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आपकी साधना–श्रृंखला को पूर्णता की ओर ले जाते हुए प्रस्तुत है —
यह भाग पूरी श्रृंखला का निष्कर्षात्मक और समन्वयात्मक अध्याय है।
यहाँ यजुर्वेद के विचार संगठित रूप में सामने आते हैं और स्पष्ट होता है कि यजुर्वेद केवल एक वैदिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति है।
यजुर्वेद के सूक्त किसी एक विषय तक सीमित नहीं हैं।
वे जीवन के हर पक्ष को स्पर्श करते हैं:
यजुर्वेद का केंद्रीय स्वर:
“कर्म करो, लेकिन स्वयं को कर्म में मत बाँधो।”
यजुर्वेद में यज्ञ:
यज्ञ सूक्तों का सार:
यज्ञ का अंतिम रूप:
अहंकार की आहुति
कहा जा सकता है:
यजुर्वेद = कर्म का बीज
गीता = कर्म का वृक्ष
गीता का “निष्काम कर्म”
यजुर्वेद की आत्मा है।
कर्मयोग का अर्थ:
कर्मयोगी:
कर्म से भागने वाला नहीं,
कर्म में डूबने वाला भी नहीं,
कर्म को साधने वाला — कर्मयोगी है।
यजुर्वेद का दर्शन चार स्तंभों पर टिका है:
1️⃣ ऋत – प्राकृतिक और नैतिक नियम
2️⃣ कर्म – उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य
3️⃣ यज्ञ – समर्पित जीवन
4️⃣ ज्ञान – आत्मबोध की ओर यात्रा
इन चारों का संतुलन:
मानव को पूर्ण बनाता है।
यजुर्वेद का समाज:
यहाँ:
समाज का उद्देश्य:
व्यक्ति की उन्नति के साथ
समष्टि का कल्याण।
आज के पर्यावरण संकट के संदर्भ में
यजुर्वेद अत्यंत प्रासंगिक है।
यजुर्वेद कहता है:
प्रकृति का शोषण नहीं,
प्रकृति के साथ यज्ञ करो।
आधुनिक मनुष्य:
यजुर्वेद का समाधान:
शांति बाहर से नहीं,
कर्म की शुद्धि से आती है।
यजुर्वेद का आदर्श मानव:
ऐसा मानव:
स्वयं भी मुक्त होता है
और समाज को भी मुक्त करता है।
यजुर्वेद का लक्ष्य केवल मोक्ष नहीं है।
उसका लक्ष्य है:
जीवन की पूर्णता
जहाँ:
आज के युग में यजुर्वेद कहता है:
तेज़ चलो,
लेकिन संतुलन मत खोओ।
कर्म करो,
लेकिन आत्मा को मत खोओ।
यजुर्वेद:
जब जीवन स्वयं यज्ञ बन जाता है,
तब मोक्ष कोई दूर की अवस्था नहीं रहता।
आपने जिस धैर्य और श्रद्धा से
यजुर्वेद भाग 1 से भाग 5 तक यह यात्रा की है,
वह स्वयं एक आंतरिक यज्ञ है 🙏
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