नीचे सामवेद के प्रथम मंत्र
“अग्न आ याहि वितये घृणानो हव्यदतये।
निहोति सत्सि बर्हिषि॥”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक और आधुनिक संदर्भों सहित विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत है।
🔥 सामवेद का प्रथम मंत्र
“अग्न आ याहि वितये…”
सार-गर्भित एवं समग्र व्याख्या
1. भूमिका : सामवेद और अग्नि का स्थान
सामवेद को वैदिक साहित्य में उपासना, स्वर और साधना का वेद कहा गया है। जहाँ ऋग्वेद मंत्रों का बीज देता है, वहीं सामवेद उन मंत्रों को स्वर, लय और चेतना प्रदान करता है। सामवेद का प्रथम मंत्र अग्नि से आरंभ होना कोई संयोग नहीं, बल्कि यह इस सत्य का उद्घोष है कि—
जब तक चेतना में अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, तब तक उपासना जीवित नहीं होती।
अग्नि केवल भौतिक आग नहीं है; वह प्राण, चेतना, प्रेरणा, तप और ज्ञान का प्रतीक है। इस मंत्र में अग्नि को आमंत्रित किया जा रहा है—न केवल यज्ञकुंड में, बल्कि मानव हृदय और जीवन-यज्ञ में।
2. मंत्र का शुद्ध पाठ
अग्न आ याहि वितये घृणानो हव्यदतये।
निहोति सत्सि बर्हिषि॥
3. शब्दार्थ (संक्षिप्त)
- अग्न – हे अग्नि (चेतना, प्रकाश, देवदूत)
- आ याहि – आओ, पधारो
- वितये – यज्ञ के लिए, विस्तार हेतु
- घृणानः – प्रकाशमान, तेजस्वी
- हव्यदतये – हवि को ग्रहण करने हेतु
- निहोति – बैठो, स्थापित होओ
- सत्सि – सत्य में, सद्भाव में
- बर्हिषि – कुश के आसन पर
4. स्थूल अर्थ (बाह्य अर्थ)
हे अग्नि!
आप तेजस्वी होकर हमारे यज्ञ में पधारिए।
आप हवि को ग्रहण करने के लिए आएँ।
आप सत्ययुक्त कुश के आसन पर विराजमान हों।
5. यज्ञात्मक (कर्मकांडीय) व्याख्या
वैदिक यज्ञ में अग्नि का कार्य केवल पदार्थों को जलाना नहीं है, बल्कि हवि को देवताओं तक पहुँचाना है। यह मंत्र अग्नि को—
- आमंत्रित करता है
- प्रतिष्ठित करता है
- उसे यज्ञ का केंद्र बनाता है
बर्हिषि (कुशासन) का अर्थ है—शुद्धता, सात्त्विकता और प्रकृति से सामंजस्य। इसका संकेत है कि अग्नि वहीं प्रतिष्ठित होती है, जहाँ पवित्रता और सत्य हो।
6. दार्शनिक व्याख्या : अग्नि = चेतना
दार्शनिक दृष्टि से अग्नि कोई बाह्य तत्व नहीं, बल्कि—
मनुष्य के भीतर स्थित जाग्रत चेतना (Conscious Awareness) है।
जब मंत्र कहता है—
“अग्न आ याहि”,
तो इसका गूढ़ अर्थ है—
“हे चेतना! हे विवेक! हे आत्म-जागरण!
मेरे जीवन में प्रकट हो।”
आज के संदर्भ में यह मंत्र आत्मिक जागृति का आह्वान है।
7. वितये – विस्तार का रहस्य
वितये शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल “यज्ञ के लिए” नहीं, बल्कि—
- चेतना का विस्तार
- सीमित अहं से व्यापक आत्मा की ओर गमन
- संकीर्ण सोच से सार्वभौमिक दृष्टि
यह बताता है कि अग्नि को बुलाने का उद्देश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मिक विस्तार (Expansion of Consciousness) है।
8. घृणानो – प्रकाशमान चेतना
घृणानः का अर्थ है—दीप्तिमान, तेजस्वी।
यह अग्नि की बाहरी लौ नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रकाश है।
यह वही अग्नि है जो—
- अज्ञान को जलाती है
- भ्रम को नष्ट करती है
- विवेक को प्रकाशित करती है
आज की भाषा में इसे Inner Light या Awakened Intelligence कहा जा सकता है।
9. हव्यदतये – कर्म का रूपांतरण
हव्य = आहुति
दतये = ग्रहण करने के लिए
इसका गूढ़ अर्थ है—
हमारे कर्म, भाव, विचार और संकल्प—
यदि अग्नि (चेतना) में समर्पित हों,
तो वे देवत्व में परिवर्तित हो जाते हैं।
अर्थात् यह मंत्र कर्मयोग का मूल सूत्र है।
10. निहोति सत्सि – सत्य में प्रतिष्ठा
अग्नि को सत्सि अर्थात् सत्य में बैठने के लिए कहा गया है।
यह स्पष्ट करता है कि—
- जहाँ असत्य, कपट और अहं है
- वहाँ अग्नि (दैवी चेतना) नहीं टिकती
अग्नि केवल सत्य, ऋत और धर्म में ही प्रतिष्ठित होती है।
11. बर्हिषि – हृदय का आसन
कुशासन बाहरी प्रतीक है।
वास्तविक बर्हिषि है—मानव हृदय।
जब हृदय—
- शुद्ध होता है
- सात्त्विक होता है
- अहंकार रहित होता है
तभी अग्नि उसमें विराजमान होती है।
12. आध्यात्मिक सार
यह मंत्र सिखाता है कि—
- जीवन स्वयं एक यज्ञ है
- कर्म ही आहुति है
- चेतना ही अग्नि है
- सत्य ही आसन है
13. आधुनिक जीवन में उपयोग
(क) मानसिक स्तर
- एकाग्रता बढ़ाता है
- नकारात्मक विचारों को जलाता है
- आत्मविश्वास देता है
(ख) नैतिक स्तर
- सत्यनिष्ठा को प्रबल करता है
- कर्मों में पवित्रता लाता है
(ग) आध्यात्मिक स्तर
- ध्यान को गहरा करता है
- आत्मचेतना को जाग्रत करता है
14. साधनात्मक प्रयोग
- प्रातः दीपक के सामने
- 11 या 21 बार जप
- शुद्ध उच्चारण
- भाव: “मेरे भीतर की अग्नि जाग्रत हो”
15. ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से
अग्नि यहाँ ब्रह्म का सगुण प्रतीक है।
जब साधक अग्नि को आमंत्रित करता है, तो वास्तव में वह—
अपने भीतर ब्रह्मचेतना को आमंत्रित कर रहा होता है।
16. निष्कर्ष (सार-संक्षेप)
यह मंत्र यज्ञ की शुरुआत नहीं,
आत्मिक क्रांति की शुरुआत है।
यह अग्नि की स्तुति नहीं,
स्वयं को जाग्रत करने का आह्वान है।

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