“ब्रह्म क्या है?” यह प्रश्न केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि मानव जीवन के परम सत्य की खोज है। वेद और उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म वही परम तत्त्व है जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है, जिसमें स्थित रहती है और अंततः जिसमें विलीन हो जाती है। इस लेख में हम ब्रह्मज्ञान को सरल, गम्भीर एवं प्रामाणिक रूप में समझने का प्रयास करेंगे।
‘ब्रह्म’ शब्द संस्कृत की “बृह्” धातु से बना है, जिसका अर्थ है — विस्तार होना, महान होना, अनन्त होना।
ब्रह्म न तो दृष्टिगोचर है, न स्पर्शयोग्य और न ही किसी रूप में सीमित। फिर भी वही सब कुछ है।
उपनिषद् कहते हैं—
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्म है।
चारों वेद ब्रह्म को एक, अद्वितीय और अविनाशी बताते हैं—
वेदों के अनुसार ब्रह्म—
उपनिषद् ब्रह्मज्ञान का सार हैं। यहीं यह स्पष्ट किया गया है कि आत्मा और ब्रह्म भिन्न नहीं हैं।
उपनिषदों के प्रमुख महावाक्य—
उपनिषदों का स्पष्ट कथन है कि जो व्यक्ति आत्मा को जान लेता है, वही ब्रह्म को जान लेता है।
सामान्यतः यह माना जाता है कि आत्मा और ब्रह्म अलग-अलग हैं, किन्तु वेदान्त दर्शन कहता है—
आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है,
भेद केवल अज्ञान का है।
जिस प्रकार— घट के भीतर का आकाश और बाहर का आकाश वास्तव में एक ही होता है, उसी प्रकार आत्मा और ब्रह्म भी एक ही हैं।
ब्रह्मज्ञान केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन का रूपान्तरण है।
ब्रह्मज्ञान से—
इसलिए कहा गया है—
“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति”
जो ब्रह्म को जानता है, वही ब्रह्म हो जाता है।
मोक्ष का अर्थ स्वर्ग की प्राप्ति नहीं, बल्कि जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति है।
उपनिषदों के अनुसार—
जब अज्ञान नष्ट हो जाता है, तब मनुष्य अपने शुद्ध, नित्य और मुक्त स्वरूप को पहचान लेता है। यही मोक्ष है।
आज का मानव तनाव, भय और असन्तोष से ग्रस्त है। ब्रह्मज्ञान उसे यह बोध कराता है कि—
“तुम अपूर्ण नहीं हो, तुम स्वयं पूर्ण हो।”
यही कारण है कि ब्रह्मज्ञान आज के युग में भी उतना ही आवश्यक है जितना प्राचीन काल में था।
ओ3म् ईश्वर का नाम है, यह ओ3म् तीन अक्षर के शंष्लेषण से बना है, जिसमें अकार उकार मकार अर्थात ब्रह्मा वीष्णु और महेश नामक सत्ता है, इस ओ3म् को को हम परमाणु मान सकते हैं, वैज्ञानिक भाषा में, यह एक परमाणु है, और इसमें तीन अणु हैं, जिसको सत रज तम कहते हैं, दार्शनिक भाषा में, ईश्वर का नाम और ईश्वर दो अलग अलग वस्तु हैं, जैसे उदाहरण के लिए हम किसी एक यंत्र को ले ले मान लीजिए की कम्प्युटर है, यह कम्प्युटर कई सारे यंत्रों का जोड़ है, इसी प्रकार से भौतीक पदार्थों के संपूर्ण योग का सार वह ईश्वर है, जिस प्रकार से दुध का सार घी है, जिस प्रकार से भोजन का सार मानव शरीर में उत्पन्न होने वाला वीर्य है। भोजन और वीर्य के मध्य बहुत गहरा रीस्ता है, यह रीस्ता अभी भौतीक रूप से हमें पुरी तरह से समझ में नहीं आता है, की किस प्रकार से भोजन से वीर्य बनता है, यदि हम वैज्ञानिक तकनीकि के माध्यम से मानव वीर्य बनाने में समर्थ हो जाते हैं, तो यह बहुत बड़ा चमत्कार होगा, यद्यपि अभी ऐसा नहीं है, लेकिन यहीं कार्य बहुत ही सहजता के साथ मानव शरीर में भोजन से वीर्य बन जाता है, और यह मानव शरीर में भोजन से बनने वाला वीर्य बहुत बड़ी शक्ति को अपने अंदर धारण करने वाला है, इसी शक्ति या ऊर्जा के द्वारा मानव शरीर बढ़ता फलता और फुलता है, इसको शरीर में धारण करने के नाम को ब्रह्मचर्य कहते हैं।
👉 इसे भी पढे यजुर्वेद प्रथम मंत्र सृष्टि सृजन संहार
जिस प्रकार से भोजन से वीर्य केवल मानव शरीर में ही बनता है, या फिर सभी प्राणी के जीवित शरीर में बनता है, जिसके द्वारा वह प्राणी अपनी संतती को निरंतर इस पृथ्वी पर बना कर रखने में समर्थ होता है। उसी प्रकार से वीर्य का शरीर में धारण करने और उसको ब्रह्ममय होने के लिए खर्च करना मानव मस्तिष्क का कार्य है। और इस वीर्य का संबंध ब्रह्मचर्य से इसके साथ ब्रह्मज्ञान से है। मानव शरीर में वीर्य बनने की प्रक्रिया को सात चरणों में वीभाजित किया गया है, सर्वप्रथम भोजन से रस बनता है, रस से खून बनता है, खून से मांस बनता है, मांस से मज्जा बनता है, मज्जा से मेद बनता है, मेद से हड्डी बनती है, और हड्डी से वीर्य बनता है।
क्या हम सीधा सीधा हड्डी से वीर्य बना सकते हैं, इसका उत्तर भी नहीं में ही आयेगा, यदि इन सातो पदार्थों को जैसे भोजन, रस, खून, मांस, मज्जा, मेद, हड्डी इत्यादि को एक साथ कीसि बाहरी मशीन में या प्रयोगशाला में किसी प्रकार से वीर्य बना सकते हैं, तो यह कार्य भी अभी असंभव है।
इसका मतलब है कि यह वीर्य बनने की प्रक्रिया बहुत ही जटील है, आज तक जितनी भी खोज हुई हैं, उन सबसे अधीक कठीन या लगभग असंभव जैसा यह कार्य है, भवीष्य में शायद यह कार्य संभव हो जाए फिर भी इसमें बहुत बड़ा संदेह है, क्योंकि इस जगत में हजारों और करोड़ों प्रकार के जीव है, सभी के वीर्य को तो नहीं बना सकते लेकिन मानव के वीर्य को बनाने में अवश्य पुरुषार्थ वैज्ञानिक कर रहें हैं।
वीर्य का एक वीश्लेषण वीकी पीडिया के आधार पर (वीर्य) कैसे बनता है? समझें इसकी पूरी प्रक्रिया
एक
पुरुष के शरीर में सबसे जरूरी चीज़ होती हैं वीर्य, आज हम आप को बताएँगे की वीर्य कैसे बनता
हैं और इसका पुरुष जीवन में क्या महत्व हैं
👉 इसे भी पढ़े निष्काम और सकाम कर्म: वेद, उपनिषद और दार्शनिक दृष्टि से विवेचन
इसके
बनने की प्रक्रिया में सबसे पहले मनुष्य भोजन करता हैं। किये गए भोजन का पांच दिन
के बाद पूर्णत पाचन होने के बाद उसका रक्त यानि खून बन जाता हैं। पांच दिनों के
बाद रक्त में से मास और इसके 5-5 दिनों के अंतराल के पश्चात मेद, मेद से हड्डी , हड्डी से मज्जा और अंतत: मज्जा से वीर्य
निर्माण होता
हैं।
बात
अगर वीर्य बनने में लगने वाले समय की करें तो यह बहुत लम्बा समय होता हैं। यह तो
आप उपर समझ ही चुकें हैं की इसकी प्रक्रिया कैसे सात चरणों को पूरा करती हैं तब
कहीं जाकर इसका निर्माण होता हैं। वीर्य बनने में 30 दिन और 4 घंटे का समय लगता
हैं।
इसके बाद 700 ग्राम खून यानि रक्त से केवल 20 ग्राम वीर्य(Sperm) का निर्माण होता हैं। अब आप यह समझ सकते हैं की 32 किलोग्राम भोजन करने से एक मनुष्य को सिर्फ 20 ग्राम वीर्य प्राप्त हो पाता हैं। इसका अर्थ यह हैं की यह कितना महत्वपूर्ण हैं।
👉 इसे भी पढ़े ब्रह्माण्ड में मानव की जिज्ञासा क्या क्यो और कैसे
वीर्य
की शक्ति ?
इसकी शक्ति इतनी ज्यादा हैं की अगर व्यक्ति के शरीर में यह ठीक मात्रा में हैं तो उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती हैं। व्यक्ति का चेहरा चमकता रहता हैं और एक आकर्षण उसके चेहरे पर हमेशा बना रहता हैं। देवताओं के वैध श्री धनवंतरी जी ने तो इसे ‘ओज’ कहा हैं।
ओज का अर्थ होता हैं प्रकाश , बल शक्ति और जोश आदि। ओज ही मनुष्य को उसके आत्म – दर्शन में सहायक होता हैं। आप ने कभी महसूस किया होगा तो देखा होगा की कोई – कोई व्यक्ति गजब का आकर्षण लिए होता हैं। यह सब विशेताएँ केवल और केवल वीर्य के कारण होती हैं।
जो व्यक्ति अपने वीर्य को संरक्षित करता हैं उसका रक्षण करता हैं और उसे बेवजह खर्च नही करता हैं। उसके चहरे पर एक अजीब तेज , उसकी आवाज में दम , कार्यों में उत्साह और स्फूर्ति दिखती हैं। तो आप समझ लीजिये की यह सब वीर्य की शक्ति का ही प्रभाव हैं।
एक
सामान्य पुरुष में वीर्य
यदि एक पुरुष एक दिन में 700-800 ग्राम भोजन करता हैं तो इस हिसाब से वह 40 दिन में 28 से 32 किलोंग्राम भोजन करता हैं। तो इस हिसाब से उसके चालीस दिन तक नियमित भोजन करने से उसे 20 ग्राम वीर्य(Sperm) प्राप्त होगा।
इस हिसाब से एक महीने में एक व्यक्ति 15 ग्राम वीर्य और 10 दिन में 5 ग्राम वीर्य प्राप्त करता हैं। प्रतिदिन की बात करें तो मनुष्य अगर प्रतिदिन 700 से 800 ग्राम भोजन करेगा तो उसको महज आधा ग्राम वीर्य की प्राप्ति होती हैं। एक बार मैथुन क्रिया करने मात्र से एक पुरुष के शरीर से 15 ग्राम या उससे अधिक वीर्य बाहर निकलता हैं।
अब आप समझ सकते हैं की जो चीज़ आप ने 40 दिन में अर्जित की प्राप्त की हैं। वह एक बार के मैथुन करने से खर्च हो जाती हैं। तो हम आप को यही सलाह देगे की आप अपने वीर्य का रक्षण करें और वीर्यवान बनें।
वीर्य एक जैविक तरल पदार्थ है, जिसे औरत कि योनि मे छोड़ा जाता है बीजीय या वीर्य तरल भी कहते हैं, जिसमे सामान्यतः शुक्राणु (स्पर्म) होते हैं। यह जननग्रन्थि (यौन ग्रंथियाँ) तथा नर या उभयलिंगी प्राणियों के अन्य अंगों द्वारा स्रावित होता है और मादा अंडाणु को निषेचित कर सकता है। इंसानों में, शुक्राणुओं के अलावा बीजीय तरल में अनेक घटक होते हैं: बीजीय तरल के प्रोटियोलिटिक और अन्य एंजाइमों के साथ-साथ फलशर्करा तत्व शुक्राणुओं के अस्तित्व की रक्षा करते हैं और उन्हें एक ऐसा माध्यम प्रदान करते हैं जहाँ वे चल-फिर सकें या "तैर" सकें। वो प्रक्रिया जिसके परिणामस्वरूप वीर्य का प्रवाह होता है उसे स्खलन कहा जाता है।
👉 इसे भी पढे अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
शारीरिक पहलू आंतरिक और बाह्य निषेचन प्रजातियों के आधार पर, शुक्राणु आंतरिक या बाह्य रूप से अंडाणु को निषेचित कर सकता है। बाह्य निषेचन में, शुक्राणु सीधे-सीधे अंडाणु को निषेचित करता है, मादा के यौनांगों के बाहर से, मादा मछली, उदाहरण के लिए, अपने जलीय वातावरण में अंडाणु जन्म देती हैं, जहाँ वे नर मछली के वीर्य से निषेचित हो जाया करते हैं।
आंतरिक निषेचन के दौरान, मादा या महिला के यौनांगों के अंदर निषेचन होता है। संभोग के जरिये पुरुष द्वारा महिला में वीर्यारोपण के बाद आंतरिक निषेचन होता है। निचली रीढ़ वाले प्राणियों में (जल-स्थलचर, सरीसृप, पक्षी और मोनोट्रीम स्तनधारी (प्राचीनकालीन अंडे देनेवाला स्तनधारी), सम्भोग या मैथुन नर व मादा के क्लोएक (आंत के अंत में एक यौन, मल-मूत्र संबंधी छिद्र या नली) के शारीरिक संगमन के ज़रिए होता है। धानी प्राणी (मारसुपियल) और अपरा (प्लेसेंटल) स्तनधारियों में योनि के जरिये सम्भोग होता है।
मानव वीर्य की संरचना
वीर्य स्खलन की प्रक्रिया के दौरान, शुक्राणु शुक्रसेचक वाहिनी के माध्यम से गुजरते हैं और प्रोस्टेट ग्रंथि नामक शुक्राणु पुटिकाओं और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियों से निकले तरल के साथ मिलकर वीर्य का रूप लेते हैं। शुक्राणु पुटिकाएं एक फलशर्करा से भरपूर पीला-सा गाढा-चिपचिपा तरल और अन्य सार पैदा करती हैं, जो मानव वीर्य का लगभग 70% होते हैं। डिहाइड्रोटेस्टोस्टेरोन द्वारा प्रभावित होकर प्रोस्टेटिक स्राव एक सफ़ेद-सा (कभी-कभी पानी जैसा साफ़) पतला तरल होता है, जिसमें प्रोटियोलिटिक एंजाइम, साइट्रिक एसिड, एसिड फॉस्फेटेज और लिपिड होते हैं। इसे चिकना बनाने के लिए मूत्रमार्ग के लुमेन में बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियां एक पानी-सा साफ़ स्राव स्रावित करती हैं।
सरटोली कोशिकाएँ, जो स्पर्माटोसाइट के विकास में पालन-पोषण और सहायता करती हैं, वीर्योत्पादक वृक्क नलिकाओं में एक तरल का स्राव करती हैं, जिससे जननांग नलिकाओं में शुक्राणुओं के जाने में मदद मिलती है। डक्टली एफ्रेंटस (नलिका अपवाही) माइक्रोविली के साथ क्यूबोआइडल (क्यूब जैसे आकार का) कोशिकाओं और लाइसोसोमल दानों से युक्त होता है, जो कुछ तरल से पुनः अवशोषण करवाकर वीर्य को संशोधित करता है। एक बार जब वीर्य प्रमुख कोशिका वाहिनी अधिवृषण में प्रवेश कर जाता है, जहाँ पिनोसायटोटिक नस अंतर्विष्ट होती हैं जो तरल के पुनःअवशोषण का संकेत देती हैं, जो ग्लिस्रोफोस्फोकोलाइन स्रावित करती हैं जिससे बहुत संभव समय से पहले कैपेसिटेशन का अवरोध होता है। सहयोगी जननांग नलिकाएँ, शुक्राणु पुटिका, प्रोस्टेट ग्रंथियाँ और बल्बोयूरेथ्रल ग्रंथियाँ अधिकांश शुक्राणु तरल उत्पादित करती हैं।
👉 इसे भी पढे हम ही शत्रु, स्वयं के परम मित्र – वैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्याख्या
मनुष्य के वीर्य प्लाज्मा जैविक व अजैविक घटकों की एक जटिल क्रमबद्धता से युक्त होते हैं।
वीर्य प्लाज्मा शुक्राणुओं को महिला के प्रजनन पथ की यात्रा के दौरान एक पोषक वसुरक्षात्मक माध्यम प्रदान करता है। योनि का सामान्य माहौल शुक्राणु कोशिकाओं के लिए प्रतिकूल होता है, क्योंकि यह बहुत ही अम्लीय (वहाँ के मूल निवासी माइक्रोफ्लोरा द्वारा लैक्टिक एसिड के उत्पादन से) और चिपचिपा होता है और इम्यून कोशिकाएँ गश्त में होती हैं। वीर्य प्लाज्मा के घटक इस शत्रुतापूर्ण वातावरण की क्षतिपूर्ति करने के प्रयास करते हैं। प्यूटर्साइन, स्पर्माइन, स्पर्माईडाइन और कैडवराइन जैसे बुनियादी एमाइंस वीर्य की गंध और स्वाद के लिए जिम्मेवार हैं। ये एल्कालाइन बेस योनि नलिका के अम्लीय माहौल का सामना करते हैं और अम्लीय विकृतिकरण से शुक्राणु के अंदर स्थित DNA की रक्षा करते हैं।
वीर्य के घटक और योगदान इस प्रकार हैं: ग्रंथि अनुमानित % विवरण
वीर्यकोष 2-5% प्रति
स्खलन में स्खलित होने वाले लगभग 200 - 500 मिलियन स्पर्माटोजोआ (शुक्राणु
या स्पर्माटोजोयन्स भी कहा जाता है) वीर्यकोष या वृषण में
बनते हैं।
वीर्य संबंधी पुटिका 65-75% अमीनो एसिड, साइट्रेट एंजाइम फ्लेविंस, फ्रुटोज (शुक्राणु कोशिकाओं के ऊर्जा के मुख्य स्रोत, जो ऊर्जा के लिए वीर्य संबंधी प्लाजमा से पूरी तरह से शर्करा पर आश्रित है), फास्फोरलकोलाइन, प्रोस्टाग्लेडिन्स (महिला द्वारा प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में बाहरी वीर्य को दबाने से जुड़ा हुआ है), प्रोटीन और विटामिन सी पुरःस्थ ग्रंथि 25-30% एसिड फास्फेटैस साइट्रिक एसिड फिब्रीनोलाइसिन प्रोस्टेट विशिष्ट एंटीजन प्रोटेओलिटिक एंजाइम, जिंक (शुक्राणु कोशिका में क्रोमाटिन युक्त डीएनए को स्थिर होने में सहयोग करता है। जिंक की कमी से शुक्राणु की कमजोरी के कारण प्रजनन क्षमता में कमी हो सकती हैं। जिंक की कमी का प्रतिकूल प्रभाव स्पर्माटोजेनिसिस पर पड़ सकता है।)
बल्बोयूरेथ्रल
ग्रंथियाँ <1% दुग्धशर्करा,
श्लेष्मा (शुक्राणु कोशिका की गतिशीलता
में वृद्धि और शुक्राणु कोशिकाओं के इसमें तैरने के लिए योनि तथा गर्भाशय ग्रीवा
एक चिपचिपी वाहिका बनाती है और वीर्य का प्रसार बाहर होने से रोकती है। वीर्य का
जेली की-सी संरचना की संलग्नता में योगदान करती है।) स्खलन पूर्व, सियालिक एसिड
1992 के विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में सामान्य मानव वीर्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि स्खलन के 60 मिनट के अंदर सामान्य मानव वीर्य 2 मिलीलीटर या इससे अधिक मात्रा में, 7.2 से 8.0 पीएच, हुआ करता है; शुक्राणु सांद्रता 20×106 स्पर्माटोजोआ/मि.ली. या अधिक होती है; प्रति स्खलन में शुक्राणु संख्या 40×106 स्पर्माटोजोआ या अधिक; आगे बढ़ते समय (ए और बी श्रेणी) 50% या उससे अधि की मृत्यु दर और तेज अग्रगति (श्रेणी ए) के समय 25% या अधिक मृत्यु दर हुआ करती है।
👉 इसे भी पढे The Practice of Yoga: Patanjali’s Perspective on Siddhis, Powers, and self mastery
रूप-रंग और मानव वीर्य की अनुकूलता मानव वीर्य
अधिकांश वीर्य सफेद होते हैं, लेकिन धूसर या यहां तक कि पीला-सा वीर्य भी सामान्य हो सकते हैं। वीर्य में रक्त से इसका रंग गुलाबी या लाल हो सकता है, जो हेमाटोस्पर्मिया कहलाता है और चिकित्सकीय समस्या पैदा कर सकता है, अगर यह तत्काल समाप्त नहीं होता है तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
स्खलन के बाद, वीर्य पहले एक थक्के की प्रक्रिया के माध्यम से गुजरता है और फिर अधिक तरल हो जाता है। यह निर्विवाद है कि प्रारंभिक थक्कापन वीर्य को योनि में रखे रहने में सहायता करता है, लेकिन द्रवीकरण से शुक्राणु मुक्त हो जाते हैं और अंडाणु या स्त्रीबीज की अपनी लंबी यात्रा पर चल पड़ते हैं। स्खलन के तुरंत बाद वीर्य आम तौर पर एक चिपचिपा, जेली की तरह का तरल होता है जो अक्सर ग्लोब्युल्स बनाता है। अंततः सूख जाने से पहले 5 से 40 मिनट के अंदर यह अधिक जलीय और तरल हो जाता है।
वीर्य
गुणवत्ता
निषेचन पूरा कर पाने की वीर्य की क्षमता का माप है वीर्य गुणवत्ता। इस प्रकार, यह किसी पुरुष में प्रजननशक्ति का एक माप है। शुक्राणु ही वीर्य का प्रजनन घटक है, और इसीलिए वीर्य गुणवत्ता में शुक्राणु की गुणवत्ता तथा शुक्राणु की संख्या दोनों शामिल हैं।
सेहत
पर प्रभाव
प्रजनन में इसकी केंद्रीय भूमिका के अलावा, विभिन्न वैज्ञानिक निष्कर्षों से पता चलता है कि मानव स्वास्थ्य पर वीर्य के कुछ लाभकारी प्रभाव होते हैं, प्रमाणित लाभ और संभावित लाभ दोनों ही हैं।
अवसादरोधी:
एक अध्ययन का कहना है कि वीर्य के योनि अवशोषण से महिलाओं में अवसादरोधी के रूप
में काम कर सकता है; अध्ययन
ने महिलाओं के दो समूहों की तुलना की, एक वे जो कंडोम का उपयोग करतीं थीं और दूसरा जो नहीं करतीं
थीं।
कैंसर की रोकथाम: अध्ययनों का मानना है कि वीर्य प्लाज्मा कैंसर, खासकर स्तन कैंसर को रोकता है और उससे संघर्ष करता है, इस जोखिम को कम करता है "50 फीसदी से कम नहीं" टीजीएफ-बेटा द्वारा एपोपटोसिस के प्रेरित होने के साथ, ग्लायकोप्रोटीन और सेलेनियम तत्व के कारण यह प्रभाव पड़ता है। एक संबंधित शहरी कहावत इन निष्कर्षों की पैरोडी करते हुए दावा करता है कि सप्ताह में कम से कम तीन बार शिश्न चूषण से स्तन कैंसर का ख़तरा कम हो जाता है।
👉 इसे भी पढे Veda Veda Darshan Perspective on Universal Life and Dharma
गर्भाक्षेप निवारण: यह धारणा है कि वीर्य के सार तत्व मां की इम्यून प्रणाली को शुक्राणु में पाए जाने वाले "बाहरी" प्रोटीन को स्वीकार करने के अनुकूल बनाते हैं साथ ही भ्रूण और गर्भनाल भी तैयार होते हैं, इससे रक्त चाप कम रहता है और इसलिए गर्भाक्षेप का खतरा कम हो जाता है। एक अध्ययन से पता चलता है कि मुख मैथुन और वीर्य निगलने से महिला के गर्भ को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है, क्योंकि वह अपने साथी के प्रतिजन (एंटीजन) को अवशोषित करती है।
वीर्य और रोग का संचरण
वीर्य एड्स के वायरस एचआईवी सहित अनेक यौन संचारित रोगों का वाहक हो सकता है।
इसके अलावा, माथुर और गौस्ट जैसे शोध में पाया गया कि शुक्राणु की अनुक्रिया में गैर-पूर्वअस्तित्ववान या पहले गैर-मौजूद रोग-प्रतिकारक पैदा होते हैं। ये प्रतिरक्षी या रोग-प्रतिकारक भूलवश स्थानीय टी लिम्फोसाइट्स को बाहरी प्रतिजन (एंटीजन) मां लेते हैं और फलस्वरूप टी लिम्फोसाइट्स पर बी लिम्फोसाइट्स का हमला होने लगता है।
वीर्य में शक्तिशाली जीवाणुनाशक गतिविधि के साथ प्रोटीन हुआ करता है, लेकिन ये प्रोटीन नेइसेरिया गनोरिया जैसे एक आम यौन संचारित रोग के विरुद्ध सक्रिय नहीं होते हैं।
वीर्य में रक्त (हेमाटोस्पर्मिया)
वीर्य में खून की मौजूदगी या हेमाटोस्पर्मिया पता लगाने योग्य नहीं हो सकता (इसे सिर्फ माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सकता है) या यह तरल में दिखता भी नहीं। इसकी वजह पुरुष प्रजनन क्षेत्र में सूजन, संक्रमण, अवरोध, या चोट हो सकती है या मूत्रमार्ग, अंडकोष, अधिवृषण या प्रोस्टेट के अंदर कोई समस्या हो सकती है।
यह आमतौर पर इलाज के बिना ही ठीक हो जाया करता है, या एंटीबायोटिक दवाओं से ठीक हो जाता है, लेकिन इसके जारी रहने पर इसकी वजह जानने के लिए वीर्य विश्लेषण या अन्य मूत्र-जननांग प्रणाली परीक्षण जरुरी हो सकते हैं।
वीर्य एलर्जी
बहुत ही कम मामलों में, लोगों को मानव वीर्य संबंधी प्लाज्मा अतिसंवेदनशीलता के नाम से ज्ञात वीर्य तरल की एलर्जिक प्रतिक्रिया का अनुभव करते पाया गया है। लक्षण या तो स्थानीय या सर्वांगी हो सकता है और योनि में खुजली, सूजन, लालिमा, या संपर्क के 30 मिनट के भीतर छाले भी हो सकते हैं। इनमे सामान्य खुजली, खराश और यहां तक कि सांस लेने में कठिनाई भी शामिल हो सकती है।
👉 इसे भी पढ़े वैराग्य शतकम् भर्तृहरिविरचितम् -1.1
संभोग के समय कंडोम लगाकर मानव वीर्य संबंधी प्लाज्मा संवेदनशीलता की जांच की जा सकती है। अगर कंडोम के उपयोग से लक्षण दूर होते हैं तो यह संभव है कि वीर्य की संवेदनशीलता मौजूद है। वीर्य तरल के बार-बार निष्कासन से वीर्य एलर्जी के हल्के मामले अक्सर ठीक हो जा सकते हैं। अधिक गंभीर मामलों में, चिकित्सक की सलाह लेना महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब कोई जोड़ा गर्भ धारण का प्रयास कर रहा हो, ऐसे मामले में, कृत्रिम वीर्यारोपण की सलाह दी जा सकती है।
मनोवैज्ञानिक पहलु
👉 यह भी पढें यजुर्वेद प्रथम मंत्र सृष्टि सूजन संहार
एक ताजा अध्ययन का कहना है कि वीर्य महिलाओं में अवसादरोधी के रूप में काम करता है, सो जो महिलाएं वीर्य के साथ शारीरिक संपर्क में आती हैं उनमें अवसाद आने की संभावना कम होती है। यह सोचा जाता है कि मनोदशा में विभिन्न बदलाव लाने वाले हारमोंस (टेस्टोस्टेरोन, ओएस्टरोजेन, फोलिकल-उत्तेजन हारमोन, ल्युटीनाइजिंग हारमोन, प्रोलैक्टिन और अनेक अलग प्रोस्टाग्लैंडिन्स) सहित वीर्य के जटिल रासायनिक संघटन के परिणामस्वरुप इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा करते हैं। 293 कॉलेज महिलाओं के एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि जो महिलाएं कंडोम का इस्तेमाल नहीं करती रहीं, ज्यादातर यौन संबंध की पहल करती रहीं और एक रिश्ता समाप्त हो जाने पर नए साथी की तलाश में करने लगीं, बताया गया कि वीर्य पर रासायनिक निर्भरता "रिबाउंड इफेक्ट्स" पैदा करती है। किसी पुरुष यौन साथी (वीर्य प्राप्तकर्ता) पर वीर्य का प्रभाव ज्ञात नहीं है।
सांस्कृतिक
पहलू
किगोंग
किगोंग और चीनी दवामें कहे जाने वाले ऊर्जा के एक रूप को विशेष महत्व दिया जाता है (पिनयिन: जिंग, एक रूपिम द्योतक "सार" या "आत्मा" भी) - जो विकसित और संचित होने का प्रयास करता है। "जिंग" यौन ऊर्जा है और माना जाता है कि जो स्खलन से नष्ट हो जाती है, इसीलिए इस कला के अभ्यास में लगे लोगों का मानना है कि हस्तमैथुन "ऊर्जा की आत्महत्या" है। किगोंग सिद्धांत के अनुसार, यौन उत्तेजना के दौरान अनेक मार्गों/बिंदुओं से हटकर ऊर्जा खुद को यौनांगों में स्थानांतरित कर लेती है। परिणामी चरम-आनंद और स्खलन से अंततः ऊर्जा शरीर से पूरी तरह निष्कासित हो जाती है। चीनी कहावत - (पिनयिन: यी डी जिंग, शि डी क्सुए, शाब्दिक: वीर्य की एक बूंद खून की दस बूंदों के बराबर होती है) से इसकी व्याख्या हो जाती है।
चीनी में वीर्य के लिए वैज्ञानिक शब्दावली है (पिनयिन: जिंग ये, शाब्दिक: सार का तरल/जिंग) और शुक्राणु की शब्दावली है (पिनयिन: जिंग जी, शाब्दिक: सार का बुनियादी तत्व/जिंग), शास्त्रीय संदर्भ के साथ दो आधुनिक शब्दावलियां.
ग्रीक दर्शन
प्राचीन ग्रीक में, अरस्तू ने वीर्य के महत्व के बारे में टिप्पणी की है: "अरस्तू के लिए, वीर्य पोषक पदार्थ, जो कि रक्त है, से निकला हुआ अवशेष होता है, जो अनुकूलतम तापमान में बहुत ही गाढ़ा हो जाता है। यह केवल पुरुष द्वारा ही उत्सर्जित किया जा सकता है, क्योंकि प्रकृति ने उन्हें ऐसा ही बनाया है, इसीलिए केवल पुरुष में अपेक्षित गर्मी होती है जो रक्त को गाढ़ा कर वीर्य बना देती है।" अरस्तू के अनुसार, भोजन और वीर्य के बीच सीधा संबंध होता है: "शुक्राणु आहार का उत्सर्जन है, या और भी खुल कर कहा जाए तो यह हमारे आहार का सर्वोत्कृष्ट घटक है।"
एक ओर भोजन और शारीरिक विकास के बीच संबंध और दूसरी ओर वीर्य, अरस्तू को बहुत कम उम्र में यौन गतिविधियों में लिप्त होने के खिलाफ चेतावनी देने के लिए बाध्य कर देता है।.. [क्योंकि] इसका प्रभाव उनके शारीरिक विकास पर पड़ता है। अन्यथा आहार शारीरिक विकास करने के बजाए वीर्य उत्पादन के काम में लग जाएगा .... अरस्तू कहते है कि इस उम्र में शरीर का विकास जारी रहता है; यौन गतिविधियां शुरू करने के लिए सर्वोत्तम समय वह होता है जब शरीर का विकास बहुत बड़े पैमाने पर होना नहीं होता है, शरीर की उच्चता कमोवेश पूरी हो जाती है, तब पोषण का रूपांतरण वीर्य में हो जाने पर शरीर के आवश्यक तत्व बर्बाद नहीं होते हैं।"
इसके अतिरिक्त, "अरस्तू हमें बताते हैं कि आंखों के आसपास का क्षेत्र सिर का क्षेत्र बीज ("सबसे अधिक बीज वाला" के लिए सबसे उपजाऊ होता है, यौन लिप्तता और व्यवहार का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव आमतौर पर आंखों में होता है जिसका तात्पर्य यह होता है कि बीज आंखों के तरल क्षेत्र से होकर आता है।" पैथागोरियन मान्यता द्वारा इसकी व्याख्या इस तरह की जा सकती है कि वीर्य मस्तिष्क का एक कतरा है।
ग्रीक स्टोइक दर्शन ने लोगोस स्पर्मैटिकोज को ("वीर्य संबंधी शब्द") जो कि निष्क्रिय उत्पादित द्रव्य है, सक्रिय कारण के सिद्धांत के रूप में देखा है। यहूदी दार्शनिक फिलो ने इसी तरह कारण के मर्दाना सिद्धांत के रूप में पतीकों (लोगोस) की यौन शब्दावली में स्त्रैण आत्मा में पुण्य के बीज बोने की बात कही।
क्रिश्चन प्लेटोवादी क्लीमेंट ऑफ़ एलेक्जेंड्रा ने लोगोस की उपमा शारीरिक रक्त से की, "आत्मा के सार तत्व" के रूप में, और कहा कि "प्राणी वीर्य मूलतः इसके रक्त का झाग है"। क्लीमेंट प्रारंभिक ईसाई विचार को प्रतिबिंबित करते हैं कि "बीज को व्यर्थ नहीं करना चाहिए, न ही बिना सोचे-समझे बिखेरना चाहिए, न ही इसे इस तरह रोपना चाहिए कि यह पनप ही न सके"।
पवित्र वीर्य
पूर्व-औद्योगिक कुछ समाज में, वीर्य और शरीर के अन्य तरल पदार्थों का बड़ा मान हुआ करता था, क्योंकि वे इसे जादुई समझा करते थे। रक्त ऐसे ही एक द्रव की मिसाल है, लेकिन व्यापक रूप से वीर्य का उदगम और प्रभाव अलौकिक माना जाता था और इसी कारण इसे पावन तथा पवित्र माना गया।
वर्तमान समय में और पुराने समय से बौद्धों और दाओवादी परंपराओं में वीर्य को बहुत मान दिया जाता रहा है, क्योंकि यह मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण घटक है।
एक समय में ओस को एक तरह की बारिश समझा जाता था, जिससे पृथ्वी निषेचित होती है और बाद के समय में यह वीर्य के लिए उपमा बन गयी। बाइबल के कुछ पद्यों में जैसे सॉन्ग ऑफ सोलोमन 5:2 और स्तुति 110:3 में अर्थ में "ओस" शब्द का उपयोग हुआ है, परवर्ती पद्य में, उदाहरण के लिए, घोषणा की गयी है कि लोगों को केवल राजा का अनुसरण करना चाहिए, जो युवा "ओस" से भरपूर वीर्यवान है।
प्राचीन काल में व्यापक रूप से यही माना गया कि रत्न दैवीय वीर्य की बूंदें हैं जो पृथ्वी के निषेचित होने के बाद जम जाती हैं। विशेष रूप से, एक प्राचीन चीनी मान्यता है कि जेड आकाशीय ड्रेगन का सूखा हुआ वीर्य था।
सिंहपर्णी रस से मानव वीर्य की समानता के आधार पर ऐतिहासिक रूप से यह माना जाता था कि इसके फूल जादुई रूप से शुक्राणु के प्रवाह में वृद्धि करते हैं। (यह धारणा संभवत: हस्ताक्षर के सिद्धांत से उत्पन्न हुआ है।)
आर्किड के जुड़वां गट्टे अंडकोष के सदृश समझे जाते थे और प्राचीन रोमन मान्यता है कि ज़िनाकार के मैथुन से वीर्य के छलक जाने से फूल खिलते हैं।
बारबरा जी. वाकर ने पवित्र वीर्य के इन मिसालों को शोधपत्र द वुमेन डिक्शनरी ऑफ सिंबल्स एण्ड सेक्रेट ऑब्जेक्ट में लिखा है कि ये मिथक और लोकोक्तियां यह दिखाती हैं कि पूर्व पितृसत्तात्मक समाज में शासन महिलाओं द्वारा होता था, जो बाद में मर्दाना संस्कृति का पूरक बन गया।
दुनिया भर के प्राचीन पौराणिक कथाओं में ज्यादातर वीर्य को किसी न किसी तरह से स्तन दुग्ध का पर्याय माना गया है। बाली की परंपराओं में, मां के दूध के वापस होने या जमा होने को पोषक उपमा से जोड़ कर देखा गया है। पत्नी पति को पिलाती है, जो उसे उसके वीर्य, जो मानवीय दयालुता का दूध, की तरह माना जाता था, के रूप में वापस देता है।
चिकित्सा दर्शन की कुछ प्रणालियों में, जैसे कि पारंपारिक रूसी चिकत्सा और हरवर्ट नोवेल के वाइटल फोर्स थ्योरी में वीर्य को (पुरुष प्रजनन प्रणाली के एक उत्पाद के बजाए) महिला और पुरुष के बीच जटिल दैहिक पारस्परिक क्रिया का उत्पाद माना गया है।
चारवृत्ति में वीर्य
कालीन पर वीर्य के साथ देखा गया वीर्य का दाग और पराबैंगनी प्रकाश के बिना जब ब्रिटिश सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस (एसएसबी) को पता चला कि वीर्य एक अच्छा अदृश्य स्याही है, सर जार्ज मैन्सफिल्ड स्मिथ कुमिंग ने अपने एजेंट को लिखा कि "हर आदमी का अपना स्टाइलो होता (है)."
वीर्य अंतर्ग्रहण
कामोद्दीपक संतुष्टि तथा शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ, मनुष् चरमसुख के दौरान शिश्न चूषण या लिंग चूषण के समय वीर्य निगल लेना सबसे आम तरीका है।
पोषक गुण
वीर्य मुख्यतः पानी है, लेकिन मानव शरीर द्वारा उपयोग किए जानेवाले लगभग सभी प्रकार के पोषक तत्व की मात्रा पायी जाती है। इसमें आमतौर पर न्यून मात्रा में पाये जानेवाले खनिज जैसे मैग्नीशियम, पोटाशियम और सेलेनियम कुछ हद तक उच्च मात्रा में पाये जाते हैं। एक आम स्खलन में 150 मिलीग्राम प्रोटीन, 11 मिलीग्राम कार्बोहाइड्रेट्स, 6 मिलीग्राम वसा, 3 मिलीग्राम कोलेस्ट्रोल, 7% US RDA पोटेशियम और 3% US RDA तांबा और जस्ता होता है। जब चयापचय होता है तब प्रोटीन 4 किलो कैलोरी/ग्रा., कार्बोहाइड्रेट भी 4 किलो कैलोरी/ग्रा. और वसा 9 किलो कैलोरी/ग्रा. प्राप्त होता है। इसलिए एक आम वीर्य स्खलन में खाद्य ऊर्जा 0.7 किलो कैलोरी (2.9 kJ) है।
सेहत के खतरे
एक सेहतमंद व्यक्ति के वीर्य अंतर्ग्रहण में कोई खतरा नहीं है। शिश्न चूषण में अतार्निहित के अलावा वीर्य निगलने में कोई अतिरिक्त खतरा नहीं है। शिश्न चूषण से एचआईवी या दाद, जैसे यौन संक्रमित रोग हो सकते हैं, खासकर उन्हें जिनके मसूड़ों से खून आता है, मसूड़ों में सूजन हो या खुले घाव हों।
किसी व्यक्ति के अंतर्ग्रहण से पहले भले ही वीर्य ठंडा हो, लेकिन एक बार शरीर से बाहर निकल आया तो वायरस लंबे समय तक सक्रिय रह सकते हैं।
शोध में कहा गया हैं कि ह्यूमन पेपिलोमावायरस (एचपीवी) से संक्रमित व्यक्ति से असुरक्षित मुख मैथुन करने पर मुंह या गले के कैंसर का खतरा हो सकता है। अध्ययन में पाया गया कि 36 प्रतिशत कैंसर के मरीज की तुलना में केवल 1 प्रतिशत स्वस्थ नियंत्रण समूह को एचपीवी था। माना जाता है कि ऐसा होने के पीछे कारण एचपीवी के संक्रमण है क्योंकि यह वायरस ज्यादातर गले के कैंसर के मामले में पाया गया है।
स्वाद और मात्रा
एक स्रोत ने उल्लेख किया है कि वीर्य के स्वाद की "कुछ महिलाओं ने प्रशंसा की है।" हालांकि आमतौर पर ऐसा कहा जाता है वीर्य का स्वाद आहार से उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होता है, ऐसा कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है जिसमें किसी खाद्य पदार्थ की बात कही गयी हो।
वीर्य स्खलन की मात्रा पृथक होती है। 30 अध्ययन की समीक्षा का निष्कर्ष निकला कि औसत मात्रा 3.4 मिलीलीटर (एमएल) के आसपास थी, कुछ अध्ययन में उच्चतम 4.99 मिलीलीटर या न्यूनतम 2.3 मिलीलीटर पायी गयी। स्वीडेन और डेनमार्क के पुरुषों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि वीर्य स्खलनों में लंबे अंतराल के कारण वीर्य में शुक्राणु की गिनती में वृद्धि हुई लेकिन इसकी मात्रा में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। युवा पुरुषों में बड़ी मात्रा में इसका निर्माण होता है।
सांस्कृतिक व्यवहार
कुछ संस्कृतियों में, मर्दानगी के गुणों का श्रेय वीर्य को दिया गया है। सैबिया और इटोरो समेत पापुआ न्यू गिनी की कई जनजातियों का विश्वास है कि उनकी जनजाति के युवा पुरुषों में वीर्य उनमें यौन परिपक्वता प्रदान करते है। आदिवासी वयस्कों में शुक्राणु मर्दाना स्वभाव का द्योतक है और अगली पीढ़ी के युवा पुरुषों को अपनी सत्ता और हकूमत सौंपे जाने के क्रम में उनके लिए अपने बड़ों का शिश्न चूस कर उनका वीर्य ग्रहण करना जरूरी है। यह रिवाज जवान होते पुरुषों और बुजुर्गों के बीच शुरू हो जाती है। इनके और अन्य आदिवासियों के बीच यह काम सांस्कृतिक रूप से सक्रिय समलैंगिकता का द्योतक है।
आध्यात्मिक विचार
चर्च फादर इपिफैनियस कहते है कि बोरबोराइट्स और अन्य व्याभिचारी रहस्यवादी संप्रदाय ईसा के शरीर के रूप में वीर्य का पान करते हैं। पिस्टिस सोफिया और टेस्टामॉनी ऑफ ट्रूथ कठोरतापूर्वक ऐसे रिवाजों की निंदा की।
आधुनिक सेंट प्रियापस चर्च में, दूसरों की उपस्थिति में वीर्य पान पूजा का एक रूप है। चूंकि इसमें जीवन देने की दैवीय क्षमता है, इसीलिए इसे पवित्र माना गया है। कुछ अध्यायों में एसस्लेसिया ग्नॉस्टिका कैथोलिका प्रथा में, ग्नॉस्टिक धार्मिक सभा के दौरान वीर्य पान एलेइस्टर क्रोवले के द्वारा प्रकृतिस्थ है।
यौन चलन
वीर्य के अंतरर्ग्रहण से संबंधित बहुत सारे यौन चलन हैं। एक या एक से अधिक साथी के साथ, स्नोबोलिंग की तरह, फ्लेचिंग और क्रीमपाई ईटिंग (योनि या गुदा से वीर्य चूसने और चाटने का कृत्य) किया जा सकता है, या अनेक हिस्सेदारों के साथ, जापान में आरंभ हुए, बुक्काके और गोक्कुन की तरह भी इस कृत्य को किया जा सकता है।
वीर्य की मात्रा में वृद्धि
बहुत सारे पुरुषों जिन्हें उत्थानशीलता में गड़बड़ी या नपुंसकता है, वे प्राकृतिक वीर्य की मात्रा के लिए गोलियों का उपयोग शुरू कर देते हैं। ये हर्बल गोलियां खाद्य व औषधि प्रशासन द्वारा अनुमोदित नहीं है और पौरुष संवर्धन की श्रेणी में आते हैं। वीर्य की मात्रा से संबंधित गोलियों की संरचना यौन संबंध बनाने के दौरान स्खलन या सीमेन की मात्रा में वृद्धि के लिए की जाती है।
इन हर्बल गोलियों को पहली बार वयस्कों के लिए मौज-मस्ती उद्योग में लाया गया और व्यस्क पोर्न स्टार रोन जेरेमी द्वारा प्रवक्ता के रूप इसका प्रचार किया गया।
इनमें से किसी के दावों को सत्यापित नहीं किया गया है और एफडीए ने न तो इसे अनुमोदित किया है और न ही स्खलन की मात्रा में वृद्धि के उद्देश्य के लिए किसी हार्बल की सिफारिश की है।
ब्रह्म कोई कल्पना नहीं, बल्कि परम सत्य है। वेद और उपनिषद् हमें सिखाते हैं कि ब्रह्म को बाहर नहीं, अपने भीतर खोजा जाता है। जब मनुष्य अपनी आत्मा को पहचान लेता है, तब उसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। यही ब्रह्मज्ञान है और यही मोक्ष का मार्ग है।
ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान
वेद, उपनिषद्, शंकराचार्य का वेदान्त दर्शन
श्वेतकेतु और
उद्दालक, उपनिषद की कहानी, छान्द्योग्यापनिषद,
GVB THE UNIVERSITY OF VEDA
यजुर्वेद
मंत्रा हिन्दी व्याख्या सहित, प्रथम अध्याय 1-10, GVB THE
UIVERSITY OF VEDA
उषस्ति
की कठिनाई, उपनिषद की कहानी, आपदकालेमर्यादानास्ति,
_4 -GVB the uiversity of veda
वैराग्यशतकम्,
योगी भर्तृहरिकृत, संस्कृत काव्य, हिन्दी
व्याख्या, भाग-1, gvb the university of Veda
G.V.B. THE
UNIVERSITY OF VEDA ON YOU TUBE
2 टिप्पणियाँ