जीवन का उद्देश्य

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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संस्कृत साहित्य के दूर्लम महावाक्य

मङ्गलाचरणम्
श्लोक :
श्रीशङ्करं भवहरं कलिकल्मषारिं योगीन्द्रवर्यमपराजितमद्वितीयम्। सर्वज्ञपीठगतमानुविधित्समार्यं नौमीड्यसर्वनिगमागमतत्त्वमूर्तिम् ॥०१॥

व्याख्या :
सांसारिक बन्धन का नाश करने वाले, कलियुग के दोषों के शत्रु, योगियों के स्वामियों में भी श्रेष्ठ, अपराजित एवं अद्वितीय, सर्वज्ञपीठ में आरूढ़, संसार का हित करने वाले आचारनिष्ठ, सभी वेद एवं तन्त्र के तात्त्विक स्वरूप श्रीशंकराचार्य को मैं स्तुतिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।
महावाक्य
श्लोक :
यत्पङ्कजाङ्घ्रिविभवेन महाष्टपाशा नाक्रोशयन्ति मनुजं जठराग्निचक्रे। नैवं पुनः प्रविशतीह वदान्यवर्यो रामानुजो विजयते यतिराजराजः ॥०२॥

व्याख्या :
जिनके चरणकमलों के प्रताप से, महान् अष्टपाश मनुष्य को कष्ट नहीं देते और उसका पुनः माता के गर्भ में प्रवेश नहीं होता है, ऐसे उदारमना जनों में श्रेष्ठ, संन्यासियों के स्वामियों के भी स्वामी श्रीरामानुजाचार्य जी विजयी हो रहे हैं।
महावाक्य
श्लोक
भक्त्यामास्थानुमितिकरणाद्वेदवेदान्तघोषैर् - वर्णाश्रम्यान्निहितनियमान् बाह्यजातीश्च म्लेच्छान्। रामारक्तान्मथितमनसो रामतत्त्वे निधाय रामानन्दो रघुवरमती राजते पुण्यकीर्तिः ॥०३॥

व्याख्या :
भक्ति में आस्था को अनुगामिनी बनाकर, वेद-वेदान्त के घोष से वर्णाश्रम में स्थित जनों को, नियमों में लगे हुए जनों को, जाति से बहिष्कृत तथा म्लेच्छ जनों को, स्त्री आदि में आसक्त मथित चित्त वालों को भी रामतत्त्व में स्थित करके अपनी पुण्यरूपिणी कीर्ति वाले, रघुवर श्रीरामजी में अपनी मति रखने वाले श्रीरामानन्दाचार्य जी शोभायमान् हैं।
महावाक्य
श्लोक
आदौ मर्कटरूपी पश्चादनिलांशो याम्ये द्वैतप्रकटीकरणार्थं तिष्ये। यो भूत्वा हरिधर्मे लोके विरराज मध्वाचार्यं श्रीगुरुमूर्तिं प्रणतोऽस्मि ॥०४॥

व्याख्या :
पहले वानर (हनुमान्) के रूप से, बाद में वायु के अंश (भीमसेन) बन कर और कलियुग में द्वैतमार्ग को प्रकट करने के लिये जो दक्षिण में उत्पन्न होकर विष्णुमार्ग में सुशोभित हुए, ऐसे गुरुरूपी श्रीमध्वाचार्य जी के प्रति मैं विनत हूँ।
महावाक्य
श्लोक
द्वैताद्वैतोपदेष्टारं विष्णुचक्रावतारिणम्। वन्दे तं निम्बमार्तण्डं द्वितीयमिव भास्करम् ॥०५॥ योऽनन्यतां समादाय शुद्धाद्वैतमबोधयत्। नौमि तं वैष्णवाचार्यं वल्लभं हरिवल्लभम् ॥०६॥

व्याख्या :
द्वैताद्वैत के उपदेष्टा, भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र के अवतार श्रीनिम्बार्काचार्य जी की मैं वन्दना करता हूँ जो दूसरे सूर्य के समान हैं। जिन्होंने अनन्यता को प्राप्त करके शुद्धाद्वैत का प्रबोधन किया, उन वैष्णवाचार्य श्रीवल्लभाचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ जो श्रीहरि के प्रिय हैं (अथवा जिन्हें श्रीहरि प्रिय हैं)।
महावाक्य
श्लोक
उदितरविप्रभावन्निग्रहा ये च पूर्वे जगति दिवि जयेयू राधका धर्मवृत्तेः। नदनुकपटशास्त्रायावका ये महान्तः प्रकटितमतिशास्त्रानग्रजान्नौमि नित्यम्॥०७॥

व्याख्या :
उगे हुए सूर्य के समान प्रभा वाले जो निग्रहाचार्य पूर्व में हो चुके हैं, धर्मवृत्ति की संसिद्धि करने वाले वे इस संसार और स्वर्ग में जयशाली हों। बादलरूपी कपटशास्त्रों के लिये जो महानुभाव वायु के तुल्य हैं, जिन्होंने शास्त्र एवं स्वमति को प्रकट किया है, ऐसे मेरे पूर्वाचार्यों को मैं प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ।
॥ ईशा वास्यमिदं सर्वम्॥०१॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर इति योगदर्शनम्। अविद्यादिपञ्चक्लेशैः पापपुण्यादिकर्मविपाकैः स्वभावतो निर्मुक्त ईशः। तेन ईश्वरेणेदं दृश्यादृश्यमयं जगत् सर्वतोभावेन परिरक्षितं तस्मात्तेन व्याप्तमित्यर्थः।

व्याख्या :
क्लेश एवं कर्मविपाक से भिन्न और निर्बाध पुरुष विशेष को ईश्वर कहते हैं, ऐसा योगदर्शन का वचन है। अविद्या आदि पांच क्लेश तथा पाप-पुण्यादि कर्मविपाक से स्वभावतः निर्मुक्त 'ईश' होता है। उस ईश्वर के द्वारा यह दृश्य एवं अदृश्य जगत् पूरी तरह से रक्षित है और इसी कारण से उससे व्याप्त है, ऐसा अर्थ है।
॥ प्राणोऽस्मि ॥०2॥
श्लोक
प्राणिति जीवति बहुकालमिति प्राणः। प्राणः प्राणयते प्राणमिति अग्निपुराणे। पिण्डे दशविधः प्राणापानव्यानसमानोदाननागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जय इति पुराणेषु। ब्रह्माण्डे सप्तविध ऊर्ध्वप्रौढाव्यूढविभूर्योनिप्रियापरिमित इत्यथर्ववेदे। प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषोत्तम इति कूर्मपुराणे। आत्मा वै मनो हृदयं प्राण इति शतपथब्राह्मणे तस्मादहमात्मा प्राणरूपीति भावयेत्।

व्याख्या :
बहुत समय तक जीवित रहता है, प्राणशक्ति से युक्त रहता है, अतएव प्राण है। 'प्राण' प्राणशक्ति का संचार करता है, ऐसा अग्निपुराण का वचन है। शरीर में यह दश प्रकार का होता है - प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनंजय, ऐसा पुराणों का कथन है। ब्रह्माण्ड में यह सात प्रकार का होता है - ऊर्ध्व, प्रौढ, अव्यूढ, विभू, योनि, प्रिय एवं अपरिमित, ऐसा अथर्ववेद में है। भगवान् प्राण सर्वज्ञ एवं पुरुषोत्तम कहे गये हैं, ऐसा कूर्मपुराण का वचन है। शतपथब्राह्मण कहते हैं, आत्मा ही मन, हृदय एवं प्राण है, अतएव मैं, आत्मा प्राणरूपी हूँ, ऐसी भावना करे।
॥ प्रज्ञानात्मा ॥०३॥
श्लोक
प्राथमिके प्रोक्तानुसारं प्रज्ञानमिति ब्रह्म। ब्रह्मात्मबोधेन मुक्तिः। कर्मबन्धो जीव आत्मा कर्ममुक्तः। प्रज्ञानमयं ब्रह्म प्रति निम्नगासिन्धुवद्यात्यभिन्नतां लभते। घट उद्भिन्ने तदाकाशो महाकाशो भवति यथा तस्मात्तथा प्रज्ञानात्मा।

व्याख्या :
पहले कहे गए अनुसार प्रज्ञान का अर्थ ब्रह्म है। ब्रह्म एवं आत्मा के बोध से मुक्ति होती है। कर्मबन्धन में फंसा जीव कहलाता है और कर्म से मुक्त आत्मा होता है। प्रज्ञानमय ब्रह्म के प्रति यह आत्मा वैसे ही जाकर अभिन्न हो जाता है जैसे नदी समुद्र के प्रति। जैसे, घड़े के फूटने पर उसका आकाश महाकाश में लीन हो जाता है। अतएव प्रज्ञान आत्मा है।
॥ अक्षरं ब्रह्म परमम् ॥०४॥
श्लोक
न क्षरतीत्यक्षरम्। क्षराद्विरुद्धधर्मत्वादक्षरं ब्रह्म भण्यते। क्षर सञ्चलने, न क्षरतीति, कूटस्थमस्तीत्यक्षरम्। कूटस्थश्चेतनो भोक्ता स तु अक्षरः पुरुष उच्यते विवेकिभीरिति श्रीधरस्वामी। अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वं चैतत् क्षरात्मकमिति वामनपुराणे। अक्षरं तत्परं पदमिति भविष्यपुराणे। अक्षरं ब्रह्म सत्यमिति पद्मपुराणे। अक्षरं ध्रुवमेवोक्तं पूर्वं ब्रह्म सनातनमिति ब्रह्मपुराणे।

व्याख्या :
जिसका क्षरण न हो, वह अक्षर है। क्षरण के विपरीत धर्म वाला अक्षर ब्रह्म कहा जाता है। क्षर शब्द चलने के अर्थ में है, जो क्षरित नहीं होता है, कूटस्थ है, वह अक्षर है। श्रीधरस्वामी कहते हैं - कूटस्थ चेतन भोक्ता है, वह विवेकियों के द्वारा अक्षर पुरुष कहा जाता है। वामनपुराण का वचन है - यह विश्व क्षरात्मक है एवं परब्रह्म अक्षर है। वह परमपद अक्षर है, ऐसा भविष्यपुराण का वचन है। वह अक्षर ब्रह्म सत्य है, ऐसा पद्मपुराण में है। निश्चय ही पहले कहा गया ब्रह्म अक्षर एवं सनातन है, ऐसा ब्रह्मपुराण का कथन है।
॥ प्राणोऽहमस्मि ॥०५,६,७,८॥
श्लोक
॥ तत्त्वस्य प्राणोऽहमस्मि पृथिव्याः प्राणोऽहमस्मि॥१०॥ ॥ अपां च प्राणोऽहमस्मि तेजसश्च प्राणोऽहमस्मि॥११॥ ॥ वायोश्च प्राणोऽहमस्मि आकाशस्य प्राणोऽहमस्मि॥१२॥ ॥ त्रिगुणस्य प्राणोऽहमस्मि॥१३॥

व्याख्या :
अब चारों का अर्थ बताते हैं। पांच महाभूत, पांच तन्मात्रा, दसों इन्द्रियाँ एवं चार अन्तःकरण को तत्त्व कहते हैं। मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। मूलाधार की स्वामिनी पृथ्वी होती है जो गन्ध तन्मात्रा से युक्त है, मैं उसमें प्राण का संचार करता हूँ। स्वाधिष्ठान के स्वामी जल हैं जो रस तन्मात्रा से युक्त हैं, मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। मणिपुर के स्वामी अग्नि हैं जो रूप तन्मात्रा से युक्त हैं, मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। अनाहत के स्वामी वायु हैं जो स्पर्श तन्मात्रा से युक्त हैं, मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। विशुद्ध के स्वामी आकाश हैं जो शब्द तन्मात्रा से युक्त हैं, मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। सत्त्व, रजस् एवं तमस्, ये तीन गुण हैं, मैं उनमें प्राण का संचार करता हूँ। 'मैं' का अर्थ प्रत्यक्ष अनुभूतिजन्य आत्मा है। वह आत्मा प्रज्ञान है। प्रज्ञानात्मा ब्रह्म होता है।
॥ योऽसौ सोऽहं हंसः सोऽहमस्मि ॥०९॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् उच्छासनिश्वासतया तदा बन्धक्षयो भवेत्। उच्छासे चैव निश्वासे हंस इत्यक्षरद्वयम्। तस्मात् प्राणस्तु हंसात्मा आत्माकारेण संस्थित इति दक्षिणामूर्तिसंहितायाम्। हंकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः कथयति निरुत्तरतन्त्रम्। सोऽहमिति विपरीतहंसः। व्यञ्जनौ बहिष्कृत्य प्रणवो भवेदिति। प्रणवो ब्रह्म। हंसो निर्विकल्पोऽद्वितीयः। तत्परब्रह्म तदहम्।

व्याख्या :
दक्षिणामूर्ति संहिता कहती है कि श्वास लेने और छोड़ने से बन्धन का नाश होता है। (कैसे ?) श्वास लेने और छोड़ने में 'हंस', इन दोनों अक्षरों का प्रयोग होता है। अतएव प्राण हंसात्मा है और आत्माकार होकर स्थित रहता है। निरुत्तर तन्त्र कहता है, (विपर्ययमत से) हंकार से बाहर जाता है और सकार से पुनः प्रवेश करता है। यह सोऽहं विपरीत हंसमन्त्र है। इसमें दोनों व्यंजनों (स् एवं ह्) को हटा देने से प्रणव (ॐ) होता है। प्रणव ब्रह्म है। हंस निर्विकल्प एवं अद्वितीय है। वह परब्रह्म है, वह मैं हूँ।
॥ यदेह तदमुत्र तदन्विह ॥१०॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् दिवि भूमावन्तरिक्षे पाताले लोके लोकातीते वा यः स्थितस्तं भावयेत्। सर्वतो ब्रह्म व्याप्तम्। यथा शुचौ तथाशुचौ। यथा विद्वत्सु तथा मूर्खेषु। यथा शैलशृंगे तथा सिन्धुगह्वरे। यथा वर्णाश्रमस्थितेषु तथा जातिबाह्येषु। सर्वतोभावेन व्याप्तं यथात्र नश्वरधर्मलोकेषु तथानश्वरधर्मपरमपद इत्यर्थः।

व्याख्या :
स्वर्ग में, भूमि में, अंतरिक्ष में, पाताल में, इस लोक तथा इस लोक से परे भी जो स्थित है, उसकी भावना करनी चाहिए। सर्वत्र ब्रह्म व्याप्त है। जैसे शुद्धि में है, वैसे ही अशुद्धि में भी है। जैसे विद्वानों में है, वैसे ही मूर्खों में भी है। जैसे पर्वतीय शिखरों में है, वैसे ही समुद्र की गहरायी में भी है। जैसे वर्णाश्रम में स्थित जनों में है, वैसे ही जातिबहिष्कृतों में भी है। सभी प्रकार से व्याप्त है। जैसे इस नश्वर लोक में है, वैसे ही अनश्वर परमपद में भी है, ऐसा अर्थ है।
॥ अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ॥११॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् यो जानाति न स ब्रूते यो ब्रूते न स ज्ञानवान् यस्माद्ब्रह्म ज्ञानिभ्योऽज्ञानिभ्योऽपि नानुभूयते सहजत्वेन। भौतिकदेहेन विश्वावस्थायामन्नप्राणकोशाभ्यांशब्दस्पर्शरूपरसगन्धग्रहण सामर्थ्यत्वाज्जीवेन विषया अनुभूयन्ते। सूक्ष्मदेहेन मनोविज्ञानकोशाभ्यां तैजसावस्थायां सूक्ष्मविषयानश्नाति। तेनैव कारणदेहेनानन्दकोशमाश्रित्य प्राज्ञावस्थायां ब्रह्मानन्दमनुभूयते। ब्रह्म विदिदात्परोऽगोचरत्वादविदितात्परश्चापि। देहत्रयीमुक्तोऽव्यक्तावस्थायातुरीयायाममृतमश्नुते।

व्याख्या :
जो जानता है, वह बता नहीं सकता एवं जो बता रहा है, वह ज्ञानवान् नहीं है क्योंकि ब्रह्म ज्ञानियों एवं अज्ञानियों के द्वारा भी सहज ही नहीं जाना जा सकता है। भौतिकदेह से विश्वावस्था में अन्नमय एवं प्राणमय कोष के माध्यम से शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध को ग्रहण करने की क्षमता से जीव के द्वारा विषयों का उपभोग किया जाता है। सूक्ष्मदेह से तैजसावस्था में मनोमय एवं विज्ञानमय कोष के माध्यम से सूक्ष्म विषयों का उपभोग करता है। उस जीव के द्वारा ही प्राज्ञावस्था में कारणदेह से आनन्दमय कोष का आश्रय लेकर ब्रह्मानन्द की अनुभूति होती है। ब्रह्म ज्ञानियों से भी परे है और अज्ञानियों से भी परे है। तीनों देह से मुक्त होकर तुरीया अव्यक्तावस्था में जीव अमृतत्त्व का उपभोग करता है।
निवृत्तिभाष्यम्
श्लोक
मह्यते पूज्यतेऽसौ इति महत्। तत्तु ब्रह्म। परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः। परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणमिति महाभारते। महतो महीयानिति श्रुतिः। महदर्थप्रकाशकं ब्रह्मबोधकं वाक्यं महावाक्यं यस्मिन् प्रणवान्तर्गतं परब्रह्म उपदिष्टम्। प्रधानस्त्वेकस्तारः। आम्नाये चत्वारि वाक्यानि। बृंहणे पञ्चविंशतिः। भूततन्मात्रेन्द्रियकरणानि चतुर्विंशतिसङ्ख्यकानि। सहात्मना पञ्चविंशतिः। तस्मादत्र तद्वद्व्याख्यास्यामः।

व्याख्या :
जिसका सम्मान होता है, जिसकी पूजा होती है, वह महान् है, वह ब्रह्म है। महाभारत में महान् तेज, महान् तप एवं महान् शरण वाले महान् परब्रह्म का वर्णन है। श्रुति कहती है कि वह महान् से भी महान् है। उस महान् के अर्थ का प्रकाशन करने वाला, ब्रह्मबोध कराने वाला वाक्य महावाक्य है जिसमें प्रणव के अन्तर्गत परब्रह्म का उपदेश किया गया है। इसमें प्रधान एक ही तार (ॐ) है। वेदों के सम्प्रदायानुसार चार वाक्य हैं। इनका विस्तार करने पर यह पच्चीस हो जाते हैं। भूत, तन्मात्रा, इन्द्रिय एवं करण को मिलाकर (तत्त्वों की) चौबीस संख्या होती है। आत्मा को जोड़ देने पर पच्चीस हो जाती है। अतएव यहाँ उसी प्रकार से व्याख्या करेंगे।
प्रज्ञानं ब्रह्म ॥१२॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् प्रज्ञानमिति चैतन्यम्। यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितं स्वभावत उत्पत्तिर्वा तच्चैतन्यम्। चैतन्यमिति आत्मा इति शिवसूत्रेषु। ज्ञानक्रिये पराशक्तेः स्पन्दनावत्र ज्ञानं बन्ध इति। अत्र ज्ञानपदेन लोकज्ञानं न तु ब्रह्मणः। प्रज्ञानं लोकोत्तरमिति। प्र इत्यारम्भः। प्र इति गतिः। जगतो निर्माणक्रियारम्भोपक्रमो वा यस्मादस्ति चान्ते यत्सर्वेषां परमा गतिस्तत्प्रज्ञायतेऽनेनेति प्रज्ञानम्। प्रज्ञानं तु प्रकाशतेति षड्जगीतायाम्। तत्तु ब्रह्म। प्रज्ञानं ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मीति वा भाष्यते बह्वृचोपनिषदि। प्रज्ञानं ब्रह्म इत्यात्मबोधोपनिषदि श्रुतिः।

व्याख्या :
प्रज्ञान का अर्थ चैतन्य है। जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है अथवा जिससे सबों की स्वभावतः उत्पत्ति है, वह चैतन्य है। शिवसूत्रों में आत्मा को चैतन्य शब्द से कहा गया है। ज्ञान एवं क्रिया पराशक्ति के स्पन्दन हैं जिसमें ज्ञान बन्धन है। यहाँ ज्ञानपद से संसार का ज्ञान लक्षित है, ब्रह्म का नहीं। प्रज्ञान संसार से परे है, ऐसा है। प्र का अर्थ आरम्भ है। प्र का अर्थ गति है। संसार की निर्माणक्रिया, आरम्भ अथवा उपक्रम जिससे है तथा जो अन्त में सबकी गति है, इसका भली प्रकार से इससे बोध होता है, अतएव यह प्रज्ञान है। प्रकाशित करने की उपलब्धि प्रज्ञान है, ऐसा षड्जगीता में है। वह ब्रह्म है। प्रज्ञान ब्रह्म है अथवा मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा बह्वृचोपनिषत् में कहा जाता है। प्रज्ञान ब्रह्म है, ऐसी आत्मबोधोपनिषत् में श्रुति है।
॥ अहं ब्रह्मास्मि ॥१३॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् अहमिति पदेन परमेश्वरोऽर्थीभूतः। अकारस्तु शिवो विष्णुः पुरुषो वा। हकारेण तस्य शक्तिरुमा श्रीः प्रकृतिर्वा निगद्यते। संयोगात्तयोरानन्दो जायते। आनन्देन ब्रह्मानन्द इति। ब्रह्मपदेन सर्वरूपता लक्षिता। अहं ब्रह्म परं ज्योतिः स्थूलदेहविवर्जितम् । अहं ब्रह्म परं ज्योतिर्जरामरणवर्जितमिति गरुडपुराणे ब्रह्मचिन्तनम्। अहं ब्रह्म चिदाकाशं नित्यं ब्रह्म निरञ्जनम् । शुद्धं बुद्धं सदामुक्तमनामकमरूपकमिति श्रुतिस्तेजोबिन्दूपनिषदि। नित्यशुद्धबन्धमुक्तसत्यमानन्दमद्वयम्। ब्रह्माहमस्म्यहं ब्रह्म परं ज्योतिर्विमुक्त ओमित्यग्निपुराणे ब्रह्मचिन्तनम्। तस्मादहं ब्रह्मास्मीत्यर्थमहं शक्तिमान्परमेश्वरोऽस्मीति भावयेत्।

व्याख्या :
'अहम्', इस पद से परमेश्वर का अर्थ ग्रहण किया गया है। अकार शिव, विष्णु अथवा पुरुष है। हकार से उसकी शक्ति उमा, लक्ष्मी अथवा प्रकृति कही जाती है। उन दोनों के संयोग से आनन्द उत्पन्न होता है। आनन्द शब्द से ब्रह्मानन्द समझना चाहिए। ब्रह्मपद से सर्वरूपता का भाव लक्षित है। गरुडपुराण में ब्रह्मचिन्तन है - 'मैं स्थूल देह से परे परम ज्योतिरूप ब्रह्म हूँ। मैं बुढापे एवं मृत्यु से रहित परम ज्योतिरूप ब्रह्म हूँ।' तेजोबिन्दूपनिषत् में श्रुति है - 'मैं चिदाकाशमय, निरञ्जन, नित्य विद्यमान् रहने वाला ब्रह्म हूँ। मैं (मल एवं अज्ञान से रहित) शुद्ध-बुद्ध, सदैव मुक्त, नाम तथा रूप से रहित ब्रह्म हूँ।' अग्निपुराण में ब्रह्मचिन्तन है - 'मैं अविनाशी, शुद्ध, बन्धन से मुक्त, सत्य, आनन्दमय, अद्वितीय ब्रह्म हूँ। मैं परम ज्योतिरूप हूँ, सर्वथा मुक्त ब्रह्म हूँ। अतएव अहं ब्रह्मास्मि के अर्थ हेतु, मैं शक्तिमान् परमेश्वर हूँ, ऐसी भावना करे।
॥ तत्त्वमसि ॥१४॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् तत्पदेन शक्त्यात्मकः परमेश्वरोऽनामरूपगुणलिङ्गविशिष्टो वर्ण्यते। तत्पदे क्लैव्यम्। त्वङ्कारस्तु पौरुषः। तयोर्न लिङ्गसाम्यता। तस्मादलिङ्गधर्मा शक्तियुक्तः परमेश्वरो लक्ष्यः। तद्ब्रह्म। त्वं जीवः। असीत्यभेदप्रबोधः। बोधको गुरुर्लब्धब्रह्मपदम्। तत्त्वमसीत्येव सम्भाष्यते बह्वृचोपनिषदि हयग्रीवोपनिषदि च।

व्याख्या :
'तत्' पद से शक्त्यात्मक परमेश्वर, जो नाम, रूप, गुण एवं लिंग की विशिष्टता से रहित है, वह वर्णित होता है। 'तत्' पद नपुंसकलिंग में है। 'त्वम्' पद में पुंल्लिङ्ग है। दोनों में लिङ्ग की दृष्टि से साम्यता नहीं है। अतएव लिङ्गधर्म से परे शक्तियुक्त परमेश्वर को लक्ष्य समझना चाहिये। तत् पद ब्रह्म है, त्वम् पद जीव है। असि पद से अभेद का बोध होता है। यहाँ ब्रह्मपद को प्राप्त गुरु बोधक हैं। तत्त्वमसि महावाक्य बह्वृचोपनिषत् में कहा गया है और हयग्रीवोपनिषत् में भी वर्णन है।
॥ अयमात्मा ब्रह्म ॥१५॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् अयमात्मा निर्लेपो निर्द्वन्द्वो निर्विकल्पस्त्रिगुणात्मकेन जगता नावरुद्धः परंब्रह्म वर्तते। अयमिति प्रत्यक्षानुभूयते लोकधर्मानुशीलेन। आत्मा इति जिज्ञासितव्यो देहव्यामोहविदूरीकरणात्। ब्रह्मेति परोक्षसाम्यम्। अयमात्मा परं ब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तकमित्यग्निपुराणे। अयमात्मा परं ब्रह्म अहमस्मीति मुच्यत इति तत्रैव। अयमात्मा परं ज्योतिश्चिन्नामानन्दरूपक इति गरुडपुराणे। अयमात्मा ब्रह्मेति बह्वृचोपनिषदि, रामतापिन्युपनिषदि, शुकरहस्योपनिषदि, हयग्रीवोपनिषदि शतपथब्राह्मणे च। अयमात्मा हि ब्रह्मैव सर्वात्मकतया स्थितः। इति निर्धारितश्रुत्या बृहदारण्यसंस्थयेत्यपरोक्षानुभूतिकथने श्रीशङ्कराचार्यः।

व्याख्या :
यह आत्मा निर्लेप, निर्द्वन्द्व, निर्विकल्प, त्रिगुणात्मक संसार के द्वारा बाधित न होने वाला परब्रह्म है। 'अयम्' पद से संसार में क्रियाशील चेतन का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। देह के मोह को दूर करने पर 'आत्मा' की जिज्ञासा करनी चाहिए। 'ब्रह्म' पद से आत्मा से अभिन्न परोक्ष तत्त्व का भाव है। यह आत्मा सत्य, ज्ञानरूपी, अनन्त परब्रह्म है, ऐसा अग्निपुराण में है। वहीं कहते हैं कि यह आत्मा परब्रह्म है, जो कि मैं हूँ, इस प्रकार से मुक्त होता है। चिदानन्दसंज्ञक यह आत्मा परमज्योतिरूप है, ऐसा गरुडपुराण की उक्ति है। यह आत्मा ब्रह्म है, यह बात बह्वृचोपनिषत्, रामतापिन्युपनिषत्, शुकरहस्योपनिषत्, हयग्रीवोपनिषत् एवं शतपथब्राह्मण में वर्णित है। अपरोक्षानुभूति के कथन में श्रीशंकराचार्य जी कहते हैं कि बृहदारण्यक की श्रुति यह निर्धारित करती है कि यह आत्मा ब्रह्म ही है जो सर्वात्मभाव से सर्वत्र स्थित है।
॥ सोऽहम् ॥१६॥
श्लोक
निवृत्तिभाष्यम् आधारस्थानमारभ्यमूर्ध्वपर्यन्तगामिना पवनेन हकारमुच्चरेत्। सकारं मुखतो विसृजेदिति लक्ष्मीतन्त्रे। अत्र हंसेऽक्षरत्रयम् हकारोऽनुस्वारयुक्तोऽकारः सकारश्चेति। विपर्यये सोऽहमिति। सकारञ्च हकारञ्च जीवो जपति सर्वदा इति ब्रह्मविद्योपनिषदि। सोऽहमात्मा इति भस्मजाबालोपनिषदि। सकारञ्च हकारञ्च लोपयित्वा प्रयोजयेत् । सन्धिं वै पूर्वरूपाख्यं ततोऽसौ प्रणवो भवेदिति मानसोल्लासे। व्यञ्जनस्य सकारस्य हकारस्य च वर्जनात्। ओमित्येव भवेत्स्थूलो वाचकः परमात्मन इति शिवपुराणे। ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म इति श्रीमद्भगवद्गीतासु।

व्याख्या :
लक्ष्मीतन्त्र में कहते हैं कि मूलाधार से आरम्भ करके ऊपर की ओर गमन वाले वायु के द्वारा हकार का उच्चारण करे। सकार का मुख से विसर्जन करे (वायु के साथ उच्चारण करे)। इस 'हंस' पद में तीन अक्षर हैं। हकार, अनुस्वार के साथ अकार (अं) तथा सकार। इसको विपरीत कर देने से सोऽहम् बनता है। ब्रह्मविद्योपनिषत् में वर्णन है कि जीव सदैव इस सकार एवं हकार का जप करता है। भस्मजाबालोपनिषत् में सोऽहम् को आत्मतत्त्व कहा है। सकार एवं हकार का लोप करके इसका प्रयोग करे, यह पूर्वरूपसन्धि है जिससे यह प्रणव (ॐ) बन जाता है, ऐसा मानसोल्लास में है। सकार एवं हकार व्यंजनों को वर्जित करने से ॐ बनता है, जो परमात्मा का स्थूल वाचक है, ऐसा शिवपुराण में है। ॐ, यह एकाक्षर ब्रह्म है, ऐसा श्रीमद्भगवद्गीता में है।

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