तवमग्ने अदितिर्देव दाशुषे तवं होत्रा भारती वर्धसेगिरा |
तवमिळा षतहिमासि दक्षसे तवं वर्त्रहा वसुपते सरस्वती ||यह मंत्र अग्नि के समन्वयात्मक (Integrative) और पालनकर्ता स्वरूप को प्रकट करता है। यहाँ अग्नि एक देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण वैदिक तंत्र का केंद्र बन जाती है—अदिति, भारती, इळा और सरस्वती सब उसी में प्रतिष्ठित हैं।
तवम् अग्ने अदितिर्देव दाशुषे
तवं होत्रा भारती वर्धसे गिरा ।
तवम् इळा षतहिमा असि दक्षसे
तवं वृत्रहा वसुपते सरस्वती ॥
तवम् अग्ने – हे अग्नि! तुम ही
अदितिः – अखण्डता, अनन्त माता
देव दाशुषे – देवों को दान देने वाले के लिए
तवं होत्रा – यज्ञ के आवाहक
भारती – वाणी, प्रेरणा, स्मृति
वर्धसे गिरा – स्तुति/वाणी से बढ़ते हो
तवम् इळा – पोषण, पृथ्वी–शक्ति
षतहिमा असि – सौ गुना वृद्धि करने वाले
दक्षसे – कर्म–दक्षता के लिए
तवं वृत्रहा – बाधाओं को नष्ट करने वाले
वसुपते – ऐश्वर्य के स्वामी
सरस्वती – ज्ञान, विवेक और प्रवाह
हे अग्नि!
तुम दान करने वाले के लिए
अदिति जैसे अनन्त हो।
तुम यज्ञ के होत्र हो
और भारती (वाणी) द्वारा
विकसित होते हो।
तुम इळा हो—
जो कर्म–दक्षता को
सौ गुना बढ़ा देती है।
तुम बाधाओं का नाश करने वाले,
धन के स्वामी
और सरस्वती (ज्ञान) हो।
इस मंत्र में चार मूल शक्तियाँ हैं:
| शक्ति | अर्थ |
|---|---|
| अदिति | अनन्तता, सीमा का टूटना |
| भारती | वाणी, विचार, संचार |
| इळा | पोषण, संसाधन, स्थायित्व |
| सरस्वती | ज्ञान, विवेक, प्रवाह |
👉 अग्नि = इन चारों का केंद्र
वर्धसे गिरा
अग्नि स्तुति से नहीं,
सार्थक वाणी से बढ़ती है।
👉 आज के समय में:
यही “गिरा” है।
षतहिमा असि दक्षसे
यह सीधा Compound Growth Law है।
👉 दक्ष कर्म + अग्नि = 100x Output
वृत्रहा
वृत्र का अर्थ:
👉 अग्नि उन्हें तोड़ती है।
यह मंत्र कहता है:
👉 तभी समृद्धि टिकेगी।
यह मंत्र तब जपें जब:
अब तक अग्नि बनी:
👉 अगला मंत्र अग्नि को
साक्षी और नियामक बनाएगा।
अगर चाहें तो मैं:
में बदल दूँ।
बताइए—
अगला मंत्र लें या अब समापन दर्शन लिखें?
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