देवी-देवता और भगवान में क्या अंतर है?
शास्त्रों वेदों पुराणों में ब्रह्म, परमात्मा, भगवान, देवी और देवता शब्दों का प्रयोग है। इनमे से
हमने आपको बतया भागवत१.२.११ के द्वारा की ❛ब्रह्म, परमात्मा और भगवान एक
है।❜ अब प्रश्न यह है कि, 'ये देवी-देवता क्या है?'
शास्त्रों वेदों पुराणों में
देवी-देवता शब्दों का प्रयोग भगवान के लिए भी किया है और स्वर्ग में रहने वाले
देवता के लिए भी किया है। राधा देवी, सीता देवी जैसे शब्द भी शास्त्रों पुराणों में
अंकित है, और कृष्ण देवता है, यह भी
लिखा है। यहाँ तक की कृष्ण हमारे इष्ट देव है यह भी लिखा है। और यह भी लिखा है की
इंद्र, अग्नि ,वायु, कुबेर ये सब देवता है, ये देवता भगवान (ब्रह्म,
परमात्मा) नहीं है। अतएव सर्व प्रथम आप यह जानने की यह माया का संसार स्वर्ण लोग तक है। ११
श्रेणी है यह माया जगत का।
तो क्योंकि यह माया जगत स्वर्ग लोक तक
है। इस कारण वर्ष, जो लोग स्वर्ग, पृथ्वी और नर्क में निवास करने वाले
है वे माया के अधीन है यानि उनपर माया का कब्ज़ा है। जो व्यक्ति पृथ्वी (मृत्युलोक)
पर साधना करके भगवान (राम कृष्ण आदि) का दर्शन कर लेते है, उन
पर माया का हावी नहीं होती। अर्थात केवल वास्तविक महापुरुष या संत या गुरु को
छोड़कर सबपर माया का अधिकार है। अतएव हम लोग या स्वर्ग के देवता (इंद्र, अग्नि ,वायु, कुबेर आदि) सबपर
माया का हावी है, सब माया के अधीन है यानि उनपर माया का
कब्ज़ा है। माया के हावी होने से माया का दोष हम पर भी है और वही देवताओं पर भी है।
माया के दोष है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय। काम का अर्थ है- पुत्रैषणा
अर्थात स्त्री अथवा पुरुष संभोग की चाह, वित्तैषणा अर्थात धन
कमाने की चाह, लोकैषणा यानी यश कमाने की चाह और क्रोध, लोभ, मोह आदि।
स्वर्ग के देवी देवता पर भी माया हावी
है इसके प्रमाण निम्नलिखित है। गीता १०.२ और ईशावास्य उपनिषद् ४ यह मंत्र कहते है की,
"भगवान को इंद्र आदि देवता तक नहीं पा सके और न जान सकते है।" केनोपनिषद ३.१ में कथा है की,
"असुरों पर विजय प्राप्त कर, देवताओं
(इंद्र अग्नि वायु आदि) को अहंकार हो गया था।" केनोपनिषद
४.१ में लिखा है की भगवती प्रकट होकर इंद्र से कहती
है, "इंद्र यह सारा संसार भगवान की शक्ति मिलने पर काम
करता है। जो तुम्हारे पास शक्तियां है यह भगवान की शक्तियां है। प्रश्नोपनिषद् २.२.१३ देवी-देवता लोग भगवान
से प्राथना करते है "हे प्रभु! जिस प्रकार माता-पिता अपने पुत्रों की रक्षा
करते है वैसे ही आप हमारी रक्षा करते है, और आप ही हमें
कार्य करने की शक्ति और आज्ञा देते है।" कठोपनिषद्
२.३.३ यह मंत्र तैत्तिरीयोपनिषद
२.८ में भी है, यह मंत्र कहते
है कि, "भगवान के भय से इंद्र, सूर्य,
वायु देवता आदि अपना अपना काम करते है। भागवत ६.३.२९ "धर्म को ठीक-ठीक देवता
भी नहीं जानते।"
अतएव यह प्रमाण प्रमाणित करते है की
देवता माया के आधीन है। उनमे भी माया से सभी दोष काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भय है। अरे देखिये, स्वर्ग में तो त्रिलोक
सुंदरी 'उर्वशी' जो स्वर्ग में रहती है
और वो इंद्र के पास है। परन्तु, तभी
इंद्र एक अहिल्या (गौतम की पत्नी) से संभोग करने को आतुर होता है। ध्रुव, अम्ब्रीश जैसे भक्त जब तपस्या करते है तो इंद्र को अपने सिंहासन खतरे में
दिखाई पड़ती है।
ये जितने भी देवता है, सब हमारे तरह है। अगर
हम भी अधिक पुण्य कर ले तो हमे भी, इंद्र, वायु, अग्नि कुबेर का स्थान मिल जायेगा। जैसे अगर
किसी को इंद्र बनना है तो उसे १०० श्रमेव यज्ञ कराना पड़ता है। आप लोग ये न सोचे 'की हम भी एक बार इंद्र बन जाये।' हम लोग तो कई बार
इंद्र, वायु, अग्नि कुबेर का स्थान मिल
चूका है। क्योंकि रामचरितमानस उत्तरकाण्ड ४२ "बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब
ग्रंथन्हि गावा॥" अर्थात बड़े भाग्य
(पुण्यों) से यह मनुष्य शरीर मिला है। सब ग्रंथों ने यही कहा है कि यह शरीर
देवताओं को भी कठिनता से मिलता है। अर्थात हमने देवताओं से भी अधिक पुण्य किये है,
तभी तो यह शरीर मिला। इसलिए देवता लोग भी यह मानव देह चाहते है।
क्योंकि देवता लोग कुछभी करें उनका कर्म भगवान नहीं लिखते। देवी-देवताओं को कर्म
करने का अधिकार नहीं है। क्योंकि स्वर्ग भोग योनि है,
वहां केवल भोगना है। और यह मानव शरीर (मृत्युलोक या पृथ्वी) कर्म
योनि है, यहाँ के कर्म का फल भगवान देते है।
तो जिनका निवास स्वर्ग में है, उन्हें देवी और देवता
कहा जाता है और यह लोग हमारे तरह ही माया के आधीन है, किन्तु
इन्होंने जो पुण्य किये है उसके फल अनुसार उनके स्वर्ग में उनका स्थान मिला है। और गीता ९.२१ "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं
विशन्ति" और भागवत १.२.९ यह कहते है की "जैसे ही देवी-देवताओं
का पुण्य समाप्त होता है, तो उन कुकर सुकर कुत्ते बिल्ली कीट
पतंग आदि योनि(शरीर) में जन्म मिलता है।" अतएव
भगवन और देवता एक नहीं है। जहां राधा देवी, सीता देवी,
कृष्ण देव आदि शब्दों का चयन किया गया है। वह भगवान के लिए किया है।
शास्त्रों वेदों पुराणों में भगवान के लिए अनेक शब्दों
का चयन किया गया है, जैसे कठोपनिषद्
१.३.२ में जीवात्मा, प्रश्नोपनिषद्
२.२.१३ में प्राण आदि।
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