एक ही वस्तु को देखने (दर्शन) और छूने (स्पर्शन) से जो एकरूप ज्ञान उत्पन्न होता है, वह इस बात का प्रमाण है कि ज्ञाता अनेक नहीं, एक ही है।
यदि देखने वाला और छूने वाला अलग-अलग आत्माएँ होतीं, तो ज्ञान में एकता नहीं होती।
इन्द्रिय-भेद के बावजूद अनुभव की एकता आत्मा की एकता को सिद्ध करती है।
विषयों के भिन्न-भिन्न होने से आत्माएँ भिन्न हों—ऐसी कोई अनिवार्य व्यवस्था नहीं।
एक ही आत्मा अनेक विषयों को जान सकती है, जैसे एक दीपक अनेक वस्तुओं को प्रकाशित करता है।
विषय-भेद आत्मा-भेद का प्रमाण नहीं है।
अनुभवों की नियमित व्यवस्था स्वयं आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती है।
इसलिए आत्मा का निषेध करना तर्कसंगत नहीं।
व्यवस्थित अनुभव = आत्मा का प्रमाण।
केवल शरीर के जलने से पाप नहीं लगता, क्योंकि पाप-पुण्य का आश्रय आत्मा है, शरीर नहीं।
यदि आत्मा जलती, तो दाह से पाप लगता, पर आत्मा नित्य है—उसका दाह असंभव है।
कार्य या शरीर के नष्ट होने से कर्ता आत्मा नष्ट नहीं होती।
“यह वही है जिसे मैंने पहले देखा था” — यह प्रत्यभिज्ञान एक ही आत्मा के कारण संभव है।
एक वस्तु में व्यवधान होने से दो वस्तुओं का भ्रम हो सकता है, पर वास्तविक द्वित्व नहीं होता।
यदि एक के नाश से दूसरे का भी नाश हो, तो दोनों एक ही सिद्ध होते हैं।
अवयव नष्ट होने पर भी समग्र वस्तु का अनुभव बना रहता है, इससे अवयवी का निषेध नहीं होता।
आत्मा के अस्तित्व का निषेध दृष्टान्तों से विरोध करता है।
जैसे—कुम्हार के बिना घट की उत्पत्ति नहीं होती, वैसे ही ज्ञाता आत्मा के बिना ज्ञान असंभव है।
लोक एवं शास्त्रीय दृष्टान्त आत्मा-सिद्धि के पक्ष में हैं, इसलिए आत्मा का निषेध असंगत है।
एक इन्द्रिय के विकार से दूसरी इन्द्रिय का ज्ञान बाधित होता है, जिससे ज्ञाता एक ही सिद्ध होता है।
यदि अनेक आत्माएँ होतीं, तो एक इन्द्रिय का विकार सभी ज्ञानों को प्रभावित न करता।
स्मृति सदैव किसी पूर्व अनुभव के विषय की होती है।
यदि आत्मा न होती, तो “मैंने पहले देखा था” — ऐसी स्मृति संभव न होती।
स्मृति स्वयं आत्मा के अस्तित्व की साक्षी है।
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न— ये सभी आत्मा के गुण हैं।
इन गुणों का प्रत्यक्ष अनुभव होने से आत्मा का निषेध असंभव हो जाता है।
आत्मा को जानने के कारण मन में संभव हैं।
मन आत्मा का उपकरण है, स्वयं आत्मा नहीं।
ज्ञाता और ज्ञान के साधनों में नामों का भेद मात्र है।
वास्तव में ज्ञान करने वाला एक ही आत्मा है।
ज्ञान की एकरूपता नियमबद्ध है और यह बिना अनुमान के प्रत्यक्ष सिद्ध होती है।
जन्म लेते ही शिशु में हर्ष, भय, शोक का अनुभव पूर्व जन्म की स्मृतियों के संस्कार से होता है।
यह आत्मा की निरन्तरता को सिद्ध करता है।
जैसे कमल का खुलना-बंद होना सूर्य पर निर्भर है, वैसे ही जागरण-निद्रा के विकार आत्मा के गुण हैं।
उष्णता, शीत, वर्षा, काल आदि पाँच विकारों के कारण नहीं हैं।
ये विकार आत्मा से सम्बद्ध हैं, प्राकृतिक तत्व मात्र नहीं।
नवजात शिशु जन्म लेते ही माता के स्तन्य की ओर आकृष्ट होता है। यह आकर्षण न तो शिक्षा से उत्पन्न है, न अनुभव से, क्योंकि जन्म के समय अनुभव का अभाव होता है। अतः यह प्रवृत्ति पूर्वजन्म के आहार-अभ्यास से उत्पन्न मानी जाती है। यह सिद्ध करता है कि आत्मा जन्म से पूर्व भी अस्तित्व में थी और उसमें संस्कार संचित थे। इस प्रकार यह सूत्र आत्मा के पूर्वजन्म और नित्यत्व का प्रमाण देता है।
जिस प्रकार लोहा स्वभावतः चुम्बक की ओर आकर्षित होता है, उसी प्रकार आत्मा अपने कर्म-संस्कारों के अनुसार उपयुक्त शरीर की ओर आकर्षित होती है। यह आकर्षण आकस्मिक नहीं, बल्कि नियमबद्ध और कारणसापेक्ष है। इससे सिद्ध होता है कि शरीर चेतना का कारण नहीं, अपितु आत्मा शरीर का आश्रय ग्रहण करती है।
आत्मा का किसी भी शरीर में अनियमित प्रवेश नहीं होता। यदि आत्मा न होती या चेतना आकस्मिक होती, तो जन्म-व्यवस्था पूर्णतः अव्यवस्थित होती। परन्तु ऐसा नहीं है। अतः जन्म एक नियमानुसार घटित होता है, जिसका आधार आत्मा और कर्म हैं।
यदि राग-द्वेष से रहित आत्मा का भी जन्म सम्भव होता, तो ऐसे उदाहरण दिखाई देते। किन्तु सभी जन्म राग-द्वेषयुक्त ही पाए जाते हैं। अतः राग-द्वेष जन्म के कारण हैं, और ये आत्मा के गुण हैं, शरीर के नहीं।
जिस प्रकार गुणयुक्त द्रव्य से गुणयुक्त पदार्थ की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार गुणयुक्त आत्मा से शरीर की उत्पत्ति होती है। इससे सिद्ध होता है कि शरीर चेतन नहीं, बल्कि चेतन आत्मा पर आधारित है।
राग, द्वेष, इच्छा आदि केवल वर्तमान संकल्प से उत्पन्न नहीं होते। इनके मूल में पूर्वसंस्कार होते हैं। अतः ये आत्मा के स्थायी गुण हैं, मन या शरीर के आकस्मिक विकार नहीं।
शरीर में गन्ध आदि गुणों की उपलब्धि से यह सिद्ध होता है कि शरीर पृथ्वी-तत्त्व से बना है। आत्मा इन गुणों से रहित है, इसलिए आत्मा भौतिक नहीं।
शरीर में उष्णता, पाचन आदि गुण पाए जाते हैं, जो अग्नि-तत्त्व के लक्षण हैं। इससे शरीर में तैजस तत्त्व की उपस्थिति सिद्ध होती है।
श्वास और प्रश्वास की क्रिया वायु-तत्त्व की उपस्थिति को सिद्ध करती है। अतः शरीर चार भूतों से युक्त है, परन्तु आत्मा उनसे भिन्न है।
गन्ध (पृथ्वी), क्लेद (जल), पाक (अग्नि), व्यूह (वायु) और अवकाश (आकाश) — इन पाँचों के लक्षण शरीर में पाए जाते हैं। अतः शरीर पाञ्चभौतिक है, जबकि आत्मा इन सबसे अतीत है।
श्रुति, अर्थात वेद और प्रमाणिक शास्त्र, ज्ञान प्राप्त करने का एक अनिवार्य स्रोत है। इस सूत्र के अनुसार, केवल अनुभव या अनुमान से ही नहीं, बल्कि श्रुति से भी ज्ञान की प्राप्ति होती है। श्रुति प्रामाणिक होती है क्योंकि यह अनादिकाल से ज्ञात और प्रमाणित परंपरा के आधार पर आती है। श्रुति का प्रमाण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्य केवल अनुभव और तर्क से सीमित ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यदि केवल प्रत्यक्ष और अनुमान से ही ज्ञान का आधार माना जाए, तो अतीत, भविष्य और दूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान संभव नहीं होगा। श्रुति के माध्यम से वेदज्ञ व्यक्ति वेदों में वर्णित सत्य, नियम, कर्म, और दैवीय तत्वों का अध्ययन करता है। इसलिए यह सूत्र स्पष्ट करता है कि श्रुति भी ज्ञान का प्रामाणिक साधन है।
यह सूत्र बताता है कि किसी वस्तु के प्रकट होने में दो कारणों से संशय उत्पन्न होता है: 1. **सत्युपलम्भ** — वस्तु के वास्तविक होने का अनुभव; 2. **विपरीत उपलम्भ** — उसके न होने का अभाव। यदि हम केवल प्रत्यक्ष पर भरोसा करें, तो कभी-कभी विपरीत संकेत मिलने से संशय उत्पन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, अंधेरे में कृष्णा का रूप देखना; कुछ वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं और कुछ भ्रम उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार, यह सूत्र ज्ञान प्राप्ति में उत्पन्न संशय और उसके कारणों की विवेचना करता है। ज्ञान की शुद्धता के लिए यह आवश्यक है कि उपलम्भों के विरोध और विपरीत दृष्टांतों का विवेकपूर्ण विश्लेषण किया जाए।
महद् अनुग्रहण का अर्थ है किसी बड़े और प्रमुख कारण का अनुभव या स्वीकार। जब कोई वस्तु अपने सामान्य गुणों और कारणों के अनुसार प्रकट होती है, तो उसका महत्त्व और प्रमाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाता है। उदाहरणतः यदि सूर्य की तेज किरणें दिन में दिखाई देती हैं, तो यह महत्त्वपूर्ण प्रमाण है कि सूर्य अस्तित्व में है। इस सूत्र का तात्पर्य है कि बड़े और सामान्य अनुभवों से ज्ञान की पुष्टि होती है, और यह हमें संशय से मुक्त करता है। महद अनुग्रहण केवल बाहरी अनुभव तक ही सीमित नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक अनुभवों में भी लागू होता है। इसलिए, यह सूत्र हमें बताता है कि ज्ञान के स्रोतों में बड़े प्रमाण और उनके उपलम्भ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
जब कोई वस्तु प्रकाश और उसके प्रभाव के कारण अनुभव होती है, तो यह संनिकर्ष से ज्ञात होती है। जैसे सूर्य की रश्मियाँ किसी वस्तु पर पड़ती हैं और उसकी उपस्थिति ज्ञात होती है। यह संकेत देता है कि ज्ञान केवल प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, बल्कि संकेतों और प्रभावों के संयोग से भी प्राप्त होता है। इस सूत्र में वर्णित संनिकर्ष विशेष ज्ञान के आधार को स्पष्ट करता है। उपलब्धि और अनुभूति के आधार पर वस्तु की स्थिति और स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार, यह सूत्र ज्ञान के गुण और उसके अभिप्राय को विस्तार से समझाता है।
यदि किसी वस्तु का अनुभव नहीं होता, तो उसके न होने का कारण भी नहीं माना जा सकता। अनुपलब्धि केवल वस्तु की अनुपस्थिति का ज्ञान देती है, लेकिन यह नकारात्मक प्रमाण के रूप में पर्याप्त नहीं है। उदाहरणतः अंधेरे में किसी वस्तु को न देखना, यह प्रमाण नहीं कि वह वस्तु अस्तित्वहीन है। इस सूत्र के अनुसार, केवल अनुपलब्धि के आधार पर निष्कर्ष निकालना अवैज्ञानिक है। ज्ञान की पुष्टि के लिए अन्य प्रमाण, संकेत और अनुभवों का भी विचार करना आवश्यक है। इस प्रकार यह सूत्र तर्क और प्रमाणिकता के महत्व को स्पष्ट करता है।
इस सूत्र में कहा गया है कि किसी वस्तु का प्रत्यक्ष न होना, उसकी अनुपलब्धि का कारण नहीं बनता। प्रत्यक्ष और अनुपलब्धि दो अलग-अलग पक्ष हैं। यदि किसी वस्तु का अनुमान या अनुभव नहीं हो, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह वस्तु न हो। उदाहरण: किसी गहरी घाटी में कोई पक्षी न दिखाई दे, इसका अर्थ नहीं कि वह पक्षी वहाँ नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञान में केवल प्रत्यक्ष पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अनुपलब्धि केवल तर्क और संकेत के माध्यम से ज्ञान के पूरक के रूप में काम करती है।
विभिन्न द्रव्यों और उनके गुणों के भेद से वस्तु की पहचान होती है। यह नियम बताता है कि प्रत्येक द्रव्य के गुण और उसके प्रभाव का ज्ञान अलग-अलग तरीके से प्राप्त होता है। उदाहरण: लोहा गर्म होता है, जल तरल है, अग्नि उष्ण है। इन गुणों और भेदों के आधार पर हम वस्तु की पहचान और अनुभव करते हैं। इस सूत्र से यह सिद्ध होता है कि ज्ञान में द्रव्य और गुण का विवेचन आवश्यक है।
विभिन्न द्रव्यों के समवाय और उनके विशेष रूपों के आधार पर वस्तु की रूप उपलभ्धि होती है। यह नियम बताता है कि अनुभव केवल एक द्रव्य या गुण से नहीं, बल्कि उनके संगम और विशेषताओं से प्राप्त होता है। उदाहरण: एक वायु और जल मिश्रित बादल का रूप अलग दिखाई देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान में अनुभव के लिए केवल पदार्थ नहीं, उनके गुण और उनके समवाय का भी अध्ययन आवश्यक है।
मनुष्य के कर्म और इंद्रियों की व्यवस्था, उसके पुरुषार्थ और लक्ष्यों के अनुसार होती है। कर्म और इंद्रिय क्रियाओं का यह तंत्र पुरुषार्थ सिद्धि के लिए कार्य करता है। इस सूत्र के अनुसार, प्रत्येक क्रिया और अनुभूति का उद्देश्य स्पष्ट और नियत होता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्ञान और अनुभव का आधार केवल आकस्मिक नहीं, बल्कि व्यवस्थित और कारणसापेक्ष होता है।
सूर्य के प्रकाश से दिन के मध्य में वस्तुओं का अनुभव होता है। यदि प्रकाश न हो, तो वस्तुओं की अनुपलब्धि होती है। यह सूत्र बताता है कि प्रकाश और समय की उपस्थिति ज्ञान प्राप्ति में अनिवार्य हैं। अनुपलब्धि केवल आंशिक और सापेक्ष कारण के रूप में कार्य करती है, पूर्ण निषेध का आधार नहीं बनती। इस प्रकार, ज्ञान के लिए प्रकाश, समय, और अन्य परिस्थितियों की भूमिका स्पष्ट होती है।
रात्रि में वस्तुओं का अनुभव न होना यह संकेत करता है कि उनका अस्तित्व संदिग्ध नहीं है। अनुपलब्धि केवल दृश्य या प्रत्यक्ष अनुभव की कमी है, न कि वस्तु के न होने का प्रमाण। उदाहरणतः अंधकार में कोई वृक्ष दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वृक्ष न हो। यह सूत्र स्पष्ट करता है कि ज्ञान की पुष्टि केवल अनुपलब्धि से नहीं की जा सकती। वस्तु के अस्तित्व की सत्यता अन्य प्रमाणों, संकेतों और परिस्थितियों से सिद्ध होती है। इस प्रकार, रात्रि में अनुपलब्धि केवल अनुभव की असमर्थता को दर्शाती है, वस्तु की सत्यता पर कोई प्रभाव नहीं डालती।
यह सूत्र बताता है कि बाहरी प्रकाश और उसके प्रभाव से ही वस्तु का अनुभव होता है। यदि प्रकाश नहीं हो, तो वस्तु अव्यक्त रहती है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वस्तु न हो। अनुभव केवल वाह्य कारण और प्रकाश के संयोग से होता है। उदाहरण: सूर्य की किरणें किसी वस्तु पर पड़ती हैं और हमें उसका ज्ञान होता है। यदि रात हो या प्रकाश की कमी हो, तो वस्तु दिखाई नहीं देती, परंतु उसका अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार, बाह्य प्रकाश अनुभव का माध्यम है, लेकिन वस्तु के अस्तित्व का निर्णय केवल अनुपलब्धि से नहीं किया जा सकता।
वस्तु जब प्रकट होती है, तो वह अभिव्यक्त होती है और उसका प्रभाव भी अनुभव होता है। यह सूत्र बताता है कि वस्तु के अभिव्यक्त होने पर उसकी स्थिति और प्रभाव से ज्ञान प्राप्त होता है। अभिभव का अर्थ है किसी वस्तु का उत्पन्न होना या उसका प्रकट होना। उदाहरणतः जब सूरज निकलता है, प्रकाश और ताप का अनुभव होता है। इस अनुभव से वस्तु के होने और उसके गुणों की पुष्टि होती है। इस सूत्र के अनुसार, ज्ञान केवल वस्तु के प्रकट होने से और उसके प्रभावों का अनुभव करके प्राप्त होता है।
रात्रि में नक्षत्रों और उनके प्रकाश की दृष्टि से वस्तुओं का अनुभव होता है। यह सूत्र बताता है कि अनुभव प्रकाश और दृष्टि के माध्यम से ही संभव है। यदि प्रकाश न हो, तो वस्तु अनुपलब्ध रहती है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि वस्तु नहीं है। उदाहरण: रात में तारे दिखाई देते हैं, लेकिन अन्य वस्तुएँ अंधकार में नहीं दिखतीं। इस प्रकार, ज्ञान की पुष्टि केवल अनुभव पर आधारित नहीं हो सकती, बल्कि अन्य प्रमाणों और संकेतों पर भी निर्भर करती है।
जब कोई वस्तु प्राप्त नहीं होती, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह न हो। उदाहरणतः कांच के पीछे रखी वस्तु दिखाई नहीं देती, परंतु वह अस्तित्व में होती है। इस सूत्र के अनुसार, अप्राप्य वस्तु की अनुपलब्धि केवल दृश्य बाधा के कारण है। अनुभव और ज्ञान में अवरोधक तत्वों का विवेचन आवश्यक है। इस प्रकार, यह सूत्र स्पष्ट करता है कि ज्ञान केवल दृश्य उपलब्धता पर आधारित नहीं हो सकता।
कुछ वस्तुएँ जैसे कुटी या अन्य माध्यमों से ढकी होती हैं। इनकी अनुपलब्धि वस्तु के न होने का प्रमाण नहीं है। अनुपलब्धि केवल अनुभव की असमर्थता को दर्शाती है। उदाहरण: किसी बंद घर में रखा सामान दिखाई नहीं देता, परंतु उसका अस्तित्व बना रहता है। इस सूत्र से यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान में अनुपलब्धि और न होने के बीच अंतर समझना आवश्यक है।
यदि किसी वस्तु का कोई बाधक या प्रभावकारी तत्व नहीं है, तो उसका अनुभव सामान्य संनिकर्ष से ही संभव है। यह सूत्र बताता है कि ज्ञान के लिए प्रत्येक वस्तु का अनुभव अवश्य नहीं होना चाहिए। अनुभव के बिना भी तर्क और संकेतों से वस्तु की सत्यता को जाना जा सकता है। उदाहरण: अंधेरे में कोई वस्तु दिखाई न दे, फिर भी उसके होने के संकेत मिल सकते हैं।
सूर्य की किरणों से स्फटिक के भीतर भी प्रकाश पहुँचता है, परंतु इससे स्फटिक का क्षरण या दाह नहीं होता। यह सूत्र वस्तु और उसके गुणों के अनुभव और प्रभाव का विवेचन करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रकाश और प्रभाव के अनुभव से वस्तु का नाश नहीं होता। इस प्रकार, ज्ञान और अनुभव के बीच संतुलन स्थापित होता है।
जब किसी वस्तु का अनुभव अन्य वस्तुओं से संबंध या तुलना में होता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि अनुभव अनुपलब्ध है। अनुभव केवल तुलना या प्रसंग के माध्यम से हो सकता है। इस सूत्र के अनुसार, अन्यतर प्रसंग ज्ञान और अनुभव को प्रभावित करते हैं। इसलिए वस्तु के अस्तित्व और गुणों के ज्ञान में प्रसंग का ध्यान रखना आवश्यक है।
वस्तु के आदर्श और प्रकटीकरण से उसका रूप और अनुभव स्पष्ट होता है। यह सूत्र बताता है कि वस्तु का रूप उसके गुणों और आदर्श स्वरूप से ज्ञात होता है। उदाहरण: सूर्य का प्रकाश और छाया किसी वस्तु पर पड़कर उसका रूप स्पष्ट करते हैं। इस प्रकार, ज्ञान का अनुभव वस्तु, प्रकाश और संदर्भ के सहयोग से संभव होता है। सूत्र स्पष्ट करता है कि उपलभ्धि केवल प्रत्यक्ष दृश्य से नहीं, बल्कि समग्र संकेतों से होती है।
यह सूत्र दृष्टानुमान और अनुमान के संयोजन के नियमों को स्पष्ट करता है। दृष्टानुमान का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमान का अर्थ है पूर्व ज्ञान या तर्क द्वारा वस्तु का ज्ञात होना। नियोजन प्रतिषेध का मतलब है कि किसी वस्तु के अनुभव और अनुमान के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने में विरोधाभाव नहीं होना चाहिए। यदि प्रत्यक्ष और अनुमान में विरोध हो, तो ज्ञान की पुष्टि नहीं हो सकती। उदाहरण: यदि किसी वस्तु को देखा जाता है और उसके गुण अनुमानित किए जाते हैं, तो ये दोनों सह-अस्तित्व में होते हैं। इस प्रकार, दृष्टानुमान और अनुमान के सहयोग से ही वस्तु के अस्तित्व और गुणों का सुनिश्चित ज्ञान प्राप्त होता है।
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि यदि किसी वस्तु के स्थान में भिन्नता होती है और उसमें विभिन्नता या अवयव नहीं होता, तो संशय उत्पन्न होता है। अर्थात् किसी वस्तु की विशेषता उसके स्थान और अवयव से जानी जाती है। यदि अवयव नहीं है और स्थान बदलता है, तो उसका ज्ञान संदिग्ध हो जाता है। उदाहरण: यदि एक ही वस्तु की छवि अलग-अलग स्थानों पर दिखाई देती है और उसके गुण समान नहीं हैं, तो उसके बारे में निष्कर्ष निकालना कठिन होता है। इस सूत्र के अनुसार, वस्तु की पहचान और ज्ञान के लिए स्थिरता और अवयव की उपस्थिति आवश्यक है।
त्वगव्यतिरेक का अर्थ है वस्तु की सततता और उसकी बाहरी आवरण से अंतर। यह सूत्र बताता है कि यदि त्वचा या बाहरी आवरण के कारण वस्तु का अनुभव अलग होता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वस्तु न हो। उदाहरण: अगर किसी फल का बाहरी छिलका कठोर है, परंतु अंदर उसका रस और गूदा है, तो अनुभव छिलके के आधार पर अलग हो सकता है। इस प्रकार, बाहरी आवरण और अंतर के कारण अनुभव में भिन्नता होने पर भी वस्तु का अस्तित्व सिद्ध रहता है।
इस सूत्र का अर्थ है कि यदि दो वस्तुएँ एक ही समय में उपलब्ध नहीं होतीं, तो यह केवल अनुभव की कमी को दर्शाता है, वस्तु के न होने का प्रमाण नहीं है। उदाहरण: यदि दो पत्तियां अलग-अलग समय में दिखाई देती हैं, तो यह उनके अस्तित्व में भिन्नता नहीं दर्शाता। ज्ञान का सिद्धांत यह है कि अनुभव का अभाव केवल समय या परिस्थिति के कारण हो सकता है। इस प्रकार, युगपद वस्तु की अनुपलब्धि उसके अस्तित्व के न होने का संकेत नहीं है।
यदि कोई वस्तु विप्रतिषेध के बावजूद एकत्व सिद्ध करती है, तो उसका अनुभव सुरक्षित है। विप्रतिषेध का अर्थ है विरोधाभास। इस सूत्र के अनुसार, विरोधाभास के बावजूद वस्तु का अनुभव और ज्ञान संभव है। उदाहरण: यदि किसी फल का आकार अलग-अलग दृष्टियों से भिन्न प्रतीत होता है, फिर भी उसकी पहचान एक ही वस्तु के रूप में होती है। इस प्रकार, ज्ञान और अनुभव के सिद्धांत में विरोधाभास के बावजूद वस्तु की सत्यता बनी रहती है।
इन्द्रिय और उनके उद्देश्य (वस्तु) पांच प्रकार के होते हैं। यह सूत्र बताता है कि ज्ञान प्राप्ति के लिए इन्द्रिय और उनके विषय का सामंजस्य आवश्यक है। उदाहरण: आंख, हाथ, कान, नाक और जीभ—ये पांच इन्द्रिय हैं जो दृष्टि, स्पर्श, श्रवण, गंध और स्वाद के लिए हैं। यदि इन्द्रिय और उनके उद्देश्य में सामंजस्य है, तो अनुभव सही होता है। इस प्रकार, ज्ञान की पुष्टि इन्द्रिय और उनके विषय के संयोजन पर निर्भर करती है।
वस्तु की बहुविधता का अर्थ यह नहीं कि उसका अनुभव असत्य या संदिग्ध है। यदि किसी वस्तु के कई रूप या गुण हों, तो भी उसका अनुभव सत्य माना जाता है। उदाहरण: एक ही फल का स्वाद मीठा, गंध सुगंधित और रंग लाल हो सकता है। इस प्रकार, बहुविध गुण होने पर भी ज्ञान में कोई भ्रम नहीं उत्पन्न होता।
गंध, स्वाद या अन्य गुणों के अलग होने से वस्तु का अनुभव प्रभावित नहीं होता। इस सूत्र बताता है कि किसी विशेष गुण के भिन्न होने पर भी वस्तु के अन्य गुणों से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण: यदि किसी फल की गंध अलग है, पर उसका स्वाद और रंग समान है, तो उसका अनुभव सत्य है। इस प्रकार, गुणों के व्यतिरेक से ज्ञान और अनुभव पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
यदि वस्तु का विषय (उद्देश्य) स्थिर है और उसमें भिन्नता नहीं है, तो उसका ज्ञान एकत्व सिद्ध करता है। अनुभव के आधार पर एकत्व और स्थायित्व सुनिश्चित होता है। उदाहरण: एक ही पानी का ग्लास अलग-अलग कोणों से देखा जाए, फिर भी उसका एकत्व नहीं बदलता। इस सूत्र के अनुसार, ज्ञान की पुष्टि स्थायित्व और विषय के अव्यतिरेक पर आधारित होती है।
ज्ञान और अनुभव केवल बुद्धि के लक्षण, वस्तु के आधार और पञ्चत्व के माध्यम से समझे जाते हैं। यह सूत्र बताता है कि बुद्धि की स्वाभाविक प्रक्रिया और पाँच इन्द्रिय अनुभव मिलकर वस्तु की सत्यता सिद्ध करते हैं। उदाहरण: किसी वस्तु को देखने, छूने और सुनने से हम उसके गुणों और स्वरूप का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार, बुद्धि और इन्द्रिय अनुभव के संयोजन से ही वस्तु का वास्तविक ज्ञान सुनिश्चित होता है।
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि प्रत्येक भौतिक वस्तु के गुणों का अनुभव उसके आत्मत्व या स्वभाव को दर्शाता है। भूतगुण, अर्थात् पदार्थ में विद्यमान विशिष्ट गुण, किसी भी वस्तु के पहचान और अस्तित्व के लिए निर्णायक हैं। व्याख्या में बताया गया है कि जब हम किसी पदार्थ के गुणों का अनुभव करते हैं—जैसे कठोरता, रंग, रूप, गंध, ताप—तो हम उसके आत्मत्व की पहचान करते हैं। यह ज्ञान न केवल प्रत्यक्ष इन्द्रिय अनुभव पर आधारित है बल्कि बुद्धि और अनुमान के समन्वय से पूर्ण होता है। इसके अलावा, प्रत्येक पदार्थ अपने गुणों में अद्वितीय होता है, और यही अद्वितीयता उसे अन्य पदार्थों से अलग करती है। इस प्रकार, भूतगुणों की विशिष्टता ही उसकी आत्मा या स्थायी स्वरूप की पुष्टि करती है।
सूत्र 62 बताता है कि पृथ्वी तत्व या पदार्थ की अनुभूति उसके पाँच मुख्य गुणों — गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द — तक सीमित होती है। न्याय दर्शन में प्रत्येक पदार्थ की अनुभूति उसके गुणों और क्रियाओं के माध्यम से होती है। उदाहरण के लिए, मिट्टी का अनुभव केवल उसका रंग, बनावट, गंध, स्वाद और ध्वनि से किया जा सकता है। इस सूत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि प्रत्यक्ष अनुभव का आधार पदार्थ के गुण और संवेदी प्रभाव हैं। कोई भी वस्तु बिना इन गुणों के ज्ञात नहीं हो सकती। यही कारण है कि न्यायशास्त्र में प्रत्यक्ष प्रमाण (प्रत्यक्षा) का महत्व अत्यधिक माना गया है। यह सूत्र पदार्थों की वास्तविकता और अनुभव के लिए आवश्यक तत्वों को विस्तार से समझाता है।
सूत्र 63 यह बताता है कि पदार्थों के गुण और प्रभाव उनके पूर्वगामी कारणों और स्थितियों पर निर्भर करते हैं। न्याय दर्शन में अप्त (सटीक) ज्ञान का आधार यह है कि कोई भी वस्तु या गुण अपने पूर्वगामी तत्वों से उत्पन्न होता है। उदाहरण स्वरूप, अग्नि की गर्मी और प्रकाश उसके ईंधन, हवा और परिस्थिति से जुड़ी होती है। इसी प्रकार, जल, वायु और आकाश की क्रियाएँ उनके स्वभाव और पूर्वगामी कारकों पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार, प्रत्येक घटना या वस्तु के अनुभव में पूर्वगामी कारकों का योगदान महत्वपूर्ण होता है। यह सूत्र कारण और प्रभाव के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है और प्रत्यक्ष ज्ञान के सिद्धांत को न्याय दर्शन में मजबूत करता है।
सूत्र 64 यह दर्शाता है कि किसी भी पदार्थ के सभी गुण एक साथ प्रत्यक्ष नहीं किए जा सकते। न्याय दर्शन में प्रत्येक वस्तु के गुणों का अनुभव सीमित संवेदी साधनों से होता है। उदाहरण के लिए, किसी फल का अनुभव केवल उसका स्वाद, गंध, रूप और स्पर्श देखकर नहीं किया जा सकता, बल्कि उसे खाकर ही पूर्ण रूप से समझा जा सकता है। इसी प्रकार, वस्तुओं के गुणों का अनुभव क्रमशः और उपयुक्त माध्यम से ही संभव है। यह सूत्र पदार्थ के गुणों और उनका अनुभव के बीच संबंध को स्पष्ट करता है और प्रत्यक्ष ज्ञान की सीमा को इंगित करता है।
सूत्र 65 यह बताता है कि पदार्थों और घटनाओं के गुण क्रमिक रूप से अनुभव किए जाते हैं। प्रत्येक वस्तु या पदार्थ का गुण केवल उसके उचित क्रम और स्थिति के अनुसार ज्ञात होता है। उदाहरण के लिए, किसी पौधे का विकास उसके बीज, मिट्टी, पानी और सूर्य के क्रमिक प्रभाव से होता है। इसी प्रकार, पदार्थों के गुण और उनके अनुभव भी क्रमिक और अनुक्रमित होते हैं। न्याय दर्शन में यह दृष्टिकोण पदार्थों की सटीकता और अनुभव के क्रम को स्पष्ट करता है।
सूत्र 66 यह बताता है कि पदार्थों और घटनाओं का अनुभव उनकी परंपरा या श्रृंखला में होने वाले क्रमिक संपर्क से होता है। न्याय दर्शन में प्रत्येक पदार्थ या घटना का परिणाम उसके पूर्वगामी कारणों और उनके अनुक्रम से जुड़ा होता है। उदाहरण स्वरूप, किसी नदी के प्रवाह या मौसम की घटनाओं का अनुभव केवल उनके क्रमिक विकास और श्रृंखला से ही संभव है। यह सूत्र क्रम और कारण-फल के संबंध को न्याय दर्शन में स्पष्ट करता है और प्रत्यक्ष अनुभव के महत्व को बताता है।
सूत्र 67 स्पष्ट करता है कि पृथ्वी और धातुओं जैसे पदार्थों के गुण सभी समय प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात नहीं हो सकते। न्याय दर्शन में प्रत्येक पदार्थ का अनुभव उसकी स्थिरता, समय और स्थिति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, मिट्टी या धातु के अणु या सूक्ष्म गुण बिना प्रयोग और निरीक्षण के ज्ञात नहीं हो सकते। इसलिए यह सूत्र प्रत्यक्ष ज्ञान की सीमा और पदार्थों के गुणों की अनुभवीयता को बताता है।
सूत्र 68 यह बताता है कि प्रत्येक पदार्थ का प्रधान गुण उसके पूर्वगामी गुणों के उत्कर्ष से उत्पन्न होता है। न्याय दर्शन में यह कारण और प्रभाव के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। उदाहरण स्वरूप, किसी पौधे की गुणवत्ता उसके बीज और मिट्टी के गुणों से निर्धारित होती है। इसी प्रकार, किसी पदार्थ के गुण उसके पूर्वगामी घटकों और स्थितियों पर निर्भर होते हैं।
सूत्र 69 बताता है कि किसी पदार्थ का व्यवस्थित और पूर्ण रूप से अनुभव तभी संभव है जब उसके पूर्वगामी और सहयोगी कारण भी व्यवस्थित हों। उदाहरण के लिए, किसी भवन का निर्माण तभी सफल होगा जब सामग्री, श्रमिक और योजना सभी ठीक ढंग से व्यवस्थित हों। यही न्याय दर्शन में पदार्थ और घटनाओं के व्यवस्थित अनुभव का सिद्धांत है।
सूत्र 70 स्पष्ट करता है कि प्रत्येक पदार्थ का अनुभव उसके गुणों और इन्द्रियों के संबंध से होता है। न्याय दर्शन में प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान केवल उसके गुणों के माध्यम से ही सम्भव है। उदाहरण स्वरूप, किसी फल का स्वाद, गंध और रूप उसके गुणों से ही ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्य पदार्थ भी इन्द्रियों के अनुभव से ही स्पष्ट होते हैं।
सूत्र 71 का अर्थ है कि किसी पदार्थ या घटना का अनुभव और ग्रहण केवल उसके गुणों और इन्द्रियों के संयोजन से ही संभव है। न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष ज्ञान केवल गुण और संवेदी अनुभव से सिद्ध होता है। उदाहरण स्वरूप, किसी वस्तु का रंग, रूप और स्पर्श केवल गुणों और इन्द्रियों के माध्यम से ही ज्ञात होता है।
सूत्र 72 यह स्पष्ट करता है कि केवल शब्द या ध्वनि द्वारा किसी वस्तु के गुणों का अनुभव संभव नहीं है। न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष अनुभव के लिए गुणों का होना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, किसी फल का स्वाद या गंध केवल उसके नाम से ज्ञात नहीं हो सकता। यही कारण है कि अनुभव और प्रत्यक्षता का महत्व न्याय दर्शन में अत्यधिक माना गया है।
सूत्र 73 बताता है कि किसी वस्तु या पदार्थ का अनुभव केवल उसके वास्तविक गुणों से संभव है। अन्य किसी पदार्थ के गुणों के आधार पर किसी वस्तु का अनुभव करना न्याय और तर्क के अनुसार उचित नहीं है। उदाहरण स्वरूप, किसी फल का अनुभव केवल उसी फल के गुणों से होना चाहिए, न कि किसी अन्य वस्तु के गुणों से। यह सूत्र न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष अनुभव और पदार्थ के वास्तविक गुणों के महत्व को स्पष्ट करता है।
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