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सौ साल का जीवन शिवसंकल्पमस्तु के मंत्र

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शिवसंकल्प सूक्त यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति । दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥१॥ वह दिव्य ज्योतिमय शक्ति (मन) जो हमारे जागने की अवस्था में बहुत दूर तक चला जाता है, और हमारी निद्रावस्था में हमारे पास आकर आत्मा में विलीन हो जाता है,वह प्रकाशमान श्रोत जो हमारी इंद्रियों को प्रकाशित करता है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो। येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः । यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥२॥ जिस मन की सहायता से ज्ञानीजन(ऋषिमुनि इत्यादि)कर्मयोग की साधना में लीन यज्ञ,जप,तप करते हैं,वह(मन) जो सभी जनों के शरीर में विलक्षण रुप से स्थित है, मेरा वह मन शुभसंकल्प युक्त ( सुंदर व पवित्र विचारों से युक्त) हो। यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु । यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥३॥ जो मन ज्ञान, चित्त , व धैर्य स्वरूप , अविनाशी आत्मा से सुक्त इन समस्त प्राणियों के भीतर ज्योति सवरुप विद्यमान है, वह मेरा मन शुभसंकल्प युक्त ( स...

प्राणोपासना ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका

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महर्षि स्वामी दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना विषय में मुण्डकोपनिषद् के तपः श्रद्धे ये ह्मुपवसन्त्यरण्ये… यत्रामृता स पुरुषो ह्यष्यात्मो।। (मुण्डक.1.2.11) तथा युञ्जन्ति ब्रहनमरुषं….रोचन्ते रोचना दिवि।। (ऋग्वेद 1.1.119) एवं सीरा युञ्जन्ति कवयो…धीरा देवेषु सुनया।। (यजुर्वेद 12.67) का अर्थ एवं व्याखया करते हुए महर्षि दयानन्द जी महाराज ने प्रतिपादित किया है कि प्राण द्वार से प्राण नाड़ियों में ध्यान करके, प्राण को परमात्मा में युक्त करके परमानन्द-मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। उपासना विषय में ही महर्षि ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदयदेश है, उसके बीच में अवकाश रूप स्थान में खोज करने से परमेश्वर मिल जाता है। महर्षि ने यह भी स्पष्ट लिखा है कि दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है। उद्धरणों में आये शब्द-प्राण, प्राण-नाडियाँ तथा हृदय के समबन्ध में विचार किया गया था कि प्राण शुद्ध ऊर्जा है, बाह्य प्राण सूर्य रश्मियों से प्राप्त होता है जिसे आधिभौतिक प्राण कहते हैं। दूसरा आध्यात्मिक प्राण जठराग्नि द्व...

क्या आप जानते हैं कि वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन क्यो है?

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       हमारा महान आर्यव्रत देश सृष्टी के प्रारंभ से लेकर महाभारत युद्ध के कुछ काल पश्चात तक विश्व गुरु के रूप में संसार का मार्ग दर्शन करता रहा.कालांतर में वेद विद्या का लोप होने से, धर्म के नाम पर अनेक मत मतान्तरों का प्रचलन होने से, धार्मिक क्रम कांडों के नाम पर यज्ञों में पशु बलि, मांस, मदिरा, मैथुन से ईश्वर प्राप्ति होने के पाखंड के प्रचलित होने से, वेदों में वर्णित सच्चिदानंदस्वरुप, सर्वव्यापक, सर्वत्र, सर्वशक्तिमान, निराकार, निर्विकार, अजन्मा, अविनाशी, न्यायकारी, दयालु,जगत के कर्ता-धर्ता एक ईश्वर का स्थान अज्ञानी, अनेक अवतार धारण कर जन्म लेने वाले एवं मृत्यु को प्राप्त होने वाले,साकार, एकदेशीय आदि अवगुणों वाले अनेक ईश्वरों (बहुदेवतावाद) ने ले लिया. आर्याव्रत देश की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अध्यात्मिक उन्नति थी जिससे वो संसार भर को अपने विज्ञान से प्रकाशित करता आ रहा था. इस पतन के कारण न केवल उसके ज्ञान का नाश हुआ अपितु अनेक मत मतान्तरों के प्रचलित होने से उसकी एकता और अखंडता नष्ट हो गयी जिससे वह विदेशी हमलावरों के सामने प्रतिकार न कर सका और अपनी स्वतंत्रता खोकर सद...

EQUALITY IN VEDAS They march onwards for prosperity

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Rigveda says : – “Te ajyesthaa akanisthaasa udbhido amadhyamaaso mahasaa vi vavridhuh | sujaataaso janushaa prishnimataro divo marya aa no achaa jigatana ||” – Rig: 5-59-6 Among these men there are no superiors or no inferiors, no middle ones either. They become great from small beginnings. They make progress in different ways by dint of their merits. By birth they are all highborn because they are all children of Mother-Earth. O you men of the Lord Refulgent! be available to us in a loveable manner or grow into praise-worthy souls in fair ways. “Ajyesthaaso akanislliaasa ete sam bhraataro vaavridhuh saubhagaaya|yuva pita swapaa rudra eshaam sudhughaa prishnih sudinaa marudbhayah||“ – Rig : 5-60-5 These men are without superiors and without inferiors. They are mutually brothers. They march onwards for prosperity. The eternally youthful, the soul protecting, grief alleviating God is their father. The richly feeding Mother-Earth produces happy days to these mortals. “ Sam samid...

God revealed VEDAS or Divine Knowledge

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   At the beginning of the creation, God transmitted divine knowledge to mankind for a style of life generating health and happiness. God revealed VEDAS or Divine Knowledge to the Rishies or the sages and they passed it on without in any way discriminating between man and woman or between man and man on grounds of caste,creed or colour, The entire human race is entitled to read the Ved mantras,meditate on them and improve the quality of life. One has just to make an effort to read and meditate on the mantra and the happy results would not be far to find. One may read the original mantra compilation called samhita or go to the translation of the text and explanation or exposition in English or Hindi language. Treatises explaining meaning of the Ved mantras may be available in other languages too.Meditation on mantras leads to bliss. “Vedo Akhilo Dharm Moolam’’ – Vedas are the roots of righteousness. When one walks on the path of righteousness one is doing one’s Dharma as a goo...