अब हम ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 1 के द्वितीय मंत्र —
अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।
स देवाँ एह वक्षति ॥२॥
विस्तृत, गहन, बहु-आयामी विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं।
इसमें हम चार आयामों में प्रवेश करेंगे:
अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।
स देवाँ एह वक्षति ॥
वह अग्नि, जो प्राचीन ऋषियों द्वारा भी स्तुत्य थी और वर्तमान साधकों द्वारा भी स्तुत्य है, वही अग्नि देवताओं को यहाँ लाती है।
लेकिन वेद कभी केवल सतही अर्थ तक सीमित नहीं रहते। यह मंत्र काल, ज्ञान, परंपरा, चेतना और दिव्यता के संबंध को उद्घाटित करता है।
यहाँ अग्नि केवल लौ नहीं है।
यह चेतना की वह ज्वाला है जो मानव विकास की मूल प्रेरणा है।
“पूर्वेभिः ऋषिभिः” — इसका अर्थ है कि यह चेतना आदिकाल से मानव में विद्यमान है।
“नूतनैः” — आज भी वही चेतना सक्रिय है।
इसका दार्शनिक निष्कर्ष:
सत्य समय से बंधा नहीं है।
चेतना युगों से समान है।
मनुष्य बदलता है, सभ्यता बदलती है, भाषा बदलती है —
लेकिन ज्ञान का मूल प्रकाश नहीं बदलता।
यह मंत्र अद्भुत रूप से आधुनिक है।
यह कहता है:
ज्ञान केवल अतीत का नहीं है।
ज्ञान केवल वर्तमान का भी नहीं है।
ज्ञान सनातन है।
पूर्वेभिः — परंपरा
नूतनैः — नवोन्मेष
वेद इन दोनों को विरोधी नहीं मानता।
बल्कि वेद कहता है:
जो सत्य है, वह हर युग में सत्य है।
यहाँ वेद “सनातन” की परिभाषा देता है —
जो कालातीत है।
ऋषि = “द्रष्टा”
जो सत्य को देखता है।
ऋषि वह नहीं जो केवल ग्रंथ पढ़े।
ऋषि वह है जो सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करे।
इस मंत्र का संदेश है:
यदि तुम्हारे भीतर अग्नि है,
तो तुम भी ऋषि हो सकते हो।
देव = जो प्रकाशित करे।
देव कोई केवल पौराणिक पात्र नहीं।
देव हैं:
जब भीतर अग्नि जलती है,
तो ये देवतुल्य गुण जीवन में प्रकट होते हैं।
इसलिए अग्नि देवों को “लाती” है।
अब इस मंत्र को आधुनिक विज्ञान के आलोक में देखें।
मानव विकास के तीन बड़े चरण:
पूर्वेभिः — आदिम मानव
नूतनैः — आधुनिक वैज्ञानिक
दोनों के केंद्र में ऊर्जा (अग्नि) है।
ऊर्जा संरक्षण का नियम कहता है:
ऊर्जा न उत्पन्न होती है, न नष्ट — केवल रूप बदलती है।
वेद कहता है:
अग्नि पूर्वजों द्वारा भी पूज्य थी,
आज भी पूज्य है।
अर्थात ऊर्जा का महत्व शाश्वत है।
सूर्य के केंद्र में परमाणु संलयन हो रहा है।
यदि सूर्य की अग्नि बुझ जाए:
अग्नि देवों को लाती है —
अर्थात जीवन के नियमों को सक्रिय करती है।
शरीर में जठराग्नि।
कोशिकाओं में ATP निर्माण।
मस्तिष्क में विद्युत आवेग।
यह सब सूक्ष्म अग्नि है।
वेद की भाषा प्रतीकात्मक है।
विज्ञान उसकी प्रक्रिया बताता है।
अब हम गहराई में प्रवेश करते हैं।
उपनिषद कहते हैं:
ब्रह्म ज्योति है।
अग्नि उस ज्योति का अनुभव योग्य रूप है।
ऋषियों ने अग्नि में ब्रह्म का दर्शन किया।
आज का साधक भी उसी प्रकाश में सत्य देख सकता है।
“पूर्वेभिः… नूतनैः” — यह ईश्वर की कालातीतता का प्रतीक है।
ईश्वर न पुराना है, न नया।
वह सनातन है।
अग्नि उसी सनातनता का दृश्य प्रतीक है।
यज्ञ में अग्नि देवताओं को बुलाती है।
आध्यात्मिक अर्थ:
जब साधक ध्यान की अग्नि जलाता है,
तो चेतना के उच्च स्तर प्रकट होते हैं।
देव = उच्च चेतना अवस्थाएँ।
ज्ञानाग्नि अज्ञान को जला देती है।
जब भीतर की अग्नि पूर्ण रूप से प्रकाशित होती है:
यह मोक्ष है।
अब तीनों आयामों को एक सूत्र में जोड़ते हैं।
| आयाम | अग्नि का अर्थ |
|---|---|
| ज्ञान | विवेक और चेतना |
| विज्ञान | ऊर्जा और परिवर्तन |
| ब्रह्मज्ञान | परम ज्योति |
तीनों में समान तत्व है — प्रकाश और गतिशीलता।
यह मंत्र समय का दर्शन भी है।
अतीत + वर्तमान = सनातन।
यदि सत्य केवल अतीत में है — तो वह मृत है।
यदि सत्य केवल वर्तमान में है — तो वह अस्थायी है।
यदि सत्य दोनों में है — तो वह सनातन है।
अग्नि सनातन है।
इस मंत्र से साधक के लिए संदेश:
अग्नि केवल तत्व नहीं — सिद्धांत है।
अग्नि =
जिसके भीतर अग्नि है, वही जीवित है।
जब ऋषि कहते हैं:
“अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत”
तो वे मानवता को यह संदेश दे रहे हैं:
सत्य न अतीत में कैद है,
न वर्तमान में सीमित है।
सत्य प्रकाश है —
जो युगों से जल रहा है।
और वही प्रकाश देवत्व को जीवन में लाता है।
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