Vaisheshik Darshan By Kadad 1 Chapter part 1

कणाद का वैशेषिक दर्शन 1.1

कणाद का वैशेषिक दर्शन 1.1

अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः
अर्थ : अब हम धर्म का विवरण करेंगे। यह जीवन और मोक्ष के लिए आवश्यक है।
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः
अर्थ : धर्म वह है जिससे उत्तम कल्याण और श्रेष्ठता प्राप्त होती है।
तद्वचनादाम्नायप्रामाण्यम्
अर्थ : जो कहा गया है, उसका प्रमाण शास्त्र और आम्नाय से होता है।
पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि
अर्थ : पृथ्वी, आप, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा और मन ये आठ द्रव्य हैं।
रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे बुद्धयः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च गुणाः
अर्थ : ये गुण हैं: रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग-विभाग, परत्व-अपरत्व, बुद्धि, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, प्रयत्न।
उत्क्षेपणं अवक्षेपणं आकुञ्चनं प्रसारणं गमनं
अर्थ : कर्म हैं: उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण, गमन।
सदनित्यं द्रव्यवत्कार्यं कारणं सामान्यविशेषवदिति द्रव्यगुणकर्मणां अविशेषः
अर्थ : द्रव्य, गुण और कर्म का लक्षण है: सदनित्य और कारण-समान्य विशेष।
द्रव्याणि द्रव्यान्तरं आरभन्ते
अर्थ : द्रव्य अन्य द्रव्य से आरंभ होते हैं।
गुणाश्च गुणान्तरम्
अर्थ : गुण अन्य गुण से भिन्न होते हैं।
कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते
अर्थ : कर्म स्वयं कर्म को साध्य नहीं बनाता।
कार्याविरोधि द्रव्यं कारणाविरोधि च
अर्थ : द्रव्य कार्य और कारण के विरोध में नहीं हो सकता।
उभय्तथा गुणः
अर्थ : गुण दोनों प्रकार के होते हैं।
कार्यविरोधि कर्म
अर्थ : कर्म कार्य के विरोध में होता है।
क्रियावद्गुणवत्समवायिकारणं इति द्रव्यलक्षणम्
अर्थ : द्रव्य के लिए गुण की तरह कर्म समान कारण है।
द्रव्याश्रय्यगुणवान्संयोगविभागेष्वकारणं अनपेक्ष
अर्थ : गुण द्रव्य पर आधारित होता है और संयोग-विभागों पर निर्भर नहीं करता।
एकद्रव्यं अगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षं कारणं
अर्थ : एक द्रव्य अगुण और संयोग-विभागों से स्वतंत्र होकर कर्म का कारण है।
द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यं कारणं सामान्यम्
अर्थ : द्रव्य ही द्रव्य, गुण और कर्म का सामान्य कारण है।
तथा गुणः
अर्थ : इसी तरह गुण भी द्रव्य से ही उत्पन्न होता है।
संयोगविभागानां कर्म
अर्थ : संयोग और विभाग कर्म के लिए आधार हैं।
न द्रव्याणां व्यतिरेकात्
अर्थ : द्रव्य के भेद से कर्म नहीं होता।
गुणवैधर्म्यान्न कर्मणाम्
अर्थ : गुण और कर्म में भेद होता है; गुण का नियम कर्म के लिए लागू नहीं होता।
द्रव्याणां द्रव्यं कार्यं सामान्यम्
अर्थ : द्रव्यों का सामान्य कार्य हमेशा अन्य द्रव्य के आधार पर होता है।
द्वित्वप्रभृतयश्च संख्याः पृथक्त्वं संयोगविभागाश्च
अर्थ : संख्या, पृथकत्व और संयोग-विभाग गुणों के आधार पर कार्य करते हैं।
असमवायात्सामान्यं कर्म कार्यं न विद्यते
अर्थ : बिना संयोग या अव्यवस्था के सामान्य कार्य या कर्म संभव नहीं है।
संयोगानां द्रव्यम्
अर्थ : संयोग के लिए द्रव्य ही आवश्यक आधार है।
रूपानां रूपम्
अर्थ : सभी रूपों का आधार अन्य रूप ही है।
गुरुत्वप्रयत्नसंयोगानां उत्क्षेपणम्
अर्थ : गुरुत्व और प्रयत्न का संयोग करने से उत्क्षेपण कार्य होता है।
संयोगविभागाः कर्मणाम्
अर्थ : संयोग और विभाग कर्मों के लिए आवश्यक हैं।
कारणसामान्ये द्रव्यकर्मणां कर्माकारणं उक्तम्
अर्थ : सामान्य कारण के आधार पर द्रव्य और कर्म में कर्म का आधार निर्धारित होता है।
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