Mimansa Darshan Chapter 9.4

Mimansa Darshan 9.4 (1–60) Detailed Explanation

Mimansa Darshan – Chapter 9.4 (Sutra 1–60) Detailed Explanation

९,४.१ — षड्विंशतिरभ्यासेन पशुगणे तत्प्रकृतित्वाद्गणस्य प्रविभक्तत्वादविकारे हि तासामकार्त्स्न्येनाभिसम्बन्धो विकारान्न समासः स्यादसंयोगाच्च सर्वाभिः
हिन्दी (विस्तृत व्याख्या):
पशुगण में ‘षड्विंशति’ (२६) संख्या अभ्यास (पुनरुक्ति) से सिद्ध होती है, क्योंकि वह प्रकृति से संबंधित है। गण (समूह) प्रविभक्त (अलग-अलग) है। यदि अविकार (परिवर्तन) न हो, तो सभी का पूर्ण संबंध नहीं बनता। विकार होने पर भी समास (संपूर्ण एकीकरण) नहीं होगा, क्योंकि सभी का एक साथ संयोग नहीं है।

English:
The number twenty-six in the group of animals is established by repetition, as it belongs to the original type. Since the group is divided, without modification there is no complete connection; nor full aggregation due to lack of universal conjunction.
९,४.२ — अभ्यासेऽपि तथेति चेत्
हिन्दी:
यदि कहा जाए कि अभ्यास में भी वही नियम—

English:
If the same reasoning is applied to repetition—
९,४.३ — न गुणादर्थकृतत्वाच्च
हिन्दी:
नहीं, क्योंकि वह गुण है और अर्थ-निर्भर है। अर्थात् अभ्यास केवल सहायक तत्व है।

English:
No; as it is a subsidiary element serving a purpose.
९,४.४ — समासेऽपि तथेति चेत्
हिन्दी:
यदि समास (समूह-एकत्व) में भी ऐसा ही कहा जाए—

English:
If similarly argued in the case of aggregation—
९,४.५ — नासम्भवात्
हिन्दी:
नहीं, क्योंकि वह संभव नहीं है। सभी तत्वों का पूर्ण एकत्व व्यावहारिक नहीं।

English:
No; because such total aggregation is impossible.
९,४.६ — स्वाभिश्च वचनं प्रकृतौ तथेह स्यात्
हिन्दी:
जैसा प्रकृति (मूल) में वचन है, वैसा ही यहाँ (विकृति में) भी मान्य होगा।

English:
As in the original prescription, so here also.
९,४.७ — वङ्क्रीणां तु प्रधानत्त्वात्समासेनाभिधानं स्यात्प्राधान्यमध्रिगोस्तदर्थत्वात्
हिन्दी:
वङ्क्री (विशेष पशु) प्रधान है, इसलिए उसका अभिधान समास (समूह रूप) से होगा। अध्रिगु में उसका प्राधान्य उसके प्रयोजन से सिद्ध है।

English:
The Vankrī animals are principal; thus collectively designated, especially in the Adhrigu rite.
९,४.८ — तासां च कृत्स्नवचनात्
हिन्दी:
उनके विषय में पूर्ण (सम्पूर्ण) वचन होने से समूहबोध सिद्ध होता है।

English:
The comprehensive statement confirms total inclusion.
९,४.९ — अपि त्वसन्निपातित्वात्पत्नीवदाम्नातेनाभिधानं स्यात्
हिन्दी:
वे एक साथ उपस्थित नहीं हैं, इसलिए पत्नी के समान पृथक्-पृथक् नाम से अभिधान होगा।

English:
Since not simultaneous, they are designated separately, like the wife.
९,४.१० — विकारस्तु प्रदेशत्वाद्यजमानवत्
हिन्दी:
प्रदेश (विशिष्ट स्थिति) के कारण विकार होगा, जैसे यजमान में होता है।

English:
Modification occurs due to specific circumstance, as with the sacrificer.
९,४.११ — अपूर्वत्वात्तथा पत्न्याम्
हिन्दी:
पत्नी में भी अपूर्व (विशेष फल) के कारण विकार स्वीकार होगा।

English:
Likewise in the wife, due to unique result.
९,४.१२ — अनाम्नातस्त्वविकारात्सङ्ख्यासु सर्वगामित्वात्
हिन्दी:
जो नाम से निर्दिष्ट नहीं है, वह अविकार रहेगा; संख्या का सर्वत्र गमन (समान प्रयोग) है।

English:
Unspecified elements remain unmodified; numbers apply universally.
९,४.१३ — सङ्खाया त्वेवं प्रधानं स्याद्वङ्क्रयः पुनः प्रधानम्
हिन्दी:
इस प्रकार संख्या प्रधान होगी, परंतु वङ्क्री पुनः विशेष प्रधान मानी जाएगी।

English:
Number is principal in this sense; yet the Vankrī remains specially principal.
९,४.१४ — अनाम्नातवचनमवचनेन हि वङ्क्रीणां स्यान्निर्देशः
हिन्दी:
जहाँ स्पष्ट वचन न हो, वहाँ मौन (अवचन) से ही वङ्क्री का निर्देश समझा जाएगा।

English:
Where no explicit statement exists, indication is inferred by omission.
९,४.१५ — अभ्यासो वा अविकारात्स्यात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
अभ्यास (पुनरुक्ति) अविकार (अपरिवर्तन) के कारण भी हो सकता है। अर्थात् पुनरावृत्ति केवल संख्या-सिद्धि के लिए है, न कि रूप-परिवर्तन के लिए। ९.४ (१–१५) का निष्कर्ष:
• संख्या और समूह का संबंध प्रकृति से निर्धारित। • समास तभी जब संयोग संभव हो। • प्रधान और गौण का भेद प्रयोजन से सिद्ध। • अनाम्नात (अविधेय) तत्व अविकार रहते हैं। मीमांसा का सिद्धांत: वचन, संख्या, संयोग और प्रयोजन— इनसे ही धर्म-रचना का निर्णय होता है।

English:
Repetition may confirm number without implying change. Thus ritual structure rests upon number, relation, and purpose.
Mimansa Darshan 9.4 (16–30) Detailed Explanation
९,४.१६ — पशुस्त्वेवं प्राधानं स्यादभ्यासस्य तन्निमित्तत्वात्तस्मात्समासशब्दः स्यात्
हिन्दी:
इस प्रकार पशु प्रधान होगा, क्योंकि अभ्यास (पुनरुक्ति) उसी के कारण है। अतः ‘समास’ शब्द (समूहवाचक प्रयोग) उचित है।

English:
Thus the animal is principal, since repetition depends on it; hence collective designation applies.
९,४.१७ — अश्वस्य चतुस्त्रिंशत्तस्य वचनाद्वैशेषिकम्
हिन्दी:
अश्व (घोड़े) के लिए ‘चतुस्त्रिंशत्’ (३४) का विशेष वचन है, अतः उसका विधान वैषेषिक (विशिष्ट) है।

English:
For the horse, thirty-four is specifically stated; hence it is a special prescription.
९,४.१८ — तत्प्रतिषिध्य प्रकृतिर्नियुज्यते सा चतुस्त्रिंशद्वाच्यत्वात्
हिन्दी:
उस विशेष को प्रतिषेध कर प्रकृति (मूल विधान) नियोजित होगी, क्योंकि ‘चतुस्त्रिंशत्’ का वाच्यत्व उसी से संबंधित है।

English:
Upon negating that special case, the original rule applies, as thirty-four refers thereto.
९,४.१९ — ऋगावास्यादाम्नातत्वादविकल्पश्च न्याय्यः
हिन्दी:
ऋगावास्य (विशेष विधान) में स्पष्ट आम्नाय (श्रुति) होने से विकल्प नहीं होगा; यही न्यायसंगत है।

English:
Where explicitly stated in the Ṛg tradition, no optionality is allowed.
९,४.२० — तस्यां तु वचनादैरवत्पदविकारः स्यात्
हिन्दी:
उस प्रसंग में वचन के कारण ‘ऐरावत’ पद में विकार (परिवर्तन) होगा।

English:
In that context, the term “Airāvata” undergoes modification by prescription.
९,४.२१ — सर्वप्रतिषेधो वासंयागात्पदेन स्यात्
हिन्दी:
यदि संयोग (संयुक्त प्रयोग) न हो, तो पद (शब्द) द्वारा सर्व-प्रतिषेध (पूर्ण निषेध) होगा।

English:
In absence of conjunction, total exclusion is effected by the term used.
९,४.२२ — वनिष्ठुसन्निधानादुरूकेण वपाभिधानम्
हिन्दी:
वनिष्ठु के सन्निधान (निकटता) से ‘उरूक’ द्वारा वपा (अवयव) का अभिधान होगा।

English:
By proximity to Vaniṣṭhu, the omentum is denoted through “Urūka”.
९,४.२३ — प्रशसास्याभिधानम्
हिन्दी:
यह प्रशंसा (स्तुति) के रूप में अभिधान हो सकता है।

English:
It may be a laudatory designation.
९,४.२४ — बाहुप्रशंसा वा
हिन्दी:
या यह बाहु (शक्ति) की प्रशंसा है।

English:
Or praise of strength (arm).
९,४.२५ — श्येन-शला-कश्यप-कवषस्त्रेकपर्णेष्वाकृतिवचनं प्रसिद्धसन्निधानात्
हिन्दी:
श्येन, शला, कश्यप, कवष और त्रेकपर्ण — इनमें आकृति-वचन (रूप-सूचक प्रयोग) प्रसिद्ध सन्निधान (प्रचलित निकटता) से सिद्ध है।

English:
In names like Śyena, Śalā, Kaśyapa, etc., form-based designation arises from established association.
९,४.२६ — कार्त्स्न्यं वा स्यात्तथाभावात्
हिन्दी:
या वहाँ पूर्णता (सम्पूर्णता) का बोध होगा, क्योंकि आंशिकता नहीं है।

English:
Or totality is intended, as no partiality exists.
९,४.२७ — अध्रिगोश्च तदर्थत्वात्
हिन्दी:
अध्रिगु याग में भी वही प्रयोजन होने से उसी नियम का अनुप्रयोग होगा।

English:
The same applies in the Adhrigu rite due to shared purpose.
९,४.२८ — प्रासङ्गिके प्रायश्चित्तं न विद्यते परार्थत्वात्तदर्थे हि विधीयते
हिन्दी:
प्रासंगिक (गौण) कर्म में प्रायश्चित्त नहीं है, क्योंकि वह परार्थ (दूसरे के लिए) है। प्रायश्चित्त केवल मुख्य प्रयोजन के लिए विधेय है।

English:
In incidental acts, expiation is not prescribed, as they serve another purpose.
९,४.२९ — धारणे च परार्थत्वात्
हिन्दी:
धारण (धारण करना) भी परार्थ होने से स्वतंत्र कर्तव्य नहीं है।

English:
Holding too is subsidiary, not independently enjoined.
९,४.३० — क्रियार्थत्वादितरेषु कर्म स्यात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
अन्य तत्व क्रिया के लिए हैं, अतः वे कर्मरूप में ही माने जाएँगे। ९.४ (१६–३०) का निष्कर्ष:
• प्रधान-पशु और संख्या का विशेष विधान। • जहाँ स्पष्ट वचन हो वहाँ विकल्प नहीं। • सन्निधान से आकृति-वचन सिद्ध। • गौण कर्मों में प्रायश्चित्त नहीं। • परार्थता से कर्म की गौणता निर्धारित। मीमांसा का सार: प्रधान और गौण का भेद, वचन और सन्निधान का आधार, और प्रयोजन की प्रधानता— इन्हीं से धर्म-विधान का निर्णय होता है।

English:
Thus ritual interpretation rests on principal purpose, explicit injunction, and contextual proximity.
Mimansa Darshan 9.4 (31–45) Detailed Explanation
९,४.३१ — न तूत्पन्ने यस्य चोदनाप्राप्तकालत्वात्
हिन्दी:
जो उत्पन्न हो चुका है, उस पर चोदना (विधि) लागू नहीं होती, क्योंकि उसका काल (समय) प्राप्त नहीं है। अर्थात् विधि पूर्वकालीन कर्तव्य पर होती है, न कि सिद्ध वस्तु पर।

English:
An injunction does not apply to what has already arisen, as its proper time has passed.
९,४.३२ — प्रदानदर्शनं श्रपणे तद्धर्मभोजनार्थत्वात्संसर्गाच्च मधूदकवत्
हिन्दी (विस्तृत):
श्रपण (पकाने) में ‘प्रदान’ का दर्शन होता है, क्योंकि उसका धर्म भोजनार्थ (उपयोग हेतु) है। मधु और उदक के संसर्ग की भाँति यह सहायक संबंध है।

English:
In cooking, offering is observed, as it serves consumption; like honey mixed with water.
९,४.३३ — संस्कारप्रतिषेधश्च तद्वत्
हिन्दी:
उसी प्रकार संस्कार का भी प्रतिषेध संभव है, जब वह गौण रूप में हो।

English:
Similarly, prohibition may apply to a subsidiary rite.
९,४.३४ — तत्प्रतिषेधे च तथाभूतस्य वर्जनात्
हिन्दी:
यदि उसका प्रतिषेध हो, तो उस रूप का वर्जन (त्याग) किया जाएगा।

English:
Upon prohibition, that specific form is excluded.
९,४.३५ — अधर्मत्वमप्रदानात्प्रणीतार्थे विधानादतुल्यत्वादसंसर्गः
हिन्दी:
यदि प्रदान (अर्पण) न हो, तो अधर्म होगा। प्रणीत (नियत) अर्थ के विधान से असमानता होने पर संसर्ग (संबंध) नहीं माना जाएगा।

English:
Failure to offer constitutes demerit; where prescription differs, no valid connection exists.
९,४.३६ — परो नित्यानुवादः स्यात्
हिन्दी:
यह पर (अतिरिक्त वचन) नित्यानुवाद (स्थायी पुनरुक्ति) हो सकता है।

English:
It may be a constant reiteration (anuvāda).
९,४.३७ — विहितप्रतिषेधो वा
हिन्दी:
या यह विहित (पूर्वविधित) का प्रतिषेध हो सकता है।

English:
Or a prohibition of what was previously enjoined.
९,४.३८ — वर्जने गुणभावित्वात्तदुक्तप्रतिषेधात्स्यात्कारणात्केवलाशनम्
हिन्दी:
वर्जन (त्याग) गुणभाव (गौण स्थिति) के कारण है। उक्त प्रतिषेध के कारण केवल भोजन (साधारण आहार) का विधान होगा।

English:
Renunciation arises due to subsidiary status; hence simple eating is prescribed.
९,४.३९ — व्रतधर्माच्च लेपवत्
हिन्दी:
व्रतधर्म (व्रत का नियम) भी लेप (लेपन) के समान गौण है।

English:
Vow-related duty is subsidiary, like anointing.
९,४.४० — रसप्रतिषेधो वा पुरुषधर्मत्वात्
हिन्दी:
रस (स्वाद) का प्रतिषेध पुरुषधर्म (व्यक्ति-नियम) होने से है।

English:
Prohibition of taste pertains to the person’s discipline.
९,४.४१ — अभ्युदये दोगापनयः स्वधर्मा स्यात्प्रवृत्तत्वात्
हिन्दी:
अभ्युदय (उन्नति) के लिए दोष-अपनय (दोष-त्याग) स्वधर्म है, क्योंकि वह प्रवृत्त (नियत) है।

English:
Removal of defects for prosperity is one’s proper duty.
९,४.४२ — शृतोपदेशाच्च
हिन्दी:
यह श्रुति के उपदेश से भी सिद्ध है।

English:
This is confirmed by scriptural instruction.
९,४.४३ — अपनयो वार्थान्तरे विधानाच्चरुपयोवत्
हिन्दी:
या दोष-अपनय किसी अन्य अर्थ में विधेय है, जैसे चरु (हविष्य) के प्रयोग में।

English:
Or removal applies in another context, like the use of oblation.
९,४.४४ — लक्षणार्था शृतश्रुतिः
हिन्दी:
श्रुति कभी लक्षणार्थ (संकेतार्थ) में भी ग्रहण की जाती है।

English:
Scripture may convey implied meaning.
९,४.४५ — श्रयणानां त्वपूर्वत्वात्प्रदानार्थे विधानं स्यात्
हिन्दी (समापन व्याख्या):
श्रयण (आश्रय या आश्रित क्रियाएँ) अपूर्व (नवीन फल) के कारण प्रदान (अर्पण) के लिए विधेय हैं। ९.४ (३१–४५) का निष्कर्ष:
• उत्पन्न वस्तु पर विधि नहीं। • गौण और प्रधान का भेद संसर्ग से। • प्रतिषेध और अनुवाद का विवेचन। • व्रत, त्याग और दोष-अपनय का शास्त्रीय आधार। • लक्षणार्थ से अर्थ-निर्णय। मीमांसा का सार: विधि, प्रतिषेध, अनुवाद, प्रधान-गौण भेद, और प्रयोजन — इनसे धर्म का सूक्ष्म निर्णय होता है।

English:
Thus injunction, prohibition, and purpose determine ritual correctness and moral order.
Mimansa Darshan 9.4 (46–60) Detailed Explanation
९,४.४६ — गुणो वा श्रयणार्थत्वात्
हिन्दी:
यदि श्रयण (आश्रय क्रिया) किसी अन्य प्रधान कर्म के लिए हो, तो वह गुण (अप्रधान) मानी जाएगी।

English:
If an act serves as support for another principal rite, it is subsidiary.
९,४.४७ — अर्थवादश्च तदर्थवत्
हिन्दी:
उससे संबंधित अर्थवाद (स्तुति-वचन) भी उसी प्रधान प्रयोजन के लिए है।

English:
The laudatory statement relates to that very purpose.
९,४.४८ — श्रुतेश्च तत्प्रधानत्वात्
हिन्दी:
श्रुति से यदि प्रधानत्व सिद्ध हो, तो उसे प्रधान ही मानना चाहिए।

English:
Scriptural statement establishes its principal status.
९,४.४९ — अर्थवादश्च तदर्थवत्
हिन्दी:
अर्थवाद पुनः उसी प्रधान अर्थ की पुष्टि करता है।

English:
Again, the eulogy confirms the same principal meaning.
९,४.५० — संस्कारं प्रति भावाच्च तस्मादप्यप्रधानम्
हिन्दी:
यदि वह केवल संस्कार (शुद्धि/सहायक क्रिया) के लिए है, तो वह प्रधान नहीं है।

English:
Being directed toward a preparatory rite, it is not principal.
९,४.५१ — पर्यग्निकृतानामुत्सर्गे तादर्थ्यमुपधानवत्
हिन्दी:
पर्यग्निकृत वस्तुओं के उत्सर्ग में उपधान (आधार) के समान साधनभाव होगा।

English:
In the release of fire-consecrated items, their function resembles a supporting base.
९,४.५२ — शेषप्रतिषेधो वार्थाभावादिडान्तवत्
हिन्दी:
यदि विशेष अर्थ न हो, तो शेष का प्रतिषेध माना जाएगा—इडन्त उदाहरण की भाँति।

English:
In absence of specific purpose, the remainder is excluded, as in similar cases.
९,४.५३ — पूर्वत्त्वाच्च शब्दस्य संस्थापयतीति चाप्रबृत्तेनोपपद्यते
हिन्दी:
“संस्थापयति” शब्द की पूर्वता से यह अप्रवृत्त (आरंभ से पूर्व) स्थिति में ही संगत है।

English:
The term “establishes” applies prior to actual performance.
९,४.५४ — प्रबृत्तेर्यज्ञहेतुत्वात्प्रतिषेधे संस्काराणामकर्म स्यात्तत्कारितत्वाद्यथा प्रयाजप्रतिषेधे ग्रहणमाजेयस्य
हिन्दी:
यदि यज्ञ हेतु से प्रवृत्ति हो चुकी है, तो संस्कारों के प्रतिषेध में वे कर्म नहीं रह जाते— जैसे प्रयाज के प्रतिषेध में आज्य का ग्रहण नहीं होता।

English:
When the sacrifice has begun, prohibition of auxiliaries renders them non-acts, like ghee in the prohibition of Prayāja.
९,४.५५ — क्रिया वा स्यादवच्छेदादकर्म सर्वहानं स्यात्
हिन्दी:
यदि क्रिया का अवच्छेद हो जाए, तो वह अकर्म बन जाती है—समग्र त्याग के समान।

English:
If action is delimited, it ceases to be an act altogether.
९,४.५६ — आज्यसंस्थाप्रतिनिधिः स्याद्द्रब्योत्सर्गात्
हिन्दी:
द्रव्य के उत्सर्ग में आज्यसंस्था प्रतिनिधि रूप में मानी जा सकती है।

English:
The ghee-rite may function as representative when substance is released.
९,४.५७ — समाप्तिवचनात्
हिन्दी:
समाप्ति-वचन से कर्म की पूर्णता जानी जाती है।

English:
Completion is known from concluding statements.
९,४.५८ — चोदना वा कर्मोत्सर्गादन्यैः स्यादविशिष्टत्वात्
हिन्दी:
यदि चोदना (विधि) कर्मोत्सर्ग से भिन्न न हो, तो अन्य साधनों से उसका पृथक्करण नहीं होगा।

English:
If injunction is indistinct from release of act, no separate distinction applies.
९,४.५९ — अनिज्यां च वनस्पतेः प्रसिद्धान्तेन दर्शयति
हिन्दी:
वनस्पति (समिधादि) के विषय में अनिज्या (अयाज्यत्व) प्रसिद्ध उदाहरण से सिद्ध किया जाता है।

English:
The non-sacrificial status of wood is shown by established precedent.
९,४.६० — संस्था तद्देवतत्वात्स्यात्
हिन्दी (समापन):
संस्था (अंतिम स्थिति या समापन) देवता-सम्बन्ध के कारण सिद्ध होती है। ९.४ (४६–६०) का सार:
• श्रयण और संस्कार सामान्यतः गुण (अप्रधान)।
• श्रुति से प्रधानत्व का निर्णय।
• प्रतिषेध से कर्म का लोप संभव।
• संस्था देवता-सम्बन्ध पर आधारित।
मीमांसा का सिद्धांत: प्रधान-गौण भेद, विधि-प्रतिषेध और प्रयोजन — इन्हीं से यज्ञकर्म की युक्ति स्पष्ट होती है।

English:
Thus principal and subsidiary acts are determined through injunction, prohibition, and purpose.
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