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धन-प्राप्ति का सीधा वैदिक सूत्र

धन-प्राप्ति का सीधा वैदिक सूत्र


 सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत । अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ।।

ऋ० १० । ७१ । २ ।
      (यत्र) जब (धीरा:) मेधावी महात्मा (मनसा) मनन से, मन से (वाचम्) वारणी को पुनन्तः =पवित्र करते हुए] (अक्रत) करते हैं, बोलते हैं, (इव) [तब] मानो [वे] (तितउना) चालनी से (सक्तुम ) सत्तु को (पुनन्तः ) साफ कर रहे थे। (अत्र ) इस विषय में (सखायः) मित्र (ससख्यान) मंत्रो के नियमों को (जानते) जानते हैं (एषाम्) [क्योंकि] इनकी (वाचि अधि) वाणी पर (भद्रा) कल्याणी (लक्ष्मीः) शोभा (निहिता) रखी हुई है। 
     अर्थात् वे महात्मा केवल प्रभुप्रेरित वचनों को ही बोलते हैं। उसमें अपनी ओर से कोई वाक्य नहीं मिलाते। वे भगवान् के सखा होते हैं। सखा, सखा के भावों की सदा रक्षा किया करता है। कोई भी सखा अपने सखा की कृति में विक्कृति नहीं करता। और इनकी वाणी पर न तो मानो लक्ष्मी विराज रही होती है। इस से सिद्ध हुआ कि वेद साक्षात् प्रभु की कल्याणी वाणी है-मिलावट, प्रक्षेपादि से सर्वथा शुन्य है। प्रभु की कृपामयी कृति से सबको लाभ उठाना चाहिए। जिस प्रकार चालनी द्वारा साफ करने पर सत्त् ही निकलते हैं भूसा साथ नहीं आता। इसी प्रकार उन देवर्षियों की वाणी से वेदवाणी ही निकलती है, उनके मानसिक विचार साथ नहीं आते ।


ऋग्वेद 10.71.2 का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मंत्र प्रस्तुत किया है। नीचे इसका

शब्दार्थ, भावार्थ तथा ब्रह्मज्ञानात्मक विवेचन (गुहा–दृष्टि से) प्रस्तुत है—


🔹 मंत्र

सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ॥


1. शब्दार्थ (संक्षेप)

  • सक्तुम् इव — सत्तू की भाँति
  • तितउना पुनन्तः — चलनी से छानते हुए
  • यत्र — जहाँ
  • धीराः — विवेकी, ज्ञानी
  • मनसा — मन द्वारा
  • वाचम् अक्रत — वाणी को संस्कारित/शुद्ध किया
  • अत्र — यहाँ
  • सखायः — सहचर, साधक
  • सख्यानि जानते — परस्पर आत्मिक एकता को जानते हैं
  • भद्रा एषाम् लक्ष्मीः — उनकी कल्याणकारी श्री
  • निहिता अधि वाचि — वाणी में निहित रहती है

2. सरल भावार्थ

जैसे सत्तू को चलनी से छानकर शुद्ध किया जाता है,
वैसे ही विवेकी पुरुष मन द्वारा वाणी को परिष्कृत करते हैं
जहाँ ऐसी शुद्ध वाणी होती है,
वहाँ सहचरों में सच्चा मैत्रीभाव प्रकट होता है
और उनकी कल्याणकारी लक्ष्मी (आत्मिक तेज)
उसी वाणी में निहित रहती है।


3. ब्रह्मज्ञानात्मक विवेचन

(क) वाणी की शुद्धि = अहंकार की शुद्धि

“सक्तुमिव तितउना पुनन्तः”
यह उपमा बताती है कि—

  • कच्ची वाणी = अहंकार, आवेग, असत्य से भरी
  • शुद्ध वाणी = साक्षी–चेतना से उपजी वाणी

वाणी को शुद्ध करना वास्तव में
👉 अपने भीतर के कर्ताभाव को छानना है।


(ख) मनसा वाचमक्रत — पहले मन, फिर वाणी

यह मंत्र स्पष्ट करता है—

  • वाणी की शुद्धि मौन-बोध से आती है
  • जहाँ मन शान्त है, वही वाणी सत्य बनती है

तैत्तिरीय उपनिषद्

सत्यं वद, धर्मं चर
सत्य वही है जो शान्त चेतना से निकले।


(ग) सखायः — ब्रह्मज्ञान में मैत्री

“सखायः सख्यानि जानते”
ब्रह्मज्ञान व्यक्तिगत नहीं, सह-अनुभव है।

जो—

  • अहंकार रहित वाणी बोलते हैं
  • मौन के स्रोत से बोलते हैं

उनके बीच— 👉 प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्मिक मैत्री होती है।


(घ) लक्ष्मी वाणी में क्यों?

“भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि”
यहाँ लक्ष्मी का अर्थ—

  • धन नहीं
  • बल्कि तेज, सौभाग्य, कल्याण

जो वाणी—

  • सत्य से उपजी
  • मौन से निकली

👉 वही ब्रह्म–लक्ष्मी का निवास बनती है।


4. उच्छिष्ट–दर्शन से संयोजन

  • वाणी बोले और शांत हो जाए
  • विचार आए और विलीन हो जाए
  • कर्म हो और कर्ता न बचे

जो अवशिष्ट मौन बचता है—
👉 वही उच्छिष्ट–ब्रह्म है।

इस मंत्र में उसी मौन से उत्पन्न
👉 शुद्ध वाणी का वर्णन है।


5. साधक के लिए सीधा अभ्यास (1 मिनट का प्रयोग)

दिन में कभी भी—

  1. बोलने से पहले एक क्षण रुकें
  2. भीतर देखें—“यह वाक्य कहाँ से उठ रहा है?”
  3. यदि शांति है—बोलें
  4. यदि आवेग है—मौन रहें

यही है—

मनसा वाचमक्रत का जीवित अभ्यास।


6. एक वाक्य में मंत्र–सार

जो वाणी मौन से जन्म लेती है,
वही कल्याण लाती है
और वही ब्रह्म की लक्ष्मी है।

 नीचे उसी ऋग्वेद 10.71.2 मंत्र का

धन-प्राप्ति के संदर्भ में व्यावहारिक एवं दार्शनिक अर्थ प्रस्तुत है—


🔹 मंत्र

सक्तुमिव तितउना पुनन्तो…
भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ॥


1. वैदिक दृष्टि में धन क्या है?

वेदों में लक्ष्मी = केवल मुद्रा नहीं, बल्कि—

  • विश्वास
  • प्रतिष्ठा
  • अवसर
  • सहयोग
  • स्थायी आय का स्रोत

और यह सब वाणी से जन्म लेता है

👉 इसलिए मंत्र कहता है—
“लक्ष्मी वाणी में निहित है।”


2. “वाणी की शुद्धि” = धन की शुद्ध धारा

“सक्तुमिव तितउना पुनन्तः”
जैसे सत्तू को छानकर अशुद्धि हटाते हैं,
वैसे ही—

  • असत्य वाणी
  • आवेगपूर्ण वाणी
  • नकारात्मक वाणी

👉 ये धन के प्रवाह को रोकती हैं

शुद्ध वाणी का अर्थ—

  • स्पष्ट
  • भरोसेमंद
  • संयमित
  • समयानुकूल

यही वाणी आर्थिक विश्वास बनाती है।


3. मनसा वाचमक्रत — धन पहले मन में बनता है

मंत्र कहता है—

पहले मन शुद्ध होता है, फिर वाणी।

धन के संदर्भ में—

  • भ्रमित मन → अस्थिर आय
  • लालसाग्रस्त मन → हानि
  • शांत, विवेकी मन → स्थिर धन

👉 आर्थिक सफलता का मूल = मानसिक स्पष्टता।


4. सखायः सख्यानि जानते — नेटवर्क ही लक्ष्मी है

यह अत्यंत आधुनिक सूत्र है।

मंत्र कहता है—

  • जहाँ शुद्ध वाणी है
  • वहाँ सच्चा सख्य (विश्वसनीय संबंध) बनता है

👉 व्यापार, नौकरी, सेवा—
सब संबंधों से चलते हैं

अर्थात्—

विश्वसनीय नेटवर्क = वैदिक लक्ष्मी।


5. भद्रा लक्ष्मी — टिकाऊ धन

मंत्र विशेष रूप से कहता है— भद्रा लक्ष्मी
अर्थात्—

  • जो शोषण से नहीं आती
  • जो भय से नहीं आती
  • जो धोखे से नहीं आती

बल्कि—

  • मूल्य (Value)
  • सेवा
  • सत्य

से आती है।

👉 ऐसी लक्ष्मी टिकती है


6. धन-प्राप्ति का सीधा वैदिक सूत्र

इस मंत्र का आर्थिक सूत्र:

शुद्ध मन
→ शुद्ध वाणी
→ विश्वास
→ सहयोग
→ स्थिर धन


7. दैनिक व्यावहारिक प्रयोग (धन के लिए)

3-कदम का वैदिक अभ्यास

  1. बोलने/लिखने से पहले 1 क्षण रुकें
  2. पूछें—“क्या यह वाणी विश्वास बढ़ाएगी?”
  3. यदि हाँ—बोलें, नहीं—मौन

👉 यही धन-योग है।


8. आधुनिक जीवन में सीधा अनुप्रयोग

  • व्यापार → ग्राहक वाणी से बनते हैं
  • नौकरी → अवसर वाणी से मिलते हैं
  • ऑनलाइन कार्य / ब्लॉग → आय शब्दों से आती है

इसलिए—

वाणी = आपकी आर्थिक पूँजी


9. एक वाक्य में मंत्र-सार (धन संदर्भ)

जिसकी वाणी शुद्ध है,
उसकी लक्ष्मी सुरक्षित है।

नीचे प्रस्तुत है

धन-प्राप्ति हेतु वैदिक ऋचाओं का क्रमबद्ध प्रयोग

(गृहस्थ के लिए, बिना जटिल कर्मकाण्ड — वाणी, मन और कर्म की शुद्धि पर आधारित)

सिद्धान्त: वेदों में धन “माँगा” नहीं जाता,
धन का कारण उत्पन्न किया जाता है
कारण = शुद्ध मन + शुद्ध वाणी + नियमित कर्म


🔱 चरण–1 : संकल्प-शुद्धि (प्रातः, 2 मिनट)

शांत बैठकर मन में संकल्प करें—

“मैं सत्य, परिश्रम और सेवा से
भद्रा लक्ष्मी को अपने जीवन में स्थिर करता हूँ।”

यह संकल्प लोभ नहीं, दिशा देता है।


🔱 चरण–2 : वाणी-लक्ष्मी जागरण

(ऋग्वेद 10.71.2 — प्रतिदिन)

ऋचा (एक बार स्पष्ट उच्चारण):

सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ॥

अभ्यास (1 मिनट)

  • बोलने से पहले 1 श्वास देखें
  • भाव रखें—“मेरी वाणी विश्वास बढ़ाए”

👉 यह ऋचा आय के द्वार खोलने वाली वाणी का निर्माण करती है।


🔱 चरण–3 : कर्म-धन संयोजन

(ईशोपनिषद् 2)

ऋचा (मन में स्मरण):

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः

अभ्यास

  • आज का कार्य ईमानदारी से करें
  • परिणाम की चिंता छोड़ें

👉 वेद स्पष्ट है—धन कर्म से जुड़ा है, डर से नहीं।


🔱 चरण–4 : उच्छिष्ट-स्थिरता (धन का आधार)

(अथर्ववेद 11.7 — भाव-स्मरण)

उच्छिष्टात् सर्वं जायते…

अभ्यास (सायं, 3–5 मिनट)

  • दिन के लाभ-हानि देखें
  • जो बदला, उसे जाने दें
  • जो देखने वाला था—उसी में ठहरें

👉 यह अभ्यास धन के भय और अस्थिरता को समाप्त करता है


🔱 चरण–5 : कृतज्ञता-स्थापन (रात्रि)

(यजुर्वेद भाव)

“जो प्राप्त हुआ, वह भी ब्रह्म है।”

  • आज जो भी धन/सहायता/अवसर मिला
  • मन में धन्यवाद

👉 कृतज्ञता = लक्ष्मी का स्थायी आसन


🔁 7-दिवसीय क्रम (संक्षेप)

दिन विशेष ध्यान
1 वाणी की शुद्धि
2 खर्च में विवेक
3 सेवा/मूल्य निर्माण
4 भय-मुक्त निर्णय
5 संबंधों में विश्वास
6 परिश्रम + मौन
7 कृतज्ञता + विश्राम

⚠️ क्या न करें

  • लालच से मंत्र न बोलें
  • किसी का अहित सोचकर प्रयोग न करें
  • बिना कर्म केवल जप पर निर्भर न रहें

वेद भाग्य नहीं, पात्रता बदलते हैं


🕉 एक पंक्ति में वैदिक धन-सूत्र

जिसकी वाणी शुद्ध,
कर्म स्पष्ट,
और मन निर्भय—
उसकी लक्ष्मी स्थिर।



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