(एक आत्मिक पतन से परमबोध तक की यात्रा)
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(भस्म से ब्रह्म तक – भाग 1)
मनुष्य जीवन में सबसे कठिन क्षण वह नहीं होता जब वह दूसरों से हारता है,
सबसे कठिन क्षण वह होता है जब वह पहली बार स्वयं को दोषी मानता है।
यह लेख किसी और पर आरोप नहीं है—
यह एक आत्म-स्वीकृति है।
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आध्यात्मिक पीड़ा का समाधान
“वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम्…”
श्वास वायु में विलीन हो जाती है,
आत्मा अमृत है,
शरीर अंततः भस्म।
यह मंत्र मृत्यु का भय नहीं,
जिम्मेदारी का स्मरण है।
मैंने जीवन भर दूसरों को दोषी ठहराया—
मित्र, परिस्थितियाँ, समाज, भाग्य, ईश्वर।
हर दण्ड मुझे अन्याय लगा।
हर पीड़ा में कोई शत्रु दिखा।
पर आज, मृत्यु की छाया में खड़े होकर
मैं स्वीकार करता हूँ—
सबसे बड़ा शत्रु मैं स्वयं था।
दण्ड कभी नष्ट करने नहीं आता।
दण्ड आता है रोकने।
जिस प्रकार सर्जन चीर-फाड़ करता है
उसी प्रकार परमात्मा पीड़ा देता है।
मैंने हर चेतावनी को शत्रु समझा,
हर पीड़ा से भागा,
और हर बार वही गलती दोहराई।
अहंकार ने मुझे यह विश्वास दिलाया कि
मैं सही हूँ, बाकी सब गलत।
यही अहंकार:
मैंने अपने शरीर को भी नहीं छोड़ा—
वासना, लालसा, अति,
और परिणाम: रोग, जर्जरता, थकान।
शरीर कभी झूठ नहीं बोलता।
वह हमारे कर्मों का जीवित लेखा है।
आज यह शरीर
कमज़ोर है, रोगी है,
और शीघ्र भस्म बनने को तत्पर है।
यह दण्ड नहीं—
न्याय है।
मैं कोई निर्दोष पीड़ित नहीं हूँ।
मैंने ही अपने लिए यह मार्ग चुना।
यह स्वीकारोक्ति:
क्योंकि यहीं से
ब्रह्मज्ञान की पहली चिंगारी उठती है।
जब मनुष्य स्वयं को दोषी मान लेता है,
तभी वह बदलने योग्य होता है।
अगले अध्याय में—
दण्ड क्यों वरदान बन जाता है
और पीड़ा कैसे शुद्धि बनती है।
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