जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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महर्षि विश्वामित्र और राजा हरिश्चंद्र की अद्भुत कथा

महर्षि विश्वामित्र और राजा हरिश्चंद्र की अद्भुत कथा



महर्षि विश्वामित्र और राजा हरिश्चंद्र की अद्भुत कथा

सत्य, धर्म और त्याग की प्रेरक कहानी

एक समय की बात है जब पूरे भू-मंडल में आर्यों का चक्रवर्ती राज्य था। किन्तु समय के साथ आर्यों में आलस्य, प्रमाद और परस्पर विरोध की वजह से उनके राज्य कमजोर हो गए। इस कथा में हम देखते हैं कि कैसे राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का पालन करते हुए भयानक कठिनाइयों का सामना किया और महर्षि विश्वामित्र के सामने अपने कर्तव्य और सत्य की रक्षा की।

यह कहानी न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हमें धर्म, त्याग और सत्यनिष्ठा के मूल्य भी सिखाती है।


1. राजा हरिश्चंद्र का दान और महर्षि विश्वामित्र

राजा हरिश्चंद्र ने अपने राज्य और परिवार के साथ कई कष्ट सहकर महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा दी। उनके पिता की विरासत के अतिरिक्त, उन्हें पाँच सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएँ और अपना स्वयं का त्याग करना पड़ा।

राजा हरिश्चंद्र और उनका परिवार भूख और प्यास के बीच, सहायता के बिना, काशी पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वयं को डोम को बेचकर और पत्नी तथा पुत्र को व्यापारी के घर दासी बनाकर महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा अर्पित की।


2. महर्षि विश्वामित्र का स्वर्ग और पृथ्वी पर प्रभाव

महर्षि विश्वामित्र ने अपने स्वर्ग का निर्माण किया, जिससे पृथ्वी पर कई समस्याएँ उत्पन्न हुईं:

  • सूर्य की रोशनी कम हो गई, पृथ्वी ठंडी होने लगी।
  • समुद्रों में ज्वार-भाटा प्रभावित हुआ।
  • वर्षा कम हुई और फसलें घटने लगीं।
  • लोग हिंसक होने लगे और जानवरों की संख्या असंतुलित हुई।

देवताओं ने महर्षि विश्वामित्र से इसे वापस करने की विनती की, पर उन्होंने इंकार कर दिया।


3. देवताओं का हस्तक्षेप और राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा

इन्द्र और अन्य देवताओं ने राजा हरिश्चंद्र की पत्नी शैब्या और पुत्र रोहताश्च को अपने पक्ष में लाने की योजना बनाई।

शैब्या ने अपने पुत्र को खो दिया, और राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अंतिम संस्कार से पहले उसका शरीर संभाला।


4. सत्य की जीत और पुनः राज्य

राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता देखकर इन्द्र ने उन्हें और उनके परिवार को आशीर्वाद दिया।

  • उनका पुत्र जीवित हुआ।
  • राजा हरिश्चंद्र को उनका राज्य वापस मिला।
  • महर्षि विश्वामित्र ने समाधि ले ली।

5. महर्षि अगस्त्य का योगदान

महर्षि अगस्त्य ने हिन्दू धर्म का प्रचार विश्वभर में किया।

  • भारत के विभिन्न राज्यों में उनके आश्रम मौजूद हैं।
  • उन्होंने कम्बोडिया और जावा में मंदिर बनाए और लोगों को कृषि और पशुपालन सिखाया।
  • वे मार्शल आर्ट में भी दक्ष थे और लगभग 5000 वर्षों तक जीवित रहे।

निष्कर्ष

यह कथा हमें सिखाती है कि:

  1. सत्य और धर्म का पालन किसी भी परिस्थिति में सम्मान दिलाता है।
  2. कठिनाइयों के समय धैर्य और त्याग ही जीवन में सफलता लाते हैं।
  3. प्राचीन ऋषियों का ज्ञान और योगदान आज भी हमारे जीवन में मार्गदर्शक है।

राजा हरिश्चंद्र और महर्षि विश्वामित्र की कहानी हमें याद दिलाती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना, किसी भी कठिनाई से अधिक महत्वपूर्ण है।


शिक्षा और नैतिक मूल्य

  • धर्म और सत्य का पालन कभी न छोड़े।
  • त्याग और साहस के माध्यम से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है।
  • महान ऋषियों का ज्ञान समाज और संस्कृति में अमूल्य योगदान देता है।


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