जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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MK PANDEY PRESIDNT OF GVB

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मानव इच्छा और संतुष्टि

मानव इच्छा और संतुष्टि 

 

     एक मछुआरा अतीत में हुआ करता था, जो किसी समय में किसी और देश में मछली पकड़ने का कार्य करता था, और एक दिन उसने अपनी जाल को समुद्र में फेंका, जिसकी जाल में उस दिन एक सोने की मछली फंस गई, तब उसने उस मछली को आनंदित होकर उठाने के लिए झुका, तभी मछली वापिस उसके हाथों से फिसल कर दुबारा सागर के पानी में कुंद गई। इस कारण से वह बहुत निराश हो गया, और उसकी आंखों में आंसू आ गये, इस लिए उसने समुद्र का त्याग कर दिया। और अपनी शरीर को भी त्यागने के लिए तैयार हो गया, और वह चिल्लाया कि आह मेरा जीवन पूरा हो गया। क्योंकि मेरा जीवन स्वर्णमय मछली के शरीर के लिए हुआ था, जो अब उसके बिना बेकार हो चुका है। इसके बाद कुछ देर में उसने अपने आपको फिर से तैयार किया और वह वापिस समुद्र में गया और उसने अपनी मछली पकड़ने वाली जाल को समुद्र के पानी में दुबारा फिर से फेंका, और इस बार उसकी जाल में चांदी की मछली फंस गई, और तत्काल वह अपनी सोने की मछली को भूल गया। और बड़ी उत्सुकता के साथ अपने हाथों से जल्दी - जल्दी जाल को ऊपर खिचने लगा, मछली को पकड़ने के लिए। लेकिन यह मछली भी उसके हाथ में आने से पहले ही फिसल कर पानी में पहले की तरह से कुंद गई। और इस बार फिर मंछुवारा स्वयं के भाग्य पर बड़ी निराशा के साथ दुःखी हो गया। और अपने भाग्य को बुरा भला कह कर कोसने लगा, और इसके साथ ही उसने समुद्र किनारे को छोड़ दिया। और अपना बहुत-सा समय उन मछलियों के खोने के प्रायश्चित में गुजारता रहा। कुछ समय के बाद वह एक बार फिर समुद्र के किनारे अपनी जाल को ले कर आया, और अपनी जाल को एक बार फिर समुद्र में फेंका, जिसमें एक सामान्य-सी मछली ही फंसी जो साधारण हांड़ मांस से बनी हुई थी। और इसको उसने अपने हाथों में पकड़ कर अपने साथ ले गया, और इसको पाकर वह पुरी तरह से खुश था, और इसको पाकर वह सोने और चांदी की मछलियों को पुरी तरह से भूल गया, जैसे वह कभी उसके जीवन में आई ही नहीं थी।

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