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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Mimansa Darshan Chapter 9.1

Mimansa Darshan 9.1 (1–58) Detailed Explanation

Mimansa Darshan – Chapter 9.1 (Sutra 1–58) Detailed Explanation

९,१.१ — यज्ञकर्म प्रधानं तद्धि चोदनाभूतं तस्य द्रव्येषु संस्कारस्तत्प्रयुक्तस्तदर्थत्वात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
यज्ञकर्म ही प्रधान है, क्योंकि वही चोदना (वेद की आज्ञा) का प्रत्यक्ष विषय है। द्रव्य (हवि, सोम, आदि) और उनके संस्कार (शुद्धि, प्रोक्षण, तैयारी) यज्ञ के लिए ही होते हैं। इसलिए संस्कार द्रव्य के लिए नहीं, बल्कि यज्ञ की सिद्धि के लिए हैं। मीमांसा सिद्धांत: जिसे वेद सीधे आज्ञा देता है वही प्रधान (मुख्य) होता है; अन्य सब (द्रव्य, संस्कार, उपकरण) उसके साधन मात्र हैं।

English:
The sacrificial act (yajña) is primary because it is directly enjoined by scripture. The preparation and sanctification of materials are subsidiary, serving the sacrifice.
९,१.२ — संस्कारे युज्यमानानां तादर्थ्यात्तत्प्रयुक्तं स्यात्
हिन्दी:
संस्कार जिन वस्तुओं पर किए जाते हैं, वे भी उसी प्रयोजन (यज्ञ) के लिए हैं। अतः उनका प्रयोजन यज्ञ के अधीन है।

English:
Objects undergoing consecration are employed solely for the sake of the sacrifice.
९,१.३ — तेन त्वर्थेन यज्ञस्य संयोगाद्धर्मसम्बन्धस्तस्माद्यज्ञ प्रयुक्तं स्यात्संस्कारस्य तदर्थत्वात्
हिन्दी:
यज्ञ का धर्म (अदृष्ट फल) से संबंध है। संस्कार इसलिए किए जाते हैं कि यज्ञ धर्म से जुड़ सके। अतः संस्कार का प्रयोजन भी यज्ञ की सिद्धि है।

English:
Through the sacrifice, a connection with dharma (unseen merit) is established. Consecrations serve this purpose by enabling the sacrifice.
९,१.४ — फलदेवतयोश्च
हिन्दी:
यज्ञ का संबंध फल और देवता दोनों से है। देवता यज्ञ की अधिष्ठात्री शक्ति है, और फल उसका परिणाम।

English:
The sacrifice relates both to its deity and to its result.
९,१.५ — न चोदनाती हि ताद्गुण्यम्
हिन्दी:
देवता प्रधान नहीं, क्योंकि वे चोदना (प्रत्यक्ष आज्ञा) का विषय नहीं। उनका स्थान गुण (अंग) के रूप में है।

English:
The deity is not primary, as it is not directly enjoined; it functions as a subsidiary factor.
९,१.६ — देवता वा प्रयोजयेदतिथिवद्भोजनस्य तदर्थत्वात्
हिन्दी (उदाहरण सहित):
कोई कह सकता है कि देवता ही प्रेरक है, जैसे अतिथि के लिए भोजन तैयार किया जाता है। परंतु भोजन का प्रधान उद्देश्य क्रिया है, अतिथि तो उसका आश्रय है।

English:
One may argue that the deity motivates the act, like a guest for whom food is prepared. Yet the act (cooking) remains primary.
९,१.७ — अर्थापत्त्याच
हिन्दी:
अर्थापत्ति (अनुमान) से भी यही सिद्ध होता है कि यज्ञ प्रधान है। यदि यज्ञ न हो, तो देवता-फल संबंध स्थापित नहीं होगा।

English:
By postulation (arthāpatti), it is inferred that sacrifice is primary.
९,१.८ — ततश्च तेन सम्बन्धः
हिन्दी:
इसी कारण देवता और फल का संबंध यज्ञ के माध्यम से है।

English:
Thus, the relation of deity and result is mediated through sacrifice.
९,१.९ — अपि वा शब्दपूर्वत्वाद्यज्ञकर्म प्रधानं स्याद्गुणत्वे देवताश्रुतिः
हिन्दी:
शब्द (वेद-वचन) में यज्ञ का पहले उल्लेख है, देवता का उल्लेख गुणरूप से है। इससे यज्ञ का प्रधानत्व सिद्ध होता है।

English:
Since the verbal injunction primarily addresses the sacrifice, and the deity is mentioned secondarily, the sacrifice is primary.
९,१.१० — अतिथौ तत्प्रधानत्वमभावः कर्मणि स्यात्तस्य प्रीतिप्रधानत्वात्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
अतिथि-उदाहरण में भी अतिथि प्रधान नहीं, बल्कि उसकी प्रीति (संतोष) मुख्य है। इसी प्रकार यज्ञ में देवता नहीं, बल्कि कर्म (यज्ञक्रिया) ही प्रधान है। मीमांसा निष्कर्ष: प्रधान वह है जो चोदना का विषय हो और जो धर्म-सिद्धि कराए। देवता, द्रव्य, संस्कार — सभी यज्ञ के अधीन अंग हैं।

English:
Even in the guest example, the guest is not primary; rather, pleasing him is the aim. Likewise, in sacrifice, the act itself is primary—not the deity. All else functions as subsidiary.
Mimansa Darshan 9.1 (11–20) Detailed Explanation
९,१.११ — द्रव्यसंख्याहितुसमुदायं वा श्रुतिसंयोगात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
श्रुति में द्रव्य, संख्या और हेतु (कारण) का जो संयोग मिलता है, उससे यह समझना चाहिए कि इनका एक समुच्चय (समुदाय) है। अर्थात् वे अलग-अलग स्वतंत्र तत्व नहीं, बल्कि यज्ञ में एक संयुक्त व्यवस्था के रूप में प्रयुक्त होते हैं। मीमांसा सिद्धांत: जहाँ श्रुति संयुक्त रूप से उल्लेख करे, वहाँ समुच्चय ग्रहण किया जाता है।

English:
When scripture connects substance, number, and purpose together, they are to be taken as a unified aggregate within the sacrifice.
९,१.१२ — अर्थकारिते च द्रव्येण न व्यवस्था स्यात्
हिन्दी:
यदि केवल द्रव्य को ही अर्थ-कारक (उद्देश्य-साधक) मान लिया जाए, तो व्यवस्था (सुसंगति) नहीं रहेगी। क्योंकि द्रव्य अपने आप में धर्म का साधक नहीं, वह यज्ञ के माध्यम से ही फलदायक होता है।

English:
If substance alone were considered the cause of the result, coherence would fail; it functions only through the sacrifice.
९,१.१३ — अर्थो वा स्यात्प्रयोजनमितरेषामचोदनात्तस्य च गुणभूतत्वात्
हिन्दी:
मुख्य प्रयोजन (अर्थ) यज्ञ ही है। अन्य (द्रव्य, संख्या आदि) प्रत्यक्ष चोदना के विषय नहीं हैं, अतः वे गुण (अंग) के रूप में हैं।

English:
The purpose belongs primarily to the sacrifice; other elements are subsidiary, as they are not directly enjoined.
९,१.१४ — अपूर्वत्वाद्व्यवस्था स्यात्
हिन्दी:
अपूर्व (अदृष्ट फल) की सिद्धि के कारण ही व्यवस्था स्थापित होती है। यज्ञ के द्वारा जो नया धर्म (अपूर्व) उत्पन्न होता है, उसी के लिए सभी अंग व्यवस्थित हैं।

English:
Order is established because of the production of apūrva (unseen potency), generated through sacrifice.
९,१.१५ — तत्प्रयुक्तत्वे च धर्मस्य सर्वविषयत्वम्
हिन्दी:
जब धर्म यज्ञ से प्रवृत्त होता है, तो उसका संबंध सभी अंगों से हो जाता है। इसलिए धर्म का सर्वविषयत्व (सभी से संबद्ध होना) सिद्ध होता है।

English:
Since dharma arises from sacrifice, it extends to all connected elements.
९,१.१६ — तद्यक्तस्येति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि यह केवल व्यक्त (विशिष्ट) यज्ञ तक सीमित है—

English:
If it is argued that this applies only to a specific instance—
९,१.१७ — नाश्रुतित्वात्
हिन्दी:
तो उत्तर — ऐसा श्रुति में नहीं कहा गया है। अतः सीमित करना उचित नहीं।

English:
No; scripture does not restrict it in that way.
९,१.१८ — अधिकारादिति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि यह अधिकार (विशेष पात्रता) से सीमित है—

English:
If it is argued that eligibility (adhikāra) limits it—
९,१.१९ — तुल्येषु नाधिकारः स्यादचोदितश्च सम्बन्धः पृथक्सतां यज्ञार्थेनाभिसम्बन्धस्तस्माद्यज्ञप्रयोजनम्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
जहाँ सब समान हैं, वहाँ अधिकार-भेद नहीं माना जाएगा। और पृथक् स्थित अंगों का संबंध भी प्रत्यक्ष चोदना से नहीं, बल्कि यज्ञार्थ (यज्ञ के प्रयोजन) से है। अतः सबका अंतिम प्रयोजन यज्ञ ही है।

English:
Among equals, no special eligibility applies. Separate elements are connected not independently but through the purpose of sacrifice. Thus, sacrifice alone is the ultimate aim.
९,१.२० — देशबद्धमुपांशुत्वं तेषां स्याछ्रुतिनिर्देशात्तस्य च तत्रभावात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
जहाँ श्रुति किसी क्रिया को उपांशु (मंद स्वर में) करने का निर्देश देती है, वह विशेष देश (स्थान) से बंधा हुआ माना जाएगा। और जहाँ ऐसा निर्देश नहीं, वहाँ वह लागू नहीं होगा। मीमांसा सिद्धांत: विधि केवल उसी स्थान और प्रसंग में मान्य होती है जहाँ श्रुति उसका स्पष्ट निर्देश करे।

English:
When scripture prescribes a low-voiced (upāṃśu) performance, it is restricted to that specific context. Without explicit mention, it does not apply elsewhere.
Mimansa Darshan 9.1 (21–30) Detailed Explanation
९,१.२१ — यज्ञस्य वा तत्संयोगात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
या यह सब यज्ञ का ही अंग माना जाए, क्योंकि उसका उससे संयोग है। मीमांसा का नियम है—जिसका प्रधान (यज्ञ) से अविनाभाव संबंध हो, वह उसी के अधीन समझा जाता है। अतः द्रव्य, संस्कार, उपांग आदि का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं, वे यज्ञ के साथ जुड़े होने से उसी के अंग हैं।

English:
Alternatively, all these belong to the sacrifice itself due to their inseparable connection with it.
९,१.२२ — अनुवादश्च तदर्थवत्
हिन्दी:
जो कथन पुनः आता है (अनुवाद), वह भी यज्ञ के अर्थ को ही पुष्ट करता है। अर्थात् पुनरुक्ति निरर्थक नहीं, बल्कि यज्ञप्रधानता को दृढ़ करती है।

English:
Repetition (anuvāda) serves to reinforce the purpose of the sacrifice.
९,१.२३ — प्रणीतादि तथेति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि ‘प्रणीत’ आदि भी उसी प्रकार स्वतंत्र माने जाएँ—

English:
If it is argued that elements like the Pranīta-water are independent—
९,१.२४ — न यज्ञस्याश्रुतित्वात्
हिन्दी:
उत्तर—नहीं, क्योंकि वे यज्ञ से पृथक् रूप में श्रुति में निर्दिष्ट नहीं। इसलिए उनका प्रधानत्व सिद्ध नहीं होता।

English:
No; they are not enjoined separately from the sacrifice.
९,१.२५ — तद्देशानां वा संघातस्य चोदितत्वात्
हिन्दी:
उनके देश (स्थान) और समूह (संघात) का ही चोदन है। अर्थात् वे अपने-अपने स्थान पर यज्ञ के समूह का भाग हैं।

English:
Their location and collective grouping are what is enjoined, as parts of the sacrificial whole.
९,१.२६ — अग्निधर्मः प्रतिष्ठकं संघातात्पौर्णमासीवत्
हिन्दी (उदाहरण सहित):
अग्नि का धर्म (विशेषता) पूरे संघात को प्रतिष्ठित करता है, जैसे पौर्णमासी यज्ञ में अग्नि की प्रधानता पूरे अनुष्ठान को स्थिर करती है। यह दर्शाता है कि कुछ तत्व संघात (समूह) के आधार बनते हैं।

English:
The property of fire sustains the collective whole, as in the Paurṇamāsa sacrifice.
९,१.२७ — अग्नेर्वा स्याद्द्रव्यैकत्वादितरासां तदर्थत्वात्
हिन्दी:
या अग्नि का प्रधानत्व इसलिए हो सकता है कि द्रव्य-एकत्व उसी में है। अन्य सब उसी के लिए (तदर्थ) हैं।

English:
Fire may be considered central, since the unity of substances depends upon it.
९,१.२८ — चोदनासमुदायात्तु पौर्ण मास्यां तथा स्यात्
हिन्दी:
पौर्णमासी यज्ञ में अनेक चोदनाओं के समुदाय से यह व्यवस्था सिद्ध होती है। अर्थात् जब अनेक विधियाँ मिलकर एक अनुष्ठान बनाती हैं, तो वे एक समष्टि के रूप में ग्रहण की जाती हैं।

English:
In the Paurṇamāsa rite, the collective force of injunctions establishes this unity.
९,१.२९ — पत्नीसंयाजान्तत्वं सर्वेषामविशेषात्
हिन्दी:
सभी यज्ञों का अंत पत्नीसंयाज से होता है, क्योंकि इसमें कोई विशेष भेद निर्दिष्ट नहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि पत्नीसंयाज समष्टिगत समापन-अंग है।

English:
All sacrifices conclude with the Patnīsaṃyāja, as no distinction is specified.
९,१.३० — लिङ्गाद्वा प्रागुत्तमात्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
या लिङ्ग (संकेत) के आधार पर यह समझा जाता है कि उत्तम (अंतिम) से पूर्व के अंग उसी की ओर अग्रसर हैं। अर्थात् अंतिम अंग (पत्नीसंयाज) समापन-सूचक है। मीमांसा सिद्धांत: जहाँ प्रत्यक्ष चोदना न हो, वहाँ लिङ्ग (संकेत), प्रसंग और क्रम से अर्थ ग्रहण किया जाता है।

English:
Or by contextual indication, earlier elements are understood to culminate in the final act.
Mimansa Darshan 9.1 (31–43) Detailed Explanation
९,१.३१ — अनुवादो वा दीक्षायाः यथा नक्तं संस्थापनस्य
हिन्दी:
यह कथन दीक्षा का अनुवाद (पुनरुक्ति) भी हो सकता है, जैसे ‘नक्तम्’ (रात्रि में) संस्थापन के प्रसंग में आता है। अर्थात् पुनः कथन का उद्देश्य नया विधान नहीं, बल्कि पूर्व विधि की पुष्टि है।

English:
This may be a reiteration of initiation (dīkṣā), just as “at night” reiterates the context of installation.
९,१.३२ — स्याद्वा अनारभ्य विधानादन्ते लिङ्गविरोधात्
हिन्दी:
या आरम्भ से पृथक् विधान होने के कारण, अंत में लिङ्ग (संकेत) के विरोध से उसका पृथक अर्थ ग्रहण होगा। मीमांसा में जहाँ लिङ्ग विरोध हो, वहाँ पृथक् अर्थ ग्रहण किया जाता है।

English:
Or it may be a separate injunction, due to contextual opposition indicated at the conclusion.
९,१.३३ — अभ्यासः सामिधेनीनां प्राथम्यात्स्थानधर्मः स्यात्
हिन्दी:
सामिधेनी मन्त्रों की पुनरावृत्ति (अभ्यास) उनके प्रारम्भिक स्थान के कारण है। अर्थात् उनका बार-बार प्रयोग स्थानधर्म (स्थान की विशेषता) है।

English:
The repetition of the Sāmidhenī mantras arises from their primary positional role.
९,१.३४ — इष्ट्यावृतौ प्रयाजवदावर्तेतारम्भणीया
हिन्दी:
इष्टि की पुनरावृत्ति में, प्रयाज की भाँति आरम्भणीय क्रियाएँ दोहराई जाएँगी। अर्थात् पुनरारम्भ में प्रारम्भिक अंग भी पुनः होंगे।

English:
In the repetition of an iṣṭi, the preliminary rites recur like the prayājas.
९,१.३५ — सकृद्वा आरम्भसंयोगादेकः पुनरारम्भो यावज्जीवप्रयोगात्
हिन्दी:
या आरम्भ से जुड़े होने के कारण वह एक बार ही हो, और पुनरारम्भ जीवनपर्यंत प्रयोग में रहे। यह दर्शाता है कि कुछ कर्म एकबारगी होते हैं, पर उनका प्रभाव दीर्घकालिक होता है।

English:
Or being connected with the initial act, it is performed once, though its effect endures throughout life.
९,१.३६ — अर्थाभिधानसंयोगान्मन्त्रेषु शेषभावः स्यात्तत्राचोदितमप्राप्तं चोदिताभिधानात्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
मन्त्र अर्थ और अभिधान (उच्चारण) से जुड़े होते हैं। इसलिए वे शेष (अंग) रूप में माने जाएँगे। जहाँ कोई कर्म सीधे चोदित न हो, वहाँ मंत्र के माध्यम से उसका संकेत प्राप्त होता है।

English:
Mantras, connected with meaning and expression, function as subsidiary elements. Even if not directly enjoined, they gain force through their verbal indication.
९,१.३७ — ततश्चावचनं तेषामितरार्थं प्रयुज्यते
हिन्दी:
इससे यह सिद्ध होता है कि जहाँ उनका पृथक् उल्लेख न हो, वहाँ वे अन्य प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होते हैं।

English:
Thus, even without explicit mention, they may serve another related purpose.
९,१.३८ — गुणशब्दस्तथेति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि ‘गुण’ शब्द से उनका गौणत्व सिद्ध है—

English:
If it is argued that the term “quality” proves their subordination—
९,१.३९ — न समवायात्
हिन्दी:
उत्तर—नहीं, क्योंकि वे समवाय (अविभाज्य संबंध) से जुड़े हैं। अर्थात् वे केवल गौण नहीं, बल्कि अविनाभाव से संबंधित हैं।

English:
No; because of their inseparable connection (samavāya).
९,१.४० — चोदिते तु परार्थत्वाद्विधिवदविकारः स्यात्
हिन्दी:
जो प्रत्यक्ष चोदित है और परार्थ (दूसरे के लिए) है, वह विधि के समान अविकार (अपरिवर्तनीय) होगा।

English:
What is directly enjoined for another’s purpose remains unaltered like a primary injunction.
९,१.४१ — विकारस्तत्प्रधाने स्यात्
हिन्दी:
परंतु जहाँ वह स्वयं प्रधान हो जाए, वहाँ विकार (परिवर्तन) संभव है।

English:
Modification occurs only when it becomes principal.
९,१.४२ — असंयोगात्तदर्थेषु तद्विशिष्टं प्रतीयेत
हिन्दी:
जहाँ संयोग नहीं है, वहाँ वह विशेष अर्थ से ग्रहण किया जाएगा। अर्थात् प्रसंग के अनुसार भिन्नता मानी जाएगी।

English:
In absence of connection, it is understood in a distinct sense.
९,१.४३ — कर्माभावादेवमिति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि कर्म के अभाव से ऐसा है— तो यह केवल अनुमान है; वास्तव में चोदना ही प्रधान कारण है। मीमांसा निष्कर्ष: कर्म, मन्त्र, द्रव्य और संस्कार— इन सबका मूल्य उनके चोदना-संबंध और प्रधान-अंग संबंध से निर्धारित होता है।

English:
If argued that this is due to absence of action— it is merely inferential; the injunction remains decisive.
Mimansa Darshan 9.1 (44–58) Detailed Explanation
९,१.४४ — न परार्थत्वात्
हिन्दी:
यह प्रधान नहीं है, क्योंकि यह परार्थ (दूसरे के लिए) है। मीमांसा का सिद्धांत है—जो स्वयं के लिए न होकर किसी अन्य प्रधान के लिए हो, वह अंग (गौण) होता है।

English:
It is not principal, because it exists for the sake of another.
९,१.४५ — लिङ्गविशेषनिर्देशात्समानविधानेष्वप्राप्ता सारस्वती स्त्रीत्वात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
विशेष लिङ्ग (संकेत) के कारण समान विधानों में भी ‘सारस्वती’ स्वतः प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह स्त्रीलिंग है। अर्थात् जहाँ सामान्यतः पुंवाचक विधान हो, वहाँ स्त्रीलिंग देवता स्वतः ग्रहण नहीं की जाएगी। लिङ्ग (व्याकरणिक संकेत) यहाँ निर्णय का आधार है।

English:
Due to specific contextual indication, Sarasvatī (feminine) is not automatically included in general masculine injunctions.
९,१.४६ — पश्वभिधानाद्वा तद्धि चोदनाभूतं पुंविषयं पुनः पशुत्वम्
हिन्दी:
या ‘पशु’ शब्द के अभिधान से वह चोदना पुंविषय (नर-पशु) पर लागू होती है। ‘पशुत्व’ का पुनः उल्लेख उसके सामान्य धर्म को दर्शाता है।

English:
The term “animal” in the injunction refers to a male animal; “animality” expresses its general property.
९,१.४७ — विशेषो वा तदर्थनिर्देशात्
हिन्दी:
विशेष निर्देश होने पर विशिष्ट अर्थ ग्रहण होगा। जहाँ प्रयोजन विशेष बताया गया हो, वहाँ सामान्य अर्थ त्यागना होगा।

English:
A specific designation leads to a specific meaning.
९,१.४८ — पशुत्वं चैकशब्द्यात्
हिन्दी:
एक शब्द से ‘पशुत्व’ का सामान्य अर्थ ग्रहण होगा। एकशब्दता सामान्य धर्म को सूचित करती है।

English:
A single term conveys the general property of “animality.”
९,१.४९ — यथोक्तं वा सन्निधानात्
हिन्दी:
या पूर्वोक्त प्रसंग के सन्निधान (निकटता) से वही अर्थ ग्रहण होगा। मीमांसा में सन्निधान एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यात्मक साधन है।

English:
Or the meaning is determined by proximity to the earlier context.
९,१.५० — आम्नातादन्यदधिकारे वचनाद्विकारः स्यात्
हिन्दी:
यदि अन्य अधिकार (प्रसंग) में भिन्न वचन हो, तो वहाँ विकार (परिवर्तन) माना जाएगा। अर्थात् प्रसंग-भेद से विधान-भेद संभव है।

English:
In a different contextual section, variation may arise due to distinct wording.
९,१.५१ — द्वैधं वा तुल्यहेतुत्वात्सामान्याद्विकल्पः स्यात्
हिन्दी:
यदि दोनों पक्ष समान कारणयुक्त हों, तो सामान्यता के आधार पर विकल्प (दोनों में से किसी एक का ग्रहण) होगा।

English:
Where reasons are equal, an optional alternative is allowed.
९,१.५२ — उपदेशाच्च साम्नः
हिन्दी:
साम (सामवेदिक गान) के उपदेश से उसका विशेष प्रयोग सिद्ध होता है।

English:
Instruction regarding the Sāman establishes its specific usage.
९,१.५३ — नियमो वा श्रुतिविशेषादितरत्साप्तदश्यवत्
हिन्दी:
विशेष श्रुति होने पर नियम (अनिवार्यता) होगी, जैसे साप्तदश्य यज्ञ में होता है। विशेष निर्देश विकल्प को समाप्त कर देता है।

English:
A specific scriptural statement imposes restriction, as in the Saptadaśa rite.
९,१.५४ — अगाणाच्छब्दान्यत्वे तथाभूतोपदेशः स्यात्
हिन्दी:
यदि गान (संगीत) न हो और शब्द भिन्न हो, तो उपदेश उसी भिन्न रूप में ग्रहण किया जाएगा।

English:
If the chant differs, the instruction follows that distinct form.
९,१.५५ — यत्स्थाने वा तद्गीतिः स्यात्पदान्यत्वप्रधानत्वात्
हिन्दी:
जिस स्थान पर वह नियत है, वहीं उसका गान होगा। पद-भेद से प्रधानत्व का निर्धारण होता है।

English:
The chant belongs to its designated position, as word-difference determines primacy.
९,१.५६ — गानसंयोगाच्च
हिन्दी:
गान के संयोग से भी उसका विशिष्ट प्रयोग सिद्ध होता है।

English:
Its specific use is confirmed by its association with chant.
९,१.५७ — वचनमिति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि केवल वचन (शब्द) ही प्रमाण है—

English:
If it is argued that mere wording is decisive—
९,१.५८ — न तत्प्रधानत्वात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
उत्तर—नहीं, क्योंकि यहाँ प्रधानत्व (मुख्यता) किसी अन्य तत्व में है। शब्द मात्र से निर्णय नहीं, बल्कि चोदना, प्रसंग, लिङ्ग और प्रधान-अंग संबंध से निर्णय होगा। मीमांसा निष्कर्ष: जहाँ प्रधान तत्व स्पष्ट हो, वहाँ गौण शब्दार्थ उसके अधीन समझे जाते हैं।

English:
No; because primacy lies elsewhere. Meaning is determined not by words alone but by injunction, context, and hierarchy.
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