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विद्या और अविद्या का सही अर्थ

 


यह श्लोक ईशावास्योपनिषद् (यजुर्वेद संहिता 40.14) का अत्यंत गूढ़ और संतुलित दर्शन प्रस्तुत करता है। नीचे मैं इसे शब्दार्थ → सरल व्याख्या → दार्शनिक भावार्थ → जीवन में उपयोग → निष्कर्ष के क्रम में स्पष्ट कर रहा हूँ, ताकि यह ब्लॉग लेख के रूप में भी सीधे उपयोग किया जा सके।


🔶 मूल मंत्र

ओ३म् विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥

(यजुर्वेद संहिता 40.14 / ईशावास्योपनिषद्)


🔹 शब्दार्थ (शब्द–शब्द अर्थ)

  • ओ३म् — परम ब्रह्म का प्रतीक
  • विद्याम् — विद्या (आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान)
  • अविद्याम् — अविद्या (कर्म, उपासना, व्यवहारिक ज्ञान)
  • यः — जो मनुष्य
  • तत् — उसे
  • वेद — जानता है
  • उभयम् सह — दोनों को साथ-साथ
  • अविद्यया — अविद्या के द्वारा
  • मृत्युम् — मृत्यु, बंधन, अज्ञान
  • तीर्त्वा — पार करके
  • विद्यया — विद्या के द्वारा
  • अमृतम् — मोक्ष, अमरत्व
  • अश्नुते — प्राप्त करता है

🔹 सरल हिंदी व्याख्या

इस मंत्र का सीधा और स्पष्ट अर्थ है—

जो मनुष्य विद्या (आत्मज्ञान) और अविद्या (कर्म, कर्तव्य और उपासना) —
इन दोनों को एक साथ जानता और अपनाता है,
वह अविद्या के द्वारा सांसारिक मृत्यु और बंधन को पार करता है
और विद्या के द्वारा अमरत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।


🔹 गूढ़ भावार्थ (दार्शनिक अर्थ)

यह मंत्र एकतरफा साधना का खंडन करता है।

❌ केवल कर्म (अविद्या) पर्याप्त नहीं

  • केवल कर्म करने से पुनर्जन्म बना रहता है
  • केवल उपासना से ही अंतिम मुक्ति नहीं मिलती

❌ केवल ज्ञान (विद्या) भी पर्याप्त नहीं

  • बिना कर्म शुद्धि के ज्ञान स्थिर नहीं होता
  • बिना कर्तव्य पालन के ज्ञान व्यवहार में नहीं उतरता

✅ समाधान — दोनों का संतुलन

कर्म + ज्ञान = मोक्ष


🧠 विद्या और अविद्या का सही अर्थ

🔸 अविद्या क्या है?

  • यज्ञ, सेवा, कर्तव्य
  • समाज, परिवार और जीवन के कर्म
  • उपासना, अनुशासन, नैतिकता

👉 यह मनुष्य को मृत्यु (बंधन, दुख) से पार कराती है
अर्थात जीवन को शुद्ध और समर्थ बनाती है।

🔸 विद्या क्या है?

  • आत्मा का ज्ञान
  • ब्रह्म का बोध
  • सत्य का साक्षात्कार

👉 यह मनुष्य को अमृत (मोक्ष) प्रदान करती है।


🌱 आधुनिक जीवन में इस मंत्र की प्रासंगिकता

आज दो प्रकार की अतियाँ दिखाई देती हैं—

  1. 🔹 केवल भौतिक कर्म में डूबे लोग
  2. 🔹 केवल ज्ञान की बातें करने वाले, व्यवहार से दूर लोग

यह मंत्र सिखाता है—

जीवन में कर्म से भागो मत
और ज्ञान को केवल पुस्तक तक सीमित मत रखो।

  • कर्म से जीवन को सुधारो
  • ज्ञान से जीवन को मुक्त करो

🔔 निष्कर्ष (जीवन-संदेश)

🔹 कर्म के बिना ज्ञान अधूरा है
🔹 ज्ञान के बिना कर्म अंधा है
🔹 दोनों साथ हों, तभी पूर्णता है

✨ **अविद्या से जीवन शुद्ध होता है

और विद्या से जीवन मुक्त होता है।**



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