(अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है)
भगवान् बुद्ध ने मानवता को यह महान सत्य सिखाया कि सही मार्ग न तो भोग-विलास का है और न ही कठोर तपस्या का, बल्कि वह मध्यम मार्ग है, जिसमें करुणा, विवेक और अहिंसा का समावेश हो।
एक बार की बात है। भगवान् बुद्ध नगर के बाहर मार्ग पर विचरण कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि सामने से भेड़-बकरियों का एक बड़ा झुंड आ रहा है। तेज धूप में चरवाहा बड़ी कठिनाई से उन्हें हाँक रहा था। झुंड के बीच एक लँगड़ा मेमना भी था, जो अन्य पशुओं के साथ चलने में असमर्थ था।
भगवान् बुद्ध का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने चरवाहे से पूछा—
“वत्स, इतनी कठिनाई क्यों हो रही है?”
चरवाहे ने हाथ जोड़कर कहा—
“भगवान! इस झुंड में एक लँगड़ा मेमना है। यह चल नहीं पाता, इसलिए सबको संभालना कठिन हो रहा है।”
बुद्ध ने फिर प्रेमपूर्वक पूछा—
“इस तपती दोपहरी में इन निरीह पशुओं को कहाँ ले जा रहे हो?”
चरवाहे ने उत्तर दिया—
“महाराज! आज राजा यज्ञ करवा रहे हैं। यज्ञ में बलि हेतु एक सौ भेड़-बकरियों की आवश्यकता है। राजा की आज्ञा से इन्हें यज्ञस्थल ले जा रहा हूँ।”
यह सुनकर बुद्ध के मुख पर करुणा और वेदना एक साथ प्रकट हो गई। उन्होंने कहा—
“चलो, मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।”
भगवान् बुद्ध ने उस लँगड़े मेमने को अपने कंधों पर उठा लिया और दोनों साथ-साथ नगर की ओर चल पड़े। नगर में प्रवेश करते ही लोगों की दृष्टि उस दृश्य पर ठहर गई—
एक महापुरुष, शांत, तेजस्वी और करुणामय, अपने कंधों पर एक निरीह मेमने को उठाए चला आ रहा था।
लोग आपस में कहने लगे—
“देखो! यही वे तपस्वी हैं जो पहाड़ी पर रहते हैं। कितनी शांति और करुणा इनके मुख से झलकती है!”
जब वे यज्ञस्थल पहुँचे, तो राजसेवकों ने पशुओं की गिनती की। जैसे ही वधकर्ता ने खड्ग उठाकर पशु की गर्दन काटने का प्रयास किया, भगवान् बुद्ध ने गंभीर स्वर में कहा—
“राजन्! खड्ग रोक दीजिए। यदि बलि देनी ही है, तो पहले मेरी गर्दन पर खड्ग चलाइए। निरीह पशुओं का वध मत कीजिए।”
यह सुनते ही राजा स्तब्ध रह गया। उसके हाथ से राजदंड छूट गया और वह भगवान् बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसने तुरंत यज्ञ में लाए गए सभी पशुओं को मुक्त करने की आज्ञा दे दी।
उस दिन न केवल वे पशु मुक्त हुए, बल्कि उस राज्य से हिंसा का बीज भी सदा-सदा के लिए नष्ट हो गया। राजा ने अहिंसा को राज्य-धर्म घोषित कर दिया।
धर्म की रक्षा तलवार से नहीं, करुणा और विवेक से होती है।
जहाँ हिंसा होती है, वहाँ धर्म केवल नाम मात्र रह जाता है।
और जहाँ अहिंसा होती है, वहाँ धर्म स्वयं जीवित रहता है।
अहिंसा केवल किसी को मारना न छोड़ने का नाम नहीं,
बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को पीड़ा न पहुँचाना ही सच्ची अहिंसा है।
“अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च।”
— महाभारत
“जो स्वयं को पीड़ा पहुँचाए बिना दूसरों को सुख देता है, वही सच्चा धर्मात्मा है।”
— भगवान् बुद्ध
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