सत्य, धर्म और त्याग की प्रेरक कहानी
एक समय की बात है जब पूरे भू-मंडल में आर्यों का चक्रवर्ती राज्य था। किन्तु समय के साथ आर्यों में आलस्य, प्रमाद और परस्पर विरोध की वजह से उनके राज्य कमजोर हो गए। इस कथा में हम देखते हैं कि कैसे राजा हरिश्चंद्र ने सत्य और धर्म का पालन करते हुए भयानक कठिनाइयों का सामना किया और महर्षि विश्वामित्र के सामने अपने कर्तव्य और सत्य की रक्षा की।
यह कहानी न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हमें धर्म, त्याग और सत्यनिष्ठा के मूल्य भी सिखाती है।
राजा हरिश्चंद्र ने अपने राज्य और परिवार के साथ कई कष्ट सहकर महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा दी। उनके पिता की विरासत के अतिरिक्त, उन्हें पाँच सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएँ और अपना स्वयं का त्याग करना पड़ा।
राजा हरिश्चंद्र और उनका परिवार भूख और प्यास के बीच, सहायता के बिना, काशी पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्वयं को डोम को बेचकर और पत्नी तथा पुत्र को व्यापारी के घर दासी बनाकर महर्षि विश्वामित्र को दक्षिणा अर्पित की।
महर्षि विश्वामित्र ने अपने स्वर्ग का निर्माण किया, जिससे पृथ्वी पर कई समस्याएँ उत्पन्न हुईं:
देवताओं ने महर्षि विश्वामित्र से इसे वापस करने की विनती की, पर उन्होंने इंकार कर दिया।
इन्द्र और अन्य देवताओं ने राजा हरिश्चंद्र की पत्नी शैब्या और पुत्र रोहताश्च को अपने पक्ष में लाने की योजना बनाई।
शैब्या ने अपने पुत्र को खो दिया, और राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अंतिम संस्कार से पहले उसका शरीर संभाला।
राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता देखकर इन्द्र ने उन्हें और उनके परिवार को आशीर्वाद दिया।
महर्षि अगस्त्य ने हिन्दू धर्म का प्रचार विश्वभर में किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि:
राजा हरिश्चंद्र और महर्षि विश्वामित्र की कहानी हमें याद दिलाती है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना, किसी भी कठिनाई से अधिक महत्वपूर्ण है।
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