तवामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरस्त्वां भरात्राय शम्या तनूरुचम |
तवं पुत्रो भवसि यस्ते.अविधत तवं सखा सुशेवः पास्याध्र्षः ||यह मंत्र अग्नि के सबसे कोमल, मानवीय और अंतरंग रूप को प्रकट करता है। यहाँ अग्नि देवता नहीं, पिता–पुत्र–मित्र–रक्षक सब कुछ एक साथ है।
तवामग्ने पितरमिष्टिभिर्नरः
त्वां भ्रात्राय शम्या तनूरुचम् ।
तवं पुत्रो भवसि यस्तेऽविधत
तवं सखा सुशेवः पास्यधृषः ॥
तवाम् अग्ने – हे अग्नि! तुम्हें
पितरम् – पिता के रूप में
इष्टिभिः – यज्ञों/भावनाओं द्वारा
नरः – मनुष्य
त्वाम् भ्रात्राय – तुम्हें भाई के रूप में
शम्या – सहायक, साथ चलने वाला
तनूरुचम् – शरीर को प्रकाश देने वाला
तवं पुत्रः भवसि – तुम पुत्र भी बन जाते हो
यः ते अविधत – जो तुम्हें स्थापित करता है, साधता है
तवं सखा – तुम मित्र हो
सुशेवः – अत्यंत कल्याणकारी
पासि – रक्षा करते हो
अधृषः – जिसे कोई परास्त नहीं कर सकता
हे अग्नि!
मनुष्य तुम्हें
अपने यज्ञ और भावना से
पिता मानते हैं।
तुम भाई की तरह
साथ चलते हो,
शरीर और जीवन को
ऊर्जा व तेज देते हो।
जो तुम्हें साधता है,
उसके लिए तुम
पुत्र बन जाते हो।
और तुम ऐसे मित्र हो
जो कल्याणकारी है,
सदैव रक्षा करता है,
जिसे कोई हरा नहीं सकता।
यह मंत्र कहता है—
मनुष्य जिन संबंधों से सुरक्षित महसूस करता है,
वे सभी अग्नि में समाहित हैं।
👉 अग्नि = Complete Relationship System
“तवं पुत्रो भवसि यस्तेऽविधत”
यह अत्यंत क्रांतिकारी वाक्य है।
👉 अर्थात:
जो जिम्मेदारी लेता है, वही उच्च होता है
जो व्यक्ति:
👉 वह बाहरी परिस्थितियों से पराजित नहीं होता।
यह मंत्र कहता है:
👉 अग्नि = Psychological Stability
यह मंत्र विशेष रूप से उपयोगी है जब:
यह मंत्र मानसिक शांति और आत्मबल देता है।
अब तक के मंत्रों में अग्नि थी:
👉 यहाँ अग्नि बनी: घर की आत्मा
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