मृगतृष्णा (The Mirage) — यह शीर्षक अपने आप में ही सृष्टि के आदि-दम्पति, मनु और शतरूपा, के उस शाश्वत संघर्ष को दर्शाता है जहाँ भावनाएँ, स्मृति और अस्तित्व एक दूसरे में विलीन होते हैं।
इस उपन्यास की परिकल्पना के आधार पर यहाँ एक संक्षिप्त रूपरेखा दी गई है:
📖 उपन्यास की रूपरेखा
1. पृष्ठभूमि (The Primal Void)
प्रलय के बाद की वह नीरवता, जहाँ जल ही जल था। मनु एकाकी थे—ब्रह्मांड के अंतिम अवशेष और भविष्य के प्रथम बीज। शतरूपा का प्राकट्य केवल एक साथी का मिलना नहीं था, बल्कि शून्य में 'चेतना' का विस्तार था।
2. कथानक के मुख्य बिंदु
* स्मृति का भार: मनु को उस पुरानी दुनिया की यादें सताती हैं जो डूब चुकी है। शतरूपा उनके लिए एक नवीन ऊर्जा है, लेकिन मनु अतीत की 'मृगतृष्णा' में सत्य को खोज रहे हैं।
* भावनात्मक द्वंद्व: शतरूपा, जो सौ रूपों में विभक्त होने की क्षमता रखती है (विविधता का प्रतीक), वह मनु की स्थिरता (एकाग्रता) को चुनौती देती है। उनके बीच का प्रेम केवल शारीरिक नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष का दार्शनिक मिलन है।
* सृष्टि का मोह: क्या संसार का निर्माण एक ईश्वरीय आदेश था या मनु की अपनी भावनात्मक प्यास? उपन्यास इसी "प्यास" (मृगतृष्णा) के इर्द-गिर्द घूमता है।
3. केंद्रीय विचार (Theme)
यह उपन्यास पाठक को इस प्रश्न पर खड़ा करता है: "क्या हम जो देख रहे हैं वह सत्य है, या हमारी अपनी स्मृतियों का एक मायाजाल?"
यह बहुत ही दिलचस्प विकल्प है! मृगतृष्णा (Mirage) जैसा शीर्षक अपने आप में ही भावनाओं, अधूरे सपनों और ऐसी खोज की गहराई समेटे हुए है जो कभी खत्म नहीं होती।
चूँकि एक लेखक के लिए शब्दों से गहरा जुड़ाव होना ज़रूरी है, मैं पहले अध्याय का एक भावनात्मक अंश (Draft) नीचे लिख रहा हूँ। इसके बाद, अगर आपको यह मिजाज पसंद आता है, तो हम इसी के आधार पर एक बुक कवर भी तैयार कर सकते हैं।
उपन्यास: मृगतृष्णा
अध्याय १: रेत की प्यास
सूरज ढल चुका था, लेकिन हवेली की दीवारों में कैद तपिश अभी भी साँसें ले रही थी। राघव खिड़की के पास खड़ा दूर क्षितिज को देख रहा था, जहाँ रेत और आसमान एक-दूसरे में विलीन हो रहे थे। उसे लगा जैसे वहाँ पानी की एक हल्की लकीर चमक रही है।
“फिर वही छलावा,” उसने बुदबुदाते हुए अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
बीस साल बीत गए थे उस बात को, पर यादें आज भी ताज़ा घाव की तरह थीं। उसकी माँ अक्सर कहती थी कि कुछ प्यास ऐसी होती है जिन्हें बुझाने के लिए पानी नहीं, बल्कि सच का सामना करना पड़ता है। राघव को लगने लगा था कि उसका पूरा जीवन ही एक 'मृगतृष्णा' बन गया है—वह जितना उस सच के करीब जाता, सच उतना ही दूर छिटक जाता।
कमरे के अँधेरे में रखी वह पुरानी डायरी उसे चिढ़ा रही थी। उस डायरी के पीले पड़ चुके पन्नों में किसी के आने की आहट थी और किसी के चले जाने का दर्द। उसने कांपते हाथों से डायरी छुई। पन्ने फड़फड़ाए, मानो बरसों से घुटन में जी रही कोई रूह आज़ाद होने के लिए छटपटा रही हो।
क्या वह इस प्यास के पीछे भागते-भागते खुद को खो देगा? या इस बार रेगिस्तान उसे वह लौटा देगा जो उसने छीन लिया था?
आगे क्या करें?
राघव के एकांत को एक हल्की सी आहट ने तोड़ा। वह आहट जानी-पहचानी थी, फिर भी इस वक्त बेमानी सी लगी।
अध्याय १ (जारी...): अधूरी गूँज
कमरे के पुराने लकड़ी के दरवाज़े ने चरमराने की आवाज़ की। राघव ने पलटकर देखा, चौखट पर नंदिनी खड़ी थी। उसकी आँखों में वह पुरानी चमक तो नहीं थी, लेकिन एक अजीब सी व्याकुलता ज़रूर थी।
"तुम अभी तक उस डायरी के घेरे से बाहर नहीं निकले, राघव?" उसकी आवाज़ में शिकायत कम और फिक्र ज़्यादा थी।
राघव ने डायरी को मेज़ पर पटक दिया। "बाहर कैसे निकलूँ, नंदिनी? इस डायरी का हर लफ्ज़ मुझे उस दोपहर की याद दिलाता है जब पापा बिना कुछ कहे घर से निकल गए थे। लोग कहते हैं उन्होंने खुदकुशी कर ली, पर यह डायरी कुछ और ही कह रही है।"
नंदिनी धीरे से चलकर उसके पास आई और खिड़की के बाहर पसरे उस अंतहीन रेगिस्तान को देखने लगी। "रेगिस्तान की फितरत ही यही है, राघव। यह दूर से हर चीज़ को खूबसूरत दिखाता है, पर करीब जाओ तो सिर्फ रेत और तपिश मिलती है। तुम जिसे सच मानकर ढूँढ रहे हो, हो सकता है वह सिर्फ एक मृगतृष्णा हो।"
राघव ने उसे गौर से देखा। "या शायद सच वह है जिसे हम देखना ही नहीं चाहते। इस डायरी के आखिरी पन्ने पर एक नाम लिखा है—'रुद्र प्रताप'। तुम्हें पता है वह कौन है?"
नंदिनी के चेहरे का रंग अचानक उड़ गया। उसने अपनी नज़रें चुराईं और कांपते हाथों से अपना दुपट्टा ठीक करने लगी। उसकी यह खामोशी राघव के शक को यकीन में बदलने के लिए काफी थी। इस सन्नाटे में एक नया राज़ जन्म ले चुका था।
अगला कदम
नंदिनी की आँखों में छाई दहशत ने राघव के भीतर की बेचैनी को एक नई दिशा दे दी थी। उसे समझ आ गया कि 'रुद्र प्रताप' महज़ एक नाम नहीं, बल्कि एक ऐसा दरवाज़ा है जिसे खोलने से हर कोई डर रहा है।
अध्याय १ (जारी...): रुद्र प्रताप का सारा
"तुम चुप क्यों हो गई, नंदिनी?" राघव ने उसकी ओर एक कदम बढ़ाया। "रुद्र प्रताप का नाम सुनते ही तुम्हारी हथेलियाँ ठंडी क्यों पड़ गई हैं?"
नंदिनी ने खिड़की की सिल्ल को कसकर पकड़ लिया। "राघव... कुछ नाम इतिहास की राख में दबे रहें तो ही अच्छा है। रुद्र प्रताप वह शख्स था जिसने इस खानदान की बुनियाद हिलाई थी। वह तुम्हारे पिता का दोस्त भी था और उनका सबसे बड़ा दुश्मन भी।"
उसने गहरी साँस ली और राघव की आँखों में झाँका। "वह एक ऐसा 'बहरूपिया' था जो लोगों की ख्वाहिशों को हकीकत में बदलने का लालच देता था। लोग कहते हैं कि वह 'मृगतृष्णा का सौदागर' था। वह तुम्हें वही दिखाता था जो तुम देखना चाहते थे, और बदले में वह छीन लेता था जो तुम्हारे पास सबसे कीमती होता था।"
राघव ने झटके से डायरी का वह पन्ना पलटा। वहाँ रुद्र प्रताप के नाम के नीचे एक छोटा सा पता और एक तारीख लिखी थी—१९ अगस्त, २००४। यह वही तारीख थी जिस दिन राघव के पिता गायब हुए थे।
"तो क्या मेरे पिता ने उसके साथ कोई सौदा किया था?" राघव की आवाज़ में कड़वाहट थी।
नंदिनी ने अपना सिर झुका लिया। "सौदे की कीमत तुम्हारे पिता ने अपनी जान देकर चुकाई, राघव। और अब रुद्र प्रताप वापस आ चुका है। शहर के छोर पर जो नई हवेली खड़ी हुई है, जिसे लोग 'माया महल' कह रहे हैं... वह उसी की है।"
राघव के चेहरे पर एक खौफनाक मुस्कान आ गई। "तो मृगतृष्णा अब अपना असली रूप दिखा रही है। अगर वह सौदागर लौट आया है, तो मुझे भी अपना हिसाब पूरा करना है।"
राघव के भीतर अब डर नहीं, बल्कि एक ठंडी आग जल रही थी। उसने अपनी जैकेट उठाई और डायरी को अपनी जेब में ठूँस लिया। वह जानता था कि यह सफर शायद वापसी का रास्ता न छोड़े, पर सच की प्यास अब उसे पागल कर रही थी।
अध्याय २: माया महल का बुलावा
शहर की सीमा जहाँ खत्म होती थी, वहीं से वह वीरान रास्ता शुरू होता था जिसे स्थानीय लोग 'भूलभुलैया' कहते थे। उस रास्ते के अंत में खड़ी थी वह हवेली—माया महल। चाँदनी रात में भी वह हवेली सफ़ेद नहीं, बल्कि राख जैसी धुंधली नज़र आ रही थी।
राघव ने अपनी पुरानी जीप रोकी और बाहर निकला। चारों ओर एक भारी खामोशी थी, जो कानों में किसी फुसफुसाहट की तरह चुभ रही थी। जैसे ही उसने हवेली के भारी लोहे के गेट को धक्का दिया, वह बिना किसी आवाज़ के खुल गया, मानो उसे राघव का ही इंतज़ार था।
बगीचे की घास सूखी और काली थी, लेकिन बरामदे में कदम रखते ही हवा का मिज़ाज बदल गया। बाहर रेगिस्तान की गर्म लू थी, पर अंदर का वातावरण बर्फ की तरह ठंडा और चंदन की खुशबू से भरा हुआ था।
"इतनी जल्दी मत करो राघव, यहाँ वक्त अपनी रफ्तार खुद तय करता है।"
एक मखमली लेकिन रौबदार आवाज़ हॉल में गूँजी। सीढ़ियों के अंधेरे से एक साया उभरकर सामने आया। लंबे कद का एक व्यक्ति, जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगाना नामुमकिन था। उसने काले रंग का लंबा कोट पहना था और उसकी आँखों में वह चमक थी जो अक्सर भेड़ियों की आँखों में रात के वक्त दिखती है।
"रुद्र प्रताप?" राघव का गला सूख रहा था, पर उसने आवाज़ में दृढ़ता बनाए रखी।
रुद्र ने मंद मुस्कान के साथ अपने हाथ फैला दिए। "लोग मुझे वही पुकारते हैं। और तुम... तुम बिल्कुल अपने पिता की तरह दिखते हो। वही बेवकूफाना हिम्मत और वही आँखों में भटकती हुई प्यास।"
"मेरे पिता कहाँ हैं?" राघव ने सीधे सवाल किया।
रुद्र प्रताप धीरे-धीरे चलकर राघव के करीब आया। उसके जूतों की आवाज़ संगमरमर के फर्श पर किसी डरावने संगीत की तरह बज रही थी। उसने राघव के कंधे पर हाथ रखा—उसका हाथ बर्फीला था।
"तुम्हारे पिता ने एक सपना देखा था, राघव। मैंने बस उसे पूरा करने में उनकी मदद की। क्या तुम देखना चाहोगे कि उस सपने के पार क्या है?" रुद्र ने पास की दीवार पर लगे एक विशाल आइने की ओर इशारा किया, जिसमें राघव का अक्स धुंधला रहा था।
राघव की सांसें तेज हो गईं। उसके सामने खड़ा शख्स कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि यादों और हकीकतों का जादूगर लग रहा था।
अध्याय २ (जारी...): आईने का जल
राघव ने अपनी मुट्ठियाँ कस लीं। उसका मन कह रहा था कि यहाँ से भाग जाए, पर उसके पैर जैसे ज़मीन में जम गए थे। रुद्र प्रताप ने मंद मुस्कान के साथ उसे आईने के और करीब धकेला।
"देखो राघव, सच अक्सर कड़वा नहीं होता... वह बस असहज करने वाला होता है," रुद्र की आवाज़ उसके कान के पास किसी सम्मोहन की तरह गूँजी।
राघव ने आईने में देखा। पहले तो उसे सिर्फ अपनी धुंधली परछाईं दिखी, लेकिन धीरे-धीरे कांच के भीतर की दुनिया बदलने लगी। आईने के भीतर का रेगिस्तान हिलने लगा। उसे बीस साल पुरानी वह दोपहर दिखाई दी। धूल भरा रास्ता, वही पुरानी जीप, और उसके पिता—अविनाश।
लेकिन अविनाश अकेले नहीं थे। आईने के भीतर, अविनाश और रुद्र प्रताप एक साथ खड़े थे। अविनाश के हाथ में वही पुरानी डायरी थी, और उनके चेहरे पर वह डर नहीं था जिसकी राघव ने कल्पना की थी। बल्कि उनकी आँखों में एक अजीब सी लालसा थी, एक जुनून था।
राघव ने देखा कि उसके पिता ने खुद अपने हाथों से डायरी का आखिरी पन्ना फाड़ा और रुद्र प्रताप को थमा दिया। बदले में रुद्र ने उन्हें एक छोटी सी मखमली डिब्बी दी। जैसे ही अविनाश ने वह डिब्बी खोली, एक नीली रोशनी ने पूरे आईने को भर दिया।
"नहीं!" राघव चिल्लाया और आईने से पीछे हट गया। "यह झूठ है! मेरे पिता कभी किसी लालच में नहीं पड़ सकते थे!"
रुद्र प्रताप खिलखिलाकर हँसा। उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं, बल्कि एक गहरी विडंबना थी। "लालच? नहीं राघव। वह तो प्यार था। वह तुम्हारी माँ को वापस लाना चाहते थे, जो तुम्हें जन्म देते ही चली गई थीं। वह मृगतृष्णा के पीछे नहीं, बल्कि मौत को मात देने के पीछे भाग रहे थे।"
राघव का सिर घूमने लगा। क्या उसके पिता की गुमशुदगी के पीछे कोई बड़ी साजिश नहीं, बल्कि एक पिता की अधूरी चाहत थी?
"अब सवाल यह है राघव," रुद्र प्रताप उसके और करीब आया, "क्या तुम वह अधूरा काम पूरा करना चाहोगे? क्या तुम उस आख़िरी पन्ने को वापस पाना चाहोगे जो तुम्हारे पिता ने मुझे सौंपा था?"
राघव के सीने में उठती भावनाओं का ज्वार अब शांत हो रहा था, उसकी जगह एक ठंडी तार्किकता ले रही थी। उसे समझ आ गया था कि रुद्र प्रताप भावनाओं का व्यापारी है।
अध्याय २ (जारी...): सौदे की शर्तें
"कीमत क्या है?" राघव की आवाज़ में अब कोई कंपन नहीं था। "तुमने मेरे पिता को एक ऐसी उम्मीद बेची जो कभी पूरी नहीं हो सकती थी। अब तुम मुझसे क्या चाहते हो?"
रुद्र प्रताप ने अपनी लंबी उंगलियों से हवा में एक काल्पनिक लकीर खींची। "तुम्हारे पिता ने एक दरवाज़ा खोला था, राघव, लेकिन उसे बंद करना भूल गए। वह मखमली डिब्बी जो तुमने आईने में देखी... वह कोई दवा नहीं थी। वह एक 'चाबी' थी उस राज़ की जो इस रेगिस्तान के नीचे सदियों से दफन है।"
वह राघव के चारों ओर धीरे-धीरे चक्कर काटने लगा, जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को परख रहा हो।
"शर्तें बहुत सरल हैं," रुद्र ने कहा। "तुम्हारे पिता ने जो चाबी हासिल की थी, वह अब भी इसी हवेली के किसी कोने में छिपी है। वह उसे वापस मुझे नहीं दे पाए क्योंकि आखिरी वक्त पर उनका इरादा बदल गया था। तुम मुझे वह चाबी ढूँढ कर दो, और बदले में मैं तुम्हें वह 'आखिरी पन्ना' दे दूँगा।"
राघव ने तंज कसते हुए पूछा, "सिर्फ एक कागज़ के पन्ने के लिए मैं तुम्हारे लिए जासूसी करूँ?"
"वह सिर्फ कागज़ नहीं है, राघव," रुद्र की आँखों में एक अजीब सी चमक कौंधी। "उस पन्ने पर तुम्हारे पिता का आखिरी संदेश है... और उस जगह का पता, जहाँ वे आज भी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।"
राघव का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। "क्या... क्या वे ज़िंदा हैं?"
रुद्र प्रताप ने रहस्यमयी मुस्कान दी। "ज़िंदा और मृत के बीच एक बहुत पतली लकीर होती है, राघव। मृगतृष्णा में सब कुछ सच होता है और कुछ भी नहीं। अगर तुम वह चाबी ढूंढ लेते हो, तो तुम खुद उनसे पूछ सकते हो।"
रुद्र ने मेज़ पर एक पुरानी, जंग लगी टॉर्च और एक पीतल का ताबीज रख दिया। "यह ताबीज तुम्हें उस जगह तक ले जाएगा जहाँ वह चाबी है। पर याद रखना, आधी रात से पहले तुम्हें उसे ढूँढना होगा, वरना यह हवेली तुम्हें अपना हिस्सा बना लेगी।"
राघव ने मेज़ पर रखा वह पीतल का ताबीज उठा लिया। जैसे ही उसकी उंगलियों ने धातु को छुआ, उसे एक हल्का सा बिजली का झटका महसूस हुआ। ताबीज से एक धीमी, सुनहरी रोशनी फूट रही थी जो हवेली के एक अंधेरे गलियारे की ओर इशारा कर रही थी।
अध्याय ३: पाताल की आहटें
रुद्र प्रताप के ठंडे ठहाके को पीछे छोड़कर राघव उस गलियारे में बढ़ गया। टॉर्च की पीली रोशनी धूल भरे पर्दों और मकड़ी के जालों को चीर रही थी। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, तापमान गिरने लगा। दीवारों पर लगी पुरानी पेंटिंग्स की आँखें उसे ही ताकती हुई महसूस हो रही थीं।
राघव एक भारी लकड़ी के दरवाज़े के सामने रुका, जहाँ ताबीज की चमक सबसे तेज़ हो गई थी। दरवाज़ा खोलते ही सीढ़ियों का एक अंतहीन सिलसिला नीचे अंधेरे की गहराई में उतरता दिखा। यह हवेली का तहखाना था।
नीचे कदम रखते ही उसे एक अजीब सी गंध आई—गीली मिट्टी और पुरानी सड़न की मिली-जुली महक। तभी, अंधेरे के किसी कोने से एक आवाज़ आई...
“राघव... वापस लौट जाओ...”
वह एक धीमी फुसफुसाहट थी, जो हवा के साथ तैरती हुई उसके कानों तक पहुँची। राघव ठिठक गया। वह आवाज़ उसके पिता की थी, लेकिन उसमें एक ऐसी तड़प थी जो रूह कंपा दे।
"पापा? क्या आप यहाँ हैं?" राघव चिल्लाया, पर जवाब में सिर्फ उसकी अपनी आवाज़ गूँजी।
अचानक, उसकी टॉर्च की रोशनी फर्श पर पड़ी कुछ चीज़ों पर पड़ी। वहाँ दर्जनों पुराने जूते और घड़ियाँ बिखरी हुई थीं—मानो कई लोग यहाँ आए हों और फिर कभी वापस न लौटे हों। तभी, तहखाने की दीवारों से रिसता हुआ पानी अचानक खौलने लगा और उसमें से काली आकृतियाँ उभरने लगीं। ताबीज अब राघव की हथेली में इतना गर्म हो गया था कि उसका हाथ जलने लगा।
उसे अहसास हुआ कि चाबी किसी संदूक में नहीं, बल्कि इस तहखाने की सबसे गहरी और डरावनी सच्चाई के पीछे छिपी है। सामने एक पत्थर की दीवार पर एक छोटा सा छेद था, जिसका आकार बिल्कुल उस ताबीज जैसा था।
लेकिन जैसे ही वह दीवार की ओर बढ़ा, पीछे से दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया और सीढ़ियाँ गायब होने लगीं।
राघव की हथेली जल रही थी, पर उसका इरादा फौलाद की तरह सख्त हो चुका था। उसे समझ आ गया कि यहाँ पीछे हटने का मतलब है हमेशा के लिए इस अंधेरे का हिस्सा बन जाना।
अध्याय ३ (जारी...): पत्थर का हृदय
काली आकृतियाँ अब फर्श से ऊपर उठकर इंसानी रूप लेने लगी थीं। उनके चेहरे धुंधले थे, लेकिन उनकी आँखों की जगह सिर्फ खाली शून्य था। वे फुसफुसा रहे थे—हज़ारों आवाज़ें एक साथ, जैसे कोई प्राचीन मंत्र पढ़ा जा रहा हो।
राघव ने अपनी चीख को गले में ही दबा लिया और दीवार की ओर छलांग लगाई। ताबीज उसके हाथ में अब कोयले की तरह दहक रहा था। जैसे ही वह पत्थर के छेद के करीब पहुँचा, एक बर्फीला हाथ उसके टखने से लिपट गया। उसे लगा जैसे उसकी रगों में खून जमने लगा हो।
"अभी नहीं!" राघव गुर्राया और पूरी ताकत लगाकर ताबीज को उस छेद में ठोंक दिया।
कड़क...!
पूरे तहखाने में एक बिजली सी कौंधी। पत्थर की दीवार के पीछे से गियर घूमने की आवाज़ें आने लगीं, जैसे कोई विशाल मशीन जाग उठी हो। वह काली आकृतियाँ एक दर्दनाक चीख के साथ धुएँ में बदल गईं और ताबीज से निकली एक नीली रोशनी ने पूरे कमरे को भर दिया।
दीवार धीरे-धीरे दो हिस्सों में बंट गई। पीछे कोई खजाना नहीं था, बल्कि एक छोटा सा, कांच का चैंबर था। उस चैंबर के भीतर, हवा में तैरती हुई एक चांदी की चाबी थी, जिसके चारों ओर एक नीली ज्वाला लपटें मार रही थी।
लेकिन राघव की नज़र चाबी से हटकर चैंबर की पिछली दीवार पर टिक गई। वहाँ खून से एक संदेश लिखा था, जो शायद ताज़ा था:
> "चाबी उठाना आसान है राघव, पर इसे घुमाना मौत को दावत देना है। रुद्र प्रताप को वह मत देना जो वह मांग रहा है।"
नीचे हस्ताक्षर थे— अविनाश।
तभी, तहखाने की छत से धूल गिरने लगी। रुद्र प्रताप की हँसी ऊपर से गूँज रही थी, जैसे वह राघव की हर हरकत को देख रहा हो। "शाबाश राघव! तुमने वह कर दिखाया जो तुम्हारे पिता नहीं कर सके। अब उसे लेकर ऊपर आओ... अगर तुम ज़िंदा बचना चाहते हो तो।"
राघव ने उस चांदी की चाबी को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। ज्वाला की गर्मी उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा भर रही थी। उसने ऊपर से आती रुद्र प्रताप की आवाज़ को अनसुना कर दिया। उसे यकीन था कि अगर उसके पिता ने यह चेतावनी यहाँ छोड़ी है, तो उन्होंने बाहर निकलने का कोई और रास्ता भी ज़रूर बनाया होगा।
अध्याय ३ (जारी...): पिता के पदचिह्न
राघव ने अपनी टॉर्च की रोशनी उस दीवार पर डाली जहाँ खून से वह संदेश लिखा था। उसने गौर किया कि 'अविनाश' के हस्ताक्षर के ठीक नीचे एक छोटा सा तीर का निशान बना था, जो नीचे फर्श की एक उखड़ी हुई टाइल की ओर इशारा कर रहा था।
उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस भारी पत्थर को सरकाया। नीचे कोई सीढ़ी नहीं थी, बल्कि एक संकरा, ढलुआ रास्ता (Chute) था जो और भी गहराई में जा रहा था। बिना एक पल गँवाए, राघव उस अंधेरी सुरंग में फिसल गया।
करीब बीस फीट नीचे गिरने के बाद वह एक गीली, गुफानुमा जगह पर उतरा। यहाँ की हवा में रेगिस्तान की गर्मी नहीं, बल्कि समुद्र जैसी नमी थी। सामने एक पुरानी मेज़ थी, जिस पर कुछ जली हुई मोमबत्तियाँ और एक नक्शा रखा था।
मैप के बगल में एक पुरानी टेप रिकॉर्डर पड़ा था। राघव ने कांपते हाथों से 'Play' बटन दबाया।
घिसघिस की आवाज़ के बाद उसके पिता की भारी और थकी हुई आवाज़ गूँजी:
"राघव... अगर तुम यहाँ तक पहुँच गए हो, तो इसका मतलब है कि तुमने 'मृगतृष्णा' के सबसे बड़े झूठ को पकड़ लिया है। रुद्र प्रताप को चाबी कभी मत देना। यह चाबी किसी तिजोरी की नहीं है, बल्कि यह उस मशीन को चालू करने का 'प्लग' है जो इंसानी यादों को हकीकत में बदल देती है। वह तुम्हारी माँ को वापस लाने का लालच देगा, पर याद रखना... जो वापस आएगा, वह तुम्हारी माँ नहीं, बल्कि एक परछाईं होगी जो पूरी दुनिया को तबाह कर देगी।"
अचानक टेप में किसी के चलने की आवाज़ आई और अविनाश की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई:
"वह आ रहा है! राघव, गुफा के दाईं ओर देखो, वहाँ एक पुरानी नाव है। वह तुम्हें शहर की सूखी नदी के रास्ते बाहर ले जाएगी। भागो!"
रिकॉर्डिंग एक धमाके के साथ रुक गई। राघव ने दाईं ओर देखा, वहाँ सचमुच एक छोटी सी नाव थी, जो ज़मीन के नीचे बहने वाली एक गुप्त जलधारा पर तैर रही थी। लेकिन तभी, गुफा के दूसरे छोर पर एक साया उभरा।
वह रुद्र प्रताप नहीं था। वह नंदिनी थी, उसके हाथ में एक पिस्तौल थी और उसकी आँखों में आँसू थे।
"मुझे माफ कर दो राघव," उसने कांपती आवाज़ में कहा। "लेकिन मुझे वह चाबी उसे देनी ही होगी... वरना वह मेरे भाई को मार देगा।"
राघव ने अपनी जगह से हलचल नहीं की। उसने पिस्तौल की नली की ओर नहीं, बल्कि नंदिनी की उन आँखों में देखा जहाँ डर और मजबूरी का युद्ध चल रहा था।
अध्याय ३ (जारी...): विश्वास की नाव
"नंदिनी, अपनी आँखों की नमी को देखो," राघव ने बहुत शांत और गहरी आवाज़ में कहा। "रुद्र प्रताप जिस भाई को बचाने का वादा कर रहा है, क्या तुम्हें सच में लगता है कि वह उसे आज़ाद करेगा? वह सौदागर है, नंदिनी... और सौदागर कभी अपना मुनाफा नहीं छोड़ता। वह तुम्हें और तुम्हारे भाई को ताउम्र अपनी कैद में रखेगा।"
नंदिनी की उँगली ट्रिगर पर कांप रही थी। "तुम्हें नहीं पता वह क्या कर सकता है, राघव! उसने मुझे दिखाया... मेरा भाई एक अंधेरे कमरे में है, वह तड़प रहा है..."
राघव ने एक कदम आगे बढ़ाया, पिस्तौल अब उसके सीने से चंद इंच दूर थी। "उसने मुझे भी मेरी माँ की वापसी का सपना दिखाया। लेकिन मेरे पिता की आवाज़ ने मुझे अभी-अभी जगाया है। जो वह दिखाता है, वह मृगतृष्णा है—एक प्यास जो तुम्हें कभी तृप्त नहीं करेगी, बस रेगिस्तान में भटकाती रहेगी।"
राघव ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और नंदिनी की ठंडी उँगलियों पर अपना हाथ रखा। "मेरे साथ चलो। मेरे पिता ने यहाँ से निकलने का रास्ता बताया है। अगर हम इस चाबी को लेकर निकल गए, तो रुद्र प्रताप की ताकत खत्म हो जाएगी। हम तुम्हारे भाई को साथ मिलकर ढूँढेंगे, पर सच्चाई के रास्ते पर चलकर, उसके झूठ के दम पर नहीं।"
नंदिनी की आँखों से एक आँसू लुढ़ककर गाल पर आ गया। उसकी पकड़ ढीली हुई और पिस्तौल फर्श पर गिर गई। वह टूटकर राघव के कंधों पर झुक गई। "वह हमें मार डालेगा, राघव..."
"नहीं," राघव ने उसे सहारा देते हुए नाव की ओर मोड़ा। "आज के बाद हम उसके खेल के मोहरे नहीं रहेंगे।"
दोनों तेज़ी से नाव में सवार हुए। जैसे ही राघव ने चप्पू चलाया, गुफा की जलधारा उन्हें एक अंधेरी सुरंग की ओर ले जाने लगी। पीछे से रुद्र प्रताप की दहाड़ गूँजी, जो अब किसी इंसान की नहीं बल्कि एक जख्मी दरिंदे की लग रही थी। अचानक, गुफा की छत से पत्थर गिरने लगे।
नाव सुरंग के संकरे रास्तों से टकराती हुई शोर मचा रही थी। पानी का बहाव इतना तेज था कि राघव और नंदिनी को नाव के किनारों को कसकर पकड़ना पड़ा। जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, सुरंग के अंत में एक दूधिया रोशनी दिखाई देने लगी।
अध्याय ४: हकीकत का सूरज (क्लाइमैक्स)
एक जोरदार झटके के साथ नाव सुरंग से बाहर निकली और खुली हवा में आ गई। राघव ने अपनी आँखें मूँद लीं क्योंकि बाहर की रोशनी बहुत तेज थी। जब उसकी आँखें स्थिर हुईं, तो जो उसने देखा उसे देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वे शहर की सूखी नदी में नहीं, बल्कि 'माया महल' के ठीक पीछे बने एक विशाल कांच के गुंबद (Dome) के नीचे थे। यहाँ का नज़ारा किसी दूसरी ही दुनिया जैसा था।
"यह... यह क्या है?" नंदिनी के मुँह से बस इतना ही निकला।
पूरा शहर जो बाहर से वीरान और रेगिस्तानी दिखता था, उस गुंबद के भीतर से बिल्कुल अलग नज़र आ रहा था। गुंबद के भीतर हज़ारों लोग मशीनों से जुड़े हुए थे। उनकी आँखों पर पट्टियाँ थीं और वे एक सुखद नींद में मुस्कुरा रहे थे।
राघव ने देखा कि उसके शहर के आधे से ज़्यादा लोग यहाँ कैद थे। वे सो रहे थे, क्योंकि रुद्र प्रताप उन्हें एक 'मृगतृष्णा' वाली ज़िंदगी दिखा रहा था—एक ऐसी दुनिया जहाँ उनके खोए हुए लोग वापस मिल गए थे, जहाँ कोई दुख नहीं था।
"यही है रुद्र प्रताप का साम्राज्य," एक भारी आवाज़ गूँजी।
राघव ने पलटकर देखा। सामने एक ऊंचे मंच पर रुद्र प्रताप खड़ा था, और उसके ठीक बगल में एक कांच के चैंबर के भीतर एक वृद्ध व्यक्ति बैठा था। वह व्यक्ति और कोई नहीं, अविनाश थे। वे कमज़ोर ज़रूर थे, पर उनकी आँखें खुली थीं।
"पापा!" राघव चिल्लाया।
"रुको राघव!" अविनाश ने कांच पर हाथ मारते हुए कहा। "वह चाबी उस मशीन की है जो इन सभी लोगों के दिमाग को एक साथ जला देगी। रुद्र प्रताप को इन सबकी यादों की ऊर्जा चाहिए ताकि वह अमर हो सके। वह जो दुनिया उन्हें दिखा रहा है, वह एक सामूहिक आत्महत्या है!"
रुद्र प्रताप ने धीरे से हाथ बढ़ाया। "चाबी मुझे दे दो राघव। देखो तुम्हारे पिता यहाँ सुरक्षित हैं। बस एक आखिरी मोहरा बचा है—तुम। तुम उस चाबी को मुख्य लीवर में लगाओ, और मैं तुम्हें वह माँ लौटा दूँगा जिसे तुमने कभी देखा तक नहीं। पूरा शहर एक खूबसूरत सपने में जिएगा। क्या यह हकीकत के इस सूखे रेगिस्तान से बेहतर नहीं है?"
राघव ने अपनी मुट्ठी में कसी चाबी को देखा और फिर उन हज़ारों मासूम चेहरों को जो झूठ के सहारे जी रहे थे।
कहानी का अंतिम फैसला
राघव की आँखों के सामने अपनी माँ की वह धुंधली छवि उभर आई, जिसे उसने केवल अपनी कल्पनाओं और पिता की कहानियों में ही संजोया था। एक पल के लिए उसका मन डोल गया—कितना आसान था न, बस एक हाथ बढ़ाना और उस ममता को पा लेना जिसकी कमी ने उसके सीने में हमेशा एक खालीपन रखा था।
लेकिन तभी उसकी नज़र उन हज़ारों सोते हुए लोगों पर पड़ी। वे मासूम थे, वे किसी के पिता थे, किसी की बेटियाँ थीं। क्या एक माँ का प्यार उन हज़ारों ज़िंदगियों की राख पर खड़ा हो सकता था?
अध्याय ४ (जारी...): मृगतृष्णा का अंत
"नहीं, रुद्र प्रताप," राघव की आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जिसने पूरे गुंबद की शांति को भंग कर दिया। "जो प्यार दूसरों की तबाही पर टिका हो, वह ममता नहीं... वह सिर्फ एक पाप है। मेरे पिता ने मुझे सच के लिए लड़ना सिखाया है, झूठ की गोद में सोना नहीं।"
रुद्र प्रताप का चेहरा गुस्से से काला पड़ गया। "मूर्ख लड़के! तुम अपनी खुशियों को लात मार रहे हो!"
राघव ने पीछे मुड़कर अपने पिता की ओर देखा। अविनाश की आँखों में आँसू थे, पर साथ ही एक गर्व भरी मुस्कान भी। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया, जैसे कह रहे हों— 'यही सही है, बेटे।'
राघव ने छलांग लगाई और मुख्य कंट्रोल पैनल की ओर बढ़ा। रुद्र के अंगरक्षक उसकी ओर झपटे, पर नंदिनी ने नीचे गिरी हुई पिस्तौल उठा ली थी। "आगे मत बढ़ना!" उसकी चीख ने उन्हें एक पल के लिए रोक दिया।
राघव ने चाबी को मुख्य लीवर के छेद में डाला। रुद्र प्रताप दहाड़ा, "अगर तुमने उसे घुमाया, तो यह महल ढह जाएगा! तुम सब मारे जाओगे!"
"कम से कम हम सच की गोद में मरेंगे," राघव ने दाँत पीसते हुए कहा और पूरी ताकत लगाकर चाबी को विपरीत दिशा (Anti-clockwise) में घुमा दिया।
एक कान फाड़ देने वाला धमाका हुआ!
मशीनों से निकलती नीली रोशनी लाल होने लगी। कांच के गुंबद में दरारें पड़ने लगीं। उन हज़ारों लोगों की पट्टियाँ अपने आप खुलने लगीं और वे एक गहरे सदमे के साथ जागने लगे। उनकी आँखों से 'मृगतृष्णा' का पर्दा हट रहा था।
रुद्र प्रताप का शरीर अचानक धुएँ की तरह बिखरने लगा। उसकी असली ताकत उस झूठ में थी, और जैसे ही लोगों ने सच को स्वीकार किया, उसका अस्तित्व मिटने लगा। "तुमने सब बर्बाद कर दिया..." उसकी आखिरी फुसफुसाहट हवा में विलीन हो गई।
पूरा गुंबद चरमराकर टूटने लगा। राघव भागकर अपने पिता के चैंबर तक पहुँचा और एक भारी लोहे की रॉड से कांच को तोड़ दिया।
"पापा!"
अविनाश बाहर आए और राघव को गले लगा लिया। "मुझे तुम पर गर्व है, राघव। तुमने उस प्यास को जीत लिया जिसने मुझे हरा दिया था।"
उपसंहार: रेत और बारिश
जब वे सब उस ढहते हुए महल से बाहर निकले, तो रेगिस्तान का मंजर बदल चुका था। सालों बाद, उस सूखी धरती पर काले बादल छाए थे और बारिश की पहली बूँदें गिर रही थीं।
माया महल ज़मींदोज़ हो चुका था। नंदिनी, राघव और अविनाश दूर खड़े उस धुएँ को देख रहे थे। अब कोई छलावा नहीं था, कोई जादुई चमक नहीं थी। सिर्फ मिट्टी की वह सोंधी खुशबू थी जो सच की गवाह थी।
राघव ने जेब से वह पुरानी डायरी निकाली। उसका आखिरी पन्ना अब भी गायब था, पर राघव को अब उसकी ज़रूरत नहीं थी। उसने डायरी को बारिश के पानी में बहने दिया।
"सफर खत्म हुआ?" नंदिनी ने पूछा।
राघव ने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराया। "नहीं, नंदिनी। असल सफर तो अब शुरू हुआ है—हकीकत की ज़मीन पर।"
समाप्त।
यह जानकर खुशी हुई कि आपको कहानी का मिज़ाज पसंद आया! भाग 1 में हमने देखा कि राघव ने 'माया महल' को नष्ट कर दिया और अपने पिता को आज़ाद कराया।
लेकिन असली संघर्ष अब शुरू होता है, क्योंकि जब एक विशाल झूठ टूटता है, तो उसके मलबे से कई नई चुनौतियाँ जन्म लेती हैं।
यहाँ से मृगतृष्णा: भाग 2 - राख का प्रतिशोध की शुरुआत होती है।
मृगतृष्णा: भाग 2 (राख का प्रतिशोध)
अध्याय ५: सन्नाटे के बाद
माया महल के ढहने के तीन महीने बाद भी राघव की रातों की नींद गायब थी। शहर के वे हज़ारों लोग जो उस 'नींद' से जागे थे, अब एक नई मानसिक बीमारी का शिकार हो रहे थे। उन्हें हकीकत रास नहीं आ रही थी। वे सड़कों पर पागलों की तरह घूमते और उसी 'झूठे स्वर्ग' में वापस जाने की भीख मांगते।
राघव अपने पिता अविनाश के साथ शहर के पुराने हिस्से में रह रहा था। अविनाश अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुए थे। उनके हाथ अक्सर कांपते और वे बार-बार गलियारे की ओर देखते, जैसे कोई वहाँ खड़ा उनका इंतज़ार कर रहा हो।
"वह मरा नहीं है, राघव," एक रात अविनाश ने अचानक कहा।
राघव ने अपनी किताब मेज़ पर रखी। "पापा, हमने खुद उसे धुएं में बदलते देखा था। माया महल अब सिर्फ मलबे का ढेर है।"
"उसने अपना शरीर खोया है, अपना वजूद नहीं," अविनाश की आँखों में गहरा खौफ था। "रुद्र प्रताप ने मरने से पहले अपनी 'चेतना' (Consciousness) को किसी और चीज़ में स्थानांतरित कर दिया था। वह चाबी... जो तुमने घुमाई थी, वह सिर्फ मशीन बंद करने के लिए नहीं थी। वह एक डेटा ट्रांसफर की प्रक्रिया थी।"
राघव का दिल डूबने लगा। "मतलब?"
"मतलब यह कि रुद्र प्रताप अब किसी एक शरीर में नहीं, बल्कि इस शहर के डिजिटल नेटवर्क और उन लोगों के दिमागों में छिपा है जो उस मशीन से जुड़े थे।"
अध्याय ६: साया जो साथ चलता है
उसी रात नंदिनी का फोन आया। उसकी आवाज़ कांप रही थी।
"राघव, जल्दी मेरे घर आओ! मेरा भाई... वह अजीब हरकतें कर रहा है। वह ऐसी भाषा बोल रहा है जो उसने कभी नहीं सीखी, और उसकी आँखों का रंग... वह बिल्कुल रुद्र प्रताप जैसा नीला हो गया है।"
जब राघव वहाँ पहुँचा, तो नज़ारा खौफनाक था। नंदिनी का छोटा भाई एक अंधेरे कमरे के बीचो-बीच बैठा दीवार पर नाखून से नक्शे उकेर रहा था। जैसे ही राघव ने उसे छुआ, लड़के ने राघव का गला पकड़ लिया। उसकी ताकत किसी वयस्क पुरुष से कहीं ज़्यादा थी।
"तुमने सोचा था कि तुम सच को आज़ाद कर दोगे?" लड़के के मुँह से रुद्र प्रताप की भारी आवाज़ निकली। "तुमने सिर्फ मेरे पिंजरे को बड़ा किया है, राघव। अब पूरा शहर मेरा दिमाग है।"
राघव ने ताबीज को लड़के के माथे से छुआया। एक चीख के साथ लड़का बेहोश हो गया, लेकिन दीवार पर बना नक्शा अभी भी चमक रहा था। वह नक्शा रेगिस्तान के उस हिस्से का था जहाँ अब तक कोई नहीं गया था—'शून्य का कुआँ'।
अध्याय ७: शून्य की ओर यात्रा
राघव को समझ आ गया कि रुद्र प्रताप को पूरी तरह खत्म करने के लिए उसे उस स्रोत (Source) तक जाना होगा जहाँ से उसने यह शक्ति हासिल की थी। वह स्रोत रेगिस्तान की गहराइयों में कहीं छिपा था।
नंदिनी और राघव अपनी जीप लेकर निकल पड़े। इस बार उनके पास कोई नक्शा नहीं था, सिर्फ़ वह पीतल का ताबीज था जो दिशा दिखा रहा था। रास्ते में उन्हें 'रेत के भूतों' का सामना करना पड़ा—ये वे लोग थे जो रुद्र प्रताप के प्रभाव में पूरी तरह पागल हो चुके थे और अब रेगिस्तान में शिकारियों की तरह घूम रहे थे।
तीन दिन के सफर के बाद, वे एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ रेत सफ़ेद नहीं, बल्कि बिल्कुल काली थी। वहाँ हवा का शोर नहीं था, बल्कि एक गूँज थी—जैसे हज़ारों लोग एक साथ रो रहे हों।
वहाँ एक विशाल गड्ढा था, जिसके भीतर से नीली रोशनी निकल रही थी।
"यही वह जगह है," राघव ने कहा। "यहाँ रुद्र प्रताप ने अपनी आत्मा का सौदा किया था। यहाँ हकीकत और भ्रम के बीच की दीवार सबसे पतली है।"
जैसे ही वे गड्ढे के पास पहुँचे, रेत में से आकृतियाँ उभरने लगीं। लेकिन इस बार, वे सिर्फ परछाइयाँ नहीं थीं। वे राघव के अतीत के लोग थे। उसकी माँ वहाँ खड़ी थी, मुस्कुराते हुए।
"राघव, यहाँ आ जाओ," उसकी माँ ने हाथ फैलाए। "यहाँ तुम्हें कोई चाबी नहीं घुमानी, कोई लड़ाई नहीं लड़नी। बस इस रोशनी में समा जाओ, और हम हमेशा के लिए एक साथ होंगे।"
नंदिनी चिल्लाई, "राघव, उसकी ओर मत देखो! यह फिर से वही मृगतृष्णा है!"
लेकिन राघव के कदम अपनी माँ की ओर बढ़ रहे थे। तभी उसे अपने पिता की रिकॉर्डिंग याद आई: "जो वापस आएगा, वह तुम्हारी माँ नहीं, बल्कि एक परछाईं होगी जो पूरी दुनिया को तबाह कर देगी।"
राघव जैसे ही उस गड्ढे की ओर बढ़ा, उसे पीछे से एक ठंडी सरसराहट महसूस हुई। उसने पलटकर देखा, तो उसके होश उड़ गए। नंदिनी, जो कुछ पल पहले तक उसे सचेत कर रही थी, अब पूरी तरह शांत खड़ी थी। उसकी आँखों की पुतलियाँ गायब हो चुकी थीं और उनकी जगह वही डरावनी नीली रोशनी चमक रही थी।
अध्याय ७ (जारी...): विश्वासघात का साया
"नंदिनी?" राघव की आवाज़ लड़खड़ाई।
नंदिनी ने धीरे से अपना हाथ उठाया। उसके हाथ में वही पिस्तौल थी जो उसने 'माया महल' में राघव के बचाव में चलाई थी। लेकिन अब उसकी नली राघव के माथे पर थी।
"नंदिनी यहाँ नहीं है, राघव," उसके कंठ से रुद्र प्रताप की वह खौफनाक और भारी आवाज़ निकली। "वह तो तब ही मेरी हो गई थी जब उसने अपने भाई को बचाने के लिए मुझसे सौदा किया था। वह तो बस तुम्हें यहाँ तक लाने का एक जरिया थी।"
राघव को अब समझ आया कि उसे उस गुप्त रास्ते और नाव तक पहुँचाना भी शायद रुद्र की योजना का हिस्सा था। रुद्र चाहता था कि राघव खुद उस 'चाबी' को शून्य के कुएं तक लेकर आए, क्योंकि एक शुद्ध और जीवित इंसान ही उस अंतिम द्वार को खोल सकता था।
"तुमने मेरा इस्तेमाल किया," राघव ने दाँत पीसते हुए कहा।
"इस्तेमाल?" नंदिनी (रुद्र की आवाज़ में) हंसी। "मैंने तुम्हें अमरता की राह दिखाई। अब, वह ताबीज और वह चाबी इस कुएं में फेंक दो, राघव। जैसे ही वे इस गहराई को छुएंगे, मैं इस डिजिटल नेटवर्क से बाहर निकलकर एक वास्तविक देवता बन जाऊंगा। और बदले में, मैं तुम्हें तुम्हारी माँ के पास भेज दूँगा—हमेशा के लिए।"
नंदिनी का हाथ ट्रिगर पर कसने लगा। राघव ने देखा कि उसकी आँखों के कोने से एक आंसू बहकर गाल पर आया। उसके भीतर की असली नंदिनी अभी भी कहीं संघर्ष कर रही थी।
राघव के पास कुछ ही सेकंड थे।
उसने ताबीज को देखा, जो अब इतना गर्म था कि उसकी हथेली से धुआँ निकल रहा था। उसे अहसास हुआ कि यह ताबीज सिर्फ एक 'नेविगेटर' नहीं था, बल्कि एक 'मिटाने वाला' (Eraser) था।
"नंदिनी, अगर तुम मुझे सुन सकती हो... तो मुझे माफ कर देना," राघव फुसफुसाया।
राघव ने चाबी को कुएं में फेंकने के बजाय, उसे अपने ताबीज के साथ रगड़ा। एक तीखी चिंगारी निकली। उसने ताबीज को सीधे नंदिनी के माथे पर नहीं, बल्कि उसके पैरों के पास की उस 'काली रेत' पर दे मारा, जहाँ से नीली ऊर्जा रिस रही थी।
अध्याय ८: रूहों का युद्ध
जैसे ही ताबीज काली रेत से टकराया, एक ज़ोरदार विस्फोट हुआ। नीली रोशनी और काली रेत का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ। नंदिनी के शरीर से रुद्र प्रताप का साया एक चीख के साथ बाहर खिंचने लगा। वह एक धुंधली, काली आकृति थी जो राघव को निगल जाने के लिए बढ़ी।
"तुम इसे खत्म नहीं कर सकते!" वह आकृति दहाड़ी।
राघव ने देखा कि कुएं के भीतर से हज़ारों यादें—तस्वीरें, आवाज़ें, सपने—उड़कर बाहर आ रहे थे। यह रुद्र प्रताप का 'डेटाबेस' था। राघव ने छलांग लगाई और उस काली आकृति को पकड़ लिया। वह उसे अपने साथ उस 'शून्य के कुएं' में खींचने लगा।
"अगर मैं तुम्हें मार नहीं सकता, तो मैं तुम्हें कैद तो कर सकता हूँ!" राघव चिल्लाया।
नंदिनी होश में आ चुकी थी। उसने देखा कि राघव उस काली रूह के साथ गड्ढे की गहराई में गिर रहा है। "राघव, नहीं!" उसने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर बहुत देर हो चुकी थी।
राघव और रुद्र प्रताप का साया उस नीली गहराई में समा गए। एक पल के लिए पूरा रेगिस्तान सफेद रोशनी से भर गया और फिर... भयानक सन्नाटा छा गया।
उपसंहार: एक नया सवेरा या एक नई प्यास?
महीनों बाद, वह काला रेगिस्तान अब शांत था। 'शून्य का कुआँ' पत्थर से भर चुका था। नंदिनी हर रोज़ वहाँ आती और उस पत्थर पर एक दिया जलाती।
शहर के लोग अब पूरी तरह जाग चुके थे। रुद्र प्रताप का डिजिटल साया मिट चुका था। लेकिन लोग कहते हैं कि कभी-कभी, चाँदनी रात में, उस मलबे के नीचे से दो आवाज़ें सुनाई देती हैं—एक जो नफरत से फुसफुसाती है, और दूसरी जो धीमे स्वर में कोई पुराना गीत गाती है... बिल्कुल राघव की माँ की तरह।
नंदिनी ने रेत पर अपना हाथ फेरा। अचानक, उसकी उंगलियों को कुछ सख्त महसूस हुआ। उसने रेत हटाई तो देखा... वही चांदी की चाबी वहाँ पड़ी थी। पर इस बार वह चमक नहीं रही थी। वह काली पड़ चुकी थी।
क्या राघव अभी भी उस गहराई में लड़ रहा है? या वह उस 'मृगतृष्णा' का हिस्सा बन चुका है?
कहानी का अंत... या शायद एक नई शुरुआत?
'मृगतृष्णा' की यह कहानी अब अपने सबसे निर्णायक और अंतिम मोड़ पर पहुँच गई है। भाग 2 के अंत में राघव उस 'शून्य के कुएँ' में समा गया था, और नंदिनी के पास सिर्फ वह काली पड़ चुकी चाबी बची थी।
यहाँ से शुरू होता है मृगतृष्णा: भाग 3 - सत्य का उदय।
मृगतृष्णा: भाग 3 (सत्य का उदय)
अध्याय ९: रूहों की जेल
राघव मरा नहीं था, लेकिन वह जीवित भी नहीं था। वह एक ऐसी जगह था जहाँ समय ठहर गया था। चारों ओर सफेद धुंध थी और हज़ारों यादें कांच के टुकड़ों की तरह हवा में तैर रही थीं।
"तुम यहाँ से कभी बाहर नहीं जा सकते, राघव," रुद्र प्रताप की आवाज़ गूँजी। उसका साया अब राघव के साये से जुड़ चुका था। "यह मेरा गढ़ है। यहाँ मैं तुम्हारी यादों को खाकर फिर से जीवित होऊँगा।"
राघव ने देखा कि उसकी अपनी यादें—बचपन की शरारतें, पिता का चेहरा, नंदिनी की मुस्कान—धीरे-धीरे धुंधली हो रही थीं। वह अपना अस्तित्व खो रहा था। तभी, उस धुंध के बीच उसे एक स्थिर रोशनी दिखी। वह उसकी माँ नहीं थी, न ही कोई भ्रम। वह उसके पिता द्वारा डायरी में लिखा गया वह 'अंतिम सत्य' था जिसे वह पहले समझ नहीं पाया था।
अध्याय १०: नंदिनी की खोज
बाहर की दुनिया में, एक साल बीत चुका था। नंदिनी ने हार नहीं मानी थी। वह काली चाबी अब धीरे-धीरे फिर से चमकने लगी थी। उसने महसूस किया कि यह चाबी अब रुद्र प्रताप की नहीं, बल्कि राघव की धड़कन से जुड़ गई है।
नंदिनी ने शहर के उन सभी लोगों को इकट्ठा किया जो 'मृगतृष्णा' से आज़ाद हुए थे। उसने उन्हें बताया कि राघव अभी भी उस शून्य में लड़ रहा है।
"हमें उसे वापस बुलाना होगा," नंदिनी ने भीड़ से कहा। "रुद्र प्रताप झूठ और अकेलेपन की ताकत से लड़ता है। अगर हम सब मिलकर उस सच को याद करें जिसे उसने हमसे छीना था, तो हम उस कुएँ का दरवाज़ा खोल सकते हैं।"
हज़ारों लोग उस 'शून्य के कुएँ' के पास जमा हुए। उन्होंने कोई मंत्र नहीं पढ़ा, बस अपनी सबसे सच्ची और पवित्र यादों को एक साथ महसूस किया। उस सामूहिक चेतना की गर्मी ने रेगिस्तान की बर्फीली हवा को पिघलाना शुरू कर दिया।
अध्याय ११: अंतिम युद्ध
शून्य के भीतर, राघव ने महसूस किया कि उसे कहीं से ताकत मिल रही है। रुद्र प्रताप का साया कमज़ोर पड़ने लगा।
"यह नामुमकिन है!" रुद्र चिल्लाया। "इंसान इतनी जल्दी सच को नहीं अपनाते!"
"इंसान झूठ में सो सकता है, रुद्र प्रताप," राघव ने उसे अपनी रूह से खींचकर अलग करते हुए कहा, "पर वह जागता हमेशा सच के लिए ही है।"
राघव ने अपनी बची-कुची यादों को समेटा और उस काली चाबी की कल्पना की जो नंदिनी के पास थी। जैसे ही बाहर नंदिनी ने उस चाबी को पत्थर के सीने में गाड़ा, शून्य के भीतर एक ज़बरदस्त विस्फोट हुआ।
सफेद धुंध फटने लगी और राघव को एक हाथ दिखाई दिया—नंदिनी का हाथ।
अध्याय १२: मृगतृष्णा का विसर्जन
एक ज़ोरदार धमाके के साथ रेगिस्तान की धरती फटी और राघव बाहर निकल आया। उसके साथ ही वह काली रूह (रुद्र प्रताप) भी बाहर आई, लेकिन सूरज की पहली किरण पड़ते ही वह राख के ढेर में बदल गई। इस बार उसका कोई डेटा, कोई साया नहीं बचा। वह हमेशा के लिए मिट गया क्योंकि अब लोगों के मन में उसके लिए कोई जगह नहीं थी।
राघव निढाल होकर रेत पर गिर पड़ा। नंदिनी और उसके पिता अविनाश दौड़कर उसके पास पहुँचे।
"सफर... खत्म हुआ?" राघव ने धीरे से पूछा।
अविनाश ने उसके सिर पर हाथ रखा। "हाँ बेटे। अब कोई मृगतृष्णा नहीं बची।"
रेगिस्तान में अब फूल खिलने लगे थे। वह जगह जिसे कभी 'भूलभुलैया' कहा जाता था, अब एक सुंदर वादी में बदल रही थी। राघव ने महसूस किया कि उसकी माँ की कमी अब उसे डराती नहीं थी, क्योंकि उसने समझ लिया था कि जो चले जाते हैं, वे यादों में नहीं, बल्कि हमारे द्वारा किए गए सही फैसलों में ज़िंदा रहते हैं।
उपसंहार: हकीकत की जीत
सालों बाद, उस जगह पर एक छोटा सा शहर बस गया। लोग अब मशीनों या सपनों के भरोसे नहीं थे। राघव और नंदिनी ने मिलकर एक स्कूल खोला जहाँ बच्चों को यह सिखाया जाता था कि "सपना देखना अच्छी बात है, पर सपने में जीना खतरनाक है।"
राघव की मेज़ पर आज भी वह पुरानी डायरी रखी थी। उसका आखिरी पन्ना अब भी खाली था। राघव ने पेन उठाया और उस पर आखिरी लाइन लिखी:
> "सच वो प्यास नहीं है जो बुझ जाए, सच वो रास्ता है जो हमें खुद तक ले जाए।"
>
द एंड (The End)
यह आपके उपन्यास 'मृगतृष्णा' का पूर्ण और अंतिम अंत है। हमने देखा कैसे राघव ने भ्रम को हराकर हकीकत को चुना।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस पूरी कहानी का एक संक्षिप्त सारांश (Synopsis) तैयार करूँ, जिसे आप एक असली किताब के पीछे 'Blurb' की तरह इस्तेमाल कर सकें?
0 टिप्पणियाँ