नीचे मैं “ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला” को इस तरह दे रहा हूँ कि आप इसे ब्लॉग, पुस्तक या वीडियो सीरीज़—तीनों रूपों में उपयोग कर सकें।
(यजुर्वेद संहिता – अध्याय 40)
कुल मंत्र: 18
उद्देश्य: सामान्य पाठक को उपनिषद् का गूढ़ ज्ञान सरल, व्यावहारिक और जीवनोपयोगी रूप में समझाना।
👉 ईश्वर से आवृत यह संपूर्ण जगत
👉 कर्मयोग का उपनिषद् सिद्धांत
👉 आत्मा अचल होकर भी सबमें गतिमान
👉 केवल ज्ञान या केवल कर्म क्यों पर्याप्त नहीं
👉 सगुण और निर्गुण ब्रह्म
👉 मृत्यु के समय की चेतना
👉 जीवन, मृत्यु और मोक्ष का निष्कर्ष
उपनिषद् का अर्थ है—
गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया गया ज्ञान
यह ज्ञान:
👉 केवल 18 मंत्रों में पूरा वेदांत समाया हुआ है।
इस उपनिषद् का मूल संदेश है—
यह पूरा संसार ईश्वर से आवृत है।
जो कुछ भी है, वही ईश्वर है।
इसलिए—
👉 यह पलायन नहीं, संतुलन सिखाता है।
🔹 कर्म करो, पर आसक्ति मत रखो
🔹 ज्ञान पाओ, पर जीवन से अलग मत करो
🔹 ईश्वर को मंदिर में नहीं, संपूर्ण जीवन में देखो
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 2
(मंत्र 1 की सरल, गूढ़ और जीवनोपयोगी व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 1)
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥
इस मंत्र का अर्थ है—
इस चलायमान संसार में जो कुछ भी है,
वह सब ईश्वर से आवृत है।
इसलिए त्याग के भाव से उपभोग करो
और किसी के धन पर लोभ मत करो।
यह मंत्र जीवन जीने की सबसे संतुलित नीति सिखाता है।
जो आवश्यक है, उसे लो
जो अनावश्यक है, उसे छोड़ दो
ईश्वर केवल मंदिर में नहीं है
👉 जब सब ईश्वर का है, तो—
🌼 जो सबको ईश्वर का मानता है
वही वास्तव में मुक्त होता है
🌼 त्याग से जीवन हल्का होता है
लोभ से जीवन भारी
ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मंत्र कहता है—
जीवन में भोग करो,
लेकिन त्याग के साथ।
संसार में रहो,
पर संसार के दास मत बनो।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 3
(मंत्र 2 की स्पष्ट, व्यावहारिक और जीवनोपयोगी व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 2)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
इस मंत्र का अर्थ है—
मनुष्य को इस संसार में कर्म करते हुए ही
सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
क्योंकि इसी प्रकार कर्म करने से
मनुष्य कर्मबंधन में नहीं फँसता।
इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
यह मंत्र पलायनवाद का पूर्ण निषेध करता है।
कर्म करो
लेकिन आसक्ति छोड़कर
यही निष्काम कर्मयोग है।
कर्म कब बाँधता है?
कर्म कब मुक्त करता है?
🌼 कर्म से मत भागो
🌼 कर्म में मत फँसो
🌼 कर्म को साधना बनाओ
ईशावास्योपनिषद् का दूसरा मंत्र कहता है—
इस संसार में रहते हुए,
कर्तव्य करते हुए,
आसक्ति छोड़कर
मनुष्य मुक्त हो सकता है।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 4(मंत्र 3 और 4 की सरल, गूढ़ और जीवनोपयोगी व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् मंत्र 3–4)
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥
जो लोग आत्मा के सत्य को नहीं जानते,
जो केवल शरीर और भोग में फँसे रहते हैं—
वे मृत्यु के बाद भी
अज्ञान और अंधकार में ही जाते हैं।
👉 आत्मा को न जानना ही आत्महत्या है
(यह शारीरिक नहीं, आध्यात्मिक अर्थ में है)
अनेजदेकं मनसो जवीयो
नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्
तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥
आत्मा—
वह न भागती है
न आती–जाती है
फिर भी सबमें व्याप्त है।
क्योंकि—
क्योंकि—
👉 शरीर चलता है, आत्मा नहीं
👉 आत्मा से सब चलता है
यह मंत्र सिखाता है—
स्थिर होकर जीना सीखो
तभी सही गति मिलेगी।
🌼 शरीर गतिशील है
🌼 मन अस्थिर है
🌼 आत्मा नित्य स्थिर है
जिसने आत्मा को जान लिया—
ईशावास्योपनिषद् के ये मंत्र बताते हैं—
जो आत्मा को नहीं जानता
वह अंधकार में जीता है।
जो आत्मा को जान लेता है
वही सच्चा प्रकाश पाता है।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 5
(मंत्र 9, 10 और 11 की स्पष्ट, संतुलित और जीवनोपयोगी व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 9–11)
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥
जो लोग केवल अविद्या (कर्म, भौतिक ज्ञान) में ही लगे रहते हैं,
वे अंधकार में प्रवेश करते हैं।
और जो केवल विद्या (केवल बौद्धिक ज्ञान) में रम जाते हैं,
वे उससे भी अधिक अंधकार में चले जाते हैं।
अन्यदेवाहुर्विद्यया अन्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥
ज्ञानी लोग कहते हैं कि—
दोनों को ठीक से समझना आवश्यक है।
विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥
जो मनुष्य विद्या और अविद्या—दोनों को साथ-साथ जानता है,
वह अविद्या के द्वारा संसार और मृत्यु को पार करता है
और विद्या के द्वारा अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
यह उपनिषद् एकांगी मार्ग को अस्वीकार करता है।
👉 यह जीवन को शुद्ध करती है।
👉 यह मोक्ष देती है।
आज लोग या तो—
उपनिषद् सिखाता है—
जीवन में कर्म भी हो
और आत्मज्ञान भी।
🌼 कर्म जीवन को मजबूत बनाता है
🌼 ज्ञान जीवन को मुक्त करता है
🌼 दोनों साथ हों, तभी पूर्णता है
ईशावास्योपनिषद् का यह भाग कहता है—
अविद्या से संसार पार करो
और विद्या से स्वयं को जानो।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 6
(मंत्र 12, 13 और 14 की सरल, दार्शनिक और व्यवहारिक व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 12–14)
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः॥
जो लोग केवल असम्भूति (अव्यक्त, निर्गुण ब्रह्म) की ही उपासना करते हैं
और सृष्टि, कर्म व जगत को नकार देते हैं—
वे अंधकार में जाते हैं।
और जो केवल सम्भूति (व्यक्त, सगुण रूप) में ही रम जाते हैं,
वे उससे भी अधिक अंधकार में पड़ते हैं।
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥
ज्ञानी लोग बताते हैं कि—
दोनों को सही रूप में समझना आवश्यक है।
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते॥
जो मनुष्य सम्भूति और विनाश (असम्भूति)—
इन दोनों को साथ-साथ जानता है,
वह विनाश के द्वारा मृत्यु को पार करता है
और सम्भूति के द्वारा अमरत्व को प्राप्त करता है।
👉 यह भक्ति, प्रेम और श्रद्धा जगाती है।
👉 यह वैराग्य और ज्ञान देती है।
यह उपनिषद् कहता है—
साकार से मन शुद्ध होता है
निर्गुण से बंधन टूटता है।
जीवन में भक्ति भी हो
और विवेक भी।
🌼 सगुण भक्ति से हृदय पवित्र होता है
🌼 निर्गुण ज्ञान से अहंकार मिटता है
🌼 दोनों मिलकर मोक्ष का मार्ग बनाते हैं
ईशावास्योपनिषद् का यह भाग सिखाता है—
ईश्वर को रूप में भी जानो
और रूप से परे भी पहचानो।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 7
(मंत्र 15, 16 और 17 की सरल, भावपूर्ण और साधनात्मक व्याख्या)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 15–17)
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
हे पूषन् (सूर्यदेव)!
सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका हुआ है।
उस आवरण को हटाइए,
ताकि मैं सत्य को देख सकूँ।
मनुष्य ईश्वर को चाहता है,
लेकिन माया और अहंकार
सत्य को ढक देते हैं।
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥
हे सूर्य!
अपनी किरणों को समेटो।
तुम्हारा जो कल्याणकारी तेज है,
उसी रूप में मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।
जो वह पुरुष (ब्रह्म) है,
वही मैं हूँ।
यह अहं ब्रह्मास्मि का अनुभव है—
जीव और ब्रह्म की एकता।
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥
प्राण वायु में विलीन हो जाए,
शरीर भस्म हो जाए।
हे मन!
अपने किए कर्मों को स्मरण कर।
मृत्यु शरीर की है,
आत्मा की नहीं।
कर्म ही आत्मा की दिशा तय करते हैं।
आज मनुष्य:
उपनिषद् सिखाता है—
ऐसा जीवन जियो
कि मृत्यु भी साधना बन जाए।
🌼 शरीर नश्वर है
🌼 प्राण प्रवाहमान है
🌼 आत्मा अमर है
ईशावास्योपनिषद् का यह भाग कहता है—
मृत्यु से मत डरो।
सत्य को पहचानो।
तुम वही हो।
🙏 ईशावास्योपनिषद् की सरल श्रृंखला — भाग 8 (समापन भाग)
(मंत्र 18 की सरल व्याख्या और पूरे उपनिषद् का सार)
(ईशावास्योपनिषद् — मंत्र 18)
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥
हे अग्नि रूप ईश्वर!
आप जो सब मार्गों को जानते हैं,
हमें शुभ मार्ग पर ले चलिए।
हमारे भीतर के पाप, अज्ञान और विकारों को दूर कीजिए।
हम बार-बार आपको नमस्कार करते हैं।
यह मंत्र अहंकार का पूर्ण विसर्जन है।
👉 यही सच्ची भक्ति और ज्ञान की पराकाष्ठा है।
ईशावास्यमिदं सर्वम्
कुर्वन्नेवेह कर्माणि…
अनेजदेकं…
उभयं सह…
सम्भूतिं च विनाशं च…
वायुरनिलममृतम्…
योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि
अग्ने नय सुपथा…
🔹 संसार में रहो
🔹 कर्म करते रहो
🔹 ईश्वर को हर जगह देखो
🔹 और अंत में अहंकार छोड़ दो
ईशावास्योपनिषद् कहता है—
जो जीवन को ईश्वर का प्रसाद समझकर जीता है,
वह मृत्यु को भी शांति से स्वीकार करता है
और मोक्ष को प्राप्त करता है।
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