🕉️🙏ओ३म् सादर नमस्ते जी 🙏🕉️
🌷🍃 आपका दिन शुभ हो 🍃🌷
दिनांक - -२३ नवम्बर २०२४ ईस्वी
दिन - - शनिवार
🌗 तिथि -- अष्टमी ( १९:५६ तक तत्पश्चात नवमी )
🪐 नक्षत्र - - मघा ( १९:२७ तक तत्पश्चात पूर्वाफाल्गुन
पक्ष - - कृष्ण
मास - - मार्गशीर्ष
ऋतु - - हेमन्त
सूर्य - - दक्षिणायन
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ६:५० पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १७:२५ पर
🌗चन्द्रोदय -- २४:३६ पर
🌗 चन्द्रास्त - - १३:०६ पर
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२५
कलयुगाब्द - - ५१२५
विक्रम संवत् - -२०८१
शक संवत् - - १९४६
दयानंदाब्द - - २००
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥 प्रश्न - हमारे समाज में मंगलवार का दिन शुभ माना जाता है जबकि शनिवार का दिन अशुभ,क्या यह सही है ?
💐उत्तर - नहीं, कोई भी दिन या घडी शुभ या अशुभ नहीं होती बल्कि व्यक्ति के कर्म ही शुभ या अशुभ होते हैं ।
ईश्वर की सृष्टि में सभी दिन समान होते हैं । वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो ऋतु व मास के अनुसार दिन सर्द-गर्म या छोटे-बडे तो होते हैं परन्तु शुभ या अशुभ का किसी दिन विशेष या काल विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं होता । जिन व्यक्तियों की मृत्यु मंगलवार को हो जाती है उनके लिए मंगलवार अशुभ हो जाता है इसी प्रकार शनिवार को यदि किसी के घर में बालक जन्म लेवे तो उसके लिए शनिवार भी शुभ हो जाता है | इसी प्रकार मंगलवार को लोगों के साथ अनेक दुखदायक घटनाएं घटती हैं व शनिवार को सुखदायक । इसलिए दिनों के विषय में यह नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता कि अमुक दिन शुभ है अमुक दिन अशुभ ।
यदि ऐसा होता तो मंगलवार को सब कुछ अच्छा ही होना चाहिए व शनिवार को बुरा परन्तु ऐसा नहीं होता । किसी भी दिन अच्छा भी घटित हो सकता है किसी भी दिन बुरा भी ।
वास्तविक स्थिति यही है कि शुभ या अशुभ अच्छा या बुरा समय व्यक्ति के अच्छे या बुरे कर्मों के कारण होता है । फिर इस विषय में यह भी विचारणीय है कि संसार में कोई मंगलवार को कोई सोमवार को कोई बृहस्पतिवार को,कोई बुधवार को या रविवार को शुभ मानकर व्रत उपवास आदि रखते हैं अपने कार्यों को आरम्भ करते हैं । वहीं कई लोग इन्हीं दिनों में काम करना अशुभ भी मानते हैं जैसे नाई लोग मंगलवार को बाल काटने के लिए अशुभ मानते हैं । मुस्लिम लोग शुक्रवार को शुभ मानते हैं । यदि हम संसार में दिन या काल विषयक मान्यताएं खोजने निकलें तो हजारों प्रकार कि मान्यताएं मिल जाएगीं जिनमें सप्ताह के सभी दिनों को लोग शुभ या अशुभ मानते मिल जाएगें ।
इसलिए दिनों के शुभ या अशुभ होने का सम्बन्ध व्यक्ति की धारणा या आस्था से ही है न कि विज्ञान से न ही शास्त्रीय परम्परा या ज्ञान से क्योंकि शास्त्रों में भी कोई ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं होता जिससे यह सिद्ध होता हो कि अमुक दिन या काल अच्छा है अमुक बुरा । वस्तुत: जो शास्त्रों में है वह सब विज्ञानसम्मत है व जो विज्ञानयुक्त है वही शास्त्रों में है ।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷 ओ३म् हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। योऽसावादित्ये पुरूष: सऽ सावहम्। ओ३म् खं ब्रह्म ।।( यजुर्वेद ४०|१७ )
💐 अर्थ :- ( हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य मुखम् अपिहितम्।)
ज्योतिर्मय चमकीले ढक्कन से सत्य स्वरूप परमात्मा का मुंह ढका हुआ है, अर्थात संसार की चमक-दमन, भोग - विलासों के अत्यन्त आकर्षण के कारण मनुष्य से भगवान ओझल हो गया है ।जिस दिन हमने इस संसार की चमक-दमन से, संसार के इन लुभावने भोग - विलासों से अपने को उभार लेंगे, अर्थात इस ढक्कन को उठा लेंगे, उसी समय हमें उस प्रकाश स्वरूप प्रभु का भान हो जायेगा और वही हमें अपने स्वरूप का साक्षात् कराता हुआ कहेगा कि
( य: असौ आदित्ये पुरूष: )
जो वह आदित्य में, सूर्यमंडल में व्यास हुआ पुरूष -- पूर्ण परमेश्वर है।
( स: असौ अहम् ) वह पुरुष में ही ( ओ३म् खं ब्रह्म) ओ३म् नाम से विख्यात, सब जगत् का रक्षक, आकाश के समान सर्वत्र व्यापक और गुण - कर्म - स्वभाव की दृष्टि से सबसे महान -- बड़ा हूँ ।
संसार के रमणीय भौतिक ऐश्वर्य के आवरण से सत्य स्वरूप प्रभु का स्वरूप ढका हुआ है । जिस दिन मानव यम -- ( अहिंसा - सत्य - अस्तेय आदि) - नियम --- ( शौच - सन्तोष - तप - स्वाध्याय आदि ) आसन - प्राणायाम - प्रत्याहार आदि से इस सांसारिक लुभावने आवरण को उतारकर परे फैंक देगा और श्रद्धा- भक्ति निष्ठापूर्वक धारणा - ध्यान- समाधि द्वारा उसमें समाहित होकर उसका अनुभव प्राप्त करेंगा, उस दिन वह प्रभु भी उसके सम्मुख अपना पूर्ण परिचय देकर कण - कण में सर्वत्र उसको अपना भान करता हुआ कहेगा " जो वह आदित्यमण्डल - सूर्यमण्डल में परिपूर्ण हुआ उसको अपने नियम में चलाने वाला पुरुष है, सो वह में ही ' ओ३म् ' नाम से प्रसिद्ध, सबका रक्षक, आकाश के तुल्य सर्वत्र व्यापक, सबसे सब दृष्टि से ज्येष्ठ और श्रेष्ठ पुरूष परमेश्वर हूँ ।
साधकों को चाहिए कि वे जप - तप आदि द्वारा इन सांसारिक भोग - विलासों से ऊपर उठे, इन बाहरी आकर्षणों से विरक्त होकर, अद्वितीय, सर्वत्र परिपूर्ण हुए, 'ओ३म्' नाम से सर्वत्र प्रसिद्ध सबके रक्षक, कण- कण और क्षण- क्षण में बसने वाले आकाशवत् सर्वत्र व्यापक महान् परमेश्वर का साक्षात करने का हार्दिक प्रयास करें ।
क्योंकि यदि इस मानव चोले में आकर भी इस मुख्य लक्ष्य - प्रभु के साक्षात करने से वञ्चित हो गये तो फिर यह महती विनष्टि होगी ।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- पञ्चर्विंशत्युत्तरशततमे ( १,९६,०८,५३,१२५ ) सृष्ट्यब्दे】【 एकाशीत्युत्तर-द्विसहस्रतमे ( २०८१) वैक्रमाब्दे 】 【 द्विशतीतमे ( २००) दयानन्दाब्दे, काल -संवत्सरे, रवि- दक्षिणायने , हेमन्त -ऋतौ, मार्गशीर्ष - मासे, कृष्ण पक्षे,अष्टमी
तिथौ, मघा
नक्षत्रे, शनिवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर गते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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