न्यायसूत्राणि
प्रवृत्ति, दोष और आत्मनित्यत्व
प्रवृत्तिर्यथोक्ता
१
इस सूत्र में न्याय दर्शन मानव प्रवृत्ति की मूल व्याख्या प्रस्तुत करता है। ‘प्रवृत्ति’ से तात्पर्य है—किसी कर्म में प्रवर्तन या सक्रियता। गौतम के अनुसार प्रवृत्ति कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि पूर्वोक्त कारणों से उत्पन्न होती है। मनुष्य बिना कारण के कर्म नहीं करता। ज्ञान, इच्छा और प्रयोजन—ये तीनों प्रवृत्ति के आधार हैं। जब किसी वस्तु का ज्ञान होता है और उससे सुख की अपेक्षा जुड़ती है, तब प्रवृत्ति जन्म लेती है। यह सूत्र यह भी संकेत देता है कि नैतिक उत्तरदायित्व तभी संभव है जब प्रवृत्ति कारणसिद्ध हो। यदि प्रवृत्ति स्वयंसिद्ध या अकारण होती, तो धर्म-अधर्म का भेद ही असंभव हो जाता। इस प्रकार यह सूत्र संपूर्ण कर्ममीमांसा और नैतिक दर्शन की नींव रखता है।
तथा दोषाः
२
यहाँ ‘दोष’ शब्द से राग, द्वेष और मोह का बोध होता है। जैसे प्रवृत्ति पूर्वोक्त कारणों से होती है, वैसे ही दोष भी कारणसिद्ध हैं। दोष मनुष्य की मानसिक अशुद्धियाँ हैं, जो उसे गलत कर्मों की ओर ले जाती हैं। न्याय दर्शन दोषों को नैतिक पतन का मूल मानता है। यह सूत्र स्पष्ट करता है कि दोष आत्मा के स्वाभाविक गुण नहीं हैं, बल्कि उपाधिजन्य हैं। यदि दोष स्वाभाविक होते, तो मुक्ति असंभव होती। इसीलिए दोषों की कारणसिद्धता स्वीकार कर उन्हें निवर्तनीय माना गया है।
तत्त्रैराश्यं रागद्वेषमोहार्थान्तरभावात्
३
यह सूत्र दोषों की त्रैधात्विक संरचना स्पष्ट करता है। राग, द्वेष और मोह—ये तीन स्वतंत्र सत्ता नहीं हैं, बल्कि एक ही दोष-तत्त्व के विभिन्न रूप हैं। परिस्थिति के अनुसार वही चेतना कभी राग बनती है, कभी द्वेष और कभी मोह। इससे न्याय दर्शन यह सिद्ध करता है कि मानसिक विकार आपस में गहरे जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग-अलग आत्मस्वरूप नहीं माना जा सकता। यह दृष्टि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत सूक्ष्म है।
नैकप्रत्यनीकभावात्
४
यह सूत्र कहता है कि ये दोष परस्पर विरोधी नहीं हैं। राग और द्वेष एक साथ विद्यमान रह सकते हैं—एक ही व्यक्ति में, एक ही काल में, भिन्न-भिन्न विषयों को लेकर। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य का मानस सरल रेखीय नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है।
व्यभिचारादहेतुः
५
यहाँ न्याय दर्शन तर्कदोष की ओर संकेत करता है। यदि कोई कारण सदा कार्य उत्पन्न न करे, तो वह हेतु नहीं कहलाता। दोषों के संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया है कि जो कारण अनियमित हो, वह सिद्धान्त का आधार नहीं बन सकता।
तेषां मोहः पापीयान्नामूढस्येतरोत्पत्तेः
६
मोह को सबसे अधिक पापजनक बताया गया है, क्योंकि राग और द्वेष भी अंततः मोह से उत्पन्न होते हैं। अज्ञान की अवस्था में ही अन्य दोष जन्म लेते हैं।
निमित्तनैमित्तिकभावादर्थान्तरभावो दोषेभ्यः
७
यह सूत्र बताता है कि दोष कारण भी हैं और कार्य भी। वे अन्य मानसिक अवस्थाओं के निमित्त बनते हैं, पर स्वयं भी किसी कारण से उत्पन्न होते हैं।
न दोषलक्षणावरोधान्मोहस्य
८
मोह को दोष मानने में कोई विरोध नहीं है, क्योंकि उसमें दोषों के सभी लक्षण विद्यमान हैं।
निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीयानामप्रतिषेधः
९
समान जाति के दोषों में कारण-कार्य संबंध स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है।
आत्मनित्यत्वे प्रेत्यभावसिद्धिः
१०
यह अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। आत्मा के नित्य होने से मृत्यु के बाद भी उसका अस्तित्व सिद्ध होता है। यदि आत्मा नित्य न हो, तो कर्मफल और पुनर्जन्म का सिद्धांत असंगत हो जाएगा। न्याय दर्शन इसी सूत्र के माध्यम से परलोक, मोक्ष और नैतिक न्याय की दार्शनिक नींव रखता है।
व्यक्ताद्व्यक्तानां प्रत्यक्षप्रामाण्यात्
११
इस सूत्र में न्याय दर्शन ‘व्यक्त’ और ‘अव्यक्त’ सत्ता के ज्ञान-संबंध पर विचार करता है। व्यक्त वे वस्तुएँ हैं जो इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष ग्रहण की जाती हैं, जबकि अव्यक्त वे कारणतत्त्व हैं जो सीधे इन्द्रियग्राह्य नहीं होते, किंतु जिनका अस्तित्व उनके कार्यों के माध्यम से जाना जाता है। न्यायकार कहते हैं कि व्यक्त का प्रत्यक्ष ज्ञान ही अव्यक्त के अस्तित्व का प्रमाण बनता है। उदाहरणार्थ—घट प्रत्यक्ष है, किंतु उसकी मिट्टी की सूक्ष्म अवस्था (अव्यक्त) प्रत्यक्ष नहीं। फिर भी घट के प्रत्यक्ष अनुभव से यह सिद्ध होता है कि कोई कारण अवश्य रहा होगा। यह सूत्र सांख्य के ‘अव्यक्त’ सिद्धांत को आंशिक स्वीकार करते हुए उसे प्रत्यक्षप्रामाण्य से जोड़ता है। न्याय में प्रत्यक्ष को सर्वोच्च प्रमाण माना गया है, और उसी के आधार पर अव्यक्त कारणों की सिद्धि होती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि न्याय दर्शन अंध-तत्त्वमीमांसा नहीं, बल्कि अनुभव-आधारित तर्क को प्रधानता देता है।
न घटाद्घटानिष्पत्तेः
१२
यह सूत्र कारण-कार्य सिद्धांत की सीमा निर्धारित करता है। यहाँ कहा गया है कि एक घट से दूसरा घट उत्पन्न नहीं हो सकता। अर्थात् समान कार्य समान कार्य का कारण नहीं बन सकता। यदि घट से घट उत्पन्न होने लगे, तो कारण-कार्य व्यवस्था ही नष्ट हो जाएगी। उदाहरण के लिए—यदि तैयार बर्तन ही दूसरे बर्तन का कारण बन जाए, तो कुम्हार, चाक और मिट्टी की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी। न्याय दर्शन में कारण को कार्य से भिन्न माना गया है। यह सूत्र स्पष्ट करता है कि उत्पादन के लिए भिन्न कारण आवश्यक है, अन्यथा अनवस्था (infinite regress) उत्पन्न हो जाएगी।
व्यक्ताद्घटनिष्पत्तेरप्रतिषेधः
१३
यह सूत्र पिछले सूत्र का विस्तार है। यहाँ यह आपत्ति निवारण किया गया है कि यदि घट व्यक्त है, तो उसी व्यक्त से घट क्यों न उत्पन्न हो? न्यायकार कहते हैं—नहीं, क्योंकि व्यक्त वस्तु अपने ही स्वरूप की पुनः उत्पत्ति का कारण नहीं बन सकती। उत्पत्ति सदैव कारण-कार्य भेद पर आधारित होती है। जैसे—जल से जल उत्पन्न नहीं होता, अग्नि से अग्नि उत्पन्न नहीं होती। इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति का अर्थ केवल प्रकट होना नहीं, बल्कि नवीन कार्य का प्रादुर्भाव है।
अभावाद्भावोत्पत्तिर्नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्
१४
यह अत्यंत सूक्ष्म सूत्र है। यहाँ कहा गया है कि भाव (सत्ता) का उत्पन्न होना पूर्ण अभाव से नहीं होता। उत्पत्ति का अर्थ यह नहीं कि शून्य से कुछ बन गया, बल्कि यह कि कारणरूप में विद्यमान सत्ता प्रकट हुई। जैसे—दही दूध के पूर्ण विनाश से नहीं, बल्कि उसके रूपांतरण से उत्पन्न होता है। न्याय दर्शन यहाँ शून्यवाद का स्पष्ट खंडन करता है और सत्कार्यवाद तथा असत्कार्यवाद के बीच संतुलित दृष्टि प्रस्तुत करता है।
व्याघातादप्रयोगः
१५
यदि उपर्युक्त सिद्धांत न माने जाएँ, तो तर्क का व्याघात होगा। अर्थात् तर्क स्वयं अपने ही विरुद्ध हो जाएगा। न्याय दर्शन में ऐसा कोई सिद्धांत स्वीकार्य नहीं जो अनुभव और तर्क—दोनों का खंडन करे। यह सूत्र एक प्रकार से पूर्ववर्ती सभी सूत्रों की रक्षा करता है।
नातीतानागतयोः कारकशब्दप्रयोगात्
१६
यह सूत्र काल-संबंधी भ्रांति का निवारण करता है। भूत और भविष्य काल में ‘कर्ता’, ‘कर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग केवल भाषिक है, न कि वास्तविक उत्पादन का प्रमाण। जैसे—“घट था” या “घट होगा” कहने से घट का वर्तमान अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। न्याय दर्शन भाषा और सत्ता के भेद को यहाँ स्पष्ट करता है।
न विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः
१७
जो पूर्णतः नष्ट हो चुका है, उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं हो सकता। यदि नष्ट से उत्पत्ति मान ली जाए, तो कारण-कार्य का नियम ही टूट जाएगा। यह सूत्र पुनः शून्यवाद और क्षणिकवाद का खंडन करता है।
क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः
१८
कारण और कार्य का संबंध क्रमबद्ध होता है। पहले कारण, फिर कार्य। यदि इस क्रम को न माना जाए, तो तर्कसंगति समाप्त हो जाएगी। यह सूत्र कालक्रम की अनिवार्यता सिद्ध करता है।
ईश्वरः कारणं पुरुषकर्माफल्यदर्शनात्
१९
यह न्याय दर्शन का ईश्वर-सिद्धि सूत्र है। संसार में अनेक ऐसे फल देखे जाते हैं जो प्रत्यक्ष पुरुषकर्म से समझ में नहीं आते। ऐसे में ईश्वर को सहायक कारण मानना आवश्यक हो जाता है। ईश्वर यहाँ कर्मफलदाता है, न कि कर्मनाशक।
न पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः
२०
यह सूत्र संतुलन स्थापित करता है। ईश्वर कारण है, किंतु बिना पुरुषकर्म के फल उत्पन्न नहीं होता। अर्थात् ईश्वर कर्म के नियम को भंग नहीं करता। यह न्याय दर्शन को भाग्यवाद से बचाता है और नैतिक उत्तरदायित्व को सुरक्षित रखता है।
तत्कारितत्वादहेतुः
२१
यह सूत्र ईश्वर को प्रत्यक्ष कर्ता मानने की आपत्ति का खंडन करता है। यदि प्रत्येक कार्य को सीधे ईश्वरकृत मान लिया जाए, तो वह कारण न होकर केवल कर्तृत्व-आरोप बन जाएगा। न्याय दर्शन में ईश्वर को ‘सहकारी कारण’ माना गया है, न कि प्रत्यक्ष कर्ता। अतः “ईश्वर करता है” यह कथन स्वतः सिद्ध कारण नहीं बन सकता। यह सूत्र कर्म-सिद्धांत की रक्षा करता है और ईश्वर को नैतिक व्यवस्था का नियामक बताता है, मनमाना कर्ता नहीं।
अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात्
२२
यहाँ एक आपत्ति प्रस्तुत की जाती है—कुछ वस्तुएँ बिना स्पष्ट कारण के उत्पन्न होती प्रतीत होती हैं, जैसे काँटे की तीक्ष्णता। इससे ऐसा लगता है कि भाव (सत्ता) कभी-कभी बिना निमित्त के भी उत्पन्न हो जाता है। यह सूत्र पूर्वपक्ष को स्थापित करता है, जिससे आगे उसका खंडन किया जा सके। न्याय दर्शन पहले विरोधी मत को स्पष्ट रूप से रखता है, यही उसकी तर्कपद्धति की विशेषता है।
अनिमित्तनिमित्तत्वान्नानिमित्ततः
२३
इस सूत्र में पूर्वपक्ष का समाधान किया गया है। जो वस्तुएँ अनिमित्त प्रतीत होती हैं, उनके भी सूक्ष्म कारण होते हैं। काँटे की तीक्ष्णता आकस्मिक नहीं, बल्कि उसकी संरचना और भौतिक संघटन का परिणाम है। अतः वास्तविक रूप से बिना कारण के कोई भी भाव उत्पन्न नहीं होता। यह सूत्र न्याय दर्शन के सार्वत्रिक कारणवाद को दृढ़ करता है।
निमित्तानिमित्तयोरर्थान्तरभावादप्रतिषेधः
२४
यहाँ कहा गया है कि निमित्त और अनिमित्त का भेद केवल दृष्टि-भेद है, तत्त्व-भेद नहीं। जो कारण हमें ज्ञात नहीं, वह अनिमित्त प्रतीत होता है। इसलिए कारण का अभाव सिद्ध नहीं होता। यह सूत्र अज्ञान को अस्तित्व-निषेध का आधार मानने से रोकता है।
सर्वमनित्यमुत्पत्तिविनाशधर्मकत्वात्
२५
यह सूत्र अनित्यवाद का सशक्त प्रतिपादन करता है। जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह नष्ट भी होता है—यह संसार का सामान्य नियम है। उत्पत्ति और विनाश जिनका धर्म है, वे नित्य नहीं हो सकते। यह अनुभवसिद्ध सत्य है और न्याय दर्शन इसे व्यापक रूप से स्वीकार करता है।
नानित्यतानित्यत्वात्
२६
यह सूत्र संभावित भ्रम का निवारण करता है। यदि अनित्य वस्तुएँ हैं, तो उनसे नित्य वस्तु सिद्ध नहीं हो जाती। अर्थात् परिवर्तनशील वस्तुओं के समूह से शाश्वत सत्ता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह तर्कशुद्ध सीमा रेखा खींचता है।
तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्यं विनाश्यानुविनाशवत्
२७
जैसे अग्नि के संपर्क से दाह्य वस्तु नष्ट होती है, वैसे ही उत्पन्न वस्तु समय के साथ विनष्ट होती है। यहाँ विनाश को स्वाभाविक प्रक्रिया बताया गया है, कोई आकस्मिक घटना नहीं। यह उदाहरण अनित्यता को प्रत्यक्ष अनुभव से जोड़ता है।
नित्यस्याप्रत्याख्यानं यथोपलब्धिव्यवस्थानात्
२८
यह सूत्र संतुलन लाता है। न्याय दर्शन यह नहीं कहता कि सब कुछ अनित्य है। जो नित्य है, उसका निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसकी उपलब्धि भिन्न प्रकार की होती है—जैसे आत्मा। इससे स्पष्ट होता है कि न्याय दर्शन न तो सर्वथा अनित्यवाद है, न सर्वथा नित्यवाद।
सर्वं नित्यम्पञ्चभूतनित्यत्वात्
२९
यह सूत्र एक विरोधी मत को प्रस्तुत करता है—यदि पंचभूत नित्य हैं, तो उनसे बने सब पदार्थ भी नित्य होने चाहिए। यह पूर्वपक्ष है, जिसे अगले सूत्र में खंडित किया जाएगा। न्याय दर्शन विरोधी दृष्टिकोण को पहले पूर्ण रूप से रखता है।
नोत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः
३०
यह सूत्र पूर्वपक्ष का निर्णायक खंडन करता है। यदि वस्तुएँ नित्य होतीं, तो उनकी उत्पत्ति और विनाश के कारण कभी अनुभव में न आते। किंतु प्रत्यक्ष रूप से हम उत्पादन और नाश दोनों देखते हैं। अतः सर्वनित्यत्व का सिद्धांत असंगत है।
तल्लक्षणावरोधादप्रतिषेधः
३१
यह सूत्र सर्वनित्यत्व के पूर्वपक्ष का निर्णायक खंडन करता है। यदि किसी वस्तु का लक्षण उत्पत्ति-विनाश से अवरुद्ध होता है, तो उसे नित्य नहीं कहा जा सकता। लक्षण किसी भी सत्ता की पहचान होता है। जब वही लक्षण अनुभव में बाधित हो रहा हो—जैसे घट का नाश—तो नित्यत्व का निषेध स्वतः सिद्ध हो जाता है। न्याय दर्शन यहाँ लक्षण को केवल शब्द नहीं, बल्कि अनुभवसिद्ध पहचान मानता है।
नोत्पत्तितत्कारणोपलब्धेः
३२
यदि कोई वस्तु नित्य होती, तो उसकी उत्पत्ति और उसके कारण कभी उपलब्ध न होते। किंतु प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र—तीनों से हमें कार्य-कारण संबंध स्पष्ट दिखता है। घट, वस्त्र, शरीर—सब किसी न किसी कारण से उत्पन्न होते हैं। अतः नित्यत्व का सिद्धांत अनुभवविरोधी है। यह सूत्र न्याय के कारणवाद को दृढ़ आधार देता है।
न व्यवस्थानुपपत्तेः
३३
यदि सब कुछ नित्य या सब कुछ अनित्य मान लिया जाए, तो संसार की व्यवस्था ही असंभव हो जाती है। नियम, अनुक्रम, कारण-कार्य, प्रयोजन—सब नष्ट हो जाते हैं। यह सूत्र बताता है कि दार्शनिक सिद्धांत का मूल्य तभी है जब वह व्यवहार और व्यवस्था को सम्भव बनाए। अतः अतिवादी दृष्टिकोण अस्वीकार्य है।
सर्वं पृथग्भावलक्षणपृथक्त्वात्
३४
यह सूत्र भेदवाद का प्रतिपादन करता है। प्रत्येक वस्तु का अपना पृथक् स्वरूप और लक्षण है। घट घट है, पट पट है—यह भिन्नता ही वास्तविकता की पहचान है। यदि सब कुछ एक ही सत्ता हो, तो अनुभव में विविधता असंभव होती। न्याय दर्शन अनुभव को मिथ्या नहीं मानता, इसलिए भेद को स्वीकार करता है।
नानेकलक्षणैरेकभावनिष्पत्तेः
३५
अनेक भिन्न लक्षणों से एक ही भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। यदि ऐसा मान लिया जाए, तो विरोधी गुण एक ही वस्तु में एक साथ सिद्ध हो जाएंगे। यह तर्कविरोध (व्याघात) उत्पन्न करता है। अतः एक वस्तु का एक ही प्रधान स्वरूप होता है, जो उसके लक्षणों से निर्धारित होता है।
लक्षणव्यवस्थानादेवाप्रतिषेधः
३६
चूँकि प्रत्येक वस्तु के लक्षण व्यवस्थित और निश्चित हैं, इसलिए वस्तुओं का निषेध नहीं किया जा सकता। यह सूत्र यथार्थवाद को पुष्ट करता है—वस्तुएँ केवल कल्पना नहीं, बल्कि सुनिश्चित पहचान वाली सत्ताएँ हैं। यही कारण है कि ज्ञान संभव है।
सर्वमभावो भावेष्वितरेतराभावसिद्धेः
३७
यहाँ एक गूढ़ तर्क प्रस्तुत किया गया है—प्रत्येक भाव में अन्य भावों का अभाव निहित होता है। घट में पट का अभाव है, दिन में रात्रि का अभाव है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अभाव भी एक बौद्धिक सत्ता है। यह सूत्र न्याय दर्शन की अभाव-मीमांसा की नींव रखता है।
न स्वभावसिद्धेर्भावानाम्
३८
यह सूत्र कहता है कि भाव अपने आप, स्वतः सिद्ध नहीं होते। यदि वे स्वभाव से ही सिद्ध होते, तो ज्ञान, कारण और अनुभव निरर्थक हो जाते। न्याय दर्शन भावों को कारणसापेक्ष मानता है, न कि स्वतःसिद्ध सत्ता।
न स्वभावसिद्धिरापेक्षिकत्वात्
३९
भावों की सत्ता सापेक्ष है—देश, काल, कारण और संबंध पर निर्भर। यही सापेक्षता उन्हें स्वभावसिद्ध होने से रोकती है। यह सूत्र वस्तुओं की पारस्परिक निर्भरता को स्पष्ट करता है और निरपेक्ष सत्ता की धारणा को सीमित करता है।
व्याहतत्वादयुक्तम्
४०
अंततः यह सूत्र घोषित करता है कि जो सिद्धांत स्वयं में विरोध उत्पन्न करे, वह युक्त नहीं हो सकता। नित्य-अनित्य, भाव-अभाव, कारण-अकार्य—इनमें यदि तर्कगत व्याघात हो, तो उसे त्यागना ही होगा। यह सूत्र न्याय दर्शन की तर्कनिष्ठ आत्मा को प्रकट करता है।
संख्यैकान्तासिद्धिः कारणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम्
४१
यह सूत्र “एक ही कारण से केवल एक ही कार्य उत्पन्न होगा” — इस संख्यैकान्त सिद्धांत का खंडन करता है।
कभी कारणों की अनुपपत्ति (अभाव) से कार्य नहीं होता, और कभी कारणों की उपपत्ति (उपस्थिति) होने पर भी कार्य नहीं होता।
अतः कार्य की संख्या को किसी एक ही नियम में बाँधना असंभव है। उदाहरणतः बीज उपस्थित हो, जल हो, भूमि हो — फिर भी कभी अंकुर नहीं निकलता।
इससे स्पष्ट है कि कारण–कार्य संबंध बहुकारणात्मक और सापेक्ष है।
न कारणावयवभावात्
४२
यदि कार्य को कारण का ही अवयव मान लिया जाए, तो नवीन उत्पत्ति असंभव हो जाएगी।
घट मिट्टी का अवयव नहीं है, बल्कि मिट्टी से उत्पन्न एक नया द्रव्य है।
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि कार्य कारण का अंश नहीं, बल्कि कारण से भिन्न सत्ता है।
न्याय दर्शन यहाँ सांख्य के सत्कार्यवाद से स्पष्ट दूरी बनाता है।
निरवयवत्वादहेतुः
४३
जो निरवयव है, वह कार्य उत्पन्न नहीं कर सकता।
यदि कारण अवयवहीन माना जाए, तो उसमें परिवर्तन की संभावना ही नहीं बचेगी।
परंतु संसार में परिवर्तन प्रत्यक्ष है।
अतः निरवयव कारण को कार्योत्पत्ति का हेतु मानना अयुक्त है।
सद्यः कालान्तरे च फलनिष्पत्तेः संशयः
४४
कर्म का फल तुरंत मिलता है या कालांतर में — यह प्रश्न संशय उत्पन्न करता है।
कुछ कर्म तत्काल फल देते हैं (जैसे अग्नि में हाथ डालना),
और कुछ कर्म बहुत समय बाद फल देते हैं (जैसे दान, अधर्म)।
यह सूत्र इसी द्विविध अनुभव को रेखांकित करता है।
न सद्यः कालान्तरोपभोग्यत्वात्
४५
सभी कर्मों का फल तुरंत नहीं मिलता।
कई कर्म ऐसे होते हैं जिनका उपभोग कालांतर में होता है।
अतः “कर्म का फल सद्यः ही मिलता है” — यह एकांतिक मत अस्वीकार्य है।
यह कर्म-सिद्धांत को अधिक यथार्थ और न्यायसंगत बनाता है।
कालान्तरेणानिष्पत्तिर्हेतुविनाशात्
४६
यदि कारण ही नष्ट हो जाए, तो कालांतर में भी फल उत्पन्न नहीं हो सकता।
जैसे जला हुआ बीज समय बीतने पर भी अंकुर उत्पन्न नहीं करता।
यह सूत्र कारण की निरंतरता (continuity) को फलोत्पत्ति के लिए अनिवार्य मानता है।
प्राङ्निष्पत्तेर्वृक्षफलवत्तत्स्यात्
४७
फल कारण से पहले उत्पन्न नहीं हो सकता।
जैसे वृक्ष के बिना फल की कल्पना असंभव है।
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि कार्य की सत्ता कारणोत्तर है, कारणपूर्व नहीं।
इससे सत्कार्यवाद का निर्णायक खंडन होता है।
नासन्न सन्न सदसत्सदसतोर्वैधर्म्यात्
४८
कार्य न तो पूर्णतः असत् है, न पूर्णतः सत्।
यदि असत् होता, तो उत्पन्न नहीं होता।
यदि सत् होता, तो उत्पत्ति व्यर्थ होती।
इसलिए कार्य “सदसत्” स्वरूप का है — यह न्याय का सूक्ष्म यथार्थवाद है।
उत्पादव्ययदर्शनात्
४९
उत्पत्ति और विनाश दोनों का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
घट बनता है और टूटता है।
यह अनुभव ही प्रमाण है कि संसार परिवर्तनशील है।
न पूर्ण नित्य, न पूर्ण असत् — यही न्याय का संतुलित निष्कर्ष है।
बुद्धिसिद्धं तु तदसत्
५०
असत्ता केवल बुद्धि में सिद्ध होती है, प्रत्यक्ष में नहीं।
अभाव को हम प्रत्यक्ष नहीं देखते, बल्कि बौद्धिक निषेध से जानते हैं।
यह सूत्र ज्ञानमीमांसा का गूढ़ निष्कर्ष है —
अभाव भी ज्ञेय है, परंतु बुद्धिसिद्ध है।
आश्रयव्यतिरेकाद्वृक्षफलोत्पत्तिवदित्यहेतुः
५१
यह सूत्र उस मत का खंडन करता है जिसमें कहा जाता है कि आश्रय (आधार) के बिना भी फल उत्पन्न हो सकता है।
जैसे वृक्ष के बिना फल की उत्पत्ति असंभव है, वैसे ही आश्रय से पृथक फल की कल्पना अहेतुक है।
आश्रय और आश्रित का व्यतिरेक (पूर्ण पृथक्करण) कार्योत्पत्ति को असंभव बना देता है।
अतः फल सदैव किसी न किसी आश्रय पर निर्भर होता है — यह नियम सार्वभौमिक है।
प्रीतेरात्माश्रयत्वादप्रतिषेधः
५२
प्रीति (सुखानुभूति) आत्मा में आश्रित होती है, न कि बाह्य वस्तुओं में।
इसलिए यह कहना कि सुख का अस्तित्व नहीं है — असिद्ध है।
बाह्य वस्तुएँ केवल निमित्त हैं, वास्तविक अनुभूति आत्माश्रित है।
यह सूत्र आत्मा को सुख–दुःख का वास्तविक भोक्ता सिद्ध करता है।
पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छदहिरण्यान्नादिफलनिर्देशात्
५३
शास्त्रों में कर्मफल के रूप में पुत्र, पशु, स्त्री, वस्त्र, स्वर्ण, अन्न आदि का निर्देश मिलता है।
यदि सुख-दुःख असत्य होते, तो इन फलों का विधान निरर्थक होता।
अतः कर्मफल का प्रत्यक्ष सामाजिक और शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध है।
तत्सम्बन्धात्फलनिष्पत्तेस्तेषु फलवदुपचारः
५४
फल वास्तव में आत्मा को प्राप्त होता है, परंतु सम्बन्धवश बाह्य वस्तुओं में फलत्व का उपचार किया जाता है।
जैसे “घर ने सुख दिया” — वास्तव में घर नहीं, अपितु उससे उत्पन्न अनुभूति सुख है।
यह उपचार (figurative attribution) न्याय की सूक्ष्म व्याख्यात्मक पद्धति है।
विविधबाधनायोगाद्दुःखमेव जन्मोत्पत्तिः
५५
जन्म स्वयं दुःखरूप है क्योंकि वह अनेक बाधाओं से युक्त है।
शरीर, रोग, भय, अभाव — ये सभी जन्म के अनिवार्य सहचर हैं।
अतः संसार में जन्म को मूलतः दुःखमय कहा गया है।
यह सूत्र बौद्ध–सांख्य की पीड़ा-दृष्टि से साम्य रखता है।
न सुखस्याप्यान्तरालनिष्पत्तेः
५६
सुख भी निरंतर नहीं रहता; वह अंतराल के बाद उत्पन्न होता है।
यदि सुख जन्मजात होता, तो दुःख का अनुभव न होता।
यह सूत्र सुख की क्षणिक और सापेक्ष प्रकृति को स्पष्ट करता है।
बाधनानिर्वृत्तेर्वेदयतः पर्येषणदोषादप्रतिषेधः
५७
बाधा के निवारण के बाद जो सुख अनुभव होता है, वह वास्तविक सुख नहीं बल्कि दुःख-निवृत्ति मात्र है।
मनुष्य उस सुख को खोजता है, पर वही खोज दोष का कारण बनती है।
अतः संसारिक सुख को परम सुख मानना भ्रांति है।
दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च
५८
दुःख के विकल्प (अभाव) को ही लोग सुख मान लेते हैं।
जैसे रोग न होना ही स्वास्थ्य समझ लिया जाता है।
यह सुख का अभिमान है, वास्तविक सुख नहीं।
न्याय दर्शन यहाँ गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है।
ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः
५९
ऋण, क्लेश और प्रवृत्ति का अनुवर्तन बना रहने से अपवर्ग (मोक्ष) नहीं होता।
जब तक कर्मबंधन बना है, तब तक दुःखचक्र चलता रहता है।
यह सूत्र मोक्ष के लिए कर्मक्षय की अनिवार्यता सिद्ध करता है।
प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः
६०
यहाँ “प्रधान” शब्द का प्रयोग न होकर “गुण” शब्द का प्रयोग किया गया है।
इससे निन्दा और प्रशंसा दोनों का विधान संभव होता है।
यदि सब कुछ प्रधान (एकसमान) होता, तो मूल्यांकन असंभव हो जाता।
न्याय दर्शन गुण–दोष विवेक को अनिवार्य मानता है।
समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः
६१
इस सूत्र का तात्पर्य है कि आत्मा पर जो कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख-दुःख आदि का आरोप (समारोपण) किया जाता है,
वह आत्मा के अस्तित्व का निषेध नहीं करता।
जैसे रस्सी पर सर्प का आरोप रस्सी को नष्ट नहीं करता,
वैसे ही उपाधिजन्य भ्रान्ति आत्मा की वास्तविक सत्ता का खंडन नहीं कर सकती।
अतः आत्मा का निषेध असंगत है।
पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः
६२
यदि आत्मा न मानी जाए, तो कर्म, कर्ता, भोक्ता और फल — इन सबका समन्वय असंभव हो जाता है।
पात्रों की श्रृंखला (कर्ता–कर्म–फल) के बिना फलसिद्धि नहीं हो सकती।
इसलिए आत्मा के अभाव में नैतिक और कर्मसिद्धांत दोनों ध्वस्त हो जाते हैं।
सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभाववदपवर्गः
६३
गहरी निद्रा (सुषुप्ति) में न स्वप्न होता है, न क्लेश का अनुभव।
यह अवस्था यह संकेत देती है कि क्लेशों का पूर्ण अभाव संभव है।
जैसे सुषुप्ति में अस्थायी क्लेश-निवृत्ति होती है,
वैसे ही अपवर्ग (मोक्ष) में स्थायी क्लेश-निवृत्ति होती है।
न प्रवृत्तिः प्रतिसंधानाय हीनक्लेशस्य
६४
जिस अवस्था में क्लेश क्षीण हो जाते हैं,
वहाँ पुनर्जन्म के लिए आवश्यक प्रवृत्ति नहीं रहती।
क्योंकि कर्म और प्रवृत्ति का मूल कारण ही क्लेश हैं।
अतः क्लेशक्षय के बाद पुनः संसार-प्रवेश असंभव है।
न क्लेशसंततेः स्वाभाविकत्वात्
६५
क्लेशों की निरंतरता आत्मा का स्वभाव नहीं है।
यदि क्लेश स्वाभाविक होते, तो वे कभी समाप्त न होते।
क्लेश आगन्तुक (आगमजन्य) हैं, इसलिए साधना द्वारा नष्ट किए जा सकते हैं।
यह मोक्ष की सम्भावना को दृढ़ करता है।
प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत्स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम्
६६
जो वस्तु उत्पत्ति से पहले अभाव में थी, वह अनित्य होती है।
क्लेश भी उत्पन्न होते हैं, इसलिए वे अनित्य हैं।
यदि कोई वस्तु स्वाभाविक प्रतीत हो, तब भी उत्पत्तिशील होने से वह नित्य नहीं हो सकती।
अणुश्यामतानित्यत्ववद्वा
६७
जैसे सूक्ष्म कालेपन (अणु-श्यामता) का गुण स्थायी नहीं होता,
वैसे ही क्लेश भी स्थायी नहीं हैं।
यह दृष्टान्त यह स्पष्ट करता है कि सूक्ष्मता नित्यत्व की गारंटी नहीं है।
संकल्पनिमित्तत्वाच्च रागादीनाम्
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राग, द्वेष आदि संकल्प (मानसिक विकल्प) से उत्पन्न होते हैं।
जहाँ संकल्प का अभाव है, वहाँ राग-द्वेष भी नहीं रहते।
इसलिए ज्ञान द्वारा संकल्पनाश का मार्ग प्रशस्त होता है,
और यही अपवर्ग (मोक्ष) का निर्णायक साधन है।
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