ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ।
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः ॥
ऋ० ११ ७। २४ ॥
(पुराणम्’) पुराणस्वरूप, पुराना होने पर भी सदा नया (यजुषा+सह)= यजुर्वेद के साथ (ऋचः) ऋग्वेद (सामानि) सामवेद (छन्दांसि) अथर्वंवेद (सर्वं) सब (उच्छिष्टात् उच्छिष्ट) सर्वोत्कृष्ट परमात्मा से (जज्ञिरे) उत्पन्न होते हैं । (दिविश्रितः ) ज्ञान के आश्रय वाले (देव) दिव्यगुणयुक्त वेद वा इन्द्रिय-ज्ञान (दिवि) दिव्यगुएणयुक्त जीव अ्थवा मन में प्राप्त होती हैं ]
कई लोगों का मत है कि यहाँ 'पुराणम्' पद से ब्रह्मवक्त्तांदि अष्टादश पुराण अभिप्रेत हैं किन्तु यह अशुद्ध है । यदि पुराणम्' पद का अर्थ अठारह पुराण होता, तो यह पद या तो मन्त्र के आरम्भ में आता या 'यजुषा सह से पूर्व न आकर पश्चात् आता। और 'ऋचः आदि को भति बहुवचन 'पुराणानि' पद का प्रयोग होता। ऐसा न करके भगवान् ने 'पुराणम्' और वह भी वेदों के नामों के बीच में प्रयोग किया है, इससे सिद्ध होता है कि यहाँ पुराणम्' पद अष्टादश- पुराणों को वाचक न होकर किसी और अभिप्राय को प्रकट करता है। वेदों के नामों के मध्य में प्रयुक्त होने से 'देहलीज-दीप-न्याय' से यह सब का विशेषण हो जाता है। 'पुराण' शब्द का अर्थ है, पुराण होता हुआ भी नया बना रहने वाला । वेद सदा से है, अतः पुराना है। प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों के हितार्थ भगवान् इसका उपदेश करते हैं अतः नया है। वेद का उपदेश किसी विशेष काल के लिए न होकर सब कालों के लिए उपयोगी होने के कारण सदा नया भासता है । अतः पुराण शब्द का पूरा-पूरा अर्थ वेदों पर ही घटता है। पुराण शब्द का एक अर्थ किया जाता है- जो सृष्ट की उत्पत्ति से पूर्व की अवस्था का वर्णन करे। यह अर्थ भी पूर्णतया वेद में ही चरितार्थ होता है । वेद के 'नासदीय' आदि सूक्त सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व दशा का ठीक-ठीक सुन्दर वैज्ञानिक वर्णन करते हैं । इससे सिद्ध हुआा कि पुराण शब्द 'ऋ्चः' आदि का विशेषण है। एक आक्षेप यह किया जाता है कि 'पुराणम्' शब्द नपुंसकलिंग है, 'ऋचः' आदि विशेष्य पद स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग है । इसके उत्तर में निवेदन है कि व्याकरण के नियमानुसार सबका विशेषण होने से 'पुराणम्' नपुंसकलिग ही बनता है ।
इस मन्त्र में परमात्मा को 'उच्छिष्ट नाम से स्मरण किया गया है। इस नाम का विशेष रहस्य है। साधारण संस्कृत में उच्छिष्ट का अर्थ 'जूठा= भुक्त शिष्ट = खाने से बचा हुआ होता है किन्तु वेद में शब्द यौगिक होते हैं, अत: यह शब्द परमात्मा का वाचक बन जाता है। उच्छिष्ट =उत्-शिष्ट, अर्थात् जो ऊपर से बचा रहे । जिज्ञासु, तत्वज्ञानी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु से परमात्मा के सम्बन्ध में जिज्ञासा करता है। गुरु शिष्य को समझाने के लिए एक-एक पदार्थ का नाम लेकर कहते हैं- 'यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं। इस प्रकार सारे दृश्यादृश्य पदाथों को ब्रह्मभिन्न बतलाते हैं । शिष्य फिर पूछता है-'महाराज ! फिर ब्रह्म है क्या वस्तु ? इन सूर्य चन्द्रादि को गति कौन देता है ? इनकी स्थिति किसके आधार से है ?' गुरु कहते हैं- 'यही तो सबके बाद बच रहा है । यहो उच्छिष्ट ब्रह्म है। उसी उच्छिष्ट की महत्ता अथर्ववेद ११1७ में वर्णन की गई है ।
वेदान्त की परिभाषा में नेति- नेति' द्वारा जिसका उपदेश दिया गया है, वेद में उसे 'उच्छिष्ट' कहा गया है। 'नेति-नेति' की अपेक्षा उच्छिष्ट पद में विशेषता है। नेति-नेति’ से केवल निषेधात्मक बोध होता है, किन्तू 'उच्छिष्ट' पद विधिपरक ज्ञान देता है । सबमें समाकर सबके अन्दर-बाहर व्यापक होकर, सबसे पृथक् जो बचा है, वही उच्छिष्ट है। भगवान् सारी सृष्टि में व्यापक है। सृष्टि तो उसके, मानो एक अंश में स्थित है, अतः वह 'उच्छिष्ट है । उच्छिष्ट शब्द का एक और अर्थ भी है- उत्= उत्तम, शिष्ट =उपदेष्टा अर्थात् परमात्मा । अर्थात् परमात्मा सबसे बड़ा उपदेशक है । दूसरे शाब्दों में परमात्मा वेदज्ञान का दाता है । मन्त्र में वेदों की उत्पत्ति परमात्मा से बतला कर इस ध्वनित अर्थ को स्पष्ट शब्दों में -'अभिधावृत्ति' से-भी कह दिया है । उच्छिष्ट शब्द का एक अर्थ हैं- उत्तम शासक या उन्नति के लिए शासन करने वाला। अर्थात् परमात्मा शासन तो करता है किन्तु जीवों की उन्नति सिद्ध करने के लिए ।
वृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत्प्रैरत नामधेयं दधाना: ।
यदेषां श्रेष्ठ यदरिप्रमासीत्प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि: ॥
ऋ० १० । ७१ ।१ ।
(वृहस्पते) हे वेदाधिपते महेश ! (प्रथमम् ) पहले सृष्टि के आारम्भ में (नामधेयम् ) नाम (दधानाः ) रखते हुए [महर्षि (यत्) जों [वचन (प्रैरत) प्रेरते हैं, उच्चारण करते हैं (वाचः:) [वह] वाणी का (अग्रम्) मुख्य, प्रधान, श्रेष्ट है। (यत्) जो (एषाम् ) इनमें से (श्रेष्ठ्म) श्रेष्ट होता है| (यत्) और [जो] (अरिप्रम्) निर्दोष, पाप-शून्य (आसीत् ) होता है (तत्) वह, (एषाम्) इनके (गुहा ) हृदय गुहा में (निहितम्) रखा हुआ। (प्रेणा) [इनके] प्रेम से (आविः) प्रकट होती है।
जब सर्गारम्भ में मनुष्य उत्पन्न हुए, और उन्होंने चारों ओर परिदृश्यमान पदार्थों के नामकरण की इच्छा की तब परमगुरु सर्व-विद्यानिधान भगवान् ने उनमें वाणी की प्रेरणा की। वही वाणी का प्रथम प्रकाश है। वह वाणी किनको मिली ? वेद कहता है, जो सर्गारम्भ के मनुष्यों में से श्रेष्ठ एवं निर्दोष होने के साथ प्रभु की कल्याणी वाणी के प्रचार के लिए भी उत्कट भावना रखते थे। सर्व- व्यापक अन्तर्यामी प्रभु ने उनके हृद्य में प्रेरणा की ।
'यदेषां श्रेष्ठ यदरिप्रमासीत’ का एक अर्थ यह भी है कि जो ज्ञान श्रेष्ठ= सबसे उत्तम और अरिप्र =निर्दोष =भ्रम विप्रलिप्सा आदि दोषों से शुन्य था, वह इनको दिया गया। तात्पर्य यह कि सृष्टि के अरम्भ में मनुष्य को वाणी के साथ ज्ञान भी दिया गया, अर्थात् शब्दार्थसम्बन्धयुक्त ज्ञान दिया गया।
प्रश्न होता है जिनको सृष्टि के आरम्भ में ज्ञान दिया जाता है, कदाचित् वे उसमें अपने भाव मिला देते हों ! इसका समाधान निम्नलिखित मन्त्र में किया गया है-
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत । अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ।।
ऋ० १० । ७१ । २ ।
(यत्र) जब (धीरा:) मेधावी महात्मा (मनसा) मनन से, मन से (वाचम्) वारणी को (पुनन्तो) =पवित्र करते हुए] (अक्रत) करते हैं, बोलते हैं, (इव) [तब] मानो [वे] (तितउना) चालनी से (सक्तुम ) सत्तु को (पुनन्तः) साफ कर रहे थे। (अत्र) इस विषय में (सखायः) मित्र (ससख्यान) मंत्रो के नियमों को (जानते) जानते हैं (एषाम्) [क्योंकि] इनकी (वाचि अधि) वाणी पर (भद्रा) कल्याणी (लक्ष्मीः) शोभा (निहिता) रखी हुई है।
अर्थात् वे महात्मा केवल प्रभुप्रेरित वचनों को ही बोलते हैं। उसमें अपनी ओर से कोई वाक्य नहीं मिलाते। वे भगवान् के सखा होते हैं। सखा, सखा के भावों की सदा रक्षा किया करता है। कोई भी सखा अपने सखा की कृति में विक्कृति नहीं करता। और इनकी वाणी पर न तो मानो लक्ष्मी विराज रही होती है। इस से सिद्ध हुआ कि वेद साक्षात् प्रभु की कल्याणी वाणी है-मिलावट, प्रक्षेपादि से सर्वथा शुन्य है। प्रभु की कृपामयी कृति से सबको लाभ उठाना चाहिए। जिस प्रकार चालनी द्वारा साफ करने पर सत्त् ही निकलते हैं भूसा साथ नहीं आता। इसी प्रकार उन देवर्षियों की वाणी से वेदवाणी ही निकलती है, उनके मानसिक विचार साथ नहीं आते ।
ऋग्वेद 11.7.24 का अत्यन्त गूढ़ मंत्र प्रस्तुत किया है। नीचे इसका
ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ।
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः ॥
यह मंत्र एक रहस्यात्मक शब्द पर टिका है—उच्छिष्ट।
अथर्ववेद (11.7 – उच्छिष्ट सूक्त) में यही ब्रह्म का सर्वोच्च नाम है।
👉 उच्छिष्ट = परब्रह्म (Absolute Residue)
“ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह”
यहाँ स्पष्ट घोषणा है कि—
👉 ये सभी मानव-रचित नहीं,
👉 बल्कि ब्रह्म के उच्छिष्ट से उत्पन्न हैं।
मुण्डकोपनिषद् (1.1.5) कहता है—
तस्मादृचः साम यजूंषि…
उसी ब्रह्म से ऋक्, साम, यजुः उत्पन्न हुए।
“दिवि देवा दिविश्रितः”
यहाँ देव का अर्थ—
बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9) में याज्ञवल्क्य कहते हैं—
देवता वास्तव में इन्द्रियाँ और प्राण हैं।
👉 अर्थात्—
दिवि का अर्थ केवल आकाश नहीं।
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है—
आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता (8.14.1)
👉 आकाश = चेतना का क्षेत्र
👉 जहाँ नाम-रूप प्रकट होते हैं
देवता उसी चेतन-आकाश में स्थित हैं।
यह मंत्र अद्वैत को अत्यन्त स्पष्ट करता है—
ईशोपनिषद् (पूर्णमन्त्र)—
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
👉 वही “अवशिष्ट” = उच्छिष्ट।
इस मंत्र का साधनात्मक अर्थ—
जब—
👉 तब जो शेष रहता है
👉 वही उच्छिष्ट-ब्रह्म है।
वेद, पुराण, देवता, लोक—
सब ब्रह्म से उत्पन्न हैं,
और अंततः उसी उच्छिष्ट में लीन हो जाते हैं।
आपने ऋग्वेद 11.7.24 का अत्यन्त गूढ़ मंत्र प्रस्तुत किया है। नीचे इसका
ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ।
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः ॥
यह मंत्र एक रहस्यात्मक शब्द पर टिका है—उच्छिष्ट।
अथर्ववेद (11.7 – उच्छिष्ट सूक्त) में यही ब्रह्म का सर्वोच्च नाम है।
👉 उच्छिष्ट = परब्रह्म (Absolute Residue)
“ऋचः सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह”
यहाँ स्पष्ट घोषणा है कि—
👉 ये सभी मानव-रचित नहीं,
👉 बल्कि ब्रह्म के उच्छिष्ट से उत्पन्न हैं।
मुण्डकोपनिषद् (1.1.5) कहता है—
तस्मादृचः साम यजूंषि…
उसी ब्रह्म से ऋक्, साम, यजुः उत्पन्न हुए।
“दिवि देवा दिविश्रितः”
यहाँ देव का अर्थ—
बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9) में याज्ञवल्क्य कहते हैं—
देवता वास्तव में इन्द्रियाँ और प्राण हैं।
👉 अर्थात्—
दिवि का अर्थ केवल आकाश नहीं।
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है—
आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता (8.14.1)
👉 आकाश = चेतना का क्षेत्र
👉 जहाँ नाम-रूप प्रकट होते हैं
देवता उसी चेतन-आकाश में स्थित हैं।
यह मंत्र अद्वैत को अत्यन्त स्पष्ट करता है—
ईशोपनिषद् (पूर्णमन्त्र)—
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
👉 वही “अवशिष्ट” = उच्छिष्ट।
इस मंत्र का साधनात्मक अर्थ—
जब—
👉 तब जो शेष रहता है
👉 वही उच्छिष्ट-ब्रह्म है।
वेद, पुराण, देवता, लोक—
सब ब्रह्म से उत्पन्न हैं,
और अंततः उसी उच्छिष्ट में लीन हो जाते हैं।
प्रस्तुत है
(अद्वैत–उपनिषद् परम्परा के आलोक में)
अथर्ववेद का 11वाँ काण्ड, 7वाँ सूक्त वेदों में अत्यन्त विलक्षण है।
यहाँ ब्रह्म को किसी देवता, रूप, कर्म या नाम से नहीं, बल्कि
👉 “उच्छिष्ट” कहा गया है।
यह सूक्त यह उद्घोष करता है कि—
सृष्टि के उपरान्त जो शेष रहता है,
वही परम सत्य है।
👉 यही परब्रह्म है।
ईशोपनिषद् का पूर्णमन्त्र इसी सत्य को दूसरे शब्दों में कहता है—
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
जो अवशिष्यते—वही उच्छिष्ट।
उच्छिष्ट–सूक्त में ब्रह्म—
केन उपनिषद् की वाणी—
नेदं यदिदमुपासते
जिसे लोग उपास्य मानते हैं, वह यह नहीं है।
👉 उच्छिष्ट उपास्य नहीं, स्वयंसिद्ध है।
सूक्त का केन्द्रीय निष्कर्ष—
सब उच्छिष्ट से उत्पन्न हैं।
मुण्डकोपनिषद् (1.1.7) कहता है—
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च
जैसे मकड़ी अपने ही भीतर से जाल रचती है।
👉 उच्छिष्ट उपादान कारण है।
उच्छिष्ट–सूक्त में देवता—
बृहदारण्यक उपनिषद् (3.9) स्पष्ट करता है—
देवता वास्तव में चेतना की शक्तियाँ हैं।
👉 देवता स्वतंत्र सत्ता नहीं,
👉 उच्छिष्ट-ब्रह्म के कार्यात्मक नाम हैं।
सूक्त कहता है—
कठोपनिषद्—
महतः परं अव्यक्तम्
महान से भी परे अव्यक्त है।
👉 उच्छिष्ट = अकाल चेतना
👉 मृत्यु भी उसी में विलीन होती है।
अथर्ववेद का यह सूक्त मूलतः—
क्योंकि—
जो उच्छिष्ट को जानता है—
वह मृत्यु को जान लेता है,
और उससे पर हो जाता है।
उपनिषद् उद्घोष—
न जायते म्रियते वा कदाचित् (कठ 2.18)
सूक्त का गूढ़ संकेत—
तब जो बचता है—
👉 अहंकार-रहित शुद्ध साक्षी
👉 वही उच्छिष्ट।
उच्छिष्ट–सूक्त कोई दर्शन नहीं, अनुभव की दिशा है।
जब सब क्रियाएँ थम जाती हैं—
जो मौन शेष रहता है
वही उच्छिष्ट।
अद्वैत वेदान्त का अंतिम सत्य—
यही कारण है कि—
शंकराचार्य भी उच्छिष्ट-सूक्त को
परब्रह्म-सिद्धि का वैदिक प्रमाण मानते हैं।
जो सब कुछ होकर भी
सब कुछ के बाद शेष रहता है—
वही उच्छिष्ट, वही ब्रह्म,
वही तुम हो।
नीचे प्रस्तुत है
यह केवल दर्शन नहीं, अनुभव–मार्ग है।
मृत्यु से भय शरीर के नाश से नहीं,
बल्कि स्वयं को शरीर मानने से उत्पन्न होता है।
कठोपनिषद् कहता है—
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवति ॥ (2.3.14)
जब हृदय में स्थित आसक्तियाँ छूट जाती हैं,
तभी मनुष्य अमरता को प्राप्त होता है।
👉 भय = अहंकार का लक्षण।
उच्छिष्ट–सूक्त का केंद्रीय वाक्य—
सब कुछ उत्पन्न होता है,
सब कुछ लीन हो जाता है,
पर उच्छिष्ट न उत्पन्न होता है,
न लीन होता है।
मृत्यु परिवर्तन है।
उच्छिष्ट अपरिवर्तनशील है।
👉 जो अपरिवर्तनशील को जान लेता है,
👉 वह मृत्यु से पर हो जाता है।
प्रश्न उठता है—
भय कहाँ होता है?
बृहदारण्यक उपनिषद्—
द्वितीयाद्वै भयम् भवति (1.4.2)
जहाँ द्वैत है, वहीं भय है।
उच्छिष्ट में द्वैत नहीं।
जब साधक स्वयं को द्रष्टा में स्थित कर देता है,
मृत्यु केवल एक घटना रह जाती है—भय नहीं।
(प्रतिदिन 20–25 मिनट)
शांत बैठें।
मन ही मन कहें—
“शरीर दिख रहा है—मैं शरीर नहीं हूँ।”
श्वास-प्रश्वास को देखें, नियंत्रित न करें।
जो भी विचार आए—
केवल देखें—
“यह विचार आया और गया—मैं देखने वाला हूँ।”
यह अहंकार की आहुति है।
अब शांत भाव से यह देखें—
फिर प्रश्न उठाएँ—
“जो इन सबका साक्षी है—क्या वह नश्वर है?”
यहीं मृत्यु–भय ढहता है।
अब कोई वाक्य न दोहराएँ।
कोई कल्पना न करें।
जो मौन–चेतना शेष रहती है—
वही उच्छिष्ट है।
उसी में ठहरें।
दिनभर जब भी—
तुरंत स्मरण करें—
“यह अनुभव देखा जा रहा है—मैं द्रष्टा हूँ।”
यह स्मरण ही मृत्युभय-विजय मंत्र है।
तीनों का संगम = अमरता का प्रत्यक्ष अनुभव।
साधना के परिपक्व होने पर—
मृत्यु शरीर की है,
भय अहंकार का है,
और विजय उच्छिष्ट–ब्रह्म की पहचान से है।
जो उच्छिष्ट में स्थित है—
वह जीवित रहते हुए भी अमृत है।
नीचे प्रस्तुत है
(बिना संन्यास, बिना बाह्य परिवर्तन — केवल दृष्टि-परिवर्तन)
उपनिषद् कहते हैं—
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा (ईशोपनिषद् 1)
त्याग का अर्थ घर छोड़ना नहीं,
👉 आसक्ति छोड़ना है।
गृहस्थ जीवन में—
इसी कारण यही जीवन ब्रह्मज्ञान की सिद्ध भूमि है।
नींद खुलते ही आँख न खोलें।
केवल यह भाव करें—
“आज जो भी होगा—
मैं उसका द्रष्टा रहूँगा।”
कोई मंत्र नहीं,
कोई कल्पना नहीं,
केवल साक्षी-भाव।
👉 यह पूरे दिन की दिशा तय करता है।
“कर्म हो रहा है — कर्ता मैं नहीं हूँ”
भीतर-भीतर बस यह भाव—
“यह क्रिया देखी जा रही है।”
यही यजुर्वेद का जीवित यज्ञ है।
गृहस्थ का सबसे बड़ा बन्धन = अपेक्षा।
जब—
तुरंत देखें—
“यह भाव उत्पन्न हुआ—मैं इसे देख रहा हूँ।”
भाव को दबाएँ नहीं,
व्यक्ति को दोष न दें।
👉 यही अहंकार की आहुति है।
जब भी मृत्यु या भविष्य का भय आए—
यहीं भय अपना आधार खो देता है।
बृहदारण्यक उपनिषद्—
द्वितीयाद्वै भयम् भवति
जहाँ द्वैत टूटा,
वहाँ भय नहीं टिकता।
खाने से पहले मन ही मन—
“यह अन्न शरीर के लिए है,
मैं अन्न नहीं हूँ।”
भोजन के बाद—
“जो खाया गया, वह समाप्त—
जो जानता है, वह शेष।”
यही उच्छिष्ट–भाव है।
दिन समाप्त होने पर शांत बैठें।
मन में देखें—
फिर प्रश्न—
“जो सब देख रहा था,
क्या वह बदला?”
यहीं अमृत-बोध स्थिर होता है।
बिस्तर पर लेटकर—
“आज का शरीर, आज का मन—
सब यहीं छोड़ता हूँ।”
नींद को
👉 छोटी मृत्यु की तरह स्वीकार करें।
जो हर रात मृत्यु से नहीं डरता,
वह जीवन में भी नहीं डरता।
कुछ समय बाद—
और सबसे बड़ा फल—
डर के बिना जीने की क्षमता।
घर में रहते हुए
जो भीतर से मुक्त हो गया—
वही सच्चा ब्रह्मज्ञानी है।
उच्छिष्ट न वन में है,
न ग्रन्थ में—
👉 वह आपकी साक्षी–चेतना है।
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