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दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः II1/1/2 न्यायदर्शन अर्थ : तत्वज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश हो जाता है और मिथ्या ज्ञान के नाश से राग द्वेषादि दोषों का नाश हो जाता है, दोषों के नाश से प्रवृत्ति का नाश हो जाता है। प्रवृत्ति के नाश होने से कर्म बन्द हो जाते हैं। कर्म के न होने से प्रारम्भ का बनना बन्द हो जाता है, प्रारम्भ के न होने से जन्म-मरण नहीं होते और जन्म मरण ही न हुए तो दुःख-सुख किस प्रकार हो सकता है। क्योंकि दुःख तब ही तक रह सकता है जब तक मन है। और मन में जब तक राग-द्वेष रहते हैं तब तक ही सम्पूर्ण काम चलते रहते हैं। क्योंकि जिन अवस्थाओं में मन हीन विद्यमान हो उनमें दुःख सुख हो ही नहीं सकते । क्योंकि दुःख के रहने का स्थान मन है। मन जिस वस्तु को आत्मा के अनुकूल समझता है उसके प्राप्त करने की इच्छा करता है। इसी का नाम राग है। यदि वह जिस वस्तु से प्यार करता है यदि मिल जाती है तो वह सुख मानता है। यदि नहीं मिलती तो दुःख मानता है। जिस वस्तु की मन इच्छा करता है उसके प्राप्त करने के लिए दो प्रकार के कर्म होते हैं। या तो हिंसा व चोरी करता है या दूसरों का उपकार व दान आदि सुकर्म करता है। सुकर्म का फल सुख और दुष्कर्मों का फल दुःख होता है परन्तु जब तक दुःख सुख दोनों का भोग न हो तब तक मनुष्य शरीर नहीं मिल सकता !

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Mimansa Darshan Chapter 8.4

Mimansa Darshan 8.4 (1–28) Detailed Explanation

Mimansa Darshan – Chapter 8.4 (Sutra 1–28)

८,४.१ — दर्विहोमो यज्ञाभिधानं होमसंयोगात्
हिन्दी:
दर्वि-होम (करछुल से की जाने वाली आहुति) को यज्ञ कहा गया है, क्योंकि उसका होम (आहुति) से संयोग है। अर्थात् होम-संबंध के कारण वह यज्ञरूप माना जाता है।

English:
The ladle-offering (darvi-homa) is designated as a sacrifice (yajña) due to its connection with oblation (homa).
८,४.२ — स लौकिकानां स्यात्कर्तुस्तदाख्यत्वात्
हिन्दी:
वह लौकिक व्यक्तियों (साधारण कर्ताओं) के लिए भी हो सकता है, क्योंकि नामकरण कर्ता के आधार पर है।

English:
It may apply to ordinary performers, since the designation depends upon the agent.
८,४.३ — सर्वेषां वा दर्शनाद्वास्तुहोमे
हिन्दी:
या सभी के लिए हो सकता है, क्योंकि वास्तुहोम में उसका दर्शन (प्रयोग) होता है।

English:
Or it may apply to all, as it is observed in the Vāstu-homa.
८,४.४ — जुहोतिचोदनानां वा तत्संयोगात्
हिन्दी:
या ‘जुहोति’ (आहुति देता है) जैसी चोदनाओं के संयोग से यज्ञत्व सिद्ध होता है।

English:
Or its sacrificial character arises from connection with injunctions such as “juhoti” (he offers).
८,४.५ — द्रव्योपदेशाद्वा गुणाभिधानं स्यात्
हिन्दी:
द्रव्य के उपदेश (निर्देश) से यह गुणाभिधान (गुणरूप नामकरण) हो सकता है।

English:
From the mention of substance, the designation may indicate a quality.
८,४.६ — न लौकिकानामाचारग्रहणत्वाच्छब्दवतां चान्यार्थविधानात्
हिन्दी:
परंतु यह केवल लौकिक आचार-ग्रहण नहीं है, क्योंकि शास्त्र में शब्दयुक्त विधान अन्य अर्थ का निर्देश करता है।

English:
However, it is not merely worldly custom, since scriptural injunctions with specific wording indicate a distinct purpose.
८,४.७ — दर्शनाच्चान्यपात्रस्य
हिन्दी:
अन्य पात्र (विशेष बर्तन) का दर्शन भी भेद को सिद्ध करता है।

English:
Observation of a distinct vessel further establishes differentiation.
८,४.८ — तथाग्निहविषोः
हिन्दी:
उसी प्रकार अग्नि और हवि (आहुति-द्रव्य) का भी विशिष्ट संबंध है।

English:
Similarly, the relation between fire and oblation is distinct and significant.
८,४.९ — उक्तश्चार्थसम्बन्धः
हिन्दी (समापन व्याख्या):
और अर्थ-संबंध (विधान और प्रयोजन का संबंध) पूर्व में ही कहा जा चुका है। अतः दर्वि-होम का यज्ञत्व शास्त्रीय अर्थ-संबंध पर आधारित है। मीमांसा सिद्धांत: शब्द, द्रव्य, और प्रयोजन के पारस्परिक संबंध से ही यज्ञ की संज्ञा निश्चित होती है।

English:
The relation of meaning (purpose and act) has already been explained. Thus, the sacrificial status of the ladle-offering is grounded in scriptural semantic connection.
Mimansa Darshan 8.4 (10–18) Detailed Explanation
८,४.१० — तस्मिन्सोमः प्रवर्तेताव्यक्तत्वात्
हिन्दी:
उस प्रसंग में सोम का प्रवर्तन (प्रयोग) होगा, क्योंकि विषय अव्यक्त (स्पष्ट रूप से पृथक निर्दिष्ट नहीं) है। अर्थात् जहाँ भेद स्पष्ट न हो, वहाँ प्रकृति से सोम का ग्रहण किया जाएगा।

English:
In that context, Soma is to be employed, since the specification is not explicit. Where distinction is unclear, the prototype (Soma) is assumed.
८,४.११ — न वा स्वाहाकारेण संयोगाद्वाषट्कारस्य च निर्देशात्तन्त्रेतेन विप्रतिषेधात्
हिन्दी:
परंतु नहीं — क्योंकि ‘स्वाहा’ के साथ संयोग है और ‘वषट्’ का पृथक निर्देश है। एक ही तन्त्र (प्रणाली) में दोनों का विप्रतिषेध (विरोध) होता है, अतः भेद मानना होगा।

English:
Not so; because there is connection with “svāhā” and separate mention of “vaṣaṭ.” Within the same system, they conflict; hence distinction must be accepted.
८,४.१२ — शब्दान्तरत्वात्
हिन्दी:
शब्दभेद (अलग शब्द) होने से भी भिन्नता सिद्ध होती है।

English:
Difference is also established due to distinct wording.
८,४.१३ — लिङ्गदर्शनाच्च
हिन्दी:
और लिङ्ग (संकेत) के दर्शन से भी भेद सिद्ध होता है।

English:
Contextual indication (liṅga) further supports the distinction.
८,४.१४ — उत्तरार्थस्तु स्वाहाकारो यथा साप्तदश्यं तत्राविप्रतिषिद्धा पुनः प्रवृत्तिर्लिङ्गदर्शनात्पशुवत्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
‘स्वाहा’ का उच्चारण उत्तरार्थ (परवर्ती प्रयोजन) के लिए है, जैसे साप्तदश्य याग में। वहाँ पुनः प्रवृत्ति (दोबारा प्रयोग) में कोई विरोध नहीं, क्योंकि लिङ्ग (संकेत) ऐसा दर्शाता है — पशुयाग के समान।

English:
The utterance “svāhā” serves a subsequent purpose, as in the Saptadaśa rite. There, repetition is not contradictory, as contextual indication permits it, similar to the animal sacrifice.
८,४.१५ — अनुत्तरार्थो वा अर्थवत्त्वादानर्थक्याद्धि प्राकृतस्योपरॊधः स्यात्
हिन्दी:
यदि वह उत्तरार्थ न हो, तो अर्थयुक्त होने से उसका अनर्थक होना संभव नहीं; अन्यथा प्राकृत (मूल विधान) का उपरोध (निरोध) हो जाएगा।

English:
If it were not for a subsequent purpose, it would become meaningless; this would obstruct the primary (prakṛta) injunction.
८,४.१६ — न प्रकृतावपीति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि प्रकृति में भी ऐसा नहीं है—

English:
If it is argued that this does not apply even in the prototype—
८,४.१७ — उक्तं समवाये पारदौर्बल्यम्
हिन्दी:
उत्तर — समवाय (संयुक्त स्थिति) में पूर्व में ही पारदौर्बल्य (कमज़ोरी) का सिद्धांत कहा जा चुका है। अर्थात् विरोध की दशा में बलवान् प्रमाण ही ग्राह्य होता है।

English:
The reply: It has already been stated that in conjunction (samavāya), weaker evidence yields to stronger authority.
८,४.१८ — तच्चोदना वेष्टेः प्रवृत्तित्वाद्विधिः स्यात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
और वह चोदना (आज्ञा) ‘वेष्टि’ (विशिष्ट क्रिया) की प्रवृत्ति कराने के कारण विधि मानी जाएगी। अर्थात् जहाँ प्रवर्तन-शक्ति है, वहाँ वह विधिरूप होती है। मीमांसा सिद्धांत: चोदना का लक्षण है — प्रवृत्ति-जनन।

English:
That injunction, since it prompts a specific act (veṣṭi), is to be regarded as a vidhi (prescriptive rule). In Mīmāṃsā, an injunction is defined by its capacity to initiate action.
Mimansa Darshan 8.4 (19–28) Detailed Explanation
८,४.१९ — शब्दसानर्थ्याच्च
हिन्दी:
और शब्द के सानर्थ्य (सार्थकता) के कारण भी उसका प्रयोजन मान्य है। मीमांसा सिद्धांत: वेदवाक्य निरर्थक नहीं होते।

English:
Also due to the meaningfulness of the word, its purpose must be accepted. In Mīmāṃsā, Vedic statements are never purposeless.
८,४.२० — लिङ्गदर्शनाच्च
हिन्दी:
लिङ्ग (संकेत) के दर्शन से भी वही अर्थ सिद्ध होता है।

English:
Contextual indication (liṅga) further confirms the meaning.
८,४.२१ — तत्राभावस्य हेतुत्वाद्गुणार्थे स्याददर्शनम्
हिन्दी:
जहाँ अभाव (अनुपस्थिति) कारण है, वहाँ गुणार्थ में उसका न दिखना उचित है। अर्थात् गुणप्रधान प्रसंग में मुख्य का अभाव बाधक नहीं।

English:
Where absence is the cause, non-perception in a subsidiary (quality-related) context is justified.
८,४.२२ — विधिरिति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि यह विधि (आज्ञा) है—

English:
If it is argued that it is an injunction—
८,४.२३ — न वाक्यशेषत्वाद्गुणार्थे च समाधानं नानात्वेनोपपद्यते
हिन्दी:
तो उत्तर—यह वाक्यशेष (पूर्ववाक्य का अंग) है। गुणार्थ में इसे पृथक् विधि मानना उचित नहीं।

English:
No; it is a continuation of the sentence (vākya-śeṣa). It cannot be treated as a separate injunction in a subsidiary context.
८,४.२४ — येषां वा परयोर्हेमस्तेषां स्यादविरोधात्
हिन्दी:
जिनके लिए बाद के विधान में हेम (स्वर्ण आदि) का निर्देश है, उनके लिए वह अविरोध से मान्य होगा।

English:
For those in whom gold is prescribed later, it applies without contradiction.
८,४.२५ — तत्रौषधानि चोद्यन्ते तानि स्थानेन गम्येरन्
हिन्दी:
वहाँ औषधियाँ भी विधिवश निर्देशित हैं; वे अपने स्थान (प्रसंग) से जानी जाएँगी।

English:
Medicinal substances are enjoined there; their application is understood from context.
८,४.२६ — लिङ्गाद्वा शेषहोमयोः
हिन्दी:
या लिङ्ग के आधार पर शेष होमों में उनका प्रयोग होगा।

English:
Or by contextual indication, they apply to the remaining oblations.
८,४.२७ — प्रतिपत्तिस्तु ते भवतस्तस्मादतद्विकारत्वम्
हिन्दी:
उनकी प्रतिपत्ति (स्वीकृति) तो है, परंतु वे मूल के विकार (परिवर्तन) नहीं हैं।

English:
They are indeed accepted, but they are not modifications of the original.
८,४.२८ — सन्निपाते विरोधिनामप्रवृत्तिः प्रतीयेत विध्युत्पत्तिव्यवस्थानादर्थस्यापरिणेघत्वाद्वचनादतिदेशः स्यात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
जब विरोधी तत्वों का सन्निपात (साथ आना) हो, तो उनकी प्रवृत्ति नहीं मानी जाएगी। विधि की उत्पत्ति और उसकी व्यवस्था के अनुसार, अर्थ अपरिणामी (न बदलने वाला) रहता है। वचन के आधार पर अतिदेश (अन्यत्र अनुप्रयोग) सिद्ध होगा। मीमांसा सिद्धांत: विरोध की स्थिति में बलवान् प्रमाण ग्राह्य, और जहाँ संभव हो वहाँ अतिदेश द्वारा समन्वय किया जाता है।

English:
When conflicting elements coincide, their operation is not assumed. According to the origin and structure of injunction, the meaning remains unchanged. By verbal authority, extension (atideśa) may be established. In Mīmāṃsā, stronger evidence prevails, and extension harmonizes apparent conflicts.
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