अर्थ : अथ पञ्चमाध्याये प्रथमान्हिकम् पहले अध्याय में दिखला चुके हैं कि साधर्म्य और वैधर्म्य भेद से अनेक प्रकार की जाति होती हैं, जिनका सविस्तार वर्णन इस अध्याय में किया जाता है। जातियों के निम्नलिखित 24 भेद हैं:- 1) साधर्म्यसम (2) वैधर्म्यसम (3) उत्कर्षसम (4) आकर्षसम (5) बण्र्यसम (6) अवण्र्यसम (7) विकल्पसम (8) साध्यसम (9) प्राप्तिसम (10) अप्राप्तिसम (11) प्रसड्डसम (12) प्रतिदृष्टान्तसम (13) अनुत्पत्तिसम (14) संशयसम (15) प्रकरणसम (16) हेतुसम (17) अर्थापत्तिसम (18) अविशेषसम (19) उपपत्तिसम (20) उपलब्धिसम (21) अनुपलब्धिसम (22) नित्यसम (23) अनित्यसम (24) कायसम। ये 24 जातिभेद हैं अर्थात् एक प्रकार के दोष हैं जो विपक्ष के खण्डन में दिए जाते है। जो कि ये साधम्र्यादि का ममता से उत्पन्न होते हैं, इसलिए इन सबके अन्त में ’सम’ शब्द दिया गया है। इनका लक्षण आगे क्रमशः सूत्रकार ही करते है। प्रथम साधम्यसम और वैधर्म्यसम का लक्षण:-
अर्थ : जब साधर्म्य से साध्य में विपरीत धर्म देखा जावे, तब साधर्म्य से ही साध्य का खण्डन हो जाता हैं, इसको साधर्म्यसम दोष कहते हैं। जैसे किसी ने कहा कि जैसे घटादि उत्पत्तिमान होने से कार्य हैं, ऐसे ही शब्द भी उत्पत्तिधर्मक होने से कार्य है। अतएव अनित्य है। इस पर दूसरा कहता हैं, जैसे आकाश निरवयव होने से नित्य है वैसे ही शब्द भी निरवयव होने से नित्य है। परन्तु ये दोनों दुष्ट हेतु हैं, क्योंकि कार्य के साथ किसी गुण के मिलने से अनित्य होना और कारण के साथ किसी गुण का साधर्म्य होने से नित्य होना साध्य के निर्णय में पर्याप्त नहीं, इसके लिए किसी अन्य हेतु की आवश्यकता हैं। तात्पर्य यह कि दो पदार्थों में किसी एक धर्म के मिलने से जो समता का प्रतिपादन करना हैं, उसको साधर्म्य सम दोष कहते है: ऐसे ही वैधर्म्यसम में दो पदार्थों के विरुद्ध धर्मों को लेकर उनकी विषमता का प्रतिपादन किया जाता है। जैसे कोई कहे कि आकाश के विरुद्ध उत्पत्ति धर्मक होने से शब्द अनित्य है। इस पर दूसरा कहे कि नित्य आकाश के समान सावयव न होने से शब्द नित्य है और घटादि कार्यों से निरवयव होने के कारण शब्द विलक्षण है। यहां भी कोई विशेष हेतु नहीं क्योंकि शब्द में दोनों धर्म हैं, वह अनित्य घटादि के समान उत्पन्न होने वाला भी है और नित्य आकाश के सदृश निरवयव भी है। वाद करने वाले दोनों पक्ष इससे अपना-अपना प्रयोजन निकाल सकते है। इसलिए ये दोनों निर्णय के प्रतियोगी साधर्म्यसम और वैधर्म्यसम दोष कहलाते हैं, सारांश यह कि दो पदार्थ परस्पर किसी एक धर्म के मिलने से एक जैसे नहीं हो जाते और नहीं किसी एक धर्म के न मिलने से वे आपस में एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हो जाते है। इसको पुष्टि करते हैं:-
अर्थ : केवल एक धर्म के साधर्म्य या वैधर्म्य से जो साध्य को सिद्ध किया जाता है, उसमें अव्यवस्था दोष भी होता है। अतएव प्रत्येक पदार्थ की सिद्धि उसके सामान्य धर्म से होती है। जैसे गौ पदार्थ की सिद्धि में गोत्व जाति और गवाकति ही मुख्य कारण हैं न कि पुच्छ और विषाणादि, क्योंकि इनकी अतिव्याप्ति महिषादि में भी होती है। अब उत्कर्षसम, अपकर्षसम, वण्र्यसम, विकल्पसम और साध्यसम का लक्षण कहते हैं:-
अर्थ : साध्य और दृष्टान्त के धर्म भेद से दोनों तरह सिद्ध होने वाले उत्कर्षसमादि 6 दोष होते हैं। जहां अविद्यमान धर्म के साथ तुलना करके साध्य को वर्णन किया जावे, उसे उत्कर्षसम कहते है। जैसे किसी ने कहा कि घट के सदृश उत्पन्न होने से शब्द भी अनित्य हैं, इसके उत्तर में दूसरा कहता है कि अनित्य होना और उत्पत्ति धर्मक होना ये दोनों धर्म रूपवान् पदार्थ में होते हैं, जब शब्द उत्पत्तिधर्मक और अनित्य वादी को परास्त करने के लिए उसकी अधिक कल्पना कर ली गई, इसी को उत्कर्षसम कहते है। व्याख्या :जहां विद्यमान धर्म को साध्य से पृथक करके वर्णन किया जावे उसे अपकर्षसम कहते है। जैसे किसी ने कहा कि रूपरहित आकाश कार्य और अनित्य नहीं, इसलिए शब्द भी रूपरहित होने से कार्य और अनित्य नहीं। यहां शब्द में उत्पत्ति का धर्म था, उसको रूपरहित होने से पृथक किया गया। जो साध्य और उसका हेतु वर्णन करने योग्य है, वह वएर्यसम और जो वर्णन करने योग्य नहीं, वह अवएर्यसम कहलाते हैं, वस्तु में कौन सा धर्म वर्णनीय है और कौन सा अवर्णनीय,यह बुद्धि से जाना जाता है, इसलिए इनके दृष्टान्त नहीं दिये। जो धर्म वस्तु को सिद्ध करने वाला है, दृष्टान्त में उनके विकल्प से साध्य को सन्दिग्ध बनाना विकल्पसम दोष कहलाता है। जैसे कहा जावे कि कियावान् वस्तु कोई भारी होता है जैसे लोहा कोई हलका होता हैं, जैसे वायु। ऐसे ही कियावान् कोई परिच्छिन्न हो सकता हैं, जैसे ढेला और कोई विभु हो सकता हैं, जैसे आत्मा। इसको विकल्पसम कहते हैं। साध्य में दृष्टान्त के एक धर्म मिलने पर सब धर्मों का साम्य मान लेना साध्यसम दोष कहलाता हैं। जैसे कोई कहे कि यदि ढेला कियावान् हैं तो आत्मा भी कियावान् है। यदि आत्मा साध्य है तो ढेला भी साध्य हैं, इत्यादि दोनो एक से है। अब उक्त आक्षेपों का समाधान करते हैं:-
अर्थ : जहां कुछ साधर्म्य होता है, वहीं साध्य की सिद्धि होती है, उसमें किसी धर्म के विरुद्ध होने से उसका खण्डन नहीं होता। सम्बन्ध सहित किसी धर्म के मिल जाने से उपमान सिद्ध होता है। जैसे यह दृष्टान्त देना कि गौ के सदृश नील गाय होती है, जिस धर्म में गौ और नील गाय का सादृश्य है, उसी धर्म के मिलने से दृष्टान्त की उपयोगिता सिद्ध होती है। विरुद्ध धर्म के भेद से समान धर्म की एकता का खण्डन नहीं होता। तात्पर्य यह है कि जिन अंशों में गौ और नील गाय में साधर्म्य हैं, वह विरुद्ध अंशों के वैधर्म्य से खण्डित नहीं होता। दृष्टान्त में दाष्र्टान्त का कोई एक धर्म मिलना चाहिए, यह आवश्यक नहीं कि इनके सारे धर्म ही आपस में मिलें। अतएव उत्कर्षसमादि दोषों से वैधर्म्य को लेकर साध्य का खण्डन करना ठीक नहीं। इस पर एक हेतु और देते हैं:-
अर्थ : दृष्टान्त में साध्य का एक धर्म मिलना चाहिए, सब धर्मों के मिलने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि सब धर्म मिल जायें तो साध्य में और दृष्टान्त में भेद ही क्या रहा, भेद न रहने से वह फिर साध्य को क्या सिद्ध करेगा ? अतएव साध्यसम प्रतिषेध अयुक्त है। अब प्रतिसम और अप्रतिसम का लक्षण कहते हैं:-
हेतु साध्य से मिलकर उसको सिद्ध करता है अथवा बिना मिले ? यदि मिलकर सिद्ध करता है तो दोनों में किसी एक की विशेषता न होने से कौन सिद्ध करता है और कौन सिद्ध होता है इसकी कुछ व्यवस्था न रहेगी। अर्थात् मिलने से उनमें साध्य-साधक-भाव नहीं रह सकता। यदि बिना मिले हेतु का साध्य को सिद्ध करना मानोगे तो भी साध्य की सिद्धि न हो सकेगी। क्योंकि दीपक उसी वस्तु को सिद्ध करता है, जिस पर उसका प्रकाश पड़ता है और जिस वस्तु से उसके प्रकाश का मेल नहीं होता, उसको सिद्ध नहीं करता। अतएव प्राप्ति से प्राप्तिसम और अप्राप्ति से अप्राप्तिसम दोष उत्पन्न होते हैं। इसका उत्तर देते हैं:-
अर्थ : उक्त दोनों प्रकार के खण्डन ठीक नहीं, क्योंकि कहीं हेतु की प्राप्ति से और कहीं अप्राप्ति से भी साध्य की सिद्धि प्रत्यक्ष देखने में आती हैं। घटादि कुम्हार, चाक और मिट्टी के मिलने से सिद्ध होते है। अभिचार (साजिस) आदि बिना मिले ही गुप्त रीति पर अपना प्रभाव दिखलाते हैं। इसलिए प्राप्तिसम और अप्राप्तिसम प्रतिषेध अयुक्त है। अब प्रसगंसम और प्रतिदृष्टांतसम का लक्षण कहते हैं:-
अर्थ : कारण का कारण और दृष्टांत का दृष्टांत नहीं होता, जब कारण के कारण या दृष्टांत के दृष्टांत की जिज्ञासा की जाती है, तब फिर उनके कारण और दृष्टांत का भी प्रंसग उत्पन्न होता है, इसी को प्रसंगसम दोष कहते है। और प्रत्येक दृष्टांत में इस दोष की सम्भावना करना प्रतिदृष्टांतसम दोष कहलाता है। जैसे कहा जावे कि कियावान् होने से वायु चलता है इस पर प्रतिवादी कहे कि वायु कियावान क्यों है ? यह प्रसंगसम का उदाहरण है। दूसरे प्रतिदृष्टांतसम का उदाहरण यह है। यदि घट के दृष्टांत से शब्द अनित्य है तो आकाश के दृष्टांत से नित्य है। अब प्रसंगसम को खण्डन करते हैं:-
अर्थ : जैसे अन्धकार में रक्खे हुए पदार्थों को जानने के लिए दीपक जलाया जाता है किन्तु दीपक को जानने के लिए दूसरा दीपक नहीं जलाया जाता। ऐसे ही जिस हेतु या दृष्टांत से साध्य को सिद्ध किया जाता है, उस हेतु या दृष्टांत की सिद्धि के लिए अन्य हेतु या दृष्टांत की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि जिसको लौकिक व परीक्षक सामान्य रूप से समझ सके, वह दृष्टांत कहलाता है। बस जैसे दीपक की सिद्धि के लिए अन्य दृष्टांत की आवश्यकता नहीं। अब प्रतिदृष्टांन्तसम का खण्डन करते हैं:-
दृष्टांत के खण्डन में प्रतिदृष्टांत दिया जाता है, जब दृष्टांत से साध्य की सिद्धि नहीं होतीं तो प्रतिदृष्टान्त से उसका खण्डन क्योंकर हो सकता है ? और प्रतिदृष्टांत की सिद्धि में प्रतिवादी ने कोई विशेष हेतु भी नहीं दिया, यदि प्रतिदृष्टान्त को हेतु माना जावे तो फिर दृष्टान्त ने क्या अपराध किया हैं जो उसको हेतु न माना जावे। अब अनुत्पत्तिसम का लक्षण कहते हैं:-
अनुत्पत्ति से खण्डन करना अनुत्पत्तिसम दोष कहलाता है। जैसे प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से घट के समान शब्द भी अनित्य हैं, ऐसा कहने पर प्रतिवादी को यह दोष देना कि उत्पत्ति से पहले अनुत्पन्न शब्द में प्रयत्न के पश्चात् होने वाला धर्म अनित्यता का कारण ही नहीं हो सकता, इससे शब्द का नित्य होना सिद्ध है। इस प्रकार अनुत्पत्ति के दृष्टांत से उत्पत्ति का खण्डन करना अनुत्पत्तिसम दोष कहलाता है। अब इसका उत्तर देते हैं:-
उत्पत्ति से पहले शब्द का अभाव है क्योंकि उत्पन्न होकर ही शब्द कहलाता हैं, उत्पत्ति से पूर्व जब शब्द ही नहीं हैं, तब अनुत्पत्ति को कारण मानकर उत्पत्ति का खण्डन करना ठीक नहीं। प्रयत्न की आवश्यकता (जो अनित्यता का हेतु है) शब्द की उत्पत्ति से ही सम्बन्ध आवश्यकता रखता हैं। तात्पर्य यह कि जब कार्य ही मौजूद नहीं हैं, तो उसके कारण का खण्डन कैसा ? कार्य की विद्यमानता में ही उसके कारण का खण्डन या मण्डन किया जा सकता है। अतएव अनुत्पत्तिसम दोष अनुत्पन्न है। अब संशयसम का लक्षण कहते हैं:-
संशय को हेतु मानकर जिसका खण्डन किया जाय, उसको संशयसम कहते है। जैसे यह कहने पर कि घटादि अनित्य कार्यों के सदृश किया से उत्पन्न होने के कारण शब्द अनित्य है। प्रतिवादी यह दूषण दे कि सामान्य गौ जाति में और घटादि कार्य में इन्द्रिय गोचर होना धर्म बराबर है अर्थात् जैसे गोत्व जाति इन्द्रिय से, ग्रहण की जाती हैं, वैसे ही घटादि कार्य भी। घटादि के समान इन्द्रियग्राह्य होने पर भी सामान्य जाति नित्य हैं। इसलिए घटादि के दृष्टान्त से और कार्यत्व के हेतु से शब्द को अनित्य कहना सन्दिग्ध हैं। क्योंकि नित्य अनित्य के साधर्म्य से संशय उत्पन्न होता है। इसी को संशयसम प्रतिषेध कहते हैं। अब इसका खण्डन करते हैं:-
साधर्म्य से संशय होता हैं, जैसे स्थाणु और पुरुष में साधर्म्य होने से संशय उत्पन्न होता है, परन्तु वैधर्म्य से जब उनके विशेष धर्मों का भेद मालूम होता हैं, तब संशय निवृत्त हो जाता है। ऐसे ही किया जो शब्द का कारण है, उससे उत्पन्न हुए कार्य शब्द के अनित्य होने में वैधर्म्य के कारण ही जो सामान्य जाति से उसका है, सन्देह उत्पन्न नहीं होता। यदि वैधर्म्य के होने पर भी सन्देह माना जावे तो फिर सन्देह की कोई सीमा न रहेगी। अतएव शब्द के विशेष धर्म का ज्ञान होने से नित्यत्व की आशंका न रहेगी। क्योंकि जब तक स्थाणु और पुरुष के साधर्म्य का ज्ञान हैं, तभी संशय है, जहां इनके वैधर्म्य का ज्ञान हुआ, फिर संशय रह नहीं सकता। अतएव संशयसम प्रतिषेध अयुक्त है। अब प्रकरणसम का लक्षण कहते हैं:-
दोनों पक्ष की प्रवृत्ति को प्रकिया कहते हैं और वह नित्य और अनित्य के साधर्म्य से उत्पन्न होती है। जैसे किसी ने कहा कि अनित्य घटादि कार्य के सदृश होने से शब्द भी अनित्य है, इस पर प्रतिवादी ने कहा कि नित्य आकाश के सदृश आकृति और शरीर रहित होने से शब्द नित्य है। अर्थात् एक पक्ष अनित्य घट के साधर्म्य से शब्द को अनित्य सिद्ध करता है। दूसरा उसी को नित्य आकाश के साधर्म्य से नित्य सिद्ध करता है। इसी को प्रकरणसम दोष कहते हैं। अब इसका खण्डन करते हैं:-
दोनों के साधर्म्य से प्रकिया की सिद्धि होने में दोनों में से एक ही पक्ष सिद्ध होगा, दोनों तो सिद्ध हो ही नहीं सकते। दोनों में से जो सच्चा पक्ष हैं, उसका खण्डन प्रकरणसम नहीं कर सकता। क्योंकि जब तक अनुसंधान से तत्व का अवधारण नहीं होता तभी तक प्रकिया रहती है, तत्व का निश्चय हो जाने पर फिर प्रकिया नहीं रहती। इसलिए प्रकरणसम दोष अयुक्त है। यदि वही तर्क प्रतिपक्ष में भी सिद्ध हो जाए, तो केवल विरोध के आधार पर निषेध नहीं किया जा सकता।
हेतु जो साध्य को सिद्ध करने वाला है, तीनों काल में उसकी सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि यदि यह मानें कि हेतु साध्य से पहले वर्तमान था तो जब साध्य ही न था, तो वह हेतु किसका था और किसको सिद्ध करता था। यदि हेतु को साध्य के पश्चात् माना जावे तो हेतु के अभाव में यह साध्य किसका था, जिससे उसको साध्य कहा जावे। और यदि दोनों का एक साथ होना माना जावे, तो कौन साध्य हैं और कौन हेतु ? इसका निर्णय किस प्रकार होगा ? इसलिए हेतु की तीनों काल में असिद्धि होने से अहेतुसम दोष उत्पन्न होता है। इसका उत्तर देते हैं:- जो हेतु भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों में सिद्ध न हो, वह वास्तविक हेतु नहीं माना जाता।
यह कहना कि हेतु की तीनों कालों में असिद्धि हैं, ठीक नहीं। क्योंकि बिना हेतु या कारण के कोई साध्य या कार्य सिद्ध नहीं होता। जब तीनों काल में कार्य सिद्धि कारण की अपेक्षा रखती हैं, तब किसी काल में भी कार्य के लिए कारण का अभाव क्यों कर हो सकता हैं। और प्रतिवादी ने जो कहा था कि साध्य के अभाव में वह साधन किसका होगा ? इसका उत्तर यह है कि जो ज्ञेय है वही साध्य हैं, उसी का जानने वाला जो साधन हैं, उसको हेतु कहते हैं और जहां ज्ञेय हैं, वही उसका हेतु भी मौजूद हैं। फिर इसी की पुष्टि करते हैं:- यदि हेतु से साध्य की सिद्धि ही न हो, तो तीनों कालों में वह असिद्ध ही रहता है।
जैसे तुम हेतु के तीनों काल में असिद्ध होने से उसका खण्डन करते हो, ऐसे ही तुम्हारे इस खण्डन का भी खण्डन किया जा सकता हैं, अर्थात् तुम हेतु के सिद्ध न होने से पहले उसका खण्डन करते हो यो पश्चात् या हेतु और तुम्हारा खण्डन दोनों एक साथ होंगे ? यदि कहो सिद्ध होने से पहले खण्डन करते हैं तो यह बिल्कुल असंगत हैं, क्योंकि जो वस्तु मौजूद होती है, उसी का खण्डन किया जाता है और जो वस्तु ही नहीं, उसका खण्डन कैसा ? यदि कहो कि हम सिद्ध होने के पश्चात् खण्डन करते हैं तो जब हेतु सिद्ध हो गया तो तुम्हारे खण्डन करने से क्या होता है ? और यदि कहो कि हेतु और हमारा खण्डन दोनों साथ-साथ रहेंगे तो यह हो नहीं सकता। दिन और रात एक साथ नहीं रह सकते। अतएव अहेतुसम प्रतिषेध अयुक्त है। अब अर्थापत्तिसम का लक्षण कहते हैं:- जब निषेध ही सिद्ध न हो, तो जिस वस्तु का निषेध किया जा रहा है उसका भी निषेध असम्भव हो जाता है।
एक बात के कहने से दूसरी बात जो स्वंयमेव जानी जाती हैं, उसे अर्थापत्ति कहते है। जहां इस अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष की सिद्धि होती है उसे अर्थापत्तिसम दोष कहते है। जैसे कोई कहे कि उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है। इस पर दूसरा कहता है कि स्पर्श रहित होने से शब्द नित्य है। अर्थात् जब घट के समान उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है तो अर्थापत्ति से यह जाना गया कि आकाश के समान अस्पृश्य होने से शब्द नित्य है। अब इसका खण्डन करते हैं:- यदि अर्थापत्ति से प्रतिपक्ष भी सिद्ध हो जाए, तो वह निर्णायक प्रमाण नहीं रह जाती।
अर्थापत्ति के अनुक्त और अनेकान्तिक होने से अर्थापत्तिसम दोष खण्डित हो जाता है, क्योंकि उक्त से अनुक्त का खण्डन भी सामथ्र्य के अनुसार होता है। जैसे यह कहा जावे कि मनुष्य प्राणी है, तो इस कहने से यह आशय नहीं निकलता कि मनुष्य के सिवाय और कोई प्राणी नहीं। ऐसे ही उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है इसका अर्थापत्ति से यह तात्पर्य निकालना कि अस्पष्ट होने से शब्द नित्य हैं, सर्वथा असंगत हैं। अतएव अर्थापत्ति के अनुक्त और अनेकान्तिक होने से अर्घापत्तिसम दोष ठीक नहीं। अब अविशेषसम का लक्षण कहते है।:- जो बात स्पष्ट कही ही नहीं गई, उसे अर्थापत्ति से सिद्ध करना पक्ष को दुर्बल कर देता है।
किसी एक धर्म के सादृश्य से दो पदार्थों को अविशेष (एक) ही मानना अविशेषसम दोष कहलाता है। जैसे शब्द और घट में उत्पन्न होना धर्म बराबर है, इससे इनको एक ही समझ लेना और अस्तित्व धर्म सब पदार्थों में बराबर हैं, इसलिए सबको एक ही समझकर दूषण देना अविशेषसम प्रतिषेध है। अब इसका उत्तर देते हैं:- यदि एक ही धर्म से सब सिद्ध मान लिए जाएँ, तो किसी में भी विशेष भेद शेष नहीं रहेगा।
एक धर्म की कहीं तो प्राप्ति है, और कही अप्राप्ति, इसलिए अविशेषसम अनैकान्तिक होने से ठीक नहीं। जैसे घट उत्पत्तिमान् है, शब्द भी उत्पन्न होता है। यहां तो प्राप्ति है। परन्तु घट स्पर्शवान् है, शब्द नहीं, यहां अप्राप्ति है। अतएव अनैकान्तिक होने से अविशेषसम दोष ठीक नहीं। अब उपपत्तिसम का लक्षण कहते हैं:- जहाँ किसी स्थान पर धर्म हो और अन्यत्र न हो, वहाँ सार्वत्रिक निषेध सम्भव नहीं।
दोनों कारणों की उपलब्धि होने से उपपत्तिसम प्रत्यवस्थान उत्पन्न होता है। जैसे शब्द के अनित्य होने का कारण उसका उत्पन्न होना है तो उसके नित्य होने का कारण शब्द का अस्पृश्य होना है। इन दोनों कारणों की उपपत्ति होने में उपपत्तिसम दोष उत्पन्न होता है। इसका उत्तर देते हैं:- एक ही प्रभाव के लिए दो कारण मान लेने से तर्क अनिश्चित हो जाता है।
जब कि प्रतिवादी दोनों के कारणों की उत्पत्ति को स्वीकार कर चुका है, फिर वह अनित्यता के कारण का खण्डन किस प्रकार कर सकता है। यदि परस्पर विरोध से एक का निषेध माना जावे, तो विरोध दोनों में बराबर है। फिर दो में से एक की सिद्धि वह क्यों कर सकेगा ? अब उपलब्धिसम का लक्षण कहते हैं:- जिस कारण को स्वीकार कर लिया गया हो, उसी के आधार पर निषेध करना आत्मविरोध है।
यदि कोई शब्द के अनित्य होने में यह हेतु दे कि घट के समान प्रयत्न जन्य होने से शब्द अनित्य हैं, इस पर प्रतिपक्षी कहे कि बिना प्रयत्न के वृक्ष के पत्तों से वायु का स्पर्श होने पर जो शब्द होता है, वह भी अनित्य है। इसलिए वादी ने जो प्रयत्न जन्य होने का हेतु दिया है वह ठीक नहीं। इस प्रकार किसी नियत कारण के अभाव में भी साध्य की उपलब्धि होने से उपलब्धिसम प्रत्यवस्थान होता है। अब इसका उत्तर देते हैं:- कारण बताए बिना भी यदि वस्तु ज्ञात हो जाए, तो वह ज्ञान निर्णायक नहीं माना जा सकता।
जबकि दूसरे कारणों से भी उसका धर्म का प्रकट होना सम्भव है, इसलिए यह प्रतिषेध अयुक्त हैं क्योंकि प्रयत्न से उत्पन्न होने का प्रयोजन यह है, कि वह कारण से उत्पन्न होता है, चाहे चेतन के प्रयत्न से चाहे जड़ के, परन्तु उसका कारण अवश्य है और जिसका कारण है यह अनित्य है। इससे प्रयत्न जन्म होने का खण्डन नहीं होता और नहीं शब्द के अनित्यत्व का खण्डन होता है। और यह माना कि शब्द बोलने से उत्पन्न नहीं होता किन्तु पहले मौजूद था, वही प्रकट होता है, केवल आवरण दर हो जाता है, ठीक नहीं। क्योंकि यदि कोई आवरण होता तो वह आंखों से दीखता है। किसी आवरण के प्रत्यक्ष न होने से यह मानना पड़ता है कि शब्द उच्चारण से पहले नहीं था और जब उच्चारण से उत्पन्न हुआ तो वह अनित्य है। अब अनुपलब्धिसम का लक्षण कहते हैं:- यदि वही गुण अन्य कारण से भी उत्पन्न हो सकता है, तो किसी एक कारण का निषेध सम्भव नहीं।
प्रतिवादी कहता है कि यदि आवरण के प्रत्यक्ष न होने से उसका अभाव मानते हो तो उसके अभाव के प्रत्यक्ष न होने से उसके अभाव का भी मानना चाहिए। आवरण के अभाव का अभाव सिद्ध होने से आवरण का भाव सिद्ध हो जाएगा। और जब आवरण का भाव सिद्ध हो गया, तब शब्द भी नित्य सिद्ध हो जायगा। इस प्रकार अभाव का अभाव मानकर दूषण देना अनुपलब्धिसम प्रत्यवस्थान कहलाता है। अब इसका उत्तर देते हैं:- केवल न देखने से अभाव सिद्ध नहीं होता, जब तक विपरीत सम्भावना शेष हो।
अभाव के अभाव से यह हेतु निर्मूल है, क्योंकि अभाव भाव का होता है न कि अभाव का। जो वस्तु हैं, उसकी उपलब्धि होती है, जो वस्तु ही कुछ नहीं, उसकी सर्वदा अनुपलब्धि है, फिर उसकी अनुपलब्धि क्या हो सकती हैं ? अतएव अभाव का अभाव न होने से अनुपलब्धिसम प्रत्यवस्थान ठीक नहीं। फिर इसी की पुष्टि करते हैं:- अनुपलब्धि स्वयं नकारात्मक होने से स्वतंत्र हेतु नहीं बन सकती।
आत्मा में विषय ज्ञान के भावाऽभाव का मन के द्वारा प्रत्यक्ष होता हैं, इसमें मुझे सन्देह है, इसका मुझे निश्चय है, यह वस्तु है और यह नहीं है। इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा अनेक प्रकार के ज्ञान विकल्प होते है। परन्तु यह अनुभव किसी को नहीं होता कि मैं शब्द का आवरण देखता हुआ उसके अभाव का अभाव देखता हूं। अतएव आत्म संवेदनीय ज्ञानों में न होने के कारण भी शब्द के आवरण की कल्पना ठीक नहीं। अब अनित्यसम का लक्षण कहते हैं:- भाव और अभाव का अनुभव ज्ञान-विकल्पों के माध्यम से होता है, अतः यह विषय आध्यात्मिक विवेचन के अंतर्गत आता है।
साधर्म्य के आधार पर समान धर्म की स्थापना करने से यदि सभी पदार्थों में अनित्यत्व का प्रसंग आ जाए, तो इसे अनित्यसम प्रत्यवस्थान कहा जाता है। जैसे— घट के अनित्य होने के साधर्म्य से शब्द को अनित्य कहना। प्रतिवादी उत्तर देता है कि घट एक पदार्थ है, अतः साधर्म्य से सभी पदार्थ अनित्य हो जाएंगे। यह अनित्यत्व का अतिप्रसंग दूषण है।
जब घट के साधर्म्य से शब्द का अनित्य होना ही सिद्ध नहीं होता, तो उसी साधर्म्य से सभी पदार्थों का अनित्य होना कैसे सिद्ध होगा? इस प्रकार प्रतिवादी का कथन प्रतिज्ञाहानि दोष से युक्त है और इसलिए असंगत है।
दृष्टान्त में जो धर्म साध्य को सिद्ध करता है वही हेतु होता है। वह कभी सामान्य रूप से साधर्म्य उत्पन्न करता है और कभी विशेष रूप से वैधर्म्य। केवल साधर्म्य या केवल वैधर्म्य के आधार पर किसी निष्कर्ष को सिद्ध करना उचित नहीं। इसलिए केवल साधर्म्य से सर्वानित्यत्व सिद्ध करना अयुक्त है।
नित्य में अनित्य और अनित्य में नित्य की कल्पना करने से नित्यसम प्रत्यवस्थान उत्पन्न होता है। यदि शब्द के अनित्यत्व को नित्य या अनित्य माना जाए, तो दोनों ही स्थितियों में विरोध उत्पन्न होता है।
शब्द के उत्पन्न होकर नष्ट होने से उसका अनित्यत्व सिद्ध है। अनित्यत्व स्वयं अभाव है, उसका पुनः भाव मानना असंगत है। अतः नित्यसम दोष निराधार है।
प्रयत्न के कार्य अनेक होते हैं— कहीं उत्पत्ति, कहीं अभिव्यक्ति। इस आधार पर शब्द की उत्पत्ति को न मानकर अभिव्यक्ति कहना कार्यसम प्रत्यवस्थान है।
जहाँ अभिव्यक्ति होती है वहाँ आवरण रहता है। शब्द के पूर्व कोई आवरण नहीं था, अतः उच्चारण से शब्द की उत्पत्ति ही होती है। इसलिए कार्यसम दूषण अयुक्त है।
यदि कार्यसम अनैकान्तिक है, तो उसका खण्डन भी अनैकान्तिक होगा— यह प्रतिवादी की आपत्ति है।
यदि यह दोष स्वीकार किया जाए, तो सभी प्रमाणों में यही दोष प्रसक्त होगा। अतः यह आपत्ति स्वयं अप्रमाणिक है।
खण्डन के खण्डन में भी वही दोष आता है। इससे विवाद निरर्थक हो जाता है।
दूसरे पक्ष को सदोष मानकर खण्डन के खण्डन में दोष लगाना मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान है।
अपने पक्ष को सिद्ध किए बिना केवल प्रतिपक्ष के दोष दिखाना मतानुज्ञा दोष है। अपने दोष का निवारण किए बिना दूसरे पर दोषारोपण करना स्वपक्ष की असिद्धि है।
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