नीचे सामवेद के प्रथम मंत्र
“अग्न आ याहि वितये घृणानो हव्यदतये।
निहोति सत्सि बर्हिषि॥”
की सार-गर्भित, दार्शनिक, आध्यात्मिक और आधुनिक संदर्भों सहित विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत है।
सामवेद को वैदिक साहित्य में उपासना, स्वर और साधना का वेद कहा गया है। जहाँ ऋग्वेद मंत्रों का बीज देता है, वहीं सामवेद उन मंत्रों को स्वर, लय और चेतना प्रदान करता है। सामवेद का प्रथम मंत्र अग्नि से आरंभ होना कोई संयोग नहीं, बल्कि यह इस सत्य का उद्घोष है कि—
जब तक चेतना में अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, तब तक उपासना जीवित नहीं होती।
अग्नि केवल भौतिक आग नहीं है; वह प्राण, चेतना, प्रेरणा, तप और ज्ञान का प्रतीक है। इस मंत्र में अग्नि को आमंत्रित किया जा रहा है—न केवल यज्ञकुंड में, बल्कि मानव हृदय और जीवन-यज्ञ में।
अग्न आ याहि वितये घृणानो हव्यदतये।
निहोति सत्सि बर्हिषि॥
हे अग्नि!
आप तेजस्वी होकर हमारे यज्ञ में पधारिए।
आप हवि को ग्रहण करने के लिए आएँ।
आप सत्ययुक्त कुश के आसन पर विराजमान हों।
वैदिक यज्ञ में अग्नि का कार्य केवल पदार्थों को जलाना नहीं है, बल्कि हवि को देवताओं तक पहुँचाना है। यह मंत्र अग्नि को—
बर्हिषि (कुशासन) का अर्थ है—शुद्धता, सात्त्विकता और प्रकृति से सामंजस्य। इसका संकेत है कि अग्नि वहीं प्रतिष्ठित होती है, जहाँ पवित्रता और सत्य हो।
दार्शनिक दृष्टि से अग्नि कोई बाह्य तत्व नहीं, बल्कि—
मनुष्य के भीतर स्थित जाग्रत चेतना (Conscious Awareness) है।
जब मंत्र कहता है—
“अग्न आ याहि”,
तो इसका गूढ़ अर्थ है—
“हे चेतना! हे विवेक! हे आत्म-जागरण!
मेरे जीवन में प्रकट हो।”
आज के संदर्भ में यह मंत्र आत्मिक जागृति का आह्वान है।
वितये शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल “यज्ञ के लिए” नहीं, बल्कि—
यह बताता है कि अग्नि को बुलाने का उद्देश्य केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मिक विस्तार (Expansion of Consciousness) है।
घृणानः का अर्थ है—दीप्तिमान, तेजस्वी।
यह अग्नि की बाहरी लौ नहीं, बल्कि ज्ञान का प्रकाश है।
यह वही अग्नि है जो—
आज की भाषा में इसे Inner Light या Awakened Intelligence कहा जा सकता है।
हव्य = आहुति
दतये = ग्रहण करने के लिए
इसका गूढ़ अर्थ है—
हमारे कर्म, भाव, विचार और संकल्प—
यदि अग्नि (चेतना) में समर्पित हों,
तो वे देवत्व में परिवर्तित हो जाते हैं।
अर्थात् यह मंत्र कर्मयोग का मूल सूत्र है।
अग्नि को सत्सि अर्थात् सत्य में बैठने के लिए कहा गया है।
यह स्पष्ट करता है कि—
अग्नि केवल सत्य, ऋत और धर्म में ही प्रतिष्ठित होती है।
कुशासन बाहरी प्रतीक है।
वास्तविक बर्हिषि है—मानव हृदय।
जब हृदय—
तभी अग्नि उसमें विराजमान होती है।
यह मंत्र सिखाता है कि—
अग्नि यहाँ ब्रह्म का सगुण प्रतीक है।
जब साधक अग्नि को आमंत्रित करता है, तो वास्तव में वह—
अपने भीतर ब्रह्मचेतना को आमंत्रित कर रहा होता है।
यह मंत्र यज्ञ की शुरुआत नहीं,
आत्मिक क्रांति की शुरुआत है।
यह अग्नि की स्तुति नहीं,
स्वयं को जाग्रत करने का आह्वान है।
0 टिप्पणियाँ