Mimansa Darshan 9.3 (1–44) Detailed Explanation
Mimansa Darshan – Chapter 9.3 (Sutra 1–44) Detailed Explanation
९,३.१ — प्रकृतौ यथोत्पत्तिवचनमर्थानां तथोत्तरस्यां ततौ तत्प्रकृतित्वादर्थे च अकार्यत्वात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
प्रकृति (मूल यज्ञ) में जैसे अर्थों की उत्पत्ति का विधान है,
उसी प्रकार उत्तर (विकृति) में भी वही व्यवस्था होगी,
क्योंकि वह उसी की प्रकृति से उत्पन्न है।
और अर्थ स्वयं कर्तव्य (अकार्य) नहीं है—
वह कर्म का प्रयोजन मात्र है।
अतः विकृति में भी मूल-विधान का अनुसरण होगा।
English:
Just as the original rite prescribes the generation of its elements,
so too in the derivative rite, since it proceeds from the original;
and meaning itself is not an independent act.
९,३.२ — लिङ्गदर्शनाच्च
हिन्दी:
लिङ्ग (संकेत) से भी यही सिद्ध होता है।
अर्थात् प्रसंगगत संकेत मूल से संबंध दर्शाते हैं।
English:
Contextual indication confirms this.
९,३.३ — जातिनैमित्तिकं यथास्थानम्
हिन्दी:
जाति-नैमित्तिक (सामान्य या कारणजन्य) तत्व
अपने-अपने स्थान के अनुसार ग्रहण होंगे।
अर्थात् जहाँ जो उचित हो, वहीं लागू होगा।
English:
Generic and occasion-based elements apply according to their proper place.
९,३.४ — अविकारमेकेऽनार्षत्वात्
हिन्दी:
कुछ आचार्य कहते हैं कि विकार नहीं होगा,
क्योंकि वह आर्ष (ऋषि-प्रदत्त) नहीं है।
अर्थात् यदि श्रुति-सम्मत न हो तो परिवर्तन मान्य नहीं।
English:
Some hold there is no modification, as it lacks Vedic authority.
९,३.५ — लिङ्गदर्शनाच्च
हिन्दी:
परंतु लिङ्ग से परिवर्तन की संभावना सिद्ध होती है।
English:
Yet contextual signs suggest modification.
९,३.६ — विकारो वा तदुक्तहेतुः
हिन्दी:
विकार (परिवर्तन) मान्य होगा,
क्योंकि पूर्व में बताए गए कारण उपस्थित हैं।
English:
Modification is justified by the previously stated reasons.
९,३.७ — लिङ्गं मन्त्रचिकीर्षार्थम्
हिन्दी:
मन्त्र में लिङ्ग (संकेत) कर्ता की इच्छा (चिकीर्षा) प्रकट करता है।
अर्थात् मन्त्र से कर्तव्य-भाव प्रकट होता है।
English:
The mantra’s indication expresses the intention to perform.
९,३.८ — नियमो वोभयभागित्वात्
हिन्दी:
दोनों भागों (प्रकृति-विकृति) में समान सहभागिता होने से नियम होगा।
अर्थात् समान आधार होने पर निश्चित व्यवस्था होगी।
English:
Regulation applies because both share participation.
९,३.९ — लौकिके दोषसंयोगादपवृक्ते हि चोद्यते निमित्तेन प्रकृतौ स्यादभागित्वात्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
लौकिक (सांसारिक) कर्म में दोष-संयोग होने पर
अपवृत्ति (त्याग) की आज्ञा दी जाती है।
परंतु वैदिक प्रकृति में यदि वह भाग न हो,
तो दोष के आधार पर परिवर्तन नहीं होगा।
English:
In worldly acts, faults may cause abandonment;
but in Vedic originals, lacking such share, change is not inferred.
९,३.१० — अन्यायस्त्वविकारेण दृष्टप्रतिघातित्वादविशेषाच्च तेनास्य
हिन्दी:
यदि विकार न माना जाए,
तो दृष्ट (प्रत्यक्ष) विरोध उत्पन्न होगा।
इसलिए अविकार मानना अनुचित है।
English:
Without modification, observed contradiction would arise;
hence non-modification is improper.
९,३.११ — विकारो वा तदर्थत्वात्
हिन्दी:
विकार स्वीकार करना चाहिए,
क्योंकि वह उसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए है।
English:
Modification is accepted since it serves the intended purpose.
९,३.१२ — अपित्वन्यायसम्बन्धात्प्रकृतिवत्परेष्वपि यथार्थं स्यात्
हिन्दी:
यदि अन्याय (अयुक्ति) का संबंध हो,
तो प्रकृति की भाँति अन्य विकृतियों में भी यथार्थ निर्णय होगा।
English:
If inconsistency arises, the same reasoning applies to other derivatives.
९,३.१३ — यथार्थं त्वन्यायस्याचोदितत्वात्
हिन्दी:
अन्याय (अयुक्ति) का विधान नहीं है,
अतः यथार्थ (शास्त्र-सम्मत) निर्णय ही मान्य है।
English:
Improper reasoning lacks injunction; thus correctness prevails.
९,३.१४ — छन्दसि तु यथादृष्टम्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
छन्द (वैदिक पाठ) में जैसा प्रत्यक्ष देखा गया है,
वैसा ही स्वीकार किया जाएगा।
अर्थात् वैदिक परंपरा और प्रत्यक्ष पाठ-रूप
मीमांसा में अंतिम प्रमाण हैं।
अध्याय ९.३ का सिद्धांत:
प्रकृति और विकृति का संबंध मूल-विधान से निर्धारित है।
जहाँ लिङ्ग, प्रकरण और प्रयोजन अनुकूल हों,
वहाँ विकार स्वीकार्य है;
अन्यथा मूल-रूप ही मान्य है।
English:
In Vedic meter and recitation, what is observed stands valid.
Thus original authority governs modification.
Mimansa Darshan 9.3 (15–28) Detailed Explanation
९,३.१५ — विप्रतिपत्तौ विकल्पः स्यात्तत्सत्वाद्गुणे त्वन्यायकल्पनैकदेशत्वात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
जब विप्रतिपत्ति (मतभेद या विरोध) हो,
तब विकल्प (दोनों में से किसी एक का ग्रहण) स्वीकार किया जाएगा।
परंतु यदि वह केवल गुण (गौण तत्व) में हो,
तो संपूर्ण विधान नहीं बदलेगा,
क्योंकि अन्याय-कल्पना (अनुचित निष्कर्ष) केवल एक अंश तक सीमित है।
English:
Where conflict exists, optionality applies;
but if it concerns only a subordinate element, the contradiction is partial and does not affect the whole.
९,३.१६ — प्रकरणविशेषाच्च
हिन्दी:
विशेष प्रकरण (संदर्भ) से भी निर्णय किया जाएगा।
अर्थात् प्रसंग निर्णय का महत्वपूर्ण साधन है।
English:
Contextual specification also determines interpretation.
९,३.१७ — अर्थाभावात्तु नैवं स्याद्गुणमात्रमितरत्
हिन्दी:
यदि प्रयोजन (अर्थ) का अभाव हो,
तो ऐसा विकल्प नहीं होगा;
अन्य तत्व केवल गुणमात्र होंगे।
English:
If purpose is absent, such optionality does not arise; the rest is merely subsidiary.
९,३.१८ — द्यावोस्तथेति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि द्यावा-पृथिवी के समान यहाँ भी—
English:
If it is argued analogously to Heaven and Earth—
९,३.१९ — नोत्पत्तिशब्दत्वात्
हिन्दी:
नहीं, क्योंकि वहाँ ‘उत्पत्ति’ शब्द है।
अर्थात् उत्पत्ति-सूचक शब्द विशेष विधि दर्शाता है।
English:
No; because the term “origin” indicates specific injunction.
९,३.२० — अपूर्वे त्वविकारोऽप्रदेशात्प्रतीयेत
हिन्दी:
अपूर्व (नवीन फल) में विकार नहीं माना जाएगा,
क्योंकि उसका कोई विशेष प्रदेश (निर्देश) नहीं है।
English:
In the case of apūrva, no modification is inferred without specification.
९,३.२१ — विकृतौ चापि तद्वचनात्
हिन्दी:
परंतु विकृति में यदि वचन (निर्देश) हो,
तो परिवर्तन स्वीकार होगा।
English:
Yet in a derivative rite, modification stands when prescribed.
९,३.२२ — अध्रिगुः सवनीयेषु तद्वत्समानविधानाश्चेत्
हिन्दी:
अध्रिगु सवन (सोम-याग) में भी
यदि समान विधान हो,
तो वही नियम लागू होगा।
English:
In the Adhrigu Soma rites, if procedure is identical, the same rule applies.
९,३.२३ — प्रतिनिधौ चाविकारात्
हिन्दी:
प्रतिनिधि (प्रतिस्थापन) में विकार नहीं होगा।
अर्थात् विकल्प-द्रव्य में मूल-रूप ही रहेगा।
English:
In substitution, no modification occurs.
९,३.२४ — अनाम्नानादशब्दत्वमभावाच्चेतरस्य स्यात्
हिन्दी:
यदि नाम-उल्लेख न हो,
तो वह अशब्द (अविधेय) होगा,
और अन्य का अभाव माना जाएगा।
English:
Without explicit mention, it lacks scriptural status and is absent.
९,३.२५ — तादर्थ्याद्वा तदाख्यंस्यात्संस्कारैरविशिष्टत्वात्
हिन्दी:
तादर्थ्य (प्रयोजन-संबंध) से वही नाम लागू होगा,
क्योंकि संस्कारों से विशेष भेद नहीं है।
English:
Due to shared purpose and lack of distinction in rites, the same designation applies.
९,३.२६ — उक्तञ्च तत्त्वमस्य
हिन्दी:
इसका तत्त्व (सिद्धांत) पूर्व में कहा जा चुका है।
English:
Its principle has already been stated.
९,३.२७ — संसर्गिषु चार्थस्यास्थितपरिमाणत्वात्
हिन्दी (गहन व्याख्या):
जो तत्व संसर्ग (संयोग) में हों,
उनमें अर्थ का परिमाण स्थिर रहता है।
अर्थात् संबंध से प्रयोजन की सीमा निर्धारित होती है।
English:
In connected elements, purpose retains a fixed measure.
९,३.२८ — लिङ्गदर्शनाच्च
हिन्दी (समापन व्याख्या):
लिङ्ग (संकेत) से भी यही सिद्ध होता है।
९.३ (१५–२८) का सिद्धांत:
• विप्रतिपत्ति में विकल्प।
• प्रकरण, लिङ्ग और वचन से निर्णय।
• अपूर्व में अविकार,
• विकृति में वचनानुसार परिवर्तन।
• प्रयोजन और संस्कार के आधार पर नाम और रूप का निर्धारण।
मीमांसा का मूल तत्त्व:
शब्द, लिङ्ग, प्रकरण, प्रयोजन और समवाय—
इनके समन्वय से ही धर्म-निर्णय होता है।
English:
Contextual indication confirms the doctrine.
Thus interpretation depends upon injunction, context, and purpose.
Mimansa Darshan 9.3 (29–43) Detailed Explanation
९,३.२९ — एकधेति एकसंयोगादभ्यासेनाभिधानं स्यात्
हिन्दी:
‘एकधा’ शब्द एक संयोग (एक संबंध) को दर्शाता है।
अभ्यास (पुनरुक्ति) से उसका विशेष अभिधान (निश्चित अर्थ) सिद्ध होता है।
English:
The term “ekadhā” denotes single connection; repetition establishes its definite meaning.
९,३.३० — अविकारो वा बहूनामेककर्मवत्
हिन्दी:
अनेक तत्व होने पर भी यदि कर्म एक है,
तो विकार (परिवर्तन) नहीं होगा।
English:
Even with many elements, if the act is one, there is no modification.
९,३.३१ — सकृत्त्वं चैकध्यं स्यादेकत्वात्त्वचोऽनभिप्रेतं तत्प्रकृतित्वात्परेष्वभ्यासेन विवृद्धावभिधानं स्यात्
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
एकत्व से ‘सकृत्’ (एक बार) का बोध होता है।
त्वचा (बाह्य भेद) का अभिप्राय नहीं है,
क्योंकि वह मूल-प्रकृति से संबंधित है।
अन्य विकृतियों में अभ्यास से वृद्धि का बोध कराया जाएगा।
English:
Oneness implies single performance; external distinctions are unintended.
In derivatives, repetition may indicate expansion.
९,३.३२ — मेधपतित्वं स्वामिदेवतस्य समवायात्सर्वत्र च प्रयुक्तत्वात्तस्य चान्यायनिगदत्वात्सर्वत्रैवाविकारः स्यात्
हिन्दी:
मेधपति (यज्ञपति) का संबंध स्वामी-देवता से समवाय (अविनाभाव) से है।
वह सर्वत्र प्रयुक्त है और अन्याय से खंडित नहीं होता।
अतः सर्वत्र अविकार (अपरिवर्तन) रहेगा।
English:
The lordship of the sacrifice inheres in the presiding deity universally; hence no modification applies.
९,३.३३ — अपि वा द्विसमवायोऽर्थान्यत्वे यथासंख्यं प्रयोगः स्यात्
हिन्दी:
यदि द्वि-समवाय (दो अविनाभाव संबंध) हों और अर्थ भिन्न हों,
तो यथासंख्य (क्रमानुसार) प्रयोग होगा।
English:
With dual inherence and differing purposes, usage follows numerical order.
९,३.३४ — स्वामिनो वैकशब्द्यादुत्कर्षो देवतायां स्यात्पत्न्यां द्वितीयशब्दः स्यात्
हिन्दी:
स्वामी का एकशब्द (एकवचन) होने से देवता में उत्कर्ष (प्रधानता) है।
पत्नी के लिए द्वितीय (गौण) शब्द होगा।
English:
The singular term elevates the principal deity; the wife is secondary.
९,३.३५ — देवता तु तदाशीष्ट्वात्सम्प्राप्तत्वात्स्वात्स्वामिन्यनर्थिका स्यात्
हिन्दी:
देवता आशीर्वाद-स्वरूप होने से स्वामी से संबंधित है;
स्वामी में उसका पृथक् अर्थ नहीं।
English:
The deity, being beneficiary, has no independent meaning apart from the lord.
९,३.३६ — उत्सर्गाच्च भक्त्यातस्मिन्पतित्वं स्यात्
हिन्दी:
उत्सर्ग (सामान्य नियम) और भक्ति (समर्पण) से
पतित्व (प्रधानता) उसी में सिद्ध होगी।
English:
By general rule and devotion, lordship rests therein.
९,३.३७ — उत्कृष्येतैकसंयुक्तो द्विदेवते सम्भवात्
हिन्दी:
एकसंयुक्त (एक से संबद्ध) तत्व उत्कर्ष पाएगा,
क्योंकि द्विदेवता का संभव है।
English:
The singly connected element is elevated, given possibility of dual deities.
९,३.३८ — एकस्तु समवायात्तस्य तल्लक्षणत्वात्
हिन्दी:
परंतु एक ही प्रधान होगा,
क्योंकि समवाय से वही उसका लक्षण है।
English:
Yet one remains principal due to inherent connection.
९,३.३९ — संसर्गित्वाच्च तस्मात्तेन विकल्पः स्यात्
हिन्दी:
संसर्ग (संयोग) होने से विकल्प संभव है।
English:
Connection permits optionality.
९,३.४० — एकत्वेपि गुणानपायात्
हिन्दी:
एकत्व होने पर भी गुणों का अपाय (नाश) नहीं होगा।
English:
Even in unity, qualities do not perish.
९,३.४१ — नियमो बहुदेवते विकारः स्यात्
हिन्दी:
यदि बहु-देवता हों, तो नियम (विशिष्ट निर्धारण) होगा
और विकार संभव है।
English:
With multiple deities, regulation and modification may apply.
९,३.४२ — विकल्पो वा प्रकृतिवत्
हिन्दी:
या प्रकृति (मूल विधि) की भाँति विकल्प भी हो सकता है।
English:
Or optionality may apply as in the original rite.
९,३.४३ — अर्थान्तरे विकारः स्याद्देवतापृथक्त्वादेकाभिसमवायात्स्यात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
यदि अर्थ भिन्न हो और देवता अलग हों,
तो विकार (परिवर्तन) स्वीकार होगा।
परंतु यदि एक ही में अभिसमवाय (अविनाभाव संबंध) हो,
तो वही प्रधान रहेगा।
९.३ (२९–४३) का निष्कर्ष:
• एकत्व से अविकार।
• बहुदेवता में नियम या विकार।
• समवाय से प्रधानता।
• संसर्ग से विकल्प।
• प्रयोजन और देवता-भेद से परिवर्तन।
मीमांसा का तात्पर्य:
धर्म-निर्णय सदैव संबंध (समवाय),
प्रयोजन (अर्थ),
देवता-भेद,
और शास्त्रीय वचन के आधार पर होता है।
English:
Where purpose and deity differ, modification applies;
otherwise unity and inherent relation preserve original form.
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