अब हम ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 1, मंत्र 3 का विस्तृत और गहन विवेचन प्रस्तुत करते हैं — ज्ञान, विज्ञान, ब्रह्मज्ञान और समन्वित अग्नि-दर्शन के चार आयामों में।
अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे ।
यशसं वीरवत्तमम् ॥३॥
मनुष्य अग्नि के द्वारा धन, पोषण, प्रतिदिन वृद्धि, यश और वीर संतानों को प्राप्त करता है।
लेकिन यहाँ “धन” और “वीर” के अर्थ बहुस्तरीय हैं। वेद का अर्थ कभी केवल भौतिक नहीं होता।
अग्निना रयिमश्नवत अर्थ
Rigveda 1.1.3 meaning in Hindi
अग्नि से धन और यश
वैदिक समृद्धि का सिद्धांत
Agni and prosperity in Vedas
वेद में यश और वीरता
Vedic philosophy of wealth
अग्नि और विकास
ऋग्वेद 1.1.3 की विस्तृत व्याख्या हिंदी में
वेद में सच्ची संपत्ति क्या है
अग्नि से पोषण कैसे मिलता है
Vedic meaning of Rayi and Yasha
अग्नि और सतत विकास सिद्धांत
दिवे-दिवे पोषम् का अर्थ
वीरवत्तमम् का वैदिक अर्थ
यहाँ अग्नि को जीवन की मूल प्रेरक शक्ति माना गया है।
यदि मनुष्य के भीतर जिज्ञासा, तप, अनुशासन और उत्साह की अग्नि है —
तो वह जीवन में प्रगति करता है।
वेद में “रयि” केवल धन नहीं है।
रयि =
जिसके भीतर अग्नि है, वही इन आंतरिक संपत्तियों को प्राप्त करता है।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है — दिवे-दिवे।
अर्थ: प्रतिदिन।
वेद कहता है —
विकास एक दिन का कार्य नहीं।
निरंतर साधना ही सच्चा पोषण है।
ज्ञान की अग्नि रोज जलनी चाहिए।
यश केवल प्रसिद्धि नहीं है।
यश =
जब व्यक्ति अग्नि (सत्य-प्रेरणा) से जीवन जीता है —
तो यश स्वतः आता है।
वीर का अर्थ केवल योद्धा नहीं।
वीर =
अग्नि भीतर साहस जगाती है।
इसलिए अग्नि वीरता देती है।
वैज्ञानिक रूप में:
ऊर्जा ही उत्पादन का स्रोत है।
सब ऊर्जा पर आधारित हैं।
अग्निना रयिम् —
ऊर्जा से समृद्धि मिलती है।
शरीर भोजन को ऊर्जा में बदलता है।
यह जैविक अग्नि है।
यदि यह अग्नि कमजोर हो जाए:
अतः अग्नि = स्वास्थ्य का आधार।
आधुनिक अर्थशास्त्र कहता है:
सतत विकास (Sustainable Growth)
वेद पहले ही कहता है —
दिवे-दिवे पोषम्।
निरंतर संतुलित वृद्धि।
किसी भी राष्ट्र की शक्ति उसके वीरों में है।
वीर =
ऊर्जा और प्रेरणा से ही ऐसे लोग जन्म लेते हैं।
अब इस मंत्र को ब्रह्मविद्या के आलोक में देखें।
गीता कहती है:
ज्ञानाग्नि कर्मबंधन को जला देती है।
जब भीतर ज्ञानाग्नि जलती है:
आध्यात्मिक रयि क्या है?
अग्नि इन दिव्य संपत्तियों को प्रदान करती है।
आध्यात्मिक जीवन में:
यही दिवे-दिवे पोषण है।
आध्यात्मिक वीर वह है:
यह भी अग्नि का फल है।
अब तीनों आयामों को एक सूत्र में जोड़ते हैं।
| आयाम | अर्थ |
|---|---|
| ज्ञान | प्रेरणा और विवेक |
| विज्ञान | ऊर्जा और विकास |
| ब्रह्मज्ञान | आत्मप्रकाश और मुक्ति |
अग्नि = परिवर्तन की मूल शक्ति।
यह मंत्र हमें सिखाता है:
अग्नि केवल लौ नहीं —
जीवन की केंद्रीय शक्ति है।
जहाँ अग्नि है:
जहाँ अग्नि नहीं:
यह मंत्र हमें एक सार्वभौमिक नियम देता है:
ऊर्जा + अनुशासन + निरंतरता = समृद्धि।
यदि भीतर की अग्नि स्थिर और शुद्ध है —
तो जीवन में प्रतिदिन पोषण, यश और वीरता आती है।
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