जगत उसी शून्यता से उत्पन्न हुआ, इस विषय पर वैज्ञानिक आज भी अनिश्चितता की स्थित में है। जबकि दर्शन कार पतञ्जली निःसंदेह होकर बोल रहे है कि एक चेतना की भी शून्यता है। जैसा की सूत्र कहता है "तद् एवार्थ मात्रनिर्भासमं स्वरूपशून्यम् इव समाधिः" परमात्मा के चेतना की शून्यता से अग्नीपिण्ड उत्पन्न हुआ और प्रकाश हो गया। इस आग्नेयपिण्ड होने बाद क्रमशः सारी सृष्टि उत्पन्न हुई, इस महान आग्नेयपिण्ड के सहयोग से पृथ्वी पर जल और औषधियां रमण करने लगी। ऋग वेद 10.80.2 आग्नेयपिण्ड यहां पर आटम या परमाणु के छोटे से कणों के कहा जा रहा है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने एक अणु को तोड़ा था सन 1945 में जो परमाणु बम जापान पर गिराया गया था। वह एक छोटा सा अणु ही था जिससे वैज्ञानिकों ने यह जाना की एक अणु में इतनी शक्ति सूक्ष्म से छुपी है। जो चमत्कारिक और आश्चर्यमय ऊर्जा का श्रोत है, जो सम्पूर्ण पृथ्वी ही नहीं इस वायुमंडल को भौतिक रूप से एक बार नहीं हजारों बार समाप्त कर सकता है। उन्होंने इसका अन्दाज नहीं लगाया था कि इतने ज्यादा लोग मरेंगे, लाखों कि संख्या में लोग कुछ ही क्षण में भस्म हो गए, और वह एक बहुत छोटा सा प्रयोग था, उस बम का नाम लिटील ब्वाय अर्थात छोटा सा बच्चा दिया था। अब तो उसका  दादें, परदादे को बनाया जा चुका है। जैसे परमाणु, हाइड्रोजन, न्युट्रान, बम जिसके अन्दर लगभग उतनी ऊर्जा को छोड़ने वाला है जितना सूर्य के पास उसकी सतह पर है और उससे आगे भी बम हैं। न्युट्रान जो सिर्फ पृथ्वी पर से जीवन को समाप्त कर देगा, इस धरा या वायुमंडल से क्योंकि वैज्ञानिकों को भौतिक वस्तु नष्ट होने का भय खाये जा रहा था, वह चाहते है कि भौतिक वस्तुएं यह दुकान, मकान, गाड़ीया बची रहें। मानव और जीव, जन्तु सारें प्राणी पशु पक्षी मर जायें, इसकी उनको कोई परवाह नहीं है। अब आप कहेंगे की इसमें तो सब पूराना है नया क्या है?

       अब इस पर थोड़ा सा विचार करेंगे क्योंकि यह कुछ थोड़े से आधार भूत सिद्धान्त है। एक अस्तर तक खरबुजे का विकास होता है फिर उसका हराश होना प्रारम्भ हो जाता है। जो विकास है इसको ही वैज्ञानिक विगवैंग थ्योरी का नाम दिया है और जो हरास हो रहा है उसको ब्लैकहोल कहते है। यह ब्लैकहोल और वीगवैंग कि घटना सिर्फ ब्रह्माण्ड के विकास और प्रलय के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि जीवन के प्रत्येक के जीवन बिन्दु के लिए यही उत्तरदाई है, और ऐसा ही प्रत्येक प्राणी के साथ हो रहा है। मानव अस्तित्व रूपी जो मूल ऊर्जा है उसके तीन किनारे हैं एक आन्तरिक रूप से बहती है दूसरी बाहर की तरफ बहती है और तीसरी अपने स्थान पर ही एक रस स्थिर अचल अदृश्य रूप से व्याप्त हो रहा है। विगवैंग का कार्य फैलना और ब्लैकहोल का कार्य सिकुड़ना जो आन्तरीक रूप में कार्य करता है। जब तक इस शरीर क विकास होता है। तब तक विगवैंग कि घटना घटती है, और जब शरीर का नाश अर्थात होता है तब ब्लैकहोल की घटना घटती है। इस भौतिक ब्रह्माण्ड में सबसे अधिक गुरुत्वाकर्षण ब्लैकहोल का ही है। ब्लैकहोल प्रकाश की किरणों को भी अपने से दूर नहीं जाने देता है। अपने भयंकर गुरुत्वाकर्षण के करण वह प्रत्येक वस्तु को स्वयं में समाहित कर लेता है। जब खरबुजा पूर्णतः पक जाता है तो वह स्वतः ही बेल से अलग हो जाता है। उसी प्रकार जब मनुष्य पूर्ण रूप से पक जाता है। पकने का मतलब है स्वयं को पूर्णतः जान लेना, चेतनता और जागरूकता के साथ सतर्क होकर स्वयं का साक्षात्कार कर लेता है, तो वह भी जो जड़ रूपी मन बेल है उससे आत्मा मुक्त हो जाती है। इसको दूसरी तरह से समझते है जब खरबुजा पक जाता है तो जिस शक्ति के प्रभाव विस्फोट हुआ था वह एक अस्तर तक बढ़ता है और वही शक्ति वापस पुनः रिटर्न हो जाती है। यह शक्ति रूपी ऊर्जा या चेतना इसको कुछ भी कह सकते है। इसके दो सिरे हैं ए और बी यह दोनों बहुत ज्यादा एक दूसरे के बहुत करीब है। लेकिन इनकी करीबता को मानव मन नहीं समझ पा रहा है क्योंकि मानव मन हमेशा आगे की सोचता है या फिर पीछे की सोचता है। जबकि उस ऊर्जा के दोनों सिरे बिल्कुल पास है, और मन निरन्तर यात्रा करता है या तो एकस्ट्रावर्ट अर्थात भविष्य की वासना पर सवारी करता है या तो फिर इन्ट्रावर्ट आन्तरीक वासना पर सवारी करता है। इसका अर्थ सिर्फ यह है कि मन के जो उसके संस्कार है वही उसको आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है इसके साथ जो इसके संस्कार है वह मात्र एक प्रकार के अभ्यास ही हैं जो भी सीखा गया है वह सब मन की वासना का ही नाम है। जहां तक वासना है वहां तक मन और उसकी यात्रा है। वह किसी प्रकार की हो सकती है शक्ति को पाने की सम्पत्ति ऐश्वर्य भोग, बिलास, योग, संभोग की तृप्ति का आनन्द पाने की आकांक्षा जो मानव मन में काम वासना सबसे अधिक प्रबल है, और इस मन की यात्रा दो तरफा है एक आन्तरीक है और दूसरी बाहरी है। साधु, सन्त, योगी, फकीर, पीर, पैगम्बर कहते अन्दर की ओर चलो इसके लिए ही सारी साधनाओं का विधान इसलिए ही किया गया है। दूसरी तरफ सम्पूर्ण भौतिक जगत का आकर्षण बाहरी यात्रा आर्टिफीसियल का प्रतिनिधित्व कर रहें है। मन या तो बाहर जाता है विषय भोग और सांसारिक भौतिक क्षणिक आनन्द को पाने की दौड़ में स्वयं का सर्वस्व विलीन करने के लिए अपनी सारी ऊर्जा को खत्म करके बाहरी वस्तु को पाना ही मूल उद्देश्य बना लिया है। या वह अपना सब कुछ दाव पर लगा कर विषय वस्तु को पाना चाहता है। जिससे क्षणिक इन्द्रिय तृप्ति के लिए है। जितनी तीव्रता से मन बाहर की तरफ यात्रा करता है उतनी ज्यादा व्यग्रता और से उत्सुकता श्रद्धा के साथ अन्दर की यात्रा नहीं करता है। क्योंकि बाहरी यात्रा करने में उसको हजारों लोग सह यात्री के रूप में मिल जाते है। जबकि अन्दर की यात्रा करने में ऐसा नहीं है। वहां तो अकेले ही चलना पड़ता है यह तो मरने की कला है कोई कभी किसी के साथ नहीं मरता है। इस यात्रा पर तो कोई सुरमा ही चलने को तैयार होता है। या वह अपने मन को तैयार कर लेता है अपनी बागडोर को सम्हालने की ताकत सब में कहा हैं। क्योंकि यह मार्ग पगडंण्डीयों जैसा है। इस पर तो एक-एक कदम चलकर ही रास्ता बनता है और वह स्वयं के लिए होता है। उस पर हम कितना भी चाहे किसी दूसरों को अपने साथ नहीं ले जा सकते या घसीट सकते है। क्योंकि यह मार्ग अदृश्य है जो आत्मा के उपलब्धि को सहज करता है। यह मार्ग बाहरी राज पथ जैसा नहीं है कि आपने अपनी गाड़ी निकाली और चल पड़े यह मार्ग तो केवल दृश्यमय जगत के लिए ही संभव है। मन का स्वभाव अस्थिरता, चंचलता जो एक जगह कभी भी केन्द्रित नहीं होता है और यही मन की सबसे बड़ी समस्या है। मन से ही मानव या मनुष्य बनता है। परमात्मा मानव मन से परे है।

   इस मार्ग पर चलने के लिए ही पतञ्जली कह रहें है। स तू दिर्घकारनैरन्तर्यसत्कार सेवितो दृढ़भुमिः।। अभी तक हम ने दो बातों के बारे में विचार किया ज्ञान और कर्म अथवा बाहरी और आन्तरीक यात्रा ज्ञान जो जानकारी के रूप में उपलब्ध होता है। यह अन्तर यात्रा का ही एक रूप है। क्योंकि विचार हमारे अन्दर चलते हैं, जिस पर मन सवार होकर स्वयं को ज्ञानवान समझने का भ्रम पाल लेता है और उसी के अनुसार अपने हाथ पैर को चलाता है। बाहर की तरफ यह उसकी बाहरी यात्रा हो गई। एक तीसरे प्रकार का भी ज्ञान है जिसको उपासना कहते है। जहां पर न ही कर्म है ना ही वहां पर ज्ञान रूपी जानकारी की ही आवश्यकता है। जिसको पतञ्जली समाधिसिद्धरीश्ररप्रणिधानात्।। कहते हैं। उपासना अर्थात ईश्वरप्रणिधान जो उपनिषद् से आया है, उप अर्थात पास में बैठना परमात्मा के पास में बैठना जिसे ध्यान कहते है। स्वयं का सम्पूर्ण रूप से परमात्मा को समर्पण कर देना। समर्पण का मतलब है स्वयं का मर जाना समझ लेना। अब सिर्फ परमात्मा ही है मैं नहीं हूं जैसा की कबीर कहते है मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है वह सब कुछ तेरा है, तेरा तुझको अर्पण क्या लागे है मेरा। 

  वहां ना ही कोई कर्म ही है ना ही वहां पर किसी प्रकार की क्रिया ही है, वहां पर होना ही पर्याप्त है अर्थात परमात्मा के पास केवल कुछ समय बैठना ही उपासना है। जिसको पतञ्जली संयम कहते है। संयम यह दार्शनिक शब्द है जिसका अर्थ है धारणा, ध्यान, समाधि जहां पर यह तीनों मिल कर एक होते है वही संयम है और जहां संयम है वहां पर ही सभी प्रकार की सिद्धियां हैं, यह संयम सभी सिद्धियों का मूल कहा गया है।

      दो तरह के प्राणी होते है एक वह होते है जो उस ब्लैकहोल कि घटना को रोकना चाहते है ऐसा वह करते है जो बाहरी जगत के भौतिक आनन्द को प्राप्त करने के लिए व्यग्र है। ययाती सदृश्य जिसके लिए वह सब पूरा का पूरा साइन्टफिक प्रयोग करते हैं। दूसरे वह होते है जो उसका सपोट या सहयोग करते हैं। यह मेडीटेसन ध्यानयोग, राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और कुछ नहीं यह सब पकने की कला मृत्यु में जीवित प्रवेश करने या मरने की कला सिखाती है। जिसकी बात पतञ्जली और उनके अनुगामी करते हैं। या फिर इस तरह से कहा जाए, तो गलत नहीं होगा की यह सब ब्लैकहोल कि घटना को सहयोग देते हैं। जिससे आत्मा सहजता के साथ मन रूपी बेल जिसकी शाखांए सम्पूर्ण विश्व रूपी ब्रह्माण्डीय शरीर में व्याप्त है। उससे सहजता के साथ छूट जाते हैं। जो व्यक्ति अपने जीवन में ध्यान का प्रयोग करते है, ध्यान क्या है? इसके लिए योग दर्शन कार पतञ्जली कहते हैं तत्र प्रत्ययैकता ध्यानम्।। ध्यान आसानी से शरीर और मन के पार चला जाता है।

 

         जितने भी महान दर्शन कार हुए है ब्रह्मा से जैमिनी और हमारे छः वैदिक दर्शन इसी की समर्थन में बातें करते हैं। उन सब का उद्देश्य केवल एक सभी मानव को समाधि उपलब्ध कराने के लिए ही उत्सुक है। महात्मा बुद्ध का भी यही मानना है, और जब मनुष्य अपूर्ण रहता है शरीर से पक जाता है लेकिन आत्मा से अधपका ही रहता है वह बुद्धि में ही जीता है। जो ठोस पदार्थ का ही तीसरा रूप है। जो ऐसा करते है उन्हें कष्ट उठाना पड़ता है जैसा की मैंने पहले बताया की दुःख तीन तरह होता है। शारीरिक, मानसिक, आत्मिक क्योंकि वह उस सार तत्त्व नियंत्रित करने का व्यर्थ प्रयास करते है नियंत्रित तो नहीं होता है यद्यपि अनियंत्रित अवश्य हो जाता है इसका मुख्य कारण है कि जीवन में ध्यान अनिवार्य रूप से नहीं जुड़ा है और सभी शरीर में ही ज्यादा समय तक ठहरना चाहते है। 

   जबकि जिससे उसकी उत्पत्ति हुई है जिससे जन्म हुआ है वह बीज बहुत अधिक अद्वितीय प्रबल शक्ति को धारण करता है। जैसा की पतञ्जली कहते है। तद् एवार्थ मात्रनिर्भासमं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।। समाधि और कुछ नहीं है अपने सम्पूर्ण स्वयं के शरीर से शून्य होना है। शरीर का जो भान उसका पूर्णतः समाप्त हो जाना ही समाधि है। इसके लिए ही ऋषि कह रहा है अहमं इन्द्र न शरीरं, अर्थात मैं शरीर नहीं हूं यद्यपि ईन्द्र शरीर का स्वामी इसका राजा सम्राट हूं। मैं शरीर नहीं हूं इसका मात्र द्रष्टा हूं, जो सब कुछ देखने वाला है, जो भी शरीर और मन के द्वारा तमाशा हो रहा है। उसका साक्षी मात्र हूं, ध्यान साक्षी की साधना का प्रथम चरण है। परज्ञानं ब्रह्म।  ज्ञान से जो परे है वही ब्रह्म है अथवा अहं ब्रह्मास्मि। मैं ही ब्रह्म अर्थात मैं परमात्मा हूं जो अपनी आत्मा से भी परे है वह परमात्मा जो सर्वज्ञ है जो सिर्फ स्वयं के बारे में ही नहीं सोचता समझता या जानता है उससे भी जो परे है। जो सारी सीमा से परे है वही परमात्मा है तत् त्वं असी। तुम सब भी वही हो। अयंम् आत्मा ब्रह्म। यह आत्मा ही ब्रह्माण्डीय चेतना है और यह आत्मा की एक अवस्था है यहां तक पहुँचने के लिए ही सभी मनुष्यों का इस पृथ्वी पर आगमन हुआ है। यहां से सभी प्रस्थान भी कर रहें है यह सब कुछ बहुत ही तीव्र गति से हो रहा है जिसकी मानव मन कल्पना भी नहीं कर सकता है। सर्व खल्विदं ब्रह्म। सब कुछ ब्रह्म अर्थात परमात्मा उसके शिवाय कुछ नहीं है। दूरंदृशं गृहपतिमतर्युम्।। सब जगह वह ही है अर्थात सब जगह हमारी ही चेतना व्याप्त है। यह सभी प्रमाण वेद और उपनिषद से लिए गए है।

Q: Kya moksha ka science me concept hai?

Q: Consciousness brain se alag ho sakti hai?

Q: Veda Big Bang ko maanta hai kya?

      आचार्य मनोज पाण्डेय

संस्थापक ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान वैदिक विद्यालय

यतपिण्डे तत ब्रह्माण्डे एक ऐसे सम्राट हो जो सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड का स्वामी है,


 🙏यतपिण्डे तत ब्रह्माण्डे🙏

 

न में द्वेषरागौ न लोभो न मोहो मदो नैव मात्सर्य्यमान्।

न धर्मो न चार्थे न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।1।।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थो नवेदा न यज्ञाः।

अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता श्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।2।।

न में मृत्युशंङका न में जातिभेदः पिता नैव माता न जन्म।

न बन्धुर्न मित्रं गुरुनैंव शिष्य श्चिदानन्दरूपः शिवऽहं शिवऽहम्।।3।।

         आज तक जो भी ज्ञान, विज्ञान, ब्रह्मज्ञान के द्वारा जाना गया है। जिससे मानव को परमानंद की अनुभूति हुई है। उसकी खुशबू के रूप में मैंने इस किताब को तैयार किया है। मानव आत्मा को सम्पूर्णता की अनुभूति कैसे हुई? और वह स्वयं के जीवन को परमानंद में कैसे बदलता है? और इसमें कुछ भी नया नहीं है। जो भी है वह बहुत पुराना है इतना पुराना है कि लोगों के सामने, वह जब आ कर खड़ा हो जाता है तो लोग उसको पहचाने से इनकार कर देते है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि वह कौन है? जिसे हम सब पहचानने से इनकार कर देते है, या फिर इस दुनिया ने अस्वीकार कर दिया है। वह स्वयं का अस्तित्व है, और जो भी इस अस्तित्व के पक्ष में खड़े होते है उनको इस दुनिया ने तब तक नहीं स्वीकार किया जब तक वह शरीर साथ थे जब वह बिना शरीर के हो गए तो उनके नाम की माला जपने लगे, और उनके नाम से पाखण्ड फैलाकर उसको धर्म का नाम दे दिया, धर्म को मैं नहीं जानता हूं। ना मैं धर्म की बातें ही करता हूं। मैं स्वयं को जानता हूं और उस स्वयं को जो भी जानता है वह मेरा मित्र, सखा या मेरा अस्तित्व है और मैं उसी की बातें कर रहा हूं। मैंने इस किताब के माध्यम से सिर्फ यह कहने का प्रयास करने का प्रयास किया है कि जो तुम स्वयं, देखते, सुनते, जानते, मानते, समझते, हो वह तुम नहीं हो, तुम एक ऐसे सम्राट हो जो सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड का स्वामी है, तुम्हारे अन्दर अद्वितीय अद्भुत खजाना और उस पर कैसे पुनः फिर से अपना अधिकार कर के स्वयं को पूर्ण कर सकते हैं। जो मार्ग जीवन और मृत्यु से परे जाने का है, वह कौन सा मार्ग है? मैं मृत्यु के अन्दर किस तरह से प्रवेश करते उसकी बातें कर रहा हूं जो अमृत का द्वार है उस पर चिन्तन, मनन, निधीध्यासन और ध्यान में उतरने उसका जीवन में प्रयोग करके जीवन की सम्पूर्णता की उपलब्धि करने के लिए जो परम आवश्यक महत्त्वपूर्ण चरण हैं उसपर विचार के साथ कुछ सहज प्रयोग करने के लिए प्रेरित कर रहा हूं। जैसा कि सद्गुरुओं ने मुझसे पहले भी ऐसा कार्य करने में ही अपने जीवन शरीर की सम्पूर्ण प्राण ऊर्जा चुका दिया है। क्योंकि वह जीवन की समग्रता, सम्पूर्णता और सहजता के साथ उसकी परिपूर्णता में स्वीकारते है और मैं उनको पसन्द करता हूं। मृत को अमृत कैसे कर दिया है उन लोगों ने जिनको मैं जानता हूं। उस मार्ग पर चलने की बात मेरे द्वारा की जा रही है। मानव मन को मानव मन से मुक्त करके उसकी चेतना में कैसे तटस्थ किया जा सकता है? उसके बारे में मैं बातें कर रहा हूं। मैं मानव को परमात्मा से एक करने कि बात करता हूं। जो आत्मा से परे है इसका मतलब यह नहीं है की मैं परमात्मा को जानता हूं। मैं उसकी बातें करता हूं जो मानव आत्मा से परे है और परमात्मा मानव शरीर के अन्दर है उसके सम्पूर्ण साम्राज्य का मालिक मानव है, वह नहीं जानता है स्वयं को भूल गया है कीड़े-मकौड़े से ज्यादा स्वयं को नहीं जानता है स्वयं को नहीं समझता है, ना मानता है। उसको फिर से याद दिलाने के लिये आवश्यक हो गया मेरे लिए की मैं यह लेख लिखूं और वह संदेश उस अस्तित्व तक पहुंचा दू, जो इसके लिये प्यासे है। मैं कहना चाहता हूं कि मानव जमीन पर रेंगने वाला किड़ा नहीं है, वह अद्वितीय अदृश्य पंखों वाला ब्रह्माण्ड का स्वामी है। उसके पास एक अदृश्य शक्ति संपन्न अद्भुत खजाना है, उसी तरह से जैसा कि एक फकीर था जिसका कटोरा कभी भरता ही नहीं था उसमें कुछ भी डाल दिया जाता और वह अदृश्य हो जाता था ऐसा ही स्वयं के अन्दर भी एक अदृश्य खजाना समाया है जो कभी भी रिक्त खाली नहीं होता है। उसमें से कितना ही खर्च करो वह और बढ़ता ही जाता है। उसी खजाने कि चाभी यह किताब है मानव जीवन में जो अज्ञान रूपी अंधकार है जो अभी श्राप की तरह से उसके खून को चुस-चुस कर उसको मार रहा है। तरह-तरह के विचारों के पाखंड, सिद्धान्त और मान्यताओं से परे जो प्रकाश देने वाला सूर्य है उस सूर्य के ऊपर जो हजारों जन्मो की धुल जम गई है। उस धुल को कैसे साफ कर सकते है? उसकी ही बात इस लेख में कि जा रही हैं। उस दीपक में जो तेल खत्म हो गया है उसमें तेल कैसे भर करके पुनः उसे जला कर अपने जीवन से सदा-सदा के लिये अन्धेरें को दूर करने कि बात मैं इस किताब के माध्यम से कर रहा हूं। यह लेख मानव मात्र के उपकार और सहायता के लिए लिखा गया है। मैंने उन सब का उपयोग किया है जो मानव को महा मानव बनाने के लिए और उसके जीवन को परमानंद में रूपान्तरित करने की बातें करते है, चाहे वह आत्मज्ञानी हो, विज्ञानी हो या वह ब्रह्मज्ञानी हो, क्योंकि मैं एक वैश्विक मानव हूं और सम्पूर्ण विश्व के मानव ने जो भी आज तक कमाया या प्राप्त किया वह सब हमारे उपयोग के लिए ही संचित किया गया है, और वही कार्य मैंने किया है। तो मैं मानव में जो पहले से बीज रूप में विद्यमान, अज्ञान, ज्ञान, विज्ञान, अर्न्तज्ञान, ब्रह्मज्ञान है। उसको फिर से भूमि कैसे उपलब्ध कराकर उसको पूर्ण रूपेण विकसित करके उसके फलों का स्वाद रस लेकर स्वयं को परम तृप्ति सदा-सदा के लिये कर पायें, और अतृप्ति के भव सागर में जो डुब-डुब कर मर रहे है, जिनकी सांसें घुट रही है उनके लिये यह अमृत बाण, अमृत रस, अमृत का दरवाजा बनें यही मेरी कामना है। जिस तरह से मेरे जीवन में प्रकाश, ज्ञान, अमृत, आनन्द के फूल खीलें, मैं मृत्यु में डुब रहा था उससे पार जाने का ध्यान रूपी अमृत द्वार मैंने पाया, उसी तरह से सभी को वह अमृत मार्ग उपलब्ध हो यहीं मेरी कामना है। मैं अपनी बात उपनिषद के एक श्लोक के माध्यम से कहना चाहता हूं वह है असतो माँ सद्गमय अर्थात असत्य से सत्य की ओर और तमसो माँ ज्योर्तिगयं, तम अर्थात अंधकार, अज्ञान, पाखण्ड से प्रकाश कि ज्योति आनन्द की तरफ, मृत्यु माँ अमृतगमय। मृत्यु से अमृत की तरफ चलने कि अतृप्ति से तृप्ति की ओर जाने का मात्र निमंत्रण है। जो इसके लिए तैयार है वही इसे समझ सकते है। इस किताब को मानव मन से जो परे है उसको केन्द्र या ध्यान में रखकर निर्माण किया गया है। इसके द्वारा किसी के मन को प्रताड़ित करने का प्रयास नहीं किया गया है, यदि कोई भी स्वयं को ऐसा महसूस करता है तो वह स्वयं मानव मन और मृत्यु के पंजे में फंसा हुआ है वह हाड़-मांस या मिट्टी का ढेर ही स्वयं को समझता है, और वह स्वयं को वास्तविक रूप से नहीं जानता है। वह स्वयं को जाने यहीं इस लेख का मूल उद्देश्य है।

    हम शरीर नहीं हैं इसके स्वामी, राजा, या सम्राट हैं। इस शरीर को ब्रह्माण्ड कहा गया है। यत पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे, ऐसा वैज्ञानिकों का भी मानना है जो इस शरीर में है वही इस बृहत ब्रह्माण्ड में भी विद्यमान उपस्थित है अन्तर मात्र मात्रा का है जिससे रेत का एक कण बना है उसी से विश्व के विशाल पर्वत और हिमालय भी बना है इस तरह से यह सिद्ध हो रहा है कि जिससे मानव शरीर बनी है उसी से यह बाहरी बृहत ब्रह्माण्ड भी बना है, मैं वहीं बोल रहा हूं जो सिद्धों ने बोला है जैसा कि कबीर कहते हैं की मैं तो बांस कि बाँसुरी हूं, मेरे द्वारा बोलने वाला तो कोई और है। बांस की बांसुरी तो खुद बोलती ही नहीं है उसको बजाने वाला मानव शरीर में अदृश्य आत्मा है जो फुंक पर फुंक मार रहा है जिसके द्वारा ही यह शरीर बज रही है। वेद का मंत्र साफ-साफ कह रहा है कि मैं शरीर नहीं हूं। इससे अलग इसका स्वामी इसका राजा हूं, अर्थात जितना मानव मन अपने शरीर को जानता है उतना ही उसके बाहर परमात्मा के ब्रह्माण्डिय शरीर को भी जानता है, और जो स्वयं को सिर्फ शरीर तक ही जानता है वही वैज्ञानिक है, लेकिन यहां पर जो बातें कि जा रही है उसे वैज्ञानिक भी नहीं जानते है। जैसा कि चाईना का सद्गुरु लाओत्सो कहता है मन को बस में करने का मतलब है की तुमने ब्रह्माण्ड को बस में कर लिया। आगे वेद स्वयं कहता है आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म, अर्थात तू स्वयं अमृत ज्योति रस से परिपूर्ण ब्रह्म है।

        एक दिन एक युवा साधु अपनी यात्रा करते हुए एक नदी के किनारे आ गया, और नदी बहुत बड़ी थी उसका पाट थोड़ा लम्बा, वह विचार करने लगा की किस तरह से इस नदी को पार किया जाये यह विचार करते हुए वही नदी किनारे बैठकर वह किसी नाव के आने का इन्तजार करने लगा। वह साधु बहुत समय तक नाव को देखता रहा शाम होने लगी और नाव कहीं नहीं दिखाई दे रही थी। वहां नाव के आने की कोई सम्भावना भी नहीं दिखाई दे रही थी। ज्यों-ज्यों शाम हो रही थी उसी तरह से धीरे-धीरे उसके सामने बहुत बड़ी कठिनाई आ रही थी। उसको कोई समाधान नहीं दिखाई दे रहा था। तभी उसने सूर्य को अस्त होते देखा जिसकी सुनहरी लालिमा सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने आगोश में समेट रही थी। अचानक उसकी नजर नदी के दूसरे किनारे पर पड़ी तो वह देख कर आश्चर्यचकित हुआ। उस तरफ अपने समय का एक महान रहस्य दर्शी गुरु सम्मानित सन्त अपनी साधना में लीन थे। वह युवा साधु जब दूसरे किनारे पर बैठे हुए सन्त को देखा तो उसका कुछ हौसला बढ़ा और उसने बहुत तेज चिल्लाकर नदी के दूसरे किनारे पर बैठे हुए सन्त को बुलाया और उससे पूछा गुरुदेव क्या आप मुझे भी नदी के पार आने का कोई रास्ता बता सकते है।

   नदी के दूसरे किनारे पर बैठे हुए रहस्य दर्शि गुरु ने कुछ देर तक चिन्तन किया और उसको ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा मेरे पुत्र तुम तो पहले से ही नदी के दूसरे किनारे पर हो। 

 

आचार्य मनोज