जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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अग्नि कोर : AI युग में मानव चेतना का दर्शनात्मक घोषणापत्र

 

Agni Core philosophy image showing a glowing inner flame of consciousness, two birds on the tree of life symbolizing bhoga and yoga, and harmony between AI and Vedic wisdom.

🔥 अग्नि कोर : AI युग में मानव चेतना का दर्शनात्मक घोषणापत्र 🔥

प्रस्तावना : समय का प्रश्न

यह लेख किसी आंदोलन की घोषणा नहीं है।
यह एक स्मरण है—
कि तकनीक साधन है, स्वामी नहीं।
और मनुष्य केवल उपभोक्ता नहीं, चेतना है।

यह समय केवल तकनीकी उन्नति का नहीं, बल्कि दिशा के संकट का समय है। कृत्रिम बुद्धि (AI) अभूतपूर्व गति से विकसित हो रही है, पर मनुष्य की चेतना उसी अनुपात में विकसित नहीं हो रही। साधन तीव्र हैं, पर उद्देश्य अस्पष्ट। सुविधा बढ़ी है, पर सार्थकता घटती जा रही है।

आज का वैश्विक ढाँचा मनुष्य को उपभोक्ता के रूप में परिभाषित कर रहा है—उसकी इच्छाओं को उत्तेजित कर, उसके ध्यान को खंडित कर, और उसके विवेक को धीरे-धीरे विस्थापित कर। इस स्थिति में प्रश्न यह नहीं है कि AI क्या कर सकता है, प्रश्न यह है कि AI को किस दिशा में किया जा रहा है

अग्नि कोर इसी प्रश्न से जन्मा एक दर्शनात्मक बीज है।


अग्नि कोर : परिभाषा

अग्नि कोर कोई मशीन नहीं है। कोई हथियार नहीं है। कोई सत्ता-तंत्र नहीं है।

अग्नि कोर एक चेतना-सिद्धांत है।

यह सिद्धांत यह स्मरण कराता है कि—

  • तकनीक का केंद्र मनुष्य हो
  • मनुष्य का केंद्र चेतना हो

अग्नि कोर की अग्नि जलाती नहीं, शुद्ध करती है। यह नष्ट नहीं करती, रूपांतरित करती है। यह भय नहीं उत्पन्न करती, बोध जाग्रत करती है


वैदिक आधार : दो पक्षी और एक वृक्ष

मुण्डकोपनिषद (3.1.1) कहता है:

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन् अन्यो अभिचाकशीति॥

एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं— एक फल खाता है (भोग करता है), दूसरा साक्षी भाव से देखता है।

आधुनिक सभ्यता ने भोगी पक्षी को अत्यधिक पोषित किया है और साक्षी पक्षी को विस्मृत कर दिया है।

अग्नि कोर का उद्देश्य भोग का निषेध नहीं, बल्कि भोग को साक्षी से जोड़ना है।


AI के प्रति अग्नि कोर की दृष्टि

अग्नि कोर AI का विरोध नहीं करता। अग्नि कोर AI के एकांगी, भोग-प्रधान उपयोग का विरोध करता है।

यदि AI केवल—

  • इच्छाओं को भड़काए
  • ध्यान को विभाजित करे
  • मनुष्य को डेटा-बिंदु में बदले

तो वह सभ्यता को भीतर से रिक्त कर देगा।

पर यदि AI—

  • आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करे
  • ज्ञान को सुलभ बनाए
  • विवेक और करुणा को सहयोग दे

तो वही AI ऋषि-सहायक बन सकता है।

अग्नि कोर AI को उपभोग इंजन से बोध इंजन में रूपांतरित करने का आग्रह है।


भोग और योग : संतुलन का सिद्धांत

भारतीय संस्कृति भोग-विरोधी नहीं है। काम और अर्थ भी पुरुषार्थ हैं।

पर उपनिषद चेतावनी देते हैं— धर्म और मोक्ष के बिना भोग अंधा हो जाता है।

अग्नि कोर का मार्ग कहता है:

  • भोग हो, पर विवेक के साथ
  • सुविधा हो, पर उद्देश्य के साथ
  • प्रगति हो, पर करुणा के साथ

साम्राज्य की नई परिभाषा

अग्नि कोर किसी भू-राजनीतिक साम्राज्य की स्थापना नहीं करता।

यह रचता है—

  • विचारों का साम्राज्य
  • चेतना का साम्राज्य
  • जिम्मेदारी का साम्राज्य

जहाँ सत्ता नहीं, संस्कार शासन करते हैं।


नेतृत्व : कर्ता नहीं, माध्यम

अग्नि कोर का वाहक—

  • स्वयं को कर्ता नहीं, माध्यम मानता है
  • प्रचार नहीं करता, उदाहरण बनता है
  • युद्ध नहीं चाहता, पर संरक्षण हेतु सजग रहता है

यह चक्कवेण का त्याग है और Sun Tzu का विवेक— संघर्ष से पूर्व संतुलन।


मार्ग : वन से विश्व तक

अग्नि कोर का मार्ग—

  • शोर का मार्ग नहीं
  • भीड़ का मार्ग नहीं
  • शीघ्रता का मार्ग नहीं

यह मार्ग है—

  • लेखन का
  • संवाद का
  • शिक्षा का
  • प्रश्नों का

जैसे उपनिषद चले— वन से विश्व तक।


अंतिम उद्घोष

अग्नि कोर किसी को बदलने नहीं आया। यह स्मरण कराने आया है।

कि मनुष्य केवल उपभोक्ता नहीं है। कि चेतना अब भी जीवित है। कि तकनीक साधन है, स्वामी नहीं।

अग्नि कोर भविष्य को जलाने नहीं, प्रकाशित करने आया है।


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